हिंदी के कथाकार मनोज कुमार पांडेय की कहानी: कष्ट

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 मनोज पांडेय/

भारतीय समाज के वर्तमान का जो हिस्सा दर्ज करने से छोड़ दिया जाता है, उसे जानना हो तो आपको मनोज पांडेय की कहानियाँ पढ़नी  होंगी. एक असफल अभिनेता के जीवन के किंचित किन्तु अनिर्वचनीय सुखों पर अपनी शुरुआती कहानी  (चंदू भाई नाटक करते हैं) लिखते हैं, आपराधिक मनोवृति का स्पाइरल घुमाव अपनी कहानी जीन्स में दर्ज करते हैं और फिर पानी जैसे अनिवार्य मुद्दे पर  पानीजैसी बेहतरीन कहानी लिखते हैं. बेचैन कर देने वाली इनकी अनेक कहानियों से गुजरते हुए आपको अपने आसपास के भारत का एहसास होगा जिससे आप दूर कर दिए गए हैं. उसी क्रम में पढ़िए, लेखक  की ये कहानी:

 

यह मेरा बीए का दूसरा साल था जब मैं पिता से झगड़ बैठा और मुझे घर से खर्च मिलना बंद हो गया. यह न होता अगर मैं थोड़ा सा झुक गया होता और अपनी गलती के लिए माफी माँग ली होती. गलती मेरी ही थी मैं जानता था पर इससे निपटने का जो तरीका पिता ने अख्तियार किया उसने मुझे गुस्से और इससे भी ज्यादा बदले की भावना से भर दिया.

बात बहुत छोटी सी थी. मैं मुकुंदपुर चौराहे पर सिगरेट का सुट्टा मारते हुए खड़ा था जब गाँव के एक ताऊ ने मुझे यह करते हुए देखा. मेरे साथ उनके ही बेटे थे जिन्होंने काफी कोशिश के बाद मुझे सिगरेट पीना सिखाया था. मैंने अभी नया नया ही सिगरेट पीना सीखा था और आजकल नाक से धुआँ छोड़ने, धुएँ के छल्ले बनाने या धुएँ का अंडा बनाने जैसी चीजों पर पूरी कलात्मकता से काम कर रहा था. इस समय बात बात पर सिगरेट जलाई जा रही थी और जहाँ तक संभव था सिगरेट का अधिकतम इस्तेमाल किया जा रहा था. सिगरेट पीते हुए जब हम चाय पीते तो सिगरेट की राख चाय के कप में झाड़ते. पूरी सिगरेट खत्म होते होते चाय का रंग बदल जाता. मुझे यह स्वाद एक अलग तरह के नशे से भर देता पर नशा कैसा भी हो आखिरकार उतरता ही है.

मनोज पांडेय

ताऊ के शिकायत करने के करीब दस बारह दिन बाद जब मैं घर गया तो मुझे घर में एक अलग ही तरह की गंध महसूस हुई. मैंने अपनी तरफ से पूरी कोशिश की कि उस गंध की छोर तक पहुँच सकूँ पर असफल रहा. वापस आने के दिन मैंने पिता से अगले महीने के खर्च का पैसा माँगा तो यह गंध अचानक से सांद्र होकर मुझ पर छा गई. पिता बोले किस बात का खर्च? सिगरेट पीने का? यह इतना अचानक था कि कोई ढंग का बहाना भी नहीं सूझ पाया. मैंने सच में झूठ की मिक्सिंग करते हुए बताया कि मैं नहीं पी रहा था बल्कि ताऊ के ही बेटे लखन पी रहे थे. जब उन्होंने ताऊ को देखा तो खुद बचने के लिए सिगरेट मुझे थमा दिया. मैं तो बस पकड़ के खड़ा था. पिता ने मुझे जिन नजरों से देखा उनमें जबरदस्त गुस्सा भरा था. मैंने माँ की तरफ देखा उनकी आँखों में मेरे लिए छोभ था या शायद छोभ और करुणा के बीच की कोई चीज.

पिता ने कहा कि उनके पास मेरी पढ़ाई के लिए पैसे हैं पर ऐयाशी के लिए नहीं. यह बोलकर वे माँ को संबोधित हो गए कि मैं दिन रात एक करके इसलिए नहीं कमाता हूँ कि इन्हें सिगरेट पिला सकूँ. इनसे कह दो कि मेरे पास इनके लिए पैसा नहीं है. इसके बाद वे देर तक माँ पर बरसते रहे. मेरी समझ में आज तक नहीं आया कि अगर मैं सिगरेट पी रहा था तो इसमें माँ की क्या गलती थी.

यह छोटी सी बात थी जो मेरे माफी माँग लेने और आगे से सिगरेट न पीने का आश्वासन देने से समाप्त हो गई होती. पर मैंने माफी नहीं माँगी. पिता की पैसे न देने की बात मुझे बहुत बुरी लगी थी. मैंने कुछ गलत किया था तो वे मुझे डाँट सकते थे. मुझे मार सकते थे, जोकि न उनके लिए कोई नई बात होती न ही मेरे लिए पर उनकी पैसे न देने की बात मुझे चुभ गई. मुझे लगा कि जैसे वह पैसे देने का कोई एहसान जता रहे हों मुझ पर. अचानक से मैंने अपने को बड़ा और जिद्दी महसूस किया. न दें पैसा, आगे से देंगे तो भी मैं नहीं लूँगा. मैं अपना खर्च खुद से चला सकता हूँ.

अगले दिन मैंने अपनी साइकिल उठाई और चुपचाप शहर चला आया.

अभी साल भर पहले मैं बीए करने के लिए बरेली आया था और अब एक छोटा सा कमरा लेकर रह रहा था. कमरा जितना भी छोटा रहा हो पर आजादी का एहसास बहुत बड़ा था. मैं अब आजाद था. मुझे किसी बात के लिए पिता की इजाजत की जरूरत नहीं थीं. दोस्तों के साथ ज्यादा उठने बैठने पर डाँट खाने का खतरा नहीं था. साल भर पहले तक मैंने टाकीज में एक भी फिल्म नहीं देखी थी बल्कि पोस्टर देखकर ही फिल्म देखने जैसी सनसनी महसूस कर लेता था. और अभी साल भर में पचीसों फिल्में देख चुका था. पर यह भी सच था कि पिता से जितने पैसे मुझे मिलते थे कमरे का किराया चुकाने के बाद वह महीने भर की सब्जी और मिट्टी के तेल आदि के लिए भी बहुत कम थे. यह सच नहीं था कि मैं पिता के पैसे से ऐश कर रहा था. ज्यादातर फिल्में दोस्तों ने दिखाई थीं और सिगरेट का यह कि सिगरेट पीने वाले दोस्त जब अपने लिए खरीदते तो मेरे लिए भी खरीद लेते.

मैं अपने दोस्तों के बीच एक उभरते हुए शायर की हैसियत से काफी लोकप्रिय था. यह कोई आज की बात नहीं थी. इंटर के दिनों में ही मैंने अपने लिखे गीतों से एक पूरी कापी भर डाली थी. पर वहाँ मैंने अपने इस हुनर के बारे में किसी को पता नहीं चलने दिया. किसी से बताने में मुझे खुद ही शरम सी आती थी. शहर आकर यह शरम न जाने कहाँ उड़ गई. अब मैं जो भी लिखता खुलेआम दोस्तों को सुनाता. एक अखबार के सांध्यकालीन संस्करण में मेरे गीत व गजलें नियमित तौर पर प्रकाशित हो रहे थे. इस तरह से दोस्तों के बीच में मेरी उपस्थिति थोड़ी विशिष्ट टाइप की थी. पर इतनी ही बात नहीं थी. इसका एक व्यवहारिक पहलू भी था. मेरे दोस्त मेरे लिए जो कुछ भी करते उसके बदले में मुझे उनके प्रेमपत्र सुधारने पड़ते. उनकी प्रेमिका या संभावित प्रेमिका की शान में गजलें कहनी पड़तीं. उनके संबंधों में कोई दरार या मान मनौव्वल चल रही है तो मुझे उस स्थिति के अनुरूप गद्य या पद्य में कुछ लिखना होता. मुझे इस स्थिति से कोई दिक्कत नहीं थी बल्कि मैं इस स्थिति को बनाए ही रखना चाहता था.

बरेली वापस आकर मैंने अपने दोस्तों को अपने इस निश्चय के बारे में बताया कि अब मैं घर से पैसे नहीं लूँगा और अपना खर्च खुद ही चलाऊँगा. कुछ दोस्तों ने मुस्कराकर बात बदल दी तो कुछ ने पूछा कि कैसे? मेरे पास कोई योजना नहीं थी. मैंने ऐसे ही जवाब दिया कि कुछ भी करूँगा पर घर से नहीं लूँगा. मेरी यह बात इतनी हवाई थी कि अभी तक मैं यह सोच ही नहीं पाया था कि मैं अपना खर्च कैसे चलाऊँगा. एक तरीका था ट्यूशन पढ़ाने का जो कि मेरे कई परिचित करते थे पर यह मेरे लिए लगभग वर्जित इलाका था. मुझे अंग्रेजी बिलकुल नहीं आती थी और आसपास के ज्यादातर बच्चे कान्वेंटिया थे. जिन्हें पढ़ा पाना मेरे बस की बात नहीं थी.

इन्हीं दिनों किसी ने अचार मिल के बारे में बताया. जिसका सुपरवाइजर मेरे एक दोस्त के पड़ोस में रहता था. मैं जाकर सुपरवाइजर से मिला. सुपरवाइजर ने अगले दिन अचार मिल बुलाया और मुझे बहुत आसानी से काम मिल गया. पचास रुपये रोज के हिसाब से महीने का पंद्रह सौ रुपए. एक दिन की भी छुट्टी नहीं. बारह घंटे का काम. बारह घंटे से ज्यादा काम का ओवरटाइम भी मिलना था. यह सब बहुत कठिन था और मेरा पूरा समय ले लेने वाला था. पर मेरे पास कोई और रास्ता नहीं बचा था. पिछले दो-तीन महीने में मुझ पर काफी उधार हो चुका था. दोस्तों ने मुझसे कन्नी काटना शुरू कर दिया था. उनकी भी गलती नहीं थी. मेरे ज्यादातर दोस्त मेरे जैसी जीवन स्थिति में थे. जिन्हें ज्यादा पैसा भी मिलता था वे भी साथ रहने पर सिगरेट पिला सकते थे या कभी कभार सिनेमा दिखा सकते थे. मेरे कमरे का किराया चुकाना या महीने भर का राशन खरीदना उनके लिए भी संभव नहीं था.

मैंने अगले दिन से काम पकड़ लिया. सब्जियों का सीजन शुरू हो रहा था. दिन में कई कई ट्रक गोभी, गाजर, नीबू आदि उतरते. दिन भर उनकी कटाई चलती रहती. काटकर धूप दिखाने के बाद उन्हें प्लास्टिक के बड़े बड़े पीपों में भर कर रख दिया जाता. पीपे में नमक पानी में कुछ मसाले और प्रिजर्वेटिव के साथ उन्हें एक बड़े हाल में रख दिया जाता. जहाँ उनमें यह सड़ते रहते. ऐसे ही सेब और संतरे भी उतरते. उनसे जैम और मामलेड बनाए जाते. सॉस और केचप के लिए टमाटर उतरते. यह सब कुछ बाजार में बिकने के लिए नहीं था. यह छोटे छोटे पाउचों में पैक कर के कुछ बड़े होटलों तथा हवाई सेवा देने वाली कुछ कंपनियों के पास भेज दिया जाता था जिनसे कि अचार मिल का करार था.

मुझे शुरुआत में सब्जी काटने के काम में लगाया गया. दिन भर गोभी और गाजर काटते जाना था. शुरू में यह मुझे बहुत आसान काम लगा पर शाम तक मेरे हाथ भर आए. बैठे बैठे पैर कई बार सुन्न हुए. उठकर कई बार भाग जाने का मन हुआ. यह भी मन में आया कि इस सब से अच्छा है कि मैं सीधे घर जाकर पिता के पैरों में पड़ जाऊँ और उनसे माफी माँग लूँ. मैंने खुद को हिम्मत बंधाई कि यह अपने पैरों पर खड़े होने का समय है. मन में कहीं यह भी था कि आगे जब भी खर्चे वगैरह की बात आएगी तो मैं कहूँ या न कहूँ पर इस अंदाज में खड़ा तो हो ही सकूँगा कि मैं आपके दिए का मोहताज नहीं हूँ. जरा मुश्किल से ही सही पर अपने पैरों पर खड़ा हो सकता हूँ. पर अपने पैरों पर खड़े होने में बहुत सारी मुश्किलें थीं.

एक अजीब से मुश्किल यह भी थी कि सब्जी या फल काटने का काम करने वाली सभी की सभी औरतें ही थीं. लड़के यहाँ पर वैसे भी बहुत कम थे. जो थे भी वह सभी मशीनों पर काम करते. हालाँकि मजदूरी में कोई फर्क नहीं था पर मशीन पर काम करना ज्यादा जिम्मेदारी और सम्मान का काम माना जाता. मेरी मुश्किल यह थी कि तब तक मेरी ठीक से दाढ़ी मूँछ भी नहीं आई थी. मैं उन औरतों के बीच में शरमाया हुआ रहता और दिन भर नजरें नीची किए हुए सब्जियाँ काटता रहता. वे आपस में बोलती बतियाती अपने काम में लगी रहतीं. कुछ ने मुझे भी अपने में शामिल करने की कोशिश की. छोटे छोटे हँसी मजाक और छेड़खानियों के साथ यह सिलसिला शुरू हुआ. कुछ ने मेरे घर परिवार के बारे में जानने की कोशिश की. मैं ज्यादातर सवालों के जवाब में चुप लगाए रहता. या बहुत हुआ तो मुन्न मुन्न करते हुए कुछ इस तरह से जवाब देता कि मेरे बोले गए में से ज्यादातर हिस्सा तो उन्हें सुनाई ही न देता.

दरअसल मेरी समस्या सिर्फ शरमीलेपन की वजह से नहीं थी. मेरी समस्या यह थी कि मैं अपने आपको एक मजदूर के रूप में नहीं स्वीकार कर पा रहा था. मुझे बार बार लगता कि यहाँ यह काम करते हुए कहीं कोई मुझे देख न ले. मैं सड़क पर नहीं एक चारदीवारी के बहुत अंदर काम कर रहा था फिर भी मैं अक्सर अपना सिर नीचा किए रहता कि कोई आते जाते देखे भी तो उसे मेरा चेहरा न दिखे. फिर भी एक दिन एक लड़के ने देख ही लिया. यह मेरे साथ आठवीं तक पढ़ता था. उसके बाद उसने स्कूल छोड़ दिया था. वह इसी चारदीवारी के अंदर उस हिस्से में काम करता था जिसमें मशरूम उगाए जाते थे.

वह हुलसकर मेरे पास आया. आते हुए उसने दूर से ही मेरा नाम लेकर पुकारा. मैं शर्म से गड़ गया. जब वह लगभग जबरन मुझसे हाथ मिला रहा था तो मेरे हाथों में जैसे जान ही नहीं बची थी. मैं उससे नजरें नहीं मिला पा रहा था. वह इस स्थिति को भाँप गया और काम का बहाना करके चला गया. यहाँ तक कि एक दो बार बाजार में मिला तब भी मैं कुछ इस तरह से उसकी बगल से गुजर गया जैसे कि मैं उसे जानता ही नहीं था. मुझे डर था कि कहीं वह मेरे मजदूरी करने की बात न छेड़ बैठे.

यहाँ ज्यादातर मजदूर एक दूसरे को नाम से पुकारते थे भले ही उनकी उम्र में कितना भी फासला क्यों न हो. कई औरतें मेरी माँ से भी बहुत ज्यादा उम्र की थीं. बहुत दिनों तक मैं उनको उनके नाम से नहीं पुकार पाया. कई बार मैं उनका नाम लेना चाहता तो गले में जैसे खराश प्रकट हो जाती. मैं मुँह के आगे मुट्ठी लगाकर खाँसने लगता. कई बार उनमें से किसी को बुलाना होता या कि उनमें से किसी से कोई बात कहनी होती तो उनके पास जाकर यह कहना होता. वे मेरे इस विचित्र व्यवहार पर हँसतीं, कई बार तो मेरे मुँह पर ही. मैं अपने ही भीतर और भीतर घुसता चला जाता.

यहाँ पर काम का समय था सुबह के सात बजे से शाम के सात बजे तक. ऐसे में जो सुबह के लिए बनाता वही दोपहर के खाने के लिए भी ले आता. अचार वहीं मिल जाता. सभी ऐसा करते. सुपरवाइजर को यह पता था. उसकी ताकीद बस इतनी थी कि मालिक को पता न चले. शाम को छूटते छूटते अँधेरा हो जाता. जिस दिन बाहर जाने के लिए ट्रक लोड हो रहे होते या कि मिल में कोई सामान गिर रहा होता उस दिन और देर हो जाती. कभी कभी तो नौ दस बज जाते. थकान से शरीर टूट रहा होता. कमरे पर जाकर तुरंत बिस्तर पर लेट जाने की इच्छा होती. कई बार दूध की पैकेट और ब्रेड ले आता. ठंडे दूध में ही हल्की सी चीनी मिलाकर ब्रेड भिगोकर खा लेता. या कई बार जब पैसे होते तो रास्ते की दुकान से सालन या कबाब खरीद लाता और रोटी या चावल घर पर बना लेता.

 

पैरेंटएज.इन से साभार

क्लास करना मैंने कब का बंद कर दिया था. दोस्तों से मुलाकात बहुत कम हो गई थी. मैंने उन्हें अपने काम के बारे में नहीं बताया था. वे कभी मिलते भी तो मैं कोई न कोई बहाना बनाकर निकल आता. घर पर माँ की याद आती पर घर गए हुए कई महीने बीत गए थे. इस बीच पिता ने गाँव के ही एक लड़के से कुछ पैसे भिजवाए थे जो मैंने लेने से मना कर दिया. तो मेरा किस्सा यह था कि मेरे अब तक के दोस्त परिचित मुझसे छूट रहे थे और दिन भर मैं जिनके बीच में काम करता था उनके जैसे हो जाना मुझसे हो नहीं पा रहा था. मैं दोनों तरफ से अजनबी हो रहा था. मैं लगातार अपने प्रति एक हीन भावना से भरता जा रहा था.

कई बार तो मैं यह भी सोचता कि इन्हें क्या मालूम कि इनके बीच इतना बड़ा शायर बैठकर अचार बना रहा है. मुझे ऐसे सपने आते कि जब मैं बहुत मशहूर हो जाऊँगा और इन अनपढ़ों को पता चलेगा कि यह मैं था जो उनके यहाँ बैठकर सब्जी काटता था तो वे क्या सोचेंगे? पर ऐसा सोचने से भी मुझे कोई राहत न मिलती. मैं सब्जी काटते हुए मन ही मन किसी शेर को पूरा कर रहा होता और उधर से कोई पुकारता कि जा एक बोरी नमक लेके आ. मैं गीतों का तुक ताल मिला रहा होता कि सुपरवाइजर ट्रक से सामान उतारने के लिए पकड़ ले जाता.

इस स्थिति के बारे में जब भी सोचता पिता अपराधी नजर आते. मैं उनके प्रति गुस्से और क्षोभ से भर जाता. इसी गुस्से में मैं पिता की अनुपस्थिति में एक-दो बार घर भी गया. वहाँ जाकर मैं माँ से खूब झगड़ता और इसके पहले कि पिता अपने काम पर से लौट कर आएँ, वापस लौट आता. ऐसे ही एक बार मैंने माँ के सामने शिगूफा छोड़ा कि मुझे लगता है कि मैं पागल हो रहा हूँ. माँ की आँखों में जैसे एक आतंक पसर आया. मुझे बहुत अच्छा लगा. मैं पिता की आँखों में भी वैसा ही आतंक देखना चाहता था. मैं चाहता था कि माँ पिता को इस बारे में बताएँ और साथ में यह भी बताएँ कि कैसे मेरे चेहरे पर पागलों वाली वहशत और अपरिचय दिख रहे थे. मैं नहीं जानता कि माँ ने पिता से कुछ कहा या कि वह हमेशा की तरह यह जहर अपने ही भीतर पचा ले गईं. मैं जानता था कि पिता गुस्सा होकर मेरी अनुपस्थिति में मेरे बारे में जो भी कहते थे माँ वह बातें मुझसे कभी नहीं कहती थीं.

वैसे पागल होने वाली बात पूरी तरह से गलत भी नहीं थी. मैं मजदूर बन पाने के बदले एक घिनौने जानवर में बदल रहा था धीरे धीरे. अपने में ही कैद. अपने से घृणा करता हुआ. और उस तरह के काम दोहराता तिहराता हुआ जिससे कि मैं अपने आप से और और घृणा कर सकूँ. मैं जिस मकान में रहता था वह सत्तर अस्सी साल पुराना एक गिरता पड़ता मकान था.   कभी यह भव्य रहा होगा पर अभी यह एक खंडहर था. नीचे दो परिवार वाले किराएदारों के साथ मकान मालिक रहा करते थे. ऊपर जो एकमात्र कमरा अभी तक गिरने से बचा हुआ था उसमें मैं रहता था. इसमें असुविधा यह थी कि टट्टी पेशाब के लिए एक लंबा चक्कर काट कर पीछे की तरफ से जाना पड़ता था. मुझे कई बार जोर की लगी होती पर उतना लंबा चक्कर काट कर जाने की इच्छा और शक्ति न होती. मैं कोई अखबार या पालीथीन बिछाता और वहीं कमरे में ही बैठकर कर लेता. इसके बाद उसे एक और पालीथीन में डालकर लोगों की नजरें बचाकर सामने की खाली जगह में झटक देता.

यह एक बानगी भर थी. इस तरह की और भी न जाने कितनी बातें थी जिनमें मैं इन दिनों लथपथ था. निकलने का कोई रास्ता नहीं नजर आ रहा था. कई बार मैं अपने हाल पर चीख चीखकर रोता. अचार मिल से अलग कई कई दिन बीत जाते किसी से बात किए हुए. ऐसे में एक दिन मुझे लगा कि अब जीने का कोई मतलब नहीं. अब मुझे मर जाना चाहिए. मैं नई ब्लेड खरीद कर लाया कि उससे अपने हाथ की नस काट सकूँ. मैं अपनी नस काटने ही वाला था कि मुझे जोर की झुरझुरी आई और मैंने ब्लेड दूर फेंक दी. यह तरीका ठीक नहीं था. फिर मैंने कहीं से नींद की दवा का जुगाड़ किया और रात में सोने के पहले पूरी की पूरी दस खा गया. यह तो मैंने बाद में जाना कि उसकी ताकत बहुत कम थी. उसने बस अगले पूरे दिन और लगभग पूरी रात मुझे सुलाए रखा. ऐसा कोई भी नहीं था जो मुझे जगाता.

अगले दिन रात में किसी समय जब मेरी नींद खुली तो सिर इतना भारी लग रहा था कि मुझसे उठा ही नहीं जा रहा था. मुझे याद नहीं था कि मैंने अपने साथ क्या किया था. मुझे बहुत कमजोरी लग रही थी. मुझे बहुत भूख लग रही थी. कमरे पर खाने के लिए कुछ नहीं था. मुझमें इतनी हिम्मत नहीं थी कि मैं उठकर अपने खाने के लिए कुछ बना सकूँ. मैंने किसी तरह चावल के डिब्बे से एक मुट्ठी चावल निकाला और उसे चबाने लगा. चावल बेस्वाद लग रहा था. मैंने उसमें चीनी मिलाई और चबाने लगा. मेरा मुँह सूख रहा था. चावल निगलने में दिक्कत हुई तो मैंने पानी के घूँट के सहारे उसे निगलने की कोशिश की. यह करते हुए मुझे रोना आ गया. मैं देर तक रोता रहा. मुझे माँ का चेहरा याद आया. सारी नाराजगी के बावजूद मुझे पिता का चेहरा याद आया. नहीं, नहीं मरना मुझे. बुरे से बुरे हाल में भी जिंदा रहना है. मर जाना हार है. मैं हार नहीं मान सकता.

फिर उस रात मुझे नींद नहीं आई. थोड़ी देर बाद पेट में मरोड़ के साथ दर्द उठने लगा. बची हुई रात भर पेट रुक रुक कर दर्द करता रहा. पूरी रात मैं कमरे की छत के पार देखता हुआ लेटा रहा. बीच बीच में नींद के हल्के फुल्के नशीले झोंकों के बीच तमाम नई पुरानी बातें मेरी आँखों में आती रहीं. कभी स्मृति के रूप में तो कभी सपने के रूप में. सुबह जब मैं अचार मिल जाने के लिए तैयार हो रहा था तो भीतर की कमजोरी के बाद भी कोई और ही था. मैं इस बात के लिए तैयार था कि जो भी जीवन मैं जी रहा हूँ उसमें धँसकर जीना ही अपने को बचाए रखने का एकमात्र विकल्प है.

मिल में जाने पर सुपरवाइजर ने कल न आने का कारण पूछा. मैंने कहा तबीयत खराब थी. पूरे दिन पेट में दर्द हो रहा था. जब काम पर लगा तो साथ की औरतों में से कई ने कल न आने की वजह पूछी. मैंने बताया कि बहुत तेज बुखार था. पूरे दिन कंबल ओढ़ कर लेटा था. बहुत ठंड लग रही थी. मेरा जवाब सुनकर उनमें से कई अचरज से मुझे देखने लगीं. इसके पहले मैं किसी सवाल के जवाब में मुन्न मुन्न करके रह जाता था. इस तरह धीरे धीरे करके मैं उन सब से खुल गया. मुझे बहुत अच्छा लगा. खुद मुझे भी अचरज हो रहा था कि मैं कितनी आसानी से उनके बीच शामिल हो गया. उन्होंने इतने दिनों तक अलग अलग रहने की मुझसे कोई शिकायत नहीं की. हँसी मजाक की बात अलग है.

उनके साथ जाने का मुझे बहुत फायदा मिला. मैं उम्र में उन सबसे छोटा था. लगभग सभी मेरा खयाल रखतीं. जब जैम उबल कर ठंडा हो रहा होता तो उनमें से कोई एक चुपचाप इशारा करती. मैं जाता तो गिलास या कटोरी में मुझे पीने को दे दिया जाता. लंच के समय किसी के आँचल से सेब निकल आता और मेरी तरफ बढ़ा दिया जाता. मैं शुरुआती दिनों में हिचकता तो आँखों ही आँखों में एक इशारा मिलता कि निश्चिंत रहो. खाओ चुपचाप. यह तो मुझे बाद में पता चला कि छोटी छोटी चोरियाँ ज्यादातर लोग कर लेते थे. यह बात सुपरवाइजर को भी पता थी पर वह इस पर ज्यादा ध्यान नहीं देता था जब तक कि कोई बड़ा हाथ मारने की कोशिश न करे.

बाद में अचार और जैम के पाउच मैं भी घर उठा ले जाता कई बार. मैंने अपने मकान मालिक की तीसरी में पढ़ रही लड़की को एक दिन जैम का एक पाउच उसकी टिफिन के लिए दिया. उसके बाद तो यह जैसे क्रम ही बन गया. मैं कम से कम एक पाउच जैम या मामलेड रोज लाता. मुझे उस बच्ची के चेहरे की खुशी बहुत अच्छी लगती. कई बार मैं उससे कहता कि आज नहीं है तो वह रोनी सूरत बना लेती. बाद के दिनों में तो मैं डीजल भी चुराकर लाया जो जेनरेटर के लिए हमेशा रखा रहता था. मैं खाना स्टोव पर बनाता था. छात्रों को उनके परिचय पत्र पर एक निश्चित मात्रा में मिट्टी का तेल मिलता पर उसके लिए बहुत लंबी लंबी लाइनें लगतीं. कई बार तो मार ही हो जाती. मुझे वहीं काम कर रहे एक लड़के ने बताया कि डीजल को स्टोव में भी जलाया जा सकता है. बस यह धुआँ ज्यादा फेंकता है.

मेरे चेहरे की मनहूसियत तेजी से गायब हो रही थी. दिन भर की मेहनत की थकान जरूर लगती थी पर शुरू के दिनों में जिस हीन भावना ने घेर रखा था वह तेजी से गायब हो रही थी. मुझे माँ की याद आती. मुझे पिता की भी याद आती. उनके प्रति जो गुस्सा या बदले की भावना थी वह कब की खत्म हो गई थी. बस उसमें एक कमजोर सी जिद भर बची थी जो किसी भी एक के झुकने से समाप्त हो जाती. दरअसल उन  महिलाओं और दूसरे मजदूरों में घुलमिल जाने के बाद मुझे उन सबके बारे में बहुत कुछ जानने को मिला था. वे कैसी भी बातें आपस में साझा कर लेतीं. खासकर महिलाएँ तो रात की मार के निशान भी एक दूसरे को दिखा लेतीं. कई बार तो सब मिलकर किसी के आदमी को गाली बकतीं.

उन सब के अपने अपने दुख थे. गरीबी और अभाव था. वे मेरी तरह किसी जिद की वजह से नहीं बल्कि अपनी मजबूरियों की वजह से वहाँ थीं. उन्हें अपने बच्चों की याद सताती. उन्हें सुबह सब काम निबटा कर आना होता. रात में वापस जाने के बाद भी बहुत सारे काम उनका इंतजार कर रहे होते. कुछ के पति भी उनकी तरह से मजदूर थे. कुछ के पतियों ने उन्हें छोड़ रखा था तो कुछ के पति जो कमाते वह उनके दारू के लिए भी कम पड़ता. एक दो विधवाएँ थीं जिन्हें न ससुराल में ठिकाना मिल रहा था न मायके में. वे आपस में कई बार लड़ती झगड़तीं पर इसके बावजूद उनमें गजब की एका थी. किसी एक की तबीयत ढीली होती या कोई और समस्या होती तो दूसरे लोग उसके हिस्से का काम निपटा लेते या कि उसे पहले से ही बहुत कम काम दिया जाता.

उन्हीं में से एक थी तोला, जो मौका पाने पर अक्सर मेरा गाल नोच लेती. मुझे देखकर मुस्कराती और इशारे करती. मेरे भीतर एक सनसनाहट सी दौड़ जाती. मैं शरमा जाता और दूसरी तरफ देखने लगता. वह हँसने लगती. थोड़ी देर बाद जब मैं उसकी तरफ देखता तो वह मुझे आँख मारती. मैं दूसरी तरफ मुँह घुमा लेता पर मेरे भीतर जैसे कुछ हथौड़े सा बजने लगता. बाद में सोचता कि मैं आखिर क्यों शरमाता हूँ, मैं भी मर्द की तरह से उसे बराबरी से जवाब दूँगा. पर सोचना अलग बात थी और कुछ कर पाना अलग बात. ऐसे ही एक दिन उसने गोदाम में मेरा हाथ पकड़ कर अपने सीने पर रख दिया. मेरी इच्छा हुई कि मैं भागता हुआ अचार मिल के बाहर निकल जाऊँ पर हाथ जहाँ के तहाँ जम गए. उसने मेरे हाथों पर अपना हाथ रख कर जोर से दबाया. मुझे डर लगा पर अच्छा भी लगा.

फिर तो यह रोज का किस्सा बन गया. वह जब भी मौका देखती गोदाम की तरफ जाते हुए मुझे इशारा कर जाती. मैं चुपचाप पीछे जा पहुँचता. गोदाम में कुछ भी कर पाने की एक सीमा थी. अक्सर वह और बेचैन हो जाती और मैं भी. हम इसके आगे की कोई राह तलाश कर पाते उसके पहले एक दिन सुपरवाइजर ने हमें देख लिया. उसने दोनों को जी भर कर डाँट लगाई और नौकरी से निकाल देने की धमकी दी. दो दिन बाद ही उसने मेरी ड्यूटी बदलकर पाउच बनाने की मशीन पर लगा दी. जहाँ प्लास्टिक की शीट से अचार या जैम भरने के लिए पाउच बनाए जाते थे. यह मेरे लिए नया काम था. मैंने बहुत सारी शीटें बर्बाद कीं. जिसके लिए उसने मेरी अगले माह की मजदूरी में से लगभग आधा काट लिया.

मैंने लड़ने की कोशिश की तो उसने धमकाया कि चुपचाप काम करना है तो करो नहीं तो चलते बनो. ज्यादा नेतागीरी दिखाओगे तो पिंटू भाई को सब बता दूँगा. पिंटू भाई अचार मिल के मालिक का नाम था जो मिल की चारदीवारी के भीतर ही रहता था. मैं चुप लगा गया. उधर तोला जब भी देखती इशारे करती. मौका मिलता तो पास चली आती. ऐसे ही एक दिन जब मैं मशीन पर काम कर रहा था वह आई और उसने मुझे चूमने की कोशिश की. वह नंगे पैर थी. जमीन से अर्थिंग मिलते ही बिजली की एक लहर हमारे भीतर उतर गई. वह चिल्लाकर दूर जा गिरी. मेरे शरीर से उसका स्पर्श हटते ही मैं सामान्य जैसा हो गया. मैं उसे उठाने के लिए उठा पर तब तक वह खुद ही उठ गई थी और वहाँ से जाने को थी. अगले दिन मिली तो आँख मारते हुए बोली कि तुम तो बड़ी जोर से करंट मारते हो. कब तक ऐसे चलेगा. या तो मुझे अपने कमरे पर ले चलो या मेरे कमरे पर चलो. आजकल मैं बिल्कुल ही अकेली हूँ.

कहने की बात नहीं कि रात में दस बजे के आसपास मैं उसके कमरे के भीतर था. फिर तो यह सिलसिला चल ही निकला. ज्यादातर मैं उसके कमरे पर और कभी कभी वह मेरे कमरे पर. बहुत दिन नहीं बीते कि सुपरवाइजर को फिर खबर लग गई. उसने मुझे अपने केबिन में बुलाया और चाँटा मारा. उसने गाली बकते हुए कहा कि पंडित होकर के तुम उस नीच जाति की औरत के चक्कर में बर्बाद हो रहे हो. तुम्हें शरम नहीं आती. वह एक दिन तुम्हें समूचा निगल जाएगी. वह और भी बहुत देर तक मुझ पर चिल्लाता रहा. फिर उसने कहा कि अब या तो तुम रात पाली में काम करो नहीं तो अपना रास्ता नापो. कोई और रास्ता न देखकर मैं रात में काम करने के लिए तैयार हो गया. वैसे भी मेरी बीए दूसरे साल की परीक्षाएँ आ रही थीं और मुझे दिन में छुट्टी की जरूरत पड़ती.

रात पाली में मुश्किल से आठ दस लड़के काम करते थे. वे सभी तरह तरह की मशीनों पर काम करते थे जहाँ अचार या जैम की पैकिंग और कटिंग होती थी. वे मशीनें एक बड़े से हाल में थीं. जबकि मुझे जिस मशीन पर काम करना था वह उन सब से दूर एक गोदाम जैसे हाल के एक कोने में थी. पर अच्छी बात यह थी कि मेरी इस मशीन के साथ बढ़िया दोस्ती हो चली थी. रात के लिए अंदाजे से शीट मैं सुबह ही काटकर जाता. रात में मशीन का हीटर गर्म होते ही मैं शुरू हो जाता. शीट लगती, शीट के ऊपर हीटर आता, उसे जरूरत भर गर्म करता और वापस लौट जाता. हीटर के जाते ही नीचे से पाउच के आकार के वैक्यूम वाले खांचे प्रकट होते और ऊपर से ऊपर वाले खांचे गिरते. बस पाउच तैयार. निकालने के पहले पानी का हल्का स्प्रे और पाउच वाली शीटें पैकिंग के लिए तैयार. मैं पहले झोंके में ज्यादा से ज्यादा काम निबटा लेना चाहता.

शुरू के दिनों में बहुत तगड़ी नींद धावा बोलती. जरा सी भी असावधानी जानलेवा थी. मुझे कई कई बार मुँह धोना पड़ता. कई बार तो मैं आजिज आकर सीधे सिर पर ही पानी का मग डाल लेता. धीरे धीरे इस स्थिति की आदत हो गई. फिर भी बीच रात में मैं एक छोटी सी नींद जरूर मारता. मैं एक के ऊपर एक वह कॉटन बिछाता जिसमें वह प्लास्टिक की शीटें आतीं. फिर वही कॉटन ओढ़कर सो जाता. एक दिन ऐसे ही सोते हुए मच्छरों से परेशान होकर मैंने अपना सिर एक कॉटन में घुसेड़ लिया और सो गया. थोड़ी देर बाद मुझे ऐसा लगा जैसे कोई मेरे सीने पर बैठकर मेरा गला दबा रहा है. मैं एक चीख के साथ उठ बैठा. चीख इतनी तेज थी कि पैकिंग वाले हाल में जो लड़के काम कर रहे थे वे भी दौड़कर आ गए. जब वे आए तो मैं वहीं पर खड़ा था और डर के मारे काँप रहा था.

जरूर छप्पन छुरी होगी, उनमें से एक ने कहा. छप्पन छुरी रात में अक्सर घूमती हुई इधर आ जाती है. वे एक एक कर चले गए. उन्हें अपने हिस्से के काम निपटाने थे. मैं अकेला हुआ तो मुझे फिर से छप्पन छुरी के डर ने घेर लिया. छप्पन छुरी का किस्सा मैं अपनी साथी मजदूरिनों से सुन चुका था. वह एक गानेवाली तवायफ थी जो अचार मिल से जुड़े हुए एक मकान में रहती थी. उसकी गायिकी के आशिकों में शहर के अनेक जाने माने लोग भी शामिल थे. एक जमाना था कि छप्पन छुरी के घर के सामने महँगी कारें खड़ी रहतीं. अनेक जगहों से बुलावे और इसरार होते कि वह वहाँ पहुँचकर लोगों की शान बढ़ाए.

उसी छप्पन छुरी के घर में डकैती पड़ी. डकैतों ने उनके शरीर पर छुरी से छप्पन घाव किए. वह फिर भी जिंदा बच गई लेकिन उसकी खूबसूरती और उससे भी ज्यादा खूबसूरत आवाज नष्ट हो गई. गायिकी और खूबसूरती चले जाने के बाद उसके आशिकों ने भी उसकी तरफ से मुँह फेर लिया. जो पहले का माल पत्ता था वह सब पहले ही डकैत लूट ले गए थे. जिंदा रहने के लिए छप्पन छुरी जिस्मफरोशी करने लगी. पर छुरी के छप्पन घावों ने उसके शरीर को बदसूरत और डरावना बना दिया था. उसे जल्दी ग्राहक ही न मिलते. आखिरकार स्थिति यह आई कि वह बस एक जून के भोजन के बदले भी किसी के साथ सोने को तैयार हो जाती फिर भी अक्सर भूखे ही रहना पड़ता. बाद में वह भीख माँगने लगी. कहते हैं कि अपने आखिरी दिनों में उसे पागलपन के दौरे पड़ने लगे थे और ऐसे ही एक भीषण दौरे में उसने खुद के ऊपर तेल छिड़क कर आग लगा लिया था और जल मरी थी.

उस रात के बाद मुझे वहाँ काम करते हुए डर लगने लगा. कई बार किसी स्त्री के गाने की आवाज सुनाई पड़ती. कानों में हारमोनियम और तबले की आवाजें आतीं और डर के मारे मेरे रोयें खड़े हो जाते. प्लास्टिक शीट को गरम करने के लिए हीटर आता तो शीट पर उसकी पड़ रहीं परछाईं में मुझे जलती हुई छप्पन छुरी दिखाई देती. ऐसे में सो पाना तो क्या वहाँ काम कर पाना ही बहुत कठिन हो गया. एक दिन मैंने यह बात वहाँ काम कर रहीं साथी मजदूरिनों से बताई. वे फिसिर फिसिर हँसने लगीं. एक ने मजाक किया कि इतने छैल छबीले हो, तुम पर तो किसी का भी दिल आ सकता है. समझो कि छप्पन छुरी का दिल भी तुम पर आ गया है. मैं शरमाकर वहाँ से हटने ही वाला था कि दूसरी ने कहा कि अपने पास छुरी रखा करो, छप्पन छुरी को छुरी से बहुत डर लगता है. मैं जब आ रहा था तो मुझे अपने पीछे तोला की खनकती हुई आवाज सुनाई पड़ी. क्या पता छप्पन छुरी इसकी छुरी के ही चक्कर में आती हो.

अगले दिन से मैं अपने साथ एक छुरी लेकर आने लगा. इससे मेरा डर काफी कम हो गया. धीरे धीरे काम में मेरा मन लगने लगा. जल्दी ही मैंने फिर से पहले वाली स्पीड पकड़ ली. इसकी वजह से मुझे रात में एक नींद मार लेने का मौका भी मिलने लगा. पर एक दूसरी चीज भी थी जो मुझे बेचैन किए रहती. तोला से जो कुछ मुझे मिला था वह मुझे भी भा गया था. मेरा मन तोला से मिलने के लिए मचलता रहता. मुश्किल यह थी कि मैं अब रात में काम करता था और वह दिन में. मैं उसके चले जाने के बाद आता. सुबह जब मेरा जाने का समय होता तब तक वह आ गई होती पर अकेले मिलने का मौका नहीं ही मिलता. पिछली बार पकड़े जाने के बाद वह भी मुझसे बचने लगी थी. शायद सुपरवाइजर ने उसे भी डाँटा हो या कि काम से निकालने की धमकी दी हो.

मिल में उससे मिल पाने का कोई मौका न देख एक दिन मैंने सोचा कि उसके घर ही चला जाय. रात आठ बजे के आसपास का समय रहा होगा, जब मैं उसके घर के आसपास चक्कर काट रहा था. तभी मैंने सुपरवाइजर को आते हुए देखा. तोला सुपरवाइजर के पीछे स्कूटर पर बैठी हुई थी. तोला उससे कुछ कह रही थी पर मैं उन दोनों से इतनी दूर था कि मुझे कुछ भी सुनाई नहीं पड़ा. सुपरवाइजर के साथ वह खुश लग रही थी. सुपरवाइजर ने उसके कमरे के सामने ही अपना स्कूटर खड़ा किया और दोनों तोला के कमरे में घुस गए. यह वही कमरा था जहाँ मैंने तोला के साथ कई सारी रातें बिताई थीं. मेरा मन रोने रोने को हो आया फिर तुरंत ही मुझे बहुत जोर का गुस्सा आया. गुस्से में मैंने एक सिगरेट जलाई और दो ही कश मारकर नीचे फेंक दी.

मेरे मन में खयाल आया कि तोला एक चरित्रहीन औरत है. मैंने सोचा कि अगर अभी चलकर मैं उसके दरवाजे को जोर जोर से खटखटाऊँ तो वह क्या करेगी. वह सुपरवाइजर जो मुझे ज्ञान दे रहा था उसके चेहरे पर कैसे भाव आएँगे? अगर मैं उन दोनों के बारे में कल सब को बता देने की धमकी दूँ तो वह दोनों क्या करेंगे. पर तभी मेरे मन में एक दूसरा खयाल आया कि सुपरवाइजर मेरी तरह चोरी से उसके घर में नहीं घुसा है. वह खुलेआम आया है. उसका स्कूटर अभी भी तोला के कमरे के बाहर खड़ा है. इसका मतलब कि उसे अपने पकड़े जाने का कुछ खास भय नहीं है. मैंने तोला को असहाय मानते हुए बरी करने की कोशिश की कि जरूर सुपरवाइजर उसे ब्लैकमेल कर रहा होगा. तुरंत ही मुझे सुपरवाइजर के पीछे स्कूटर पर बैठी और बतियाती तोला दिखाई पड़ी. तोला एक चरित्रहीन औरत है, मुझे उससे बचकर रहना चाहिए, मैंने अपने आप से कहा और मिल के लिए वापस चल दिया.

यह मेरे लिए अच्छा ही हुआ. सुबह तोला से नजरें चार करने के लिए मैं जान बूझकर देर तक रुका रहता था. अब मैं जल्दी लौटकर आने लगा. रात में काम करने की वजह से पूरा दिन मेरे पास में होता ही था. दोस्तों से मिलना जुलना बढ़ गया. कभी कभी क्लास करने भी जाने लगा. और तो और मैं एक बार घर भी हो आया और मैंने पिता को दुखी करने वाली कोई बात नहीं की. यह सब करके खुद मुझे बहुत अच्छा लग रहा था. मैं अपनी पहले की हरकतों और जीवन के बारे में सोचता तो मुझे लगता कि वह कोई और ही था जो वह सब कर रहा था. बस एक चीज थी जो नहीं बदली थी कि मैं उस नन्हीं लड़की के लिए अभी भी जैम या अचार के पाउच चुराकर लाता था. यहाँ भी रोज रोज चुराने की बजाय मेरी कोशिश यह होती थी कि इकट्ठे बहुत सारे पाउच लाकर रख लूँ जिससे कि रोज रोज चोरी करने की जहमत न उठानी पड़े.

इस बीच मेरी गजलें और गीत कुछ बेहतर अखबारों में छपने लगे थे. अक्सर उन गजलों के साथ मेरी तसवीर भी छपी होती. मैं सोचता कि किसी दिन मिल मालिक पिंटू भाई की नजर से वह अखबार या पत्रिकाएँ गुजरें जिनमें मेरी तसवीर छपी हो. उसे भी तो पता चलना चाहिए कि उसकी मिल में कितना होनहार शायर पाउच बना रहा है. फिर सोचता कि यह बढ़िया ही है जो उसे कुछ नहीं पता. पता चल जाने पर मेरी मजदूरी थोड़ी बढ़ा देगा. बल्कि यह भी कि अभी जब मैं अपमानित किया जाता हूँ या डाँट खाता हूँ या तो एक मजदूर के रूप में डाँट खाता हूँ कल को शायर के रूप में डाँट खाना पड़ा तो यह तो डूब ही मरने वाली बात होगी. फिर मैं यह सोचता कि उसे पता तो चले पर तब जबकि मैं यह नौकरी छोड़ दूँ. तब वह कभी मिले तो कहे कि अरे मुझे तो अब जाकर पता चला कि मेरे यहाँ कितना बड़ा शायर काम कर रहा था.

खैर मिल मालिक ने देखा हो या न देखा हो पर पिता ने एक दिन जरूर देख लिया. अगली बार जब मैं घर गया तो माँ ने मुझे वह अखबार दिखाया जिसमें गणतंत्र दिवस पर मेरा एक गीत मेरी तसवीर के साथ छपा हुआ था. माँ ने बताया कि पिता को यह देखकर बहुत ही अच्छा लगा था और यह गीत उन्होंने कई लोगों को दिखाया था और पढ़कर भी सुनाया था. मैंने घर में किसी को नहीं बताया था कि मैं गीत-गजल लिखता हूँ. मैंने माँ से कहा कि मैं अगली बार घर आऊँगा तो बहुत सारे अखबार और पत्रिकाएँ लाऊँगा जिनमें मेरी रचनाएँ छपी हैं. माँ ने कहा कि आज मत जाओ. तुम्हें घर पर रुके हुए बहुत दिन हो गए, आज रुक जाओ. पिता भी तुमको याद करते हैं.

मैंने कहा कि नहीं, मुझे जाना है. पर मैंने जाने में जान-बूझकर इतनी देर लगाई कि पिता घर आ गए. पिता ने साइकिल से उतरते हुए मेरी तरफ देखा. वे आकर मेरे पास ही बैठ गए. माँ ने पैर छूने का इशारा किया जिसे मैंने नजरंदाज कर दिया. बदले में मैंने माँ से कहा कि मुझे जाना है. बहुत देर हो रही है. रात में काम पर भी जाना है. बदले में पिता ने कहा कि बहुत देर हो गई है आज यहीं रुक जाओ, कल चले जाना. कोई वजह नहीं थी पर अचानक जैसे मुझे रुलाई आने को हुई. रुलाई रोकते हुए मैंने कहा कि बिना बताए गायब होने पर काम छूट जाएगा. पिता ने कहा कि काम छोड़ दो. आज रुक जाओ मुझे तुमसे कुछ बातें करनी हैं. मैंने फिर से जाने की जिद की और उठ खड़ा हुआ. बदले में पिता ने मेरा हाथ पकड़ा और बोले कि चुपचाप बैठ जाओ. आज अब तुम्हें नहीं जाना है तो नहीं जाना है. उनके हाथ पकड़ते ही मेरी रुलाई मेरी काबू के बाहर हो गई. मैं उनसे लिपट गया और रोने लगा.

अगली सुबह पिता ने कहा कि काम छोड़ दो. तुम्हें जो भी चाहिए मुझसे लो. मैंने कहा कि कल को फिर से कोई किसी बात की शिकायत कर देगा और आप फिर से पैसा बंद कर देंगे. उन्होंने कहा कि अब वह ऐसा नहीं करेंगे. मैंने पूछा कि फिर क्या करेंगे. उन्होंने कहा, थप्पड़ मारूँगा खींचकर. मैं चुप हो गया. वे जब काम पर जाने लगे तो बोले कि जितने पैसे की जरूरत हो माँ से लेकर जाना. और अब काम छोड़ दो, अब तक जो भी हुआ पर अब मैं नहीं चाहता कि तुम एक भी दिन वहाँ काम करो. अभी पढ़ने लिखने की उमर है वही करो. फिर उन्होंने बीए दूसरे साल के रिजल्ट के बारे में पूछा. मैंने बताया. फिर तीसरे साल की बात आई तो मैंने बताया कि इम्तहान अभी कम से कम तीन महीने दूर है. वे बोले कि जाकर पढ़ाई में जुट जाओ. तुम्हारी कविता वहुत अच्छी थी, उन्होंने साइकिल पर बैठते हुए कहा. मेरे आफिस में भी सबने पढ़ा था.

बरेली आकर मैं अचार मिल गया और सुपरवाइजर से कहा कि मैं आज और अभी से काम छोड़ना चाहता हूँ. सुपरवाइजर ने कहा कि यह संभव नहीं है. तुम चले जाओगे तो पाउच कौन बनाएगा. पहले किसी दूसरे को अपनी तरह से ट्रेंड करो तब जाओ. मैंने कहा कि पाउच कौन बनाएगा इसकी चिंता आप करो, मैं क्यों करूँ. उसने पलट कर जवाब दिया कि फिर इस महीने का तुम्हारा अब तक का जो भी किया धरा है उसका तुम्हें एक भी पैसा नहीं मिलेगा. मेरी जेब में काफी रुपये थे. मुझे रुपये की कोई चिंता नहीं थी पर मैं अपनी मेहनत का पैसा कैसे छोड़ सकता था. मैंने सुपरवाइजर से कहा कि मैं जानता कि आप तोला के घर क्या करने जाते हो. कल को यह बात सब जान जाएँ तो. मैंने उसे बताया कि जोंधवल में वह जहाँ रहता है वह मैंने देखा है और मैं उसकी बीवी को भी पहचानता हूँ.

सुपरवाइजर ठंडा पड़ गया. उसने कहा कि मुझे एक हफ्ते का समय दो बस. हफ्ते भर बाद छोड़ देना. तुम इस तरह से अचानक छोड़ोगे तो मेरी नौकरी भी खतरे में आ जाएगी. उसकी विनम्रता मुझे अच्छी लगी और मैंने हफ्ते भर काम पर बने रहना स्वीकार कर लिया. अगले दिन सुपरवाइजर ने कहा कि तुम्हें पिंटू भाई बुला रहे हैं, जाते समय उनसे मिलकर जाना. पिंटू भाई ने पूछा कि कि मैं काम क्यों छोड़ना चाहता हूँ. मैंने जवाब दिया कि मेरा इम्तहान आ रहा है. मुझे पढ़ाई करनी है. उसने कहा कि पढ़ाई कर के क्या उखाड़ लोगे. फिर वह अचानक से उदार हो गया. उसने कहा कि इम्तहान के एक दिन पहले छुट्टी ले लेना या फिर अभी से काम के कुछ घंटे कम कर लो.

मैं काम छोड़ने के अपने निश्चय पर डटा रहा. तब उसने कहा कि एक प्रार्थनापत्र लिख कर लाओ कि तुम फलाँ तारीख से काम छोड़ना चाहते हो और तुम्हारा हिसाब कर दिया जाय. मैंने एक छोटी सी एप्लीकेशन लिखी. जिसमें यह था कि बीए आखिरी साल की परीक्षा निकट है. इस वजह से मैं फिलहाल नौकरी कर पाने में असमर्थ हूँ. कृपया मेरा अब तक का हिसाब करके मुझे मुक्त करने का कष्ट करें. मैंने अपना प्रार्थना पत्र पिंटू भाई को पकड़ाया तो वह भड़क गया. उसने मुझे गाली बकी और कहा कि किस बात का कष्ट बे. तू जाएगा तो तेरे बदले में दस आएँगे. यह कहकर उसने प्रार्थना पत्र मेरे मुँह पर मारा और कहा कि दोबारा लिखकर ले आ.

मुझे गाली बकी गई थी पर मुझे कुछ खास दिक्कत नहीं हुई. मुझे पिंटू भाई की तिलमिलाहट अच्छी लगी. उसे बहुत कष्ट था.

 

आप लेखक से उनके फोन ( 08275409685) या ई-मेल पर संपर्क कर सकते हैं. उनका ई-मेल है  [email protected] 

 

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