महेश वर्मा की तीन कवितायें

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महेश वर्मा/
भारतीय काव्य परंपरा में ज्ञान और दर्शन के समुच्चय की जो तेजोमय धारा है, महेश वर्मा उनमें एक विलक्षण नाम हैं. कौतुक और सरलता से सावचेत दूरी बनाते हुई महेश की कविताएं समुद्र सी गहराई लिए हैं, जिससे उठती आंदोलनधर्मी लहरें बारम्बार पाठक को अपनी तरफ आकर्षित करती हैं.

लोहा और समुद्र

समुद्र अपनी शवपेटिका से निकाल कर
एक मृत जहाज हमारी पृथ्वी के लिये दे रहा है

उसमें अस्थियों का संयोजन तक जस का तस सुरक्षित है
सुरक्षित हैं संगीत और यौनिकता की गुत्थियाँ

सत्ताईस युवा पुराविदों की रूचियाँ
इसी धात्विक ढांचे में आकर पहले से विन्यस्त हो चुकीं :
आगे वे नियति की तरह प्रकट होंगी.

आखिरी संघर्ष करने वाले कैप्टन
या किसी प्रेमी  की अंतिम पुकारें लेकर आने को
इसे पुकार रहा है प्राचीन बंदरगाह

कुछ लोगों की नींद इतनी लंबी हो गई थी
कि इस समकालीन दिन के मध्याह्न में भी नहीं खुलने वाली

यह नींद ही उस जहाज में सुरक्षित बची चीज़ है
कैसे वह मोटे सांकलों, घिरनियों और अश्वशक्तियों के खींचे
पृथ्वी पर आई और अक्षुण्ण रही

थरथराता, प्राचीन आवाज़ में कुछ कहता
बंधकर उपर आ रहा है इतिहास
यह विशाल संरचना ज्ञान में कितने वाक्य जोड़ेगी?

शू तिंग

बड़े कान का भाग्य लेकर पैदा हुआ था
जब एक नौका में बदला तो
दोनों कान बादबान हो गए

जाड़े की किसी टोपी में समाता नहीं सौभाग्य
ठंडी हवा घुमा देती है मेरी नाव मनमानी दिशा में
चूंकी मैं ही होता हूँ नाविक इस कोहरे के समुद्र का
वापस खूंटे से बांध देता हूँ अपनी नौका

गर्मियों में गर्म धूल और बरसात की तड़तड़ाती बारिश
इसे चिथड़ा कर देने पर आमादा

पुश्तैनी घर ही मेरा बंदरगाह
लोहे की लंगर का एक सिरा पैर में बांधकर बैठा हूँ पैंसठ साल से.

यात्रा के संस्मरण
और गिलास की शराब ख़त्म हुए अरसा हुआ

काहे का बड़ा कान ?
काहे का सौभाग्य ?

#हमारे क्षेत्र में बड़े कान को सौभाग्य का चिन्ह मानते हैं.

लौटने के संदर्भ में

जहाँ कविता के बीच
किसी हिस्से के बगल में खींच दी थी
एक छोटी सी याद रखने की लकीर
और एक छोटा सा निशान वहीं पर

लौटने पर कई बार
कई बार उस जगह
कुछ भी महसूस नहीं होता

कई बार तुरंत कौंध जाता है भीतर एक रिश्ता
जो उस पहली बार इसी जगह पर
कविता में मिल था.

इसमें हर बार एक उजाला ही भीतर नहीं फैलता
कई बार गाढ़ी उदासी भी फैल जाती है।
(यहाँ इस्तेमाल हुई  पहली पेंटिंग  एसएच रजा  की है दूसरी रविन्द्र नाथ टैगोर की और तीसरी महेश वर्मा की ही बनाई हुई हैं)

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