मधुबनी पेंटिंग और इतिहास का अनूठा मेल

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ममता अग्रवाल/

घनी चित्रकारी और उसमें इंद्रधुनषी रंगों को समेटे बिहार की मधुबनी पेंटिंग कला देश ही नहीं, विदेशों में भी लोकप्रिय है। नवोदित कलाकार नेहा दासगुप्ता ने इतिहास के प्रति अपने रुझान के चलते इस प्राचीन कला में ऐतिहासिक इमारतों के चित्रों का समावेश किया है नेहा एक सामूहिक चित्र प्रदर्शनी ‘दिल्ली तेरे इश्क में’ में शामिल होने जा रही हैं, जिसका आयोजन 20 से 22 अप्रैल के बीच होगा।

मधुबनी पेंटिंग के प्रारंभिक स्वरूप पर गौर करें तो इस प्राचीन कला में ज्यादातर राम, जानकी, लक्ष्मण, राधा-कृष्ण व दुर्गा से जुड़े प्रसंगों को उकेरा जाता था, मगर समय के साथ इसमें नए-नए प्रयोग भी किए जाते रहे हैं। नेहा भी नया प्रयोग कर पेंटिंग की इस शैली को नए स्वरूप में पेश करने का प्रयास करती हैं।

नेहा दासगुप्ता की चित्र-कृतियां विशुद्ध रूप से मधुबनी पेंटिंग नहीं हैं, उससे केवल प्रेरित हैं, इसलिए उन्होंने अपनी प्रदर्शनी को नाम दिया है ‘ए टच ऑफ मधुबनी’।

अपनी पेंटिंग्स की खासियत बताते हुए नेहा कहती हैं, “मेरी पेंटिंग्स इसलिए अलग हैं, क्योंकि उनमें मधुबनी और इतिहास का अनूठा मेल है। अपनी प्रदर्शनी में मेरा उद्देश्य मधुबनी कला से प्रेरणा लेते हुए वैश्विक स्मारकों को चित्रित करना था। इसके जरिए मैंने इतिहास और यात्रा के प्रति अपने रुझान को एक सूत्र में बांधने का प्रयास किया है।”

उन्होंने कहा, “अपनी इन पेंटिंग्स के जरिए मैं अपनी यात्राओं को कागज पर उतारना चाहती थी। मैं जिस भी देश में गई, वहां के एक लोकप्रिय स्मारक को या उस स्थान से प्रेरित चित्र को चित्रित किया। इसलिए इस प्रदर्शनी में लगने वाली मेरे बनाए चित्रों में कोलकाता में बिताए मेरे समय और वहां की मछलियों की प्रतिछाया भी देखने को मिलेगी।”

मधुबनी पेंटिंग के प्रारंभिक स्वरूप पर गौर करें तो इस प्राचीन कला में ज्यादातर राम, जानकी, लक्ष्मण, राधा-कृष्ण व दुर्गा से जुड़े प्रसंगों को उकेरा जाता था, मगर समय के साथ इसमें नए-नए प्रयोग भी किए जाते रहे हैं

इतिहास की छात्रा रहीं नेहा कहती हैं कि इस विषय में ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन करने के कारण ऐतिहासिक इमारतों के प्रति उनका लगाव बेहद स्वाभाविक है। उन्होंने कहा, “मैं ऐतिहासिक इमारतों की याद को किसी भी माध्यम से सहेजना चाहती थी, इसलिए यह प्रयोग किया।”

विभिन्न चित्र-शैलियों के मेल को आप कितना सही मानती हैं? इस सवाल पर नेहा ने कहा, “मेरा ख्याल है कि किसी भी पारंपरिक कला को एक नया स्वरूप देना अच्छा है। इस कला की खूबसूरती और विरासत को ध्यान में रखते हुए मैंने ऐतिहासिक इमारतों के प्रति अपने रुझान को पेश करने का प्रयास किया है, जैसे कि मैंने इनमें पेरिस के आइफिल टॉवर, रोम के कोलोसम, आगरा के ताजमहल और दिल्ली के इंडिया गेट और कुतुब मीनार को चित्रित किया है।”

कला को समाज के आईने के रूप में इस्तेमाल किया जाता रहा है। क्या आपको लगता है कि इसे समाज में मौजूद समस्याओं को दर्शाने के लिए प्रभावशाली माध्यम के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है, यह पूछे जाने पर उन्होंने कहा, “बेशक, कला को जागरूकता फैलाने और सच्चाई को सामने लाने के लिए प्रयोग किया जा सकता है। चित्रकार हों या फोटोग्राफर, वे समाज के सकारात्मक और नकारात्मक पहलुओं को उभारते हुए लम्हों को कैद कर सकते हैं।”

वह कहती हैं, “कला मात्र सुखद पहलू से बढ़कर है, इसके माध्यम से लोगों को बेहतर जिंदगी और बेहतर समाज के लिए कोशिश करने के लिए प्रेरित किया जा सकता है। कला समाज और उसमें हो रहे विकास को रचनात्मक स्वरूप में पेश करने का माध्यम है।”

कला के विभिन्न माध्यमों को एक ही आर्टवर्क में पेश करने के सवाल पर नेहा कहती हैं, “मुझे लगता है कि यह सही है, लेकिन साथ ही किसी भी कलाकार को किसी कला से प्रेरणा लेते हुए उसके मौलिक स्वरूप के इतिहास और विरासत का सम्मान करना चाहिए। बदलाव गलत नहीं है, यह केवल रचनात्मक रूप से नए प्रयोग करने के हमारे कौशल को दर्शाता है।”

–आईएएनएस

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