मैं और मेरी कहानियाँ- विमल चंद्र पाण्डेय

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विमल चंद्र पाण्डेय समाज में गहरे पैठे किंतु तथाकथित विमर्शों के दायरे से बाहर छूट गए विषयों को अपनी कहानियों का केंद्र बनाते हैं. जैसे आस्था. अपनी कहानी ‘एक शून्य शाश्वत..‘ में उन्होंने एक बेहतरीन पात्र उकेरा है जो अव्वल तो धर्म का धंधा शुरु करता है लेकिन कहानी के विकास क्रम उस पात्र की विकसित होती आस्था उसे बेदोष बनाते चलती है. मनुष्य का असीम मन- मस्तिष्क वो अपनी अक्सर कहानियों में खंगालते हैं. डरसोमनाथ का टाइम टेबलउत्तर प्रदेश की खिड़की और प्रेम पखेरू इसके अनोखे उदाहरण हैं. पाठकों के बीच लोकप्रिय विमल चंद्र पाण्डेय खुद अपनी कहानियों को कैसे देखते हैं यह भी जानना रोचक है- सौतुक

विमल चंद्र पाण्डेय

हमारी तरफ भूमिका को कोई ख़ास अच्छी चीज़ नहीं माना जाता है। ऐसा समझते हैं कि जब किसी का ध्यान असली मुद्दे से भटकाना होता है या फिर अपनी बात को स्पष्ट तरीके से व्यक्त करना मुश्किल होता है तो भूमिका बनायी जाती है जिसके जवाब में सामने वाला कहता है कि ज़्यादा भूमिका मत बनाइये, सीधे असली मुद्दे पर आइये। वजहें यही नहीं और भी होंगी जिसकी वजह से अपनी रचना प्रक्रिया पर बात करने जितना ही मुश्किल काम मेरे लिये अपनी कहानियां की भूमिका लिखना भी हो जाता है। मेरी प्रिय कहानियाँ मैंने चुन ली हैं और वो किताब की शक्ल में आपके सामने हैं, अब मैं इन कहानियों को ये जैसी हैं, उनसे बेहतर या बुरी किसी भी भूमिका से नहीं बना सकता। हाँ, इस भूमिका को इन प्रिय कहानियों को लेकर दो-चार बातें करने का मौका ज़रूर बना सकता हूँ।

ये कहना कि लेखक के लिये हर रचना उसकी पसंदीदा होती है और उसकी संतान की तरह होती है, मुझे थोड़ी अतिशयोक्ति लगती है। शुरुआती दौर की कई कहानियाँ हैं जो प्रकाशित हुयीं तो बेहद चर्चित और प्रशंसित रहीं लेकिन अब मुझे उनमें कथ्य, भाषा और कभी-कभी शिल्प के स्तर पर कमियाँ स्पष्ट दिखायी देती हैं। इसे मैं अपने अनुभव की तरह लेता हूँ जब मुझे याद आता है कि कुछेक कहानियाँ जो मैंने एक सिटिंग में लिखीं और उनसे बहुत उम्मीद नहीं थी, वे पाठकों और संपादकों को बहुत पसंद आयीं तो एकाध कहानियाँ ऐसी भी रहीं जिन्हें लिखते हुये मैं कुछ कालजयी लिखने के एहसास से भर कर ये सोचने लगा कि इसे छापने का महान अवसर मैं किस संपादक को दूँ पर वे कहानियाँ सबसे ज़्यादा रिजेक्ट की गयीं। तो मुझे लगता है प्रतिनिधि कहानियाँ और प्रिय कहानियाँ में यही फ़र्क होगा कि प्रिय कहानियों में ज़रूरी नहीं कि सभी लेखक की प्रतिनिधि कहानियाँ हों और वो प्रतिनिधि निर्धारित करने की अनावश्यक व्यवसायिक मजबूरियों से दूर सिर्फ़ लेखक और कहानी के आपसी संबंधों की वजह से प्रिय होती होंगी।

ज़ाहिर है इन कहानियों के साथ कुछ और भी कहानियाँ रही होंगी जो मेरी प्रिय रही होंगी लेकिन जगह की कमी के कारण ये जो कहानियाँ आपके सामने हैं, उनमें हर एक का लेखक से कुछ ऐसा यादगार रिश्ता है जिसकी वजह से ये कहानियाँ प्रिय हैं और हमेशा रहेंगी। ‘चश्मे’ कहानी वाली घटना मेरे पिताजी के एक डायलॉग पर लिखी गयी थी जो उन्होंने मेरे एक छोटे फ्रेम वाले चश्मे को देखकर डांटते हुये कहा था। कहानियाँ लिखने का ये बेहद शुरुआती दौर था जब कहीं भी अपना नाम छपा हुआ देख कर एक अलौकिक ख़ुशी मिलती थी। राजेन्द्र राव ने ‘चश्मे’ को दैनिक जागरण में प्रकाशित किया था और जब मेरी शादी हुयी तो कहानियों की बेहद शौकीन मेरी पत्नी ने मुझे बरसों पहले प्रकाशित दैनिक जागरण का वह पन्ना दिखाया जो उसने संभाल कर रखा था। उसमें एक तरफ उसका बी.एससी. का रिज़ल्ट छपा था तो दूसरी ओर मेरी कहानी। उसने कहा कि उसे हमेशा से लगता था जैसे मेरा नाम उसने बहुत बार बहुत पहले से सुन रखा था। ‘डर’ वो कहानी थी जिसके प्रकाशित होने के बाद मुझे प्रशंसकों और पाठकों द्वारा लेखकों को दी जाने वाली तारीफों और आत्मविश्वास के महत्व का बोध हुआ। ‘एक शून्य शाश्वत’ ठीक से मेरी पहली लम्बी कहानी थी। मैं अपने थोड़े सीनीयर कथाकारों नीलाक्षी सिंह और शशिभूषण द्विवेदी की लम्बी कहानियाँ पढ़ के हैरान रहता था कि कथ्य और कथारस का इतने पन्नों तक इस कड़ाई और अभ्यास के साथ पालन कर ले जाना बेहद मुश्किल बात है और शायद मैं कभी नहीं कर पाउंगा क्योंकि मेरी कहानियाँ तब छह से आठ पन्नों तक जाते-जाते क्लाइमेक्स खोजने लगती थीं। यही पहली वो कहानी थी जिस पर मैंने तब तक सबसे ज़्यादा मेहनत की थी। क़रीब तीन सालों तक चार से पाँच बार इसे लिखने की कोशिश करने के बाद छोड़ दिया था। एक बार इसका नाम ‘माया’ था तो दूसरी ‘शून्य’, और भी नाम और आरम्भ थे जो याद नहीं लेकिन इस कहानी पर जो मेहनत की गयी थी इसने उससे बढ़कर मुझे प्रतिदान दिये। प्रिय कवि कुंअर नारायण ने ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार समारोह में इस कहानी का मंच से जब ज़िक्र और तारीफ़ की तो ऐसी घटनाएं मेरे लिये अविश्वसनीय और अद्भुत रूप से उत्साहजनक थीं। इस कहानी को लिख कर मैं उस सुख के कुछ बूंदों का आनंद ले पाया था जिसे लेखकीय संतोष या सुख कहते हैं।

इस पहली लम्बी कहानी के बाद बहुत कुछ हुआ। कई लम्बी कहानियाँ लिखीं, मेरी लम्बी कहानियों को अलग से रेखांकित किया गया, मैं एक किताब से पाँच किताबों तक पहुँचा, मुंबई आया, फिल्म बनाने की जद्दोजहद में लिखना पढ़ना स्वाभाविक रूप से कम हुआ। दो साल लगा कर अपनी पहली फ़िल्म बनायी और इस दौरान कुछेक कहानियाँ ज़रूर लिखीं लेकिन लिखना शुरू करने के बाद पहली बार एक वक़्फा तीन से चार साल का ऐसा गुज़रा जिसमें मैंने कुछ फुटकर तो लिखा लेकिन कुछ ऐसा नहीं लिखा जिससे मुझे संतुष्टि मिलती। इसका मतलब ये कतई नहीं कि मैं कहानियों को उनकी लम्बाई से आंकता हूं और उनकी बेहतरी उनकी लम्बाई के समानुपाती होती है। इस बीच कुछेक जगहों पे मेरे कहानीकार की मौत की बात फैली जिसे अलग-अलग तरीकों से लिया गया लेकिन मेरी चिंता एक ऐसी कहानी को लिखने की थी जिसमें मैं आज़ाद तरीके से लिखूँ और जिस पर अपने समय को दर्ज करने का कोई दबाव न हो। एक ऐसी कहानी जो एक अच्छी कहानी के सभी आग्रहों से मुक्त हो और फिर भी मुझे उसे लिख कर आनंद आये। एक लम्बे अंतराल के बाद मेरी वो कहानी करीब डेढ़ साल के गैप में अलग-अलग तरीकों से शुरू होकर रुकने के बाद एक दिन पूरी हुयी। ‘मारण मंत्र’ अब तक की प्रकाशित मेरी आख़िरी लम्बी कहानी है और फ़िल्म के बाद इस कहानी को पूरा करने के बाद से मैं फिर से बहुत सारी कहानियों की तितलियाँ अपने पेट में उड़ता महसूस कर रहा हूँ जो बीच में सो गयी थीं।

‘शनिवार रविवार पलटवार’ वो कहानी है जिसे पढ़ने के बाद मेरी पत्नी को पता चला कि लेखक कहानियों के लिये कितने स्वार्थी हो सकते हैं। इतना तो वो समझती थी कि एक लेखक के लिये पूरी दुनिया उसका किरदार होती है, अब उसने ये भी जाना कि वो लेखक ख़ुद भी अपनी दुनिया के किरदारों की तरह एक आम किरदार होता है और जैसे बाकी लोग उसकी कहानियों का हिस्सा बिना किसी लागलपेट के बनते हैं वैसे ही वो ख़ुद और उसके बेहद क़रीबी भी स्पष्ट तरीके से किसी कहानी का हिस्सा हो सकते हैं। ‘पर्स’ इस मायने में मेरी पसंदीदा कहानी है कि मैं इस कहानी के मुख्य किरदार की तरह होने से डरता हूं और मुंबई के संघर्ष में चौकन्ना रहते-रहते एक दिन अचानक लोकल में चढ़ते हुये मुझे डर लगा कि मैं अपनी कहानी के उस किरदार की तरह होता जा रहा हूं जो मुझे नहीं होना। मुंबई में कई साल रहने के बावजूद मेरा पर्स एक बार भी मारा नहीं गया और मैं अक्सर सोचने पर अपने इस चौकन्नेपन पर शर्मिंदा होता हूं। ये चौकन्नापन मेरी रचनात्मकता को धीरे-धीरे नुकसान पहुंचा रहा है और मैं ये समझते हुये भी इसका कुछ नहीं कर सकता। ‘शुभचिंतक’ कहानी एक तरह से शादियों के पक्ष में मेरी दलील है जो मैं अपने सभी उन दोस्तों को दिया करता हूं जो शादियों के विरोध में एक से बढ़कर एक दलीलें दिया करते हैं।

कहानियां कहने लिखने सुनाने के बाद एक ख़ालीपन का एहसास होता है जो ‘मस्तूलों के इर्दगिर्द’ लिखने के बाद सबसे ज़्यादा हुआ था। ऐसे ही एक ख़ालीपन से भरे दिन में मैंने फेसबुक पर स्टेटस अपडेट किया था कि अगर कभी मेरा दूसरा संग्रह प्रकाशित हुआ तो मैं उसका नाम ‘मस्तूलों के इर्दगिर्द’ रखूंगा और ऐसा होने के बाद एक दूसरे ख़ालीपन ने उसकी जगह ले ली। मैं कभी नहीं कह पाता कि मैं कहानियां अपने पाठकों के लिये लिखता हूं क्योंकि शायद मेरे पाठक मेरी कहानियाँ चुनते तो इसमें से कई कहानियाँ उस सूची से बाहर होतीं और कई दूसरी इसमें शामिल होतीं। मैं सबसे पहले तो ख़ुद के लिये ही लिखता हूं और जो लिख कर मुझे अच्छा नहीं लगता उसे मैं ठंडे बस्ते में डाल देता हूं। यह शायद मेरी ज़िद और कमज़ोरी हो सकती है लेकिन मैं इसे बनाये रखना चाहता हूं।

अपने आख़िरी वक़्त में मैं चाहूंगा कि मुझे मेरे सबसे क़रीबी चेहरों के साथ कोई एक ऐसी प्रिय कहानी भी याद आये जिसे लिख कर मैंने बहुत हल्का महसूस किया हो। एक ऐसी कहानी जिसे लिखने के बाद मैं अपने लगातार लिखने की कोशिश को समझ पाऊं। ये सारी प्रिय कहानियाँ उस एक प्रिय कहानी तक पहुँचने की जद्दोजहद कही जा सकती हैं जो मैंने अभी तक नहीं लिखी। ये भले ही किसी लेखक कलाकार की कही हुयी सबसे घिसी-पिटी बात हो, मैं इसमें बहुत भरोसा करता हूं।

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