लुभावना विध्वंस!

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रजनीश जे जैन/

रजनीश जे जैन

देश के कुछ हिस्सों में आये धुल आंधी के अंधड़ ने सौ से ज्यादा लोगों की जिंदगी ख़त्म कर दी, सम्पति का नुक्सान हुआ वह अलग। हमारा देश इस लिहाज से श्रेष्ठ  है कि इसे प्रकृति ने चारो मौसमों की सौगात दी है। परन्तु हरेक मौसम अपनी पराकाष्टा पर विध्वंस भी लेकर आता है। अति बारिश से आने वाली बाढ़, पैंतालिस- छयालीस डिग्री तापमान पर चलने वाली गर्म हवाए, शीत लहर और कोहरे का प्रकोप आदि भी कई हजार लोगों को असमय काल के सुपुर्द करते रहे है। इनके अलावा भूस्खलन, भूकंप, बादल फटना जैसी प्राकृतिक आपदाए भी बगैर आहट हमारी जिंदगियों पर मंडराती रही  है।

ये आपदाएं भी किसी फिल्म का विषय हो सकती है यह बात हॉलीवुड ने दुनिया को बेहतर तरीके से समझाई है। आपदाओं पर बनी फिल्मों को ‘डिजास्टर मूवी’ की श्रेणी में रखा गया है। इन फिल्मों का इतिहास इतना ही पुराना है जितना सिनेमा का।  सिनेमा माध्यम के शुरूआती दौर में ही इस तरह की फिल्मे बननी आरम्भ हो गई थी। साइलेंट फिल्मों के समय में बनी ‘फायर’ (1901) विध्वंस पर आधारित पहली फिल्म मानी जाती है। इस फिल्म में एक आदमी जलते हुए मकान से एक परिवार को सुरक्षित बाहर निकालता है। अपनी पहली और अंतिम यात्रा पर लंदन से अमेरिका के लिए निकले टाइटेनिक जहाज ने 1912 में जल समाधि ली थी। इस दुखद घटना के ठीक एक वर्ष बाद साइलेंट फिल्म ‘टाइटेनिक अटलांटिस’  1913  में अमेरिका में रिलीज़ हो गई थी।

डिजास्टर फिल्मों में आमतौर पर प्रकृति फिल्म का नायक होती है। सम्पूर्ण कथानक उसके ही इर्दगिर्द घूमता है। प्राकृतिक आपदाएं अपने पूरे शबाब पर होती है। अधिकांश फिल्मों में मनुष्य उसके सामने असहाय ही नजर आता है। परन्तु अंत में मनुष्य अपनी चतुराई से किसी तरह बच निकल कर प्रकृति के कोप से मानव जाति को बचा लेता है।

डिजास्टर जॉनर की फिल्मो का ऐसा आकर्षण रहा है कि कॉमेडी और हॉरर की तरह दुनिया भर में इसने अपना अलग दर्शक वर्ग बना लिया है। इस आकर्षण को हॉलीवुड के बड़े स्टूडियो और फिल्मकारों ने डटकर भुनाया है। समय के साथ अपग्रेड होती तकनीक, विजुअल इफेक्ट, सिनेमोटोग्राफी और कंप्यूटर जनरेटेड इमेजेस के बदलाव को हर नई  फिल्म के आगमन के साथ महसूस किया जा सकता है। इन फिल्मों की एक और उल्लेखनीय विशेषता यह रही है कि अधिकाँश सफल फिल्म किसी बेस्टसेलर किताब पर आधारित रही है। 1974 में आई ‘द टॉवरिंग इन्फर्नो ‘ एक सो अड़तीस  मंजिला बिल्डिंग में लगी आग में फंसे लोगों पर आधारित थी। इस फिल्म को दर्शक आज भी याद करते है। इसी तरह आर्थर हैली के लोकप्रिय उपन्यास ‘एयरपोर्ट’ पर इसी नाम से आई फिल्म और ‘ अर्थक्वेक ‘ ( दोनों 1975 ) आज भी अपनी लोकप्रियता बरकरार रखे हुए है।

1990 के बाद इन फिल्मों के विशाल  बजट और वीएफएक्स तकनीक के बढ़ते  प्रयोग ने कल्पना  और वास्तविकता की लकीर को लगभग पाट  दिया है। अब इन फिल्मो में विध्वंस को देखना लुभावना हो गया है।  एक बड़े स्वीमिंग पूल में शूट हुई  केट विंस्लेट, लेनार्डो डी कैप्रिया की दुखद प्रेमकथा  वाली ‘टाइटेनिक’  (1997) इसके पहले स्टीवन स्पीलबर्ग की हेलन हंट और बिल पिक्सटन अभिनीत आधी सीट पर बैठकर देखने को मजबूर कर देने वाली  ‘ट्विस्टर’ (1996) जेम्स बांड बनने के पूर्व पिएर्स ब्रोसनन की ‘दांतेस पीक’ (1997) कभी ‘गॉडफादर’ फिल्म में गॉडफादर बने मार्लोन ब्रांडो के विश्वस्त सलाहकार बने रोबर्ट डुआल की ‘डीप इम्पैक्ट’ (1998 ) धीमी आवाज में डायलाग बोलने वाले ब्रूस विलिस की ‘आर्मगेडन’ (1998 ) डेनिस क्वेड की ‘द डे आफ्टर टुमारो’ ( 2004 ) हॉलीवुड के चॉकलेटी हीरो जॉन कुसाक की ‘2012’ ( 2009) डिजास्टर श्रेणी की बेहद उल्लेखनीय फिल्मे है।

भारत में इन फिल्मों का बहुत बड़ा दर्शक वर्ग है परन्तु बॉलीवुड में साइंस फिक्शन या डिजास्टर फिल्मे बनाने का दुस्साहस बिरले निर्माताओं ने  ही किया है

भारत में इन फिल्मों का बहुत बड़ा दर्शक वर्ग है परन्तु बॉलीवुड में साइंस फिक्शन या डिजास्टर फिल्मे बनाने का दुस्साहस बिरले निर्माताओं ने  ही किया है। 1979 में यश चोपड़ा निर्देशित ‘काला पत्थर’ चसनाला खान दुर्घटना पर आधारित थी। अमिताभ बच्चन के शानदार अभिनय के बावजूद यह फिल्म अपनी लागत  नहीं निकाल पाई थी। इसी तरह बी आर चोपड़ा निर्मित ‘द बर्निंग ट्रैन’ (1980) अपने डिजास्टर से अधिक मधुर गीत संगीत के लिए सराही गई थी।  दोनों ही फिल्मे मानव निर्मित आपदाओं पर आधारित थी।

(रजनीश जे जैन की शिक्षा दीक्षा जवाहर लाल नेहरु विश्वविद्यालय से हुई है. आजकल  वे मध्य प्रदेश के शुजालपुर में रहते हैं और  पत्र -पत्रिकाओं में  विभिन्न मुद्दों पर अपनी महत्वपूर्ण और शोधपरक राय रखते रहते हैं.)

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