“वज़ीर-ए-आज़म” शेख़ अब्दुल्ला और नया कश्मीर : भूमि सुधार और आगे

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कवि, लेखक और गहन अध्ययनकर्ता अशोक कुमार पाण्डेय किसी परिचय के मोहताज नहीं हैं. समाज में चल रहे उथल-पुथल पर स्पष्ट राय रखने और स्टैंड लेने वाले अशोक कुमार पाण्डेय कश्मीर के इतिहास पर एक शोधपरक पुस्तक ‘कश्मीरनामा’ लेकर आ रहे हैं. इस तरह की पुस्तक हिंदी में उपलब्ध नहीं हैं.

जब भी कश्मीर पर बात होती है तब आतंक, बन्दूक, नेता, पकिस्तान ही सारी जगह घेरते हैं. वहाँ के लोग, समाज, खेत खलिहान, महंगाई, बेरोजगारी और इस आईने में राजनितिक फैसले अक्सर बात-चीत का हिस्सा नहीं हो पाते हैं. इस लिहाज से यह पुस्तक हिंदीभाषियों के लिए एक नई खिड़की खोलेगी. इसकी एक बानगी आप कश्मीर में हुए भूमि-सुधार पर यहाँ  प्रकाशित इस पुस्तक अंश से देख सकते हैं. उम्मीद है यह पुस्तक कश्मीर पर चल रहे बहस में एक जरुरी हस्तक्षेप साबित होगी-सौतुक 

अशोक कुमार पाण्डेय/

सत्ता में आने के बाद शेख़ अब्दुल्ला ने “नया कश्मीर” के सपने को अमली जामा पहनाने की कोशिशें शुरू कर दीं। इस दिशा में उठाया गया सबसे महत्त्वपूर्ण क़दम था – भूमि सुधार। कश्मीर के भूमि सुधारों को भारत में  हुए भूमि सुधारों में सबसे अधिक क्रांतिकारी माना जाता है। हमने देखा है कि शेख़ के भारत के प्रति झुकाव का एक कारण यह भी था कि पाकिस्तान में  जिस तरह का सामंती शासक वर्ग आया था वह कभी भी “नया कश्मीर” के जनपक्षधर एजेंडे को पूरा नहीं करने देता और यह भविष्य ने सिद्ध भी किया, जहाँ शेख़ जम्मू और कश्मीर में  क्रांतिकारी भूमि सुधार लागू करने में सफल रहे वहीं पाकिस्तान में  भूमि सुधार का प्रस्ताव करने के कारण मियाँ इफ्तिखारुद्दीन मुस्लिम लीग और पाकिस्तान की राजनीति से बाहर कर दिए गए। सत्ता में आने के बाद शेख़ अब्दुल्ला की सरकार ने एक झटके में  मुआफ़ीदारों और मुक्कर्रीख्वारों को मिलने वाली सुविधायें समाप्त कर दीं।

अशोक कुमार पाण्डेय

1950 में  लाये गए “बिग लैंडेड एस्टेट्स अबोलिशन एक्ट” के तहत (1) भूमि की अधिकतम सीमा 182 कैनाल (22 ।75 हेक्टेयर) तय कर दी गई। इसमें बागानों, चारागाहों, जलाऊ और न जोतने योग्य बेकार भूमि को शामिल नहीं किया गया, (2) बंटाई पर खेती करने वाले किसानों को ज़मीन का मालिकाना दिया गया, (3) जिन किसानों को ज़मीन उपलब्ध कराई गई उनके लिए सीमा 160 कैनाल की सीमा निर्धारित की गई जिसमें पहले से मालिकाने की ज़मीन भी शामिल थी, (4) मुआवज़े के सवाल पर यह व्यवस्था दी गई कि राज्य की विधानसभा इसे बाद में तय करेगी। विधानसभा में  फ़ैसला लिया गया कि किसी तरह का मुआवज़ा नहीं दिया जाएगा। इस तरह जम्मू और कश्मीर भारत का इकलौता राज्य बन गया जहाँ बड़े ज़मींदारों को ज़मीनों के बदले कोई मुआवज़ा नहीं दिया गया, (5) पुंछ क्षेत्र के सभी ग़ैर मौरूसी काश्तकारों को उनकी ज़मीनों का मालिकाना दे दिया गया, (6) ऊधमपुर में शिक़ार  के लिए आरक्षित की गई ज़मीनों का आरक्षण समाप्त कर दिया गया और किसानों को इन ज़मीनों पर खेती करने की अनुमति दी गई, (7) शिक़ार  के नियमों में बदलाव करके जंगलों के आसपास के गाँवों के किसानों को उन जंगली जानवरों पर गोली चलाने के अधिकार दिए गए जो उनकी खेती को नुक्सान पहुँचाते थे और (8) 13 अप्रैल 1947 के बाद ज़मीन के अंतरण के सभी आदेश और डिक्रियों को अमान्य घोषित कर दिया गया ताकि इस क़ानून की मूलभावना से खिलवाड़ न हो सके। इसके अलावा 1953 में राज्य सरकार ने मुजावज़ा की व्यवस्था ख़त्म कर दी और किसानों को अपना अतिरिक्त अनाज़ सरकार को बेचने की आज़ादी।

इसी के साथ लगान की दर आधे से एक तिहाई कर दी गई। ऋणमाफ़ी के लिए ऋण समाधान न्यायालय बनाये गए और एक ही झटके में  कुल ऋण 80 प्रतिशत घटाकर 2.4 मिलियन से 1.2 मिलियन रुपये कर दिया गया।

भारत में भूमि सुधारों का गंभीर अध्ययन करने वाले डेनियल थोर्नर ने इकनोमिक वीकली के 12 सितम्बर, 1953 के अंक में कश्मीर के कुछ इलाक़ों में  किये सर्वे के आधार पर कुछ ज़रूरी निष्कर्ष दिए हैं। वहाँ मौज़ूद भ्रष्टाचार की तमाम नज़ीरें देते हुए वह इस निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि कश्मीर की भ्रष्ट नौकरशाही के भरोसे इतनी बड़ी योजना लागू नहीं की जा सकती थी। राजस्व कर्मचारियों, सरपंचों और नेताओं की गठजोड़ से वहाँ एक नया वर्ग पैदा हुआ जिसने इस क़ानून में से पतली गलियाँ निकाल कर तयशुदा सीमा से अधिक ज़मीनें हथियाई।

यहाँ मार्क्स याद आते ही हैं जब वह अठारहवीं ब्रूमेर में  पेरिस कम्यून पर टिप्पणी देते हुए कहते हैं कि पुरानी व्यवस्था को आमूलचूल रूप से बदले बिना क्रांतिकारी परिवर्तन लागू नहीं किये जा सकते। कश्मीर के भूमि सुधार को लेकर बहुत सारे अध्ययन हुए हैं। यहाँ बहुत विस्तार से उन पर विचार करना संभव नहीं होगा लेकिन इतना तो तय है कि अपनी कमज़ोरियों के बावज़ूद भूमि सुधारों ने जागीरदारों, मुआफ़ीदारों और मुक्कर्रीख्वारों के सामन्ती वर्ग को ख़त्म कर दिया। तीस के दशक में शुरू हुए आन्दोलन से किसानों के शोषण का मुद्दा जो कश्मीर के राजनैतिक विमर्शों में शामिल हुआ था अब वह केन्द्रीय मुद्दा बन गया था। ब्रेखर इसका समाहार करते हुए कहते हैं-

कश्मीरियों की बहुसंख्या इन सुधारों से लाभान्वित हुई है और उनमें से कई ने जिनका लेखक ने साक्षात्कार किया उन्होंने पाकिस्तान के प्रति अपना भय ज़ाहिर किया जहाँ ऐसा कोई भूमि सुधार नहीं हुआ कि उससे मिलने पर हाल में उन्हें मिलीं ज़मीने जागीरदारों को वापस दी जा सकती हैं या “नया कश्मीर” के और प्रावधान लागू करना असंभव हो जाएगा।

कश्मीरियों की बहुसंख्या इन सुधारों से लाभान्वित हुई है और उनमें से कई ने जिनका लेखक ने साक्षात्कार किया उन्होंने पाकिस्तान के प्रति अपना भय ज़ाहिर किया

इस तरह साढ़े तीन सदियों से अधिक समय के बाद कश्मीर सत्ता एक कश्मीरी के हाथों में आने के बाद आम कश्मीरी किसानों को अपनी सत्ता होने का एहसास ही गहरा नहीं हुआ था बल्कि इस क़दम ने किसानों को भारतीय राज्य से भी जोड़ दिया। नया कश्मीर के इन क्रांतिकारी जनपक्षधर कार्यक्रमों के चलते भविष्य में तमाम उतार चढावों के बावज़ूद शेख़ की लोकप्रियता उनके आख़िरी दिनों तक क़ायम रही।

लेकिन जिन नीतियों से कश्मीरी किसानों को ज़मीन मिली और कर्ज़ों से मुक्ति उन नीतियों के चलते स्वाभाविक था कि पुराना सामन्ती-साहूकार वर्ग क्रुद्ध भी होता। महाराजा के हाथों से अधिकार जाने से डोगरा और कश्मीरी पंडितों के प्रभावशाली वर्गों में जो असंतोष था वह अपने अधिकारों के छिन जाने से और प्रबल हुआ। इसके कारण स्पष्ट थे। राज्य में जहाँ 233 मुस्लिम जागीरदारों की 3,14,632,14 रुपये मूल्य की जागीरें ज़ब्त हुई थीं वहीं 173 ग़ैर मुस्लिमों की 1,92,231,3 ।60 रूपये मूल्य की जागीरें ज़ब्त हुई थीं। मुकर्ररी अधिकारों के मामले में जहाँ सिर्फ़ 467 मुस्लिमों के अधिकार छिने थे वहीं ग़ैर मुस्लिमों की संख्या 1860 थी।

राज्य की जनसंख्या में  86% मुसलमानों के तथ्य को साथ रखकर देखें तो स्पष्ट है कि डोगरा राज में  ये सुविधाएँ अल्पसंख्यक हिन्दू समुदाय के पक्ष में  बाँटी गईं थीं। स्वाभाविक अपनी सत्ता और संपत्ति खोने के बाद यह वर्ग एक प्रतिक्रियावादी वर्ग में बदल गया और शेख़ अब्दुल्ला का सबसे बड़ा शत्रु बन गया। धर्म उसकी एकता का सबसे बड़ा आधार था और इन शक्तियों ने जम्मू में  प्रजा परिषद का दामन थामा। जब पटेल जम्मू और कश्मीर में  मौलिक अधिकारों को लागू करने के लिए दबाव बना रहे थे तो असल में वह इस भूस्वामी वर्ग के लिए संपत्ति के अधिकार के तहत वैसा ही मुआवज़ा सुनिश्चित कर रहे थे जैसा भारत के अन्य प्रदेशों में  भूमि सुधार के बाद मिला था। पटेल और शेख़ के बीच बहुत अच्छे रिश्ते तो कभी नहीं रहे लेकिन हम देखेंगे कि 1949-50 के बीच धारा 370 और जम्मू और कश्मीर के भारत से एकीकरण के सवाल पर जो तनातनी हुई उसने कश्मीर और भारत के इतिहास में एक बड़ी भूमिका निभाई। नेहरू के निर्णयों की ख़ामियों और ख़ूबियों पर तो अक्सर बात की जाती है लेकिन पटेल की इस भूमिका पर अक्सर बात नहीं होती।

शेख़ अब्दुल्ला कश्मीर घाटी के तो लगभग सर्वमान्य नेता थे लेकिन जम्मू क्षेत्र में उनका वैसा प्रभाव कभी नहीं रहा

हमने देखा है कि शेख़ अब्दुल्ला कश्मीर घाटी के तो लगभग सर्वमान्य नेता थे लेकिन जम्मू क्षेत्र में उनका वैसा प्रभाव कभी नहीं रहा। वहाँ का मुस्लिम नेतृत्व तो पुंछ विद्रोह के बाद पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर चला गया और हिन्दुओं की बहुसंख्या जो डोगरा शासन के साथ ख़ुद को प्रत्यक्ष रूप से जुड़ा हुआ पाती थी डोगरा शासन के अवसान के बाद शेख़ अब्दुल्ला की धुर विरोधी हो गई। साम्प्रदायिक दंगों का दंश झेलकर पंजाब से भारी संख्या में आये शरणार्थियों और जम्मू के इस समुदाय की साम्प्रदायिक भावनाओं को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ समर्थित प्रजा परिषद ने अपने राजनीतिक उद्देश्य के लिए उपयोग किया। इसी दौर में बलराज पुरी जैसे कुछ प्रगतिशील तत्त्वों ने जम्मू और लेह के लिए क्षेत्रीय स्वायत्ता की माँग की जिससे इन इलाक़ों की क्षेत्रीय आकांक्षाएँ पूरी की जा सकें। दिल्ली समझौते के दौरान इस पर सहमति भी बनीं लेकिन जन संघ और हिन्दू महासभा ने दिल्ली समझौते का तीख़ा विरोध किया। प्रजा परिषद ने “मुस्लिम कश्मीर” की जगह “हिन्दू भारत” के साथ ख़ुद को जोड़ा और धारा 370 को हटाने तथा भारत के साथ पूर्ण एकीकरण की माँग की जो उनकी राजनैतिक आकांक्षाओं के लिए अधिक उपयुक्त प्रतीत होता था।

30 जनवरी 1948 को एक हिन्दू कट्टरपंथी नाथूराम गोडसे द्वारा गाँधी की हत्या के बाद लगे प्रतिबन्ध के हटाये जाने के बाद संघ को ख़ुद को पुनर्जीवित करने के लिए जिस मुद्दे की तलाश थी वह एक मुस्लिम बहुल प्रदेश कश्मीर में देशभक्ति के लिटमस टेस्ट से बेहतर क्या हो सकता था। 1951 में  स्थापित हुई जनसंघ के संस्थापक अध्यक्ष श्यामा प्रसाद मुखर्जी की अध्यक्षता में  21 अक्टूबर 1951 को हुई पहली राष्ट्रीय समिति की बैठक में जो पहला घोषणापत्र जारी हुआ उसमें चार प्रमुख मुद्दों पर ज़ोर दिया गया, भारतीय संस्कृति पर आधारित शिक्षा पद्धति, स्कूलों में  हिंदी का प्रयोग, अल्पसंख्यकों को किसी भी तरह के विशेषाधिकार का विरोध और जम्मू और कश्मीर का भारतीय संघ में  पूर्ण एकीकरण। पार्टी ने इन्हीं मुद्दों पर चुनाव लड़ा और हालाँकि उसे लोकसभा में केवल 3 सीटें मिलीं लेकिन सदन के भीतर वह अकाली दल सहित अन्य दलों के 32 सांसदों का समर्थन हासिल करने में सफल रहे और इसे राष्ट्रीय लोकतांत्रिक मोर्चे का नाम दिया गया। जिन दो मुद्दों पर आन्दोलन शुरू करने का तय किया गया वे थे धारा 370 और पाकिस्तान से आये रिफ्यूजियों के हालात। जनसंघ, हिन्दू महासभा और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने यह आन्दोलन दिल्ली से पंजाब होते हुए जम्मू तक चलाने का फ़ैसला किया था। नारा तय किया गया : “एक देश में  दो विधान/एक देश में  दो निशान/ एक देश में  दो प्रधान/नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।”

अभी हाल तक महाराजा के पीछे स्वतंत्र जम्मू और कश्मीर राज्य की माँग के लिए खड़ी प्रजा परिषद की भारत के प्रति देशभक्ति ऐसी जागी कि उससे जुड़े छात्रों ने तिरंगे के साथ लगे राज्य के झंडे को जलाने की कोशिश की। ज़ाहिर साम्प्रदायिक एजेंडे के तहत शुरू किया गए इस आन्दोलन ने जम्मू में जनजीवन को तहस-नहस कर दिया। सरकारी संपत्ति की तोड़ फोड़ से लेकर हिंसा तक की घटनाएँ हुईं। राष्ट्रभक्ति की इस आग को भड़काने में  राष्ट्रीय प्रेस ने भी अपनी भूमिका निभाई। नेहरू इसे लेकर बेहद चिंतित थे। इन पाँच सालों में पहली बार वह कश्मीर के भविष्य को लेकर सशंकित थे। उन्होंने इंटेलीजेंस ब्यूरो के तत्कालीन उप निदेशक बी एन मलिक को हालात का अध्ययन करने के लिए जम्मू भेजा। मलिक का दावा है कि नेहरू ने दो कामों के लिए भेजा था। पहला यह कि प्रजा परिषद को अपना आन्दोलन ख़त्म करने पर राजी करें और यह कि उन्हें समझाएँ कि कश्मीर से भारत का एकीकरण अधूरा नहीं पूरा है लेकिन चूँकि मामला सुरक्षा परिषद में है इसलिए कश्मीर के लिए ख़ास दर्ज़ा कुछ और सालों तक बनाकर रखना पड़ेगा । कुछ सालों बाद ये विशेष अधिकार अपने आप ख़त्म हो जायेंगे और कश्मीर भी दूसरे किसी राज्य की तरह ही हो जाएगा और दूसरा यह कि शेख़ अब्दुल्ला से बात करके उन्हें साम्प्रदायिक और हिन्दू विरोधी भाषणों से बचने का आग्रह करें।

नेहरू ने प्रजा परिषद से अपना आन्दोलन वापस लेने की अपील करते हुए कहा कि क्षेत्रीय स्वायत्ता की बात मान ली गई है

मलिक के दावे की सच्चाई की जाँच करने के लिए आज हमारे पास कोई तरीक़ा नहीं है लेकिन 1953 में  शेख़ की गिरफ़्तारी के बाद जिस तरह कश्मीर के भारत से एकीकरण और धारा 370 को धुंधला करने की जितनी कोशिशें हुईं उसे देखते हुए इस संभावना को पूरी तरह खारिज़ भी नहीं किया जा सकता। जम्मू में आन्दोलन पर एक हद तक क़ाबू पाने के बाद 5 फ़रवरी 1953 को नेहरू ने श्यामा प्रसाद मुखर्जी को लिखा कि उन्हें इस बात को लेकर ज़रा सी भी आशंका नहीं है कि भारत के साम्प्रदायिक और संकीर्ण मानसिकता वाले तत्त्वों द्वारा समर्थित परिषद का साम्प्रदायिक आन्दोलन बर्बादी लेकर आयेगा, केवल जम्मू और कश्मीर के लिए ही नहीं बल्कि पूरे देश के लिए। मुखर्जी ने आन्दोलन तो नहीं ख़त्म किया लेकिन शेख़, नेहरू और मुखर्जी के बीच लगातार ख़त-ओ-किताबत चलती रही। मई में अनधिकार प्रवेश के चलते मुखर्जी श्रीनगर में गिरफ़्तार कर लिए गए लेकिन पत्राचार जारी रहा। अंततः तीनों के बीच में एक सहमति बनी जिसके तहत जम्मू, लद्दाख और कश्मीर की क्षेत्रीय स्वायतत्ता और दिल्ली समझौते के तहत धारा 370 पर सहमति बन गई। मुखर्जी तुरंत आन्दोलन वापस नहीं ले सकते थे क्योंकि यह कायरता समझा जाता। इसी बीच जेल में  श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु हो गई। नेहरू ने प्रजा परिषद से अपना आन्दोलन वापस लेने की अपील करते हुए कहा कि क्षेत्रीय स्वायत्ता की बात मान ली गई है। 2 जुलाई को जम्मू और कश्मीर सरकार ने भी नेहरू की बात से सहमति ज़ाहिर करते हुए प्रजा परिषद के नेताओं को रिहा कर दिया और 3 तारीख़ को वे दिल्ली जाकर मिले तथा क्षेत्रीय स्वायत्ता तथा दिल्ली समझौते को लेकर सहमति बनी। इसके तहत जम्मू और कश्मीर राज्य को भारत के भीतर स्वायत्ता मिलनी थी तथा जम्मू, कश्मीर घाटी तथा लेह को जम्मू और कश्मीर राज्य के भीतर। अगर यह समझौता लागू हो पाया होता तो शायद कश्मीर समस्या पैदा ही नहीं होती या फिर होती तो भी उसका यह स्वरूप नहीं होता। लेकिन जनसंघ ने इसे मानने से इंकार कर दिया। बलराज मधोक के अनुसार इसके लिए उसे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से अनुदेश मिले  थे। इसके बाद जनसंघ ने 370 तथा क्षेत्रीय स्वायत्ता के ख़िलाफ़ ज़ोर-शोर से आन्दोलन शुरू कर दिया।

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