स्ट्रीट परफॉरमेंस – एक रिदमिक लैंडस्केप

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गार्गी मिश्रा/

संगीत मानवजाति की सार्वभौमिक भाषा है –  हेन्री वॉड्सवर्थ लॉन्गफेलो

गार्गी मिश्रा

हम अपनी स्मृति पर थोड़ा ज़ोर डालें तो ऐसा महसूस होता है मानो ये अभी हाल ही की बात है जब गर्मियों की चिलचिलाती दुपहरी में कोई संत लंबी सफेद दाढ़ी, सर पर केसरिया पगड़ी बांधे, पीला अंगरखा पहने, हाथ में इकतारा लिए निगुर्ण गाते हुए हमारे द्वार आ खड़ा हो जाता था। या फिर दिन के दूसरे पहर के ख़त्म होते-होते नट-नटिनीयों की टोली अपने लोकगीत और नृत्य प्रस्तुत करते हुए किसी मुहल्ले से गुज़रते दिखाई देते थे। जादूगरों के होने से न जाने कितने ही इतवार यादगार बन गए, जिन्होंने अपने काले जामे से एक के बाद एक अनगिनत ग़ुलाब के फूलों की लड़ी लगा दी। बिना किसी सूचना के आने वाले मदारियों और संपेरों ने रोज़मर्रा की जिंदगी में एक आश्चर्यजनक उल्लास पैदा किया तो वहीं बहरूपियों ने किस्सों, कहानियों और नाटकों से मनोरंजन किया। इन सभी कलाओं में कलाकारों की विविध कला और संस्कृति तो दिखती ही है साथ ही इन प्रस्तुतियों में उनके जीवन से जुड़ा संघर्ष भी देखने के मिलता है। हो न हो यह संघर्ष ही उन्हें इस कला में उतारता है जो धीरे-धीरे किसी एक स्थान या क्षेत्र की गरिमा या पहचान बनती है।

इस लिहाज से यह मानने में कोई परहेज़ न होगा कि जगहें किसी ख़ास कला के लिए नहीं जानी जातीं बल्कि वह कला ही है जिसके कारण जगहों को जाना जाता है। डिल्यूज़ और गुआत्री ने एक निबंध , ‘ऑफ द रिफ्रेन’ में कहा है कि जगहों का प्रादेशीकरण वहां घटित होने वाली सामयिक कलाओं द्वारा होता है। इस संबंध में वे संगीत को बतौर मेटाफर इस्तेमाल करते हुए इस प्रश्न का उत्तर ढ़ूंढने की कोशिश करते हैं कि कैसे किसी एक स्ट्रीट पर प्रस्तुत किया गया संगीत लोगों को एक दूसरे से जोड़ता है और कैसे यह पूरी घटना एक पहचान के रूप में सामने आती है। स्ट्रीट परफॉरमेंस यानि सुर, लय और ताल का एक रिदमिक लैंडस्केप। एक ऐसा तालबद्ध लैंडस्केप जिसका कैनवस हैं गलियां, नुक्कड़, सड़कें, मुहल्ले। एक ऐसा लैंडस्केप जो संगीतमय है, जिसमें अखंडता का भाव है, जिसमें एक बहाव है, जिसमें संयोजन और सममिति का अद्भुत मिश्रण है, जिसका एक रूप और आकार है, जो अपने भावबोधक संकेतों, गति और सजीवता से लोगों को अपनी अभिव्यक्ति की ओर आकर्षित करता है। संसार की समस्त कलाओं की तरह स्ट्रीट परफॉरमेंसेज़ का भी एक उद्देश्य होता है जो ज़्यादातर सामाजिक कुरीतियों के ख़िलाफ एक सहज आपत्ती और विश्व में शांति का संदेश फैलाना है।

स्त्री पुरुष एकदम शिथिल हो जाते हैं जैसे मूर्ति. यह लन्दन की तस्वीर है.

बस्किंग और अन्य कलाएं

स्ट्रीट परफॉरमेंस के लिए एक और लोकप्रिय शब्द है जिसे बस्किंग कहते हैं। बस्किंग शब्द का प्रयोग ब्रिटेन में सन् 1860 में हुआ था। इस शब्द की जड़ें स्पैनिश शब्द बस्कर से जुड़ी हुई हैं जिसका अर्थ है, तलाशना या खोजना।  बस्किंग एक किस्म का कलात्मक प्रदर्शन है जो सार्वजनिक जगहों पर होता है। प्रदर्शन के बाद दर्शक कलाकारों को उनके इस मनोरंजन के लिए कुछ पैसे देते हैं। जिसमें आर्थिक सहयोग की अपेक्षा खाने की चीज़ें या रोज़मर्रा के जीवन में उपयोग आने वाली चीज़ें भी देते हैं। स्ट्रीट परफॉरमेंसेज़ में विभिन्न कलात्मक प्रस्तुतियां शामिल हैं जिनमें एक्रोबैटिक्स, ऐनिमल ट्रिक्स, बलून ट्विस्टिंग, कैरिकेचर्स, क्लाऊनिंग, कॉमेडी, कॉन्टोर्शन्स, एस्केपोलॉजी, डॉन्स, सिंगिंग, फॉयर स्किल्स, फ्ली सर्कस, फॉर्च्यून टेलिंग, जगलिंग, माईम, मैजिक, लिविंग स्टैच्यू, म्यूज़िकल परफॉरमेंस, पपेटियरिंग, स्नेक चार्मिंग, स्टोरी टेलिंग, रिसाईटिंग पोएट्री प्रोज़, स्ट्रीट थिएटर, स्वोर्ड स्वॉलोविंग प्रमुख हैं। यूं तो स्ट्रीट परफॉरमेंसेज़ की शुरुआत कलाकारों की आर्थिक समस्याओं को कम करने के लिए हुई लेकिन इसका एक ज़रूरी मक़सद कुछ विलुप्त प्राय वाद्य यंत्रों और यांत्रिकी उपकरणों को बचाने के लिए हुआ, जैसे बैरेल ऑर्गन, म्यूज़िक बॉक्स, पियानो रोल। पुराने समय में बस्किंग में ऑर्गन ग्राईंडर्स का इस्तेमाल हुआ करता था।

विश्व के अलग अलग कोनों में स्ट्रीट परफॉरमेंस अलग-अलग नामों से जाने गए। फ्रांस में बस्कर्स को ट्रोबडोर के नाम से जाना जाता था, उत्तरी फ्रांस में ट्रॉवरीज़, जर्मनी में मिनीसिंगर्स, रशिया में स्कोमोरोख, मेक्सिको में मारियाचिस, जापान में शिंडोन्या के नाम से जाना जाता था। वहीं हिंदुस्तान और पाकिस्तान के गुजराती इलाकों में इस कला को भवाई के नाम से जाना जाता है जिसके अंतर्गत गांव ढ़ांड़ीयों में छोटे-छोटे नाटक खेले जाते हैं।

मेडिसिन शो

स्ट्रीट परफॉरमेंस का ही एक रूप है मेडिसीन शो

जिसकी शुरुआत यूनाईटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका में 19 वीं सदी में हुई थी। इसके तहत यात्रा करने वाले विक्रेता अलग अलग जगहों पर एक छोटे नाटक या स्किट का प्रदर्शन करते और लोगों को दवाईयां बेचते जो चोट लगने पर मरहम का दर्द की दवा की तरह काम आतीं। अक्सर इस शो को देखने के बाद दर्शकों को ऐसा महसूस होता कि उनकी शारिरीक तकलीफ़ में कुछ कमी आई है।

ओल्ड क्रो मेडिसीन शो केथ सेकर का कहना है 

हम बड़े हुजूमों के लिए परफॉर्म करते हैं और हमारा मक़सद इतना ही है कि लोग एक नज़र हमें देखें, हमें सुनें। यह सब कुछ किसी न किसी गली, नक्कड़ या मुहल्ले से शुरु हुआ और इसलिए हम अपनें काम से काफ़ी जुड़ाव महसूस करते हैं। ये बहुत ही बेहतरीन अनुभव रहा है। बस्किंग एक बहुत ही विनम्र और साहसिक कार्य है। इसमें संगीत की ऊर्जा का भी बहुत बड़ा महत्व है। लोग इस तरह के परफॉरमेंस के सामने से गुज़रते हैं। बहुत से लोगों के लिए एक बस्कर एक मामूली सा आदमी हो सकता है लेकिन कभी कबी बस्किंग एक सामाजिक बैरोमीटर का काम करता है जो जिससे आप ये जान सकते हैं कि आप किन लोगों के बीच में रह रहे हैं।

यह डॉट कॉटन की तसव्वर है जो कैबरे करते हैं. इनको क्लोव्निंग और माईम में महारत हासिल है

स्ट्रीट परफॉरमेंसेज़ के मुख़्य प्रकार

स्ट्रीट परफॉरमेंस तीन प्रकार के होते हैं।

सर्कल शो – सर्कल शो एक ऐसा शो है जिसकी ख़ासियत है एक हुजूम को अपने इर्द-गिर्द इक्ट्ठा कर लेना। इस परफॉरमेंस की एक ख़ास बात ये है कि इसकी शुरुआत और अंत बेहद अलग होते हैं। अक्सर इस तरह की परफॉरमेंसेज़ में स्ट्रीट थिएटर, पपेटियरिंग, मैजिशीयन्स, कॉमेडियन्स, एक्रोबैट्स, जगलर्स और म्यूज़ीशियन्स शामिल होते हैं। कभी-कभी सर्कल शो में बहुत बड़े हुजूम के इकट्ठे होने का अंदेशा होता है और एक कुशल बस्कर की ख़ासियत यह मानी जाती है कि वह इस हुजूम को कंट्रोल करने में कामयाब रहता है।

वॉक बाय ऐक्ट्स– इस परफॉरमेंस की ख़ास बात यह है कि ये बेहद कम समय के लिए परफॉर्म किया जाता है। इस ऐक्ट में बस्कर या तो कोई म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट बजाता है या फिर लिविंग स्टैच्यू बनता है। वॉक बाय ऐक्ट एक सर्कल शो में तब्दील हो सकता है अगर उसमें कुछ अनोखे ऐक्ट्स की पेशकश की जाय।

स्टॉपलाईट परफॉरमर इस परफॉरमेंस की खास बात यह है कि इसे ट्रैफिक सिग्नल के लाल होने पर परफॉर्म किया जाता है। जब तक सिग्नल लाल रहता है तब तक परफॉरमर्स गाड़ियों के नज़दीक जा कर अपने करतब दिखाते हैं। इन परफॉरमेंसेज़ में ज़्यादातर मैजिक, ब्रेक डांस या जग्लिंग शामिल होता है। चूंकी इस परफॉरमेंस की अवधि बहुत कम होती है इसलिए इसका प्रभावशाली होना अति आवश्यक हो जाता है।

परफॉरमेंस के रिवार्ड कलेक्शन में भी शामिल है कला 

ये तो बात हुई अलग-अलग स्ट्रीट परफॉरमेंस की। पर क्या आप जानते हैं कि कला के प्रर्दशन के बाद रिवार्ड के रूप में

1855 में स्ट्रीट म्यूजिशियन पोब्रे रबेक़ुइस्ता (Pobre Rabesquista) का चित्र. बनाने वाले हैं रोद्रिगुएस (Rodrigues)

कलाकारों के मिलने वाले पैसे भी बेहद कतात्मक तरीके के इकट्ठे किए जाते हैं। बस्करर्स, पब्लिक द्वारा दिए गए डोनेशंस और टिप के रूप में दिए गए पैसों को अलग-अलग तरह से इक्टठे करते हैं जो निर्भर करता है उनके ऐक्ट पर। वॉक बाय ऐक्ट्स के लिए म्यूज़िकल इंस्ट्रूमेंट के केस, स्पेशल बॉक्स या कैन इस्तेमाल किया जाता है। सर्कल शो में परफॉरमर अक्सर शो के ख़त्म होने पर पैसे इक्ट्ठे करता है या कभी-कभी शो के दौरान ही। इन परफॉरमेंसेज़ के दौरान कोई-कोई परफॉरमर एक बॉट्लर को भी अपने साथ रखता है जिसका काम होता है शो के दौरान या उसके बाद रिवार्ड्स को कलेक्ट करना। बोलचाल की भाषा में उस कलेक्टर को बॉट्लर, हैट मैन या पिच मैन कहते हैं क्योंकि पैसे या तो किसी बॉटल या हैट या किसी पिच(जगह) में कलेक्ट किए जाते हैं।

परफॉरमेंस में पिच का महत्व

पिच यानी वो जगह जहां बस्कर्स अपनी कला का प्रदर्शन करते हैं। स्ट्रीट परफॉरमेंसेज़ में पिच का महत्व बहुत है क्योंकि कई बार ऐसा होता है कि कुछ जगहों पर परफॉरमर्स दर्शकों की भीड़ इकट्ठा कर पाते हैं और कई जगहों पर ऐसा कर पाना संभव नहीं होता। पॉपुलर पिच वो मानी जाती हैं जहां लोग बड़ी तादाद में इकट्ठे होते हों,  जहां विज़ीबिलटी ज़्यादा हो और शोर कम। ऐसी जगहों में टूरिस्ट स्पॉट, लोकप्रिय पार्क, रेस्त्रां, कैफ़े, बार, पब, सब वे, बस स्टॉप इत्यादि शामिल हैं।

दुनिया के कुछ महत्वपूर्ण स्ट्रीट परफॉरमर्स

ऐबे, द स्पून लेडी स्पून प्लेयर, स्ट्रीट परफॉरमर, न्यूयॉर्क सिटी
जोसेफिन बेकर स्ट्रीट डांसर
कैटफिश द बॉटलमैन बस्कर, ऑस्ट्रेलिया
ट्रेसी चैपमैन बस्कर, कैम्ब्रिज
माईक डॉटी सिंगर, बस्कर , न्यूयॉर्क सिटी
न्यून फॉल्कनर बस्कर
बेंजामिन फ्रैंकलिन स्ट्रीट परफॉरमर, फ्री स्पीच के लिए सामाजिक कार्य
यमुना बाई वायकर इंडियन फोक, लावणी, तमाशा आर्टिस्ट। बतौर बस्कर अपनी मां के साथ काम किया

राजस्थान के जैसलमेर के एक कलाकार जो रावणहत्था में सक्रिय रहे हैं

परंपरा और संगीत से परिभाषित होते हिन्दुस्तान में स्ट्रीट परफॉरमेंस

हम दुनिया भर में स्ट्रीट परफॉरमेंसेज़ के विभिन रूपों से परिचित हुए और हमने देखा कि कितना विविध है इस कला का संसार। हर कला को यूनिवर्सल और लोकल दोनों स्तरों पर देखे जाने की ज़रूरत होती है। हम अपने देश की बात करें तो ऐसी बहुत सी कलाएं हैं जो स्ट्रीट परफॉरमेंसेज़ से सीधे तौर पर जुड़ती हैं। आईये एक नज़र डालते हैं उन कलाओं पर।

राजस्थान का मशहूर रावणहत्था – रावणहत्था एक प्राचीन वाद्य यंत्र है। यह एक प्राचीन मुड़ा हुआ वायलिन है जो भारत और श्री लंका के आस पास के क्षेत्रों में लोकप्रिय है। मध्यकालीन भारत के इतिहास के दौरान, राजा संगीत के संरक्षक थे। इससे शाही परिवारों में रावणहत्था की बढ़ती लोकप्रियता में मदद मिली। राजस्थान और गुजरात में, राजकुमारों द्वारा सीखा जाने वाला यह पहला वाद्य यंत्र था। राजस्थान की संगीर परंपरा ने महिलाओं के बीच भी रावणहत्था को लोकप्रिय बनाने में सहायता की। पौराणिक कथाओं के अनुसार, रावण हिंदू भगवान शिव के प्रतापी भक्त थे, और उन्होंने रावणहत्था का उपयोग करके उनकी सेवा की। हिंदू महाकाव्य रामायण में, राम और रावण के बीच युद्ध के बाद, हनुमान एक रावणहत्था उठाकर उत्तर भारत लौट आये। भारत में, रावणहत्था अभी भी राजस्थान में बजाया जाता है। भारत से, रावणहत्था पश्चिम की ओर मध्य-पूर्व और यूरोप तक पहुंचा, जहां 9वीं शताब्दी में, इसे रावणस्त्रोंग कहा जाने लगा। कुछ लोगों का मानना ​​था कि रावणहत्था भगवान हनुमान द्वारा लंका से भारत लाया गया था। आज भी जब आप राजस्थान ख़ासकर जैसलमेर जाएंगे तो आप के वहां के फोक आर्टिस्ट रावणहत्था के साथ लोक गीत गाते हुए ज़रूर मिलेंगे।

सपेरों का संगीत जो अव विलुप्तप्राय है – एक वक़्त हुआ करता था जब हिंदुस्तान में सपेरों ने संगीत और और उसकी प्रस्तुति में एक ख़ास जगह बना रखी थी। वे दुनिया भर में विषैले से विषैले सांपों को अपने संगीत के अधीन कर उन्हें नियंत्रित करने की कला के लिए जाने जाते थे। सपेरों की उपस्थिति अक्सर तीज त्योहारों या यूं भी गली मुहल्लों में होती थी लेकिन समय के साथ यह कला अब विलुप्त होने की कगार पर है। ऐनिमल राईट्स ऐकेटिविस्ट्स का मानना है कि यह कला सांपों के प्रति क्रूरता को दर्शाती है। आज के समय में नाग पंचमी जैसे त्योहार पर भी सपेरे बमुश्किल नज़र आते हैं।

चलती रेल में संगीत – हालांकि यह बात सुनने में पीड़ादायक है कि हिंदुस्तान में अक्सर रेल गाड़ियों में भक्ति संगीत, कव्वाली या हिन्दी फिल्मों के गीत गाने वाले आर्टिस्ट ग़रीबी की मार सहने के कारण इस कला को अपनाते हैं लेकिन उनका संगीत सुनने पर किसी साधना से कम नहीं जान पड़ता। जुलाई 2015 में द ईंडियन एक्सप्रेस में एक रिपोर्ट के अनुसार मुंबई की लोकल और अन्य ट्रेनों में गाना गाने वाले स्ट्रीट आर्टिस्ट बक़ायदा संगीत की शिक्षा प्राप्त किये हुए होते हैं। उनमें से कई आर्टिस्ट ऐसे भी होते हैं जो पुराने संगीत के घरानों से ताल्लुक रखते हैं जिन्हें ग़रीबी के कारण इस ट्रेनों में गा कर अपनी रोज़ी-रोटी का बंदोबस्त करना पड़ता है। इस बात की पुष्टि एक स्टडी के अंतर्गत की गई है जो स्वराधार नाम के एक ग्रुप के युवाओं ने की थी जिनका उद्देश्य उन गायकों को उचित सम्मान दिलाना है जो रेल गाड़ियों में गाना गा कर यात्रियों का मनोरंजन करते हैं।

कला का क्षेत्र जितना विविध है उतना ही विविध है उसका स्त्रोत। हम जिन चीज़ों को देखते हैं वो एक संपूर्ण रूप में हमारे सामने आती है और हमारा मनोरंजन करती हैं। यह अंदाज़ा लगाना मुश्किल होता है कि कौन सी कला किस तबके से उठ कर आई है, उसके पीछे किस किस्म की प्रेरणा और चेतना छिपी है। स्ट्रीट परफॉरमर्स की इस यात्रा को देखते हुए एक बात महसूस होती है कि यदि हम इन कलाओं के प्रति अपनी ज़िम्मेदारी नहीं समझेंगे, यदि हम इन कलाओं को नहीं बचाएंगे तो ये अपनी सुंदरता, उपयोगिता और भव्यता के साथ ज़मीदोज़ हो जाएंगी।

(गार्गी मिश्रा, अपने नामार्थ के अनुरुप ही, विदुषी है। विभिन्न विषयों पर लिखते हुए गार्गी नए किस्म का आस्वाद पैदा करती हैं। चीजों को उनकी सूक्ष्मता में अवलोकित करता हुआ उनका गद्य नया नजरिया भी प्रदान करता है।)

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