कैसा लगता है जब दूर किसी देश की भीड़ आपके देश का प्रतिनिधित्व करने वाले सैनिक को गोली मार देती है, उसे गाड़ी से खींच लेती है और फिर धराशायी कर देती है

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अनुवाद- चन्दन पाण्डेय

डेव ईगर्स की कहानी ‘व्हाट इट मीन्स व्हेन अ क्राउड इन अ फार अवे नेशन टेक्स अ सोल्जर रिप्रेजेंटिंग योर ऑन नेशन, शूट्स हिम, ड्रैग हिम फ्रॉम हिज व्हीकल एंड देन म्यूटीलेट्स हिम इन द डस्ट’ का हिन्दी अनुवाद, यह कहानी‘हाऊआर वी हंगरी’ नामक संग्रह से ली गई है.

एक आदमी है जिसे अचानक बड़ी घबराहट हुई. वह एक साथ चिन्तित और व्यग्र हुआ. ये महसूसियत उसके तईं अजनबी थीं. पहले कभी यह अछूत किस्म का ग्लानि भाव उसे नहीं हुआ पर पिछले वर्ष से वह इसमे डूबा जा रहा है. कभी तो अपने घर के इर्दगिर्द वो यों ही घूमते हुए खुद को पाता, बगैर यह जाने कि उसके भीतर पनपे इस तनाव की वजह क्या है. दिन साफ़ शाफ्फाक होता था, सूरज ऊपर तना हुआ होता था और सब कुछ ठीक था फिर भी वह किसी अनजानी हड़बड़ी का शिकार लगता था. कोई किताब पढ़ने के लिए वह बैठता और तुरंत ही उठ खड़ा होता कि उसे याद आया हो, कोई जरूरी फोन निबटाना है. फोन तक पहुँच कर उसे ख्याल आता कि फोन तो उसे करना ही नहीं था, वो तो खिड़की के बाहर कुछ ऐसी चीज थी जिसका देख-निरेख करना था. उसकेआहाते में कुछ गड़बड़ी थी जिसकी उसे मरम्मत करनी थी. उसे कहीं जाना था, उसे कहीं जाने के लिए तेज दौड़ लगाना था. सुबह के अख़बार में इस आदमी ने वो तस्वीर देख ली थी. ट्रक के नीचे पड़े सैनिक के शव की तस्वीर देख लिया था. उसकी, यानी सैनिक की, वर्दी भूरे रंग की थी, पीठ के बल पड़े होने के नाते धुप में चमकते उसके जूते की नोक ऊपर की ओर थी. इस बीच यह आदमीअपने घर पर, गर्म मौजे-दास्ताने डाले, आराम से बैठेकर ताजा संतरे का जूस का पीते हुए, रंगीन अख़बार में मृत सैनिक की तस्वीर लगातार देखे जा रहा था. अकेले के इस घर में यह तस्वीर देखते हुए वह आदमी गश खा गया था. तस्वीर में निगाह गड़ाए जब उसे खून का ख्याल कौंधा तो उसने सोचा, आखिर इसे गोली कहां मारी गई होगी ? खून तो कहीं दृश्यमान भी नहीं था. इसे बिसराने के ख्याल से उसने पन्ना पलटा लेकिन तुरंत ही इस पन्ने पर यह देखने के लिए लौट आया कि क्या मृत सैनिक की इस तस्वीर की जद में उस सुदूर देश के भी निवासी हैं? ना,वो लोग नहीं थे. कोई नहीं था. यह आदमी अपनी जगह छोड़कर उठा. दूर के एक कारखाने से उठते धुएँ की तरंग को क्षितिज में सरकते और मिल जाते देखा. यह आदमी खुद को इस तरह बिखरा हुआ क्यों पा रहा था? इस तरह लुटा-पिटा क्यों पा रहा था ? अगर कोई सैनिक उसके अपने ही देश में मार दिया जाए, धराशायी कर दिया जाए तब तो इस आदमी को इतना दू:ख नहीं होगा या ऐसी घृणा नहीं उपजेगी. ये एहसासात तो उसे तब भी नहीं होते जब रेलगाड़ियों की भिड़ंत की बाबत सुनता है या तब भी नहीं जब मिसौरी के किसी परिवार के, जो मिनी वैन से दिसंबर में कही यात्रा पर निकले हों, किसी झील में डूब जाने की खबर मिले. लेकिन अब, दुनिया के दूसरे ओने-कोने में, अपनी गाड़ी से खींच लिया गया यह सैनिक क्यों इतना परेशान कर रहा है, यह अकेला सैनिक, यह रक्त विहीन शव जो ट्रक के नीचे धराशायी हुआ हो – यह सब इस आदमी को इतना निजी क्यों लग रहा है, यह सब इस आदमी को बेचैन क्यों किए जा रहा है ? यह किसी एक दिन की कहानी नहीं, घर पर पडा यह आदमी अब अक्सर ही ऐसे जज्बातों की गिरफ्त में पाता है. यह आदमी खुद को किसी सुरंग में फंसा हुआ पाता है, किसी अनचाही जकड़न में खुद को पाता है. अँधेरे में दूर तक और देर तक देखने की कोशिश से उसकी आँखों में दर्द पनप जाता है.यह आदमी फिर-फिर उस कारखाने से निकलते धुएँ की लकीर को देखता है, और जबकि आज के दिन उसे करने को बहुत सारे काम है, वह उनमे से कोई काम नहीं करेगा.

1 COMMENT

  1. What a lovely presentation of industrial pollution and mental pollution of war. In the globalized world, not only free-market is free in real terms but the fear, anger, anxiety is also defying boundaries.
    Best of luck to the author and more importantly the translator.

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