स्ट्रीट फोटोग्राफी – गलियों की धूल में ख़ूबसूरती ढूँढने वाली आँखें  

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गार्गी मिश्रा/

गार्गी मिश्रा

कला के सफ़र में एक दिलचस्प सिलसिला  देखने को मिलता है। वह आम जिंदगी से, बुनियादी ज़रूरतों और संघर्षों से पैदा हुई फ़िर कुलीनतावाद के कब्ज़े में आकर सीमित दायरे में सिकुड़ी फ़िर उसने अपने आप को आज़ाद करने और जिंदगी से जुड़ने में रूचि दिखाई, इसके लिए संघर्ष किया। यह सिलसिला शताब्दियों से चला आ रहा है। यह थियेटर के साथ हुआ, पेंटिंग के साथ हुआ और संगीत के साथ भी हुआ। फोक से एलीट और एलीट से फोक की ओर आने जाने का यह सिलसिला समाज के बदलावों को भी दिखाता है,
हालांकि यहाँ यह हमारा विषय नहीं है।

वर्ष 1838 या 1839 में स्ट्रीट फोटोग्राफी के तहत पहली फोटोग्राफ लूईस ज़ॉक मैंडे डाग्यूरे द्वारा ली गई थी जिसमें उन्होंने अपने स्टूडियो की खिड़की से पेरिस के बॉलेवार्ड डू टेंपल को कैप्चर किया था

हाई मेगापिक्सल के मोबाइल कैमरों ने फ़ोटोग्राफ़ी की पुरानी सूरत को सिरे से बदल दिया है। रोज़मर्रा की कैंडिड तस्वीरें, राह चलते कभी आम तो कभी ख़ास दृश्य और तस्वीरों की मानों इक बाढ़ में हम शायद ये भूल गए कि कब और कैसे स्ट्रीट आर्ट से जन्मे कला के एक सब कल्चर – स्ट्रीट फोटोग्राफी ने हमारे बीच एक एहम जगह बना ली। गौर करें तो  स्ट्रीट फोटोग्राफी का इतिहास आधी सदी से कुछ ज़्यादा का है। बीसवीं सदी के शुरुआती दौर में कुछ जाने माने फोटोग्राफर्स (उदाहरण के तैर पर – एल्फ्रेड स्टीगिल्ट्ज) अपने आस-पास के अर्बन कल्चर को कैमरे की गिरफ़्त में एक नया आयाम दे रहे थे लेकिन यह मीडियम इतना नया था और तकनीक इतनी सीमित की ज़्यादातर फोटोग्राफर्स की कला कैमरे की कैपेसिटी को टेस्ट करने और डार्क रूम में इफेक्टस के सहारे तस्वीरों को मैन्यूपुलेट करने में ज़ाया हो रही थी।

Photograph of meat market in Varanasi. A butcher’s daily life with his knife. Photograph-Maciez Dakowicz

स्ट्रीट फोटोग्राफी की असल पहचान तब तक नहीं बनी जब तक फोटोग्राफर्स ने 1880 में इमप्रेशनिश्ट पेंटर्स के काम से प्रेरणा ले कर तकनीक के साथ रियल लाईफ फोटोग्राफी की इच्छा को एक दिशा देने की कोशिश की। इस कोशिश में लेइका हैंड हेल्ड पोर्टेबल कैमरा फोटोग्राफर्स के लिए एक वरदान साबित हुआ। 1924 में कमर्शियली उपलब्ध इस कैमरे ने फोटोग्राफर को मूव करते हुए एक से एक मूवमेंट्स को कैप्चर करने में मदद की। 35 एम एम के इस कैमरे में वाईड अपारचर, शार्ट एक्सपोज़र टाईम की सुविधा होने से फोटोग्राफर को आऊटडोर्स में एक ही समय में कई तस्वीरों को लेने मे सहायता हुई। अब वे दिन गए जब लंबे एकस्पोजर टाईम में देर तक एक ही पोज़ में ब्लर इफेक्ट इत्यादी इस्तेमाल किये जाते थे।

1838 या 1839 में स्ट्रीट फोटोग्राफी के तहत पहली फोटोग्राफ लूईस ज़ॉक मैंडे डाग्यूरे द्वारा ली गई थी जिसमें उन्होंने अपने स्टूडियो की खिड़की से पेरिस के बॉलेवार्ड डू टेंपल को कैप्चर किया था वहीं 1851 में चालर्स नेग्रे पहले फोटोग्राफर हुए जिन्होंने पेरिस की सड़कों पर लोगों की चलती-फिरती तस्वीरों को कैप्चर करने में महारत हासिल की। सन् 1930 में यूरोप के प्रसिद्ध और बेहतरीन फोटोग्राफर्स एन्ड्रे कर्ट्ज् , इज्ले बिंग , हेन्री कार्टियर ब्रेसन की पहली पसंद लेइका रहा। पर अचंभे की बात यह है इन फोटोग्राफर्स ने कभी भी अपने आप को स्ट्रीट फोटोग्राफर के रूप में नहीं स्वीकारा बल्कि वे ख़ुद को फोटो जर्नलिस्ट या फैशन फोटोग्राफर कहना पसंद करते थे या फिर बतौर एक नए मिडीयम का एक्सपेरिमेंटर। दूसरे विश्व युद्ध के बाद लेइका, फोटोग्राफर्स की प्रायरटी में रहा जिनमें न्यूयार्क के सिटी फोटोग्राफर्स रॉय डेकरावा, लिस्टे मॉडल, विलीयम क्लेन, हेलेन लेविट, रॉबर्ट फ्रैंक( अपनी विश्व विख्यात किताब – ‘द अमेरिकन्स’ के लिए प्रसिद्ध जिसने आने वाली पीढ़ी के फोटोग्राफर्स के लिए युनाइटेड स्टेट्स और यूरोप की सट्रीट फोटोग्राफी के माध्यम से स्ट्रीट फोटोग्राफी के लिए एक स्तंभ साबित हुआ) इत्यादि शामिल रहे।

 

1960 के दशक में ली फ्रीडलैंडर, गैरीविनोग्रैंड, डायन आरबस ने स्ट्रीट फोटोग्राफी में कुछ प्रमुख नाम रहे। आज स्ट्रीट फोटोग्राफी दुनिया भर में कई आर्टिस्ट्स द्वारा अपनाई जाने वाली कला में शामिल है जिसमें लेइका से ले कर सेल फोन्स इक्कीसवीं शताब्दी में फोटोग्राफी के चेहरे हैं।

(गार्गी  जीवन को कविता की तरह बरतती हैं. तस्वीरों से कविता लिखती हैं. उन तस्वीरों के ब्यौरे भी लिखे तो भी कविता लिखती हैं. और फिर कविता तो लिखती ही लिखती हैं. बनारस इनका जीवन है. बनारस के बारे में कितना कुछ लिखा जा चुका है फिर भी गार्गी जब बनारस पर लिखती हैं तो नया लिखती हैं. सौतुक बहुत जल्दी आपको गार्गी की नज़र से बनारस की सैर कराएगा.)

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