चेहरे पर चेहरा: मुखोटे के पीछे छुपा आदमी

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन

एक ही मिजाज की दो खबरे है। 2016 -17 में रेलवे के आरक्षित डिब्बों में यात्रा करने वाले कुछ यात्री  कम्बल, मग,तकिया, खिड़की की फ्रेम तक अपने साथ ले गए। इस छुटपुट चोरी से रेलवे को कुल तीन करोड़ रूपये का फटका लगा है। आम धारणा है कि आरक्षण करा कर यात्रा करने वाले लोग पढ़े लिखे और संपन्न होते है।

दूसरी कहानी बेहद शिक्षित और उच्च संपन्न वर्ग के लोगों की है जो ‘कोबरा पोस्ट 2’ के स्टिंग ऑपरेशन में बेनकाब हुए।  दोनों ही परिस्तिथियों में पकडे जाने पर किसी भी पक्ष ने अपनी पृष्ठ्भूमि पर आने वाली आंच की परवाह नहीं की। लालच ने तर्कशील लोगों के विवेक को हर लिया।

टी इस लुइस ने कही कहा है ‘जब कोई नहीं देख रहा हो तब भी आप संयंत व्यवहार रखते है तो इसे ईमानदारी कहा जा सकता है’ .. शॉपिंग मॉल, ऑफिस और रिहाइशी इलाकों में स्पष्ट नजर आने वाले बोर्ड के माध्यम से याद दिलाया जाता है कि प्लीज् अपनी हद में रहिये- आप सी सी टी वी की हद में है। भले ही कैमरे चालू अवस्था में न हो परन्तु उनकी चेतावनी आम आदमी पर मनोवैज्ञानिक असर करती है। अक्सर इस प्रश्न को अरसे से तलाशा जा रहा है कि भला आदमी मौका मिलते ही क्यों स्तरहीन हरकत कर गुजरता है? यहाँ मनोविज्ञान ही इस गुत्थी को समझने सुलझाने में मदद के लिए आगे आता है।

जब कोई नहीं देख रहा हो तब भी आप संयंत व्यवहार रखते है तो इसे ईमानदारी कहा जा सकता है

मानवीय व्यवहार का अध्ययन करने वाले अधिकाँश चिंतकों ने मनुष्य के व्यक्तित्व को दो रंगो में बांटा है। सफ़ेद व घुसर काला। सफ़ेद रंग व्यक्ति की सरलता, रचनात्मकता, सादगी और ईमानदारी को दर्शाता है वही काला ठीक विपरीत विशेषण को बताता है। मजबूत इच्छा शक्ति वाले लोग अपने सफ़ेद रंग को बचा लेते है परन्तु थोड़े से भी कमजोर विश्वास वाले घुसर प्रभावों के शिकार बन जाते है। उसने गलत किया तो मैं भी कर सकता हूँ या सब कानून तोड़ते है तो में क्यों न तोडू ? का भाव अच्छे भले आदमी को छोटा मोटा अपराध करा देता है।

यही नहीं भीड़ में यही बात सामूहिकता का रूप लेकर और अधिक विकराल हो जाती है। किसी बड़े व्यवसायी के टेक्स चोरी, किसी फिल्म स्टार की बदचलनी या किसी नामचीन  खिलाड़ी के नशे की लत के समाचार आम आदमी के अवचेतन में ‘ग्लोरिफाइएड’ होकर धधकते लावा की तरह बहते रहते है।  जब भी इसे  रिसाव को मौका मिलता है यह भले आदमी से स्तरहीन आचरण करा देता है। अवचेतन की यह धारा और अधिक  ताकतवर तब हो जाती है जब टीवी स्क्रीन या बड़े परदे की छवियाँ अतृप्त इच्छाओ और आकांशाओ को ‘जस्टिफाई ‘ करने लगती है।

रियलिटी टीवी शो ‘बिग बॉस’ की लोकप्रियता का आधार ही उसके प्रतियोगियों का घटिया और स्तरहीन व्यवहार था। इस शो ने साबित किया कि बहुसंख्य दर्शक नकारात्मकता पसंद करते है। और कोई वजह नहीं कि पिछले दो तीन दशकों में  बड़े परदे पर खलनायकों के लिए विशेष भूमिकाए लिखी गई और वे पात्र नायक से ज्यादा  टिकाऊ लोकप्रियता को प्राप्त हुए।  शाकाल, मोगेम्बो, गब्बर – नकारात्मकता की खदान के नायब नमूने है। फिल्मों में नायक की लंबी पारी खेल चुके शीर्ष अभिनेताओं में भी ‘ग्रे शेड्स’ की भूमिकाओं के लिए खासा रुझान रहा है।

राकेश ओम प्रकाश मेहरा ने अमिताभ बच्चन को एक पटकथा पढ़ने के लिए दी।  संयोग से अमिताभ दिल्ली जा रहे थे।  समय  बिताने के लिए उन्होंने वह पटकथा साथ रख ली। कहानी इतनी रोचक थी कि  मुंबई से  दिल्ली के सफर का पता ही नहीं चला। एयरपोर्ट पर उतरते ही बच्चन जी ने  राकेश को फ़ोन लगाया कि वे यह फिल्म कर रहे है।  इस  तरह ‘ अक्स’ (2001 ) परदे पर आई।  अमिताभ को  इस फिल्म के लिए ‘फिल्म फेयर बेस्ट एक्टर’ का अवार्ड मिला। बुरे आदमी (मनोज बाजपाई) की आत्मा  अच्छे आदमी के शरीर में प्रवेश कर क्या गुल खिला सकती है इस फिल्म का कथानक था।

सुदूर अफ़्रीकी जन जातियों में आज भी अपने घर के प्रवेश द्धार पर डरावने मुखोटे टांगने की परंपरा है। आगंतुक को स्मरण कराने के लिए कि वह अपनी बुराई और नकारात्मकता घर के  बाहर ही छोड़ आये।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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