मैं और मेरी कहानियां- वंदना राग

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वंदना राग के सृजन में विषय वस्तु के बतौर मानवीय मूल्य हैं. विमर्शों की बगटूट तेज रफ्तार नहीं, सार्वभौमिक सत्यों की तरफ खरामा खरामा बढ़ते कदम इनकी कहानियों का शिल्प है. वो यूटोपिया में भारतवर्ष की आधुनिक डिस्टोपिया का वर्णन हो, नक्शा और इबारत में युवाओं पर कहर की तरह टूटा सत्तर का ज़ालिम दशक हो या फिर नमक में पितृसत्ता की पिटी हुई हनक हो, वंदना राग की कहानियाँ सात आंगनों के पार द्वार की तरह खुलती हैं. लेकिन यह भी जानना मजेदार होगा कि वो खुद अपनी कहानियों को कैसे देखती हैं- सौतुक

वंदना राग

कैसे कहा जाए उन रिश्तों की बाबत जो आपके ज़ेहन का हिस्सा होते हैं? उन अनोखे रिश्तों के बारे में कभी ठहर के सोचने का वक़्त मिलता ही कब है? वे तो बस हमारे भीतर चुपके से बेआवाज़ बैठे रहते हैं. कभी अपनी गोदी में हमारा सर रख हमारा माथा सहलाते, हमे बेहिसाब दुलराते तो कभी हमें अपना कन्धा हौले से थमाते ज़ार –ज़ार रोने को. कभी शरारत से हमारी चिकोटी काटते चुहल करते तो कभी एक खानदानी बुज़ुर्ग की तरह हमें आँखें दिखाते.

होते हैं कुछ ऐसे भी अन्तरंग रिश्ते जिनका ताना- बाना दुनिया की नज़रों से छिपा ही रहता है. वे मन की दुनिया में ही प्रकट होते हैं और फिर वहीँ बने रहते हैं कभी आकुल- व्याकुल तो  कभी विश्राम की मुद्रा में. गहरे बसे हुए ये विरल से रिश्ते.

ऐसा ही मकबूल और विरल सा रिश्ता है मेरा अपनी कहानियों से. मेरी कहानियां, फकत मनोरंजन का शगल नहीं. मनोरंजन के आस्वाद के किस खाँचे ये फिट होती हैं मैं तो यह भी नहीं जानती, हाँ लेकिन इतना ज़रूर जानती हूँ कि मनोरंजन के साथ ये कहीं न कहीं पढ़नेवालों को परेशान  करने वाली कहानियां हैं. ये सच्ची सी कहानियां हैं और इन सचों में मैंने अपनी कल्पना के अनगिनत रंग भरे हैं. ये सच, मेरी दृष्टि के सच हैं. इनका व्यापकता पर कोई दावा नहीं. मेरी सीमित समझ और शायद सीमित दृष्टि के सच हैं ये. ऐसे सच जो मैंने देखे, महसूस किये और सोचे.

मैं इन्हें लिखती हूँ तो यह कोई विशिष्टता नहीं. यह कोई अजूबा भी नहीं. मैं कोई अलहदा किस्म की प्रजाति नहीं. मैं तो करोड़ों साधारण लोगों के बीच की कोई एक संख्या हूँ. बस एक संख्या. जिसे बचपन से लेकर आज तक कोई और तरीका मालूम ही न हुआ अपनी बात रखने का. ज़िन्दगी ने कई प्रयोग करवाए इन सचों को बोलने की खातिर. थिएटर से जुड़ी, टीवी पर सांस्कृतिक कार्यक्रम एंकर किये और रेडियो के लिए कई तरह की सीरीज लिख उन्हें रिकॉर्ड किया. लेकिन जैसे, जहाज़ का पंछी जहाज़ को उड़ी-उड़ी आये वैसे ही लौट- लौट कर आना हुआ उस नायब रिश्ते की ओर, जो ज़िन्दगी के हर संघर्षमय पड़ाव के बावजूद मेरे भीतर बेआवाज़दम बदम ज़िन्दा रहा. जिसे मैंने बचपन से कभी निहायत कच्चे तो कभी कुछ पके लेकिन हमेशा ही सच्चे ढंग से अपनी आवाज़ में कहने की कोशिश की.

अपनी कुछ कहानियों की मार्फ़त अपनी बात रखना चाहती हूँ.

शहादत और अतिक्रमण से बात शुरू करते हैं तो कारगिल युद्ध का दौर याद आता है.और याद आता है छोटे शहरों का युद्ध और देशभक्ति को ले उमड़ा उन्माद. उसी में छूट गयीं, बिला गयीं कुछ औरतें. एक 20 साल की लड़की को दूर से देखा था और सुना था वह कारगिल के शहीद की विधवा है. उसकी सफ़ेद साड़ी और उदास रंगत अभी भी ज़ेहन में धधकती है. मैं उसे नहीं जानती थी न जानती हूँ लेकिन मैंने कल्पना की उसके प्रति होने वाले अन्यायपूर्ण रवैये की क्योंकि मैं बावस्ता हूँ उसी समाज से और बावस्ता हूँ युद्ध में हताहत होने वाली कौमों से. जिनमें खामोश ढंग से तिल –तिल कर मरने वाली औरतें ही होतीं हैं. उनकी मौत के आंकड़े कहीं उपलब्ध नहीं होते लेकिन अगर कोशिश की जाये तो हम निश्चित तौर पर पाएंगे कि सरहदों के सम्मान के लिए लदे जाने वाले युद्ध दरसल औरतों का हर तरह से अपमान और अहित ही करते हैं. बड़ी संख्या में. इस कहानी पर मुझे यदि कुछ प्रशंसा मिली तो कुछ आलोचना भी हुई. भारतीय सामाजिक व्यवस्था को तोड़ने का विचार पैदा करने का आरोप भी लगा.

मुझे अच्छा लगा. लगा यदि किसी तक यह बात पहुंची कि मैंने  चिरपरिचित सामाजिक व्यवहार और ढांचे पर सवाल उठाये हैं और यह बात लोगों को परेशान करती है तो मैं सही दिशा में जा रही हूँ.

क्योंकि कहानियों का मकसद सवाल उठाना भी तो है.

इस संग्रह की एक कहानी देवा देवा पी. साईनाथ के एक लेख को पढ़कर जन्मी. फिर बहुत सारी सरकारी रिपोर्ट्स पर गौर किया और किसानों और सरकारी समर्थन के बीच बढ़ते गैप को शिद्दत से महसूस किया. आत्महत्या के कारण बहुत पेचीदा होते है. शायद अपनी और अपने आस-पास की ज़िन्दगी को आसान बनाने का तरीका समझ, लोग आत्महत्या का कदम उठाते हैं लेकिन त्रासद सच यह है कि पीछे छूट गए लोगों की ज़िन्दगी इससे और मुश्किल हो जाती है. विदर्भ में यह एक परंपरा सी बन गयी है और यह बहुत- बहुत खौफनाक सच है.

नमक एक पुरुष के अहम् की जकड़बंदी की कहानी है. प्रेम उच्च भावना है या पुरुष का अहम्  ही सर्वोपरि होता है जैसे सवालों को उठाने वाली कहानी है. बहुत सारे पुरुषों में प्रेम के प्रति नकार को प्रबल होते देखा है क्योंकि वो उनके रुतबे में सेंध लगाता है. और ठीक इसके बरक्स प्रेम के प्रति समाज में ऐसा जूनून भी देखा है जो सब हदों को पार कर, जाने किस जहाँ की यात्रा पर लिए चलता हैआज रंग है, नमक का वही विलोम हैआज रंग है के त्रिकोणीय प्रेम  प्रसंग में पहले प्यार के मीठे एहसास के साथ ही गाढ़े रिश्ते और नकारात्मकता की ओर का अबूझ आकर्षण, किसी लेखक या मनोविश्लेषक के समझाने के बस की बात नहीं. कितने तरह के मन और मन की बातें हैं सब. ऐसी स्थिति देखी नहीं लेकिन असामाजिक तत्वों के प्यार भी तो किसी धरातल पर सच ही होते होंगे न? हम एक ही समय में कितनी जटिल यह कहानी भी जब लिखी गयी तो उसकी तात्कालिकता की अनुगूंज इतने बरसों बाद भी सुनाई पड़ेगी यह नहीं मालूम था. उस सच की अनुगूंज आज भी गाहे- बगाहे अख़बारों में पढ़ने को जब मिल जाती हैं तो मन सिहर उठता है.

कठकरेज और दो ढाई किस्से ‘कुछ इश्क किया कुछ काम किया’ वाले तर्ज़ पर निरंतर चलने वाले विरोधाभासों की कहानियां है. ये मेरे अपने जीवन के भी संघर्ष हैं. नास्टैल्जिया के बरक्स आधुनिक विकास को कैसे देखा जाये? क्या ग्रामीणों को या कस्बाई लोगों को नए मानकों के अनुसार तरक्की करने का हक नहीं है? लेकिन ऐसे में क्या व्यापक सौहार्द, करुणा और मुश्किल से सहेजे रिश्तों की हम बलि नहीं चढ़ा दे रहे हैं? क्या हम सब एक चूहा दौड़ में शामिल नहीं हो रहे हैं? क्या हम धर्म की आड़ में अपनी आक्रामक सांस्कृतिक परिभाषाएं नहीं गढ़ रहे हैं? और गढ़ कर उसपर खुद मुदित हो तांडव नहीं कर रहे हैं?

यदि विद्वानों के कहे अनुसार ‘कुछ खोने और पाने का नाम ही है ज़िन्दगी’ तो मैंने भी खोयी है एक ज़िन्दगी और उसके कुछ मायने. मैंने खोयी है अपनी निष्कपट बोली और उसमें निहित भाव, ढेर सारे प्रेम, जिज्ञासा और कौतुहल. ढेर सारा विश्वास और उत्साह. जब भोलापन बेवकूफी कहलाने लगे तो सायास चालाक हो जाना पड़ता है और इससे हासिल बहुत कुछ हो सकता है–मसलन, एक कम्फर्ट ज़ोन, कुछ स्टीरियोटाइप सुविधाएँ और ठहरे हुए रिश्ते भी लेकिन क्या वही मुक़म्मल हासिल है?

क्रिसमस कैरोल की नायिका दो राहे पर खड़ी नायिका है. हमारी आज की इस सदी का सच जीती नायिका. मिल्लेन्निअल बच्चों से पहले पैदा हुए पुरुषों और स्त्रियों का सच. जाएँ तो जाएँ कहाँ, का पशोपेश. शेक्सपियर की पकी लाइनों  ‘टू बी ऑर नॉट टू बी’ का असमंजस.

इस सदी का घटाटोप. हमारे जीवन का घटाटोप. मेरा घटाटोप.

मेरा ही सच है सबकुछ. मेरी ही अनुभूतियाँ. मेरी ही स्मृतियाँ.

लेकिन जिसे जिया किसी और ने.

छह भिखारियों दिसम्बर की विभीषिका के बीच फंसीयूटोपिया की नायिका नज्जो ने, पास्कल टोपनो की धार्मिक तालीम और ज़िन्दगी के बीच के संतुलन को गड़बड़ करते तस्वीर के अबढंग बच्चे पप्पू ने, नक्शा और इबारत के बोड़ो दा ने या फिर टोली के भागीरथी, मुसद्दी और प्रेत जैसे सड़क के भिखारियों ने.

ये सब मेरा ही अंतस है और मेरा ही बाहम्य.

दरअसल, जब हम कहानियां कह रहे होते हैं तो अपने भीतर से किसी व्यक्ति, किसी  परिस्थिति, किसी दृश्य या किसी डायलॉग को ही खंगाल रहे होते हैं. उस भीगी पुरनम बात को किसी तार पर डाल सुखा रहे होते हैं या उस बरसों की काई को धूप रौशनी दिखा कर ज़मीन पुख्ता कर रहे होते हैं.

कई लोगों ने मुझसे पूछा है, सुन्दर लम्हों से सजी कहानी कहाँ है तुम्हारे पास? क्यों नहीं लिखा अभी तक?

क्या कहूँ? क्यों ज़िन्दगी की बुरी अफ़सोस जनक बातों पर ही नज़र थम जाती है? कई बार लगता है विदूषक का आधुनिक रूप हूँ मैं. सत्तर के दशक में राज कपूर निर्देशित फिल्म आई थी ‘मेरा नाम जोकर’, जिसमें नायक खूबसूरत प्रेम और आदर्श जीवन की कल्पना में ही ज़िन्दगी  बिता देता है. सचमुच ज़िन्दगी एकहरी तो नहीं होती.

इसी तरह मेरी कहानियां भी एकहरी नहीं, बहुरंगी हैं.

मेरी तरह.

सुख की तलाश में चलती हुई लेकिन लज्जित, परास्त और संशय से भरी हुई. खिलखिलाकर हंसती हुई लेकिन उसी पल किसी दर्द को जीती हुई भी.

यूटोपिया होता नहीं है. लेकिन हम उसके प्रयास में लगे रहते हैं. मेरा पहला कहानी संग्रह इसी नाम का है. यूटोपिया की परिस्थिति हो नहीं सकती लेकिन उसकी कल्पना कभी मर भी नहीं सकती.

मैं और मेरी कहानियां उसी सच का काल्पनिक विस्तार है.

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