माखनलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय में गोशाला और गोशाले में पत्रकार तैयार होंगे

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अवनीश मिश्रा/
 
भोपाल स्थित माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता विश्वविद्यालय अब अपने कैम्पस में गोशाला खोलने की योजना बना रहा है.
 
देश के हृदय स्थल मध्यप्रदेश में माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय जो माख़नलाल पत्रकारिता विश्वविद्यालय के नाम से चर्चित है पिछले कुछ सालों से अपने नए नए कारनामों की वजह से काफी  चर्चा में रहा है.  अलबत्ता इनमें शिक्षा-दीक्षा में सुधार को लेकर कोई पहल शामिल नहीं रहा है.
 
इस नए फैसले में विश्वविद्यालय ने तय किया है कि बिसनखेड़ी में बन रहे अपने नये कैंपस में 5 एकड़ ज़मीन पर गौशाला बनाई जायेगी. सूत्रों के मुताबिक ये प्रस्ताव यूनिवर्सिटी के मॉनिटरिंग इकाई महापरिषद में रखा जा चुका है.
  
इस बाबत जब हमने यूनिवर्सिटी के कुलपति बी के कुठियाला से बात की तो उन्होंने कहा की यूनिवर्सिटी में दूध के लिए गौशाला बनाई जा रही है इसके साथ ही गोबर से बायो-गैस भी तैयार किया जाएगा.
 
अब सवाल ये है कि एक पत्रकारिता विश्वविद्यालय को सबकुछ छोड़ अचानक दूध की इतनी जरुरत क्यों आ गई. क्या पत्रकारिता के नए रंगरूट बिना दूध पिए पत्रकार नहीं बन पा रहे थे?
 
एक कर्मचारी ने नाम न छापने के शर्त पर बताया कि कुलपति का कार्यालय अब बहुत ही कम समय का रह गया है इसलिए कुठियाला ये सब कर रहे हैं. यह सब अपना भविष्य सुरक्षित करने के लिए किया जा रहा है.
 
इस कर्मचारी का इशारा राष्ट्रीय सेवक संघ की तरफ था जिसको खुश करने के लिए कुठियाला इस तरह के कदम उठा रहे हैं. कुठियाला संघ से जुड़े रहे हैं.
 
इस मुद्दे पर जब छात्रों से बात करने कि कोशिश की गई तो छात्रों ने बात करने से मना कर दिया. उनकी बातचीत में कुलपति और उनसे जुड़े कर्मचारियों का डर साफ़ नजर आ रहा था.
 
इस मुद्दे पर जब कांग्रेस से जुड़े संगठन एनएसयूआई के छात्र नेता सुहृद तिवारी से पूछा गया तो उन्होंने इस तरह के कार्यों का विरोध करते हुए कहा, "हम पत्रकारिता के यूनिवर्सिटी में किसी भी तरह के संप्रदायिक आयोजन या निर्माण नहीं होने देंगे. हम और हमारे संगठन ने इसका पुरजोर विरोध करने का फैसला किया है." वहीं वाम संगठन भी इस निर्माण का विरोध करते नजर आ रहे हैं. सीपीएम के प्रदेश महासचिव बादल सरोज ने इस मुद्दे पर कहा की सरकार को चाहिए कि कुलपति को तुरंत निलंबित कर किसी गौशाला यूनिवर्सिटी में सेट कर दिया जाए.
 
सवाल यह उठता है कि जिस विश्वविद्यालय में न अच्छी लाइब्रेरी हो, न कम्प्यूटर लैब  ढंग से काम करे और जहां मूलभूत सुविधा के लिए छात्र परेशान होता हो, उस विश्वविद्यालय का कुलपति ऐसे प्रस्ताव कैसे ला सकता है. इससे साबित होता है कि कुठियाला विश्वविद्यालय के मूल उद्देश्य से वाकिफ ही नहीं हैं. यह विश्वविद्यालय चाहता तो देश को कुछ अच्छे पत्रकार देने की कोशिश करता, खासकर हिंदी क्षेत्र में पर दुर्भाग्यपूर्ण है कि यह विश्वविद्यालय इस दिशा में प्रयास भी नहीं करता दिख रहा है.
 

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