अब फेसबुक भी आपकी हैसियत के अनुसार आपसे व्यवहार करने की तैयारी में

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शिखा कौशिक/

अब फेसबुक भी करेगा आपके हैसियत के अनुसार आपसे व्यवहार. कहने का मतलब यह है कि फेसबुक एक ऐसी तकनिकी लेकर आ रहा है जिससे इस सोशल नेटवर्किंग साइट को आपके आर्थिक और सामाजिक हैसियत का अंदाजा लग सके. वैसे तो फेसबुक यह कहकर ये सारे आंकड़े तैयार करेगा कि लोगों को उनकी हैसियत के मुताबिक़ विज्ञापन दिखाए जाएँ. लेकिन इस सोशल नेटवर्किंग साइट्स का अमेरिकी चुनाव में बेजा इस्तेमाल देखकर आप खुद अनुमान लगा सकते हैं कि उन आंकड़ो का भविष्य क्या होगा. या कम से कम आप निश्चिंत तो नहीं ही हो सकेंगे कि इन आंकड़ो को कोई बेजा इस्तेमाल न हो.

फेसबुक ने एक तकनिकी के पेटेंट का आवेदन दाखिल किया है, जो ऑटोमेटिकली या यूँ कहें की अपने आप ही यूजर्स की सामाजिक-आर्थिक हैसियत की पहचान कर सकता है तथा उन्हें तीन अलग-अलग वर्गो में विभाजित कर सकता है. ये वर्ग हैं – कामकाजी वर्ग, मध्य वर्ग और उच्च वर्ग.

डेली मेल की रिपोर्ट में शनिवार को बताया गया कि पेटेंट के मुताबिक, यह सोशल मीडिया दिग्गज एक ऐसी प्रणाली बनाना चाहती है तो यूजर्स के निजी आंकड़ों को इकट्ठा कर उनका विश्लेषण कर उसकी सामाजिक-आर्थिक हैसियत का अंदाजा लगा सकती है। इन निजी आंकड़ों में शिक्षा, मकान-स्वामित्व और इंटरनेट का इस्तेमाल भी शामिल हैं.

इस पेटेंट को शुक्रवार को सार्वजनिक किया गया. इसमें एक ऐसे एल्गोरिदम का सुझाव दिया गया है, जो फेसबुक की क्षमताओं में सुधार कर सकता है, जिससे वह यूजर्स को अधिक प्रासंगिक विज्ञापन दिखा सकेगा.

यह सोशल मीडिया दिग्गज एक ऐसी प्रणाली बनाना चाहती है तो यूजर्स के निजी आंकड़ों को इकट्ठा कर उनका विश्लेषण कर उसकी सामाजिक-आर्थिक हैसियत का अंदाजा लगा सकती है

पेटेंट में कहा गया, “अपने यूजर्स के सामाजिक-आर्थिक हैसियत का अंदाजा लगाने से उसे (फेसबुक) थर्ड पार्टी के विज्ञापन टारगेट यूजर्स तक पहुंचाने में मदद मिलेगी.”

यह तो मानी हुई बात है कि फेसबुक अब इतना प्रभावशाली हो गया है कि अपने यूजर्स के लिए नए-नए नियम-कानून लाने लगा है. कभी अचानक से न्यूज़ फीड में विडियो की भरमार हो जाती है तो कभी न्यूज़ वेबसाईटस की खबरें दिखने लगती हैं. कभी स्क्रीन पर आने वाला विडियो खुद-ब-खुद चलने लगता है. हाल में आये इनके बयान से स्पष्ट होता है कि अब फेसबुक न्यूज़फीड को कम करने का प्रयास कर रहा है. उसी बयान में यह भी कहा गया कि फेसबुक स्थानीय संचार को अधिक बढ़ावा देगा.

कहने का मतलब यह है कि फेसबुक एक ऐसा प्लेटफॉर्म हो गया है जो अपने इस्तेमाल करने की शर्त हर कुछ दिन पर बदलते रहता है. आप फेसबुक पर अपने न्यूज़फीड और व्यवहार को प्लान नहीं कर सकते क्योंकि अचानक एक दिन पता चलेगा कि अब यह सोशल नेटवर्किंग साइट आपकी उस रणनीति को प्रोत्साहन नहीं देगा.

वर्तमान में फेसबुक को करीब 140 करोड़ लोग इस्तेमाल करते हैं, ऐसा अनुमान है. लेकिन इसी दौर में यह भी खबर है कि फेसबुक से लोगों का मन उचटने लगा है और पहले के मुकाबले लोग अब फेसबुक पर कम समय खर्च करते हैं.आपको मालूम होना चाहिए कि आप जितना अधिक समय इस सोशल नेटवर्किंग साइट पर खर्च करते हैं उसी अनुपात में इसके मालिक मार्क जुकरबर्ग की आमदनी बढती है.

लेकिन हाल में आये जुकरबर्ग के बयान के अनुसार लोग फेसबुक पर पहले के मुकाबले करीब पांच करोड़ घंटे कम खर्च रहे हैं. यह फेसबुक इस्तेमाल करने वालों के रोज खर्च करने वाले समय का हिसाब है. एक टेकक्रंच नाम की वेबसाइट के अनुसार, अब हर व्यक्ति पहले की अपेक्षा फेसबुक पर कम से कम पांच प्रतिशत कम समय देता है.

इसका मतलब यह है कि लोग फेसबुक के द्वारा थोपे गए शर्तों और उसके बेजा इस्तेमाल की वजह से इससे विमुख हो रहे हैं. और अगर फेसबुक ऐसे ही अपने यूज़र्स पर अपनी शर्तें थोपता रहा तो हो सकता है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स की दुनिया के इस बाहुबली की हालत भी एक समय के ऑरकुट की तरह हो जाए.

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