कहना गलत गलत और छुपाना सही सही

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Young woman on meadow under sunset light

श्रुति कुमुद/

( वन्दना राग की कहानी ‘नमक’ पढ़ते हुए )

( ”Beloved” is theatrical, ”lover” is frank, ”friend” is vague.

—- मारिना स्वेतायेवा की डायरी से )

बदलते समय के साथ रिश्तों में नयेपन तथा नए रिश्तों की जरूरत को समझने तथा उनके आविष्कार की कहानी है – नमक. स्त्री-पुरुष के बीच के सम्बधों को प्रेम जैसे गझिन शब्द में बाँधने या मौकानुरुप इस्तेमाल किए जाने वाले शब्द “दोस्ती” से अलग कोई नाम क्यों नहीं दिया जा सका – यह समझ से परे है. प्रेम और दोस्ती के दायरे से बाहर कितना कुछ है जो अनाम रह जाने के कारण पारिभाषित भी नहीं हो पाया. मसलन इच्छा. वन्दना राग की कहानी ‘नमक’ में इच्छा और आदत दो प्रमुख किरदार बनकर उभरती हैं.

श्रुति कुमुद

यह कहानी माथुर और तान्या की है. इच्छाओं, सियासती दाँव-पेंच और अस्पष्ट समझ के साथ माथुर है जो कि राज्य कार्यपालिका में बड़ा अधिकारी है तथा बैलौस और जिम्मेदार तान्या है. रूटीन से अघाया माथुर एक पार्टी के दौरान तान्या को देखता है और उसके प्रति अपने सहज आकर्षण से बेचैन हो उठता है. फिर उसकी ‘पुरुषोत्तम’ कवायदें शुरु होती है – पत्नी से झूठ, बेचैनी, नायिका से बातचीत के बहाने, झूठे स्पर्श. चूँकि यह नायक भी समाज के दूसरे शक्तिशाली और विनम्र लोगों की तरह है इसलिए उसकी कथा कहने तक यह कहानी भी कोई खास बात पैदा नहीं करती.

इस कहानी में फर्क तान्या पैदा करती है. वह अब तक की नायिकाओं से अलग न होती तो शायद इस कहानी का विशेष अर्थ न होता पर वो निस्पृह है. वह ना तो प्रेमातुर है, ना ही फैशनबेल ‘पुरुषविरोधी’. अतुल ( उसका पति ) से उसकी शानदार निभ रही है.  तान्या  एच.आर.डी से मैनैजमेंट की डिग्री लिए हुए है. कहानीकार कोई ऐसा बहाना कहानी में पैदा नहीं करती जिसकी आड़ में तान्या और माथुर के बीच का ‘वह–अनजाना-सा-रिश्ता-जिसे-पारिभाषित-भी-अब-तक-नहीं-किया-गया’ तार्किक लगने लगे. इधर के कहानीकारों ने ‘कम से कम’ अपनी कहानियों में बहानेबाजी बन्द कर दी है – यह सराहनीय है. कहानी में मौजूद यह सवाल भी स्त्री की ओर से है वरना माथुर साहब की तरफ से तो सब कुछ स्पष्ट है. उनके लिए वह एक स्त्री भर है जो थोड़ी तर्रार है, व्यक्तित्व रखती है ..और उन्हें वो स्त्री चाहिए.

कहानी तब शुरु होती है जब नायिका अनजाने में ही नायक के चाहे अनुसार व्यवहार करने लगती है.या कम से कम नायक को ऐसा लगता है. और यही उसकी मुश्किल है. सच्चाई यह है कि तान्या माथुर की अनचाही बढ़तों से ऐतराज बरतती है और माथुर से उसकी बातचीत वैसे ही है जैसे किसी पड़ोसी या किसी परिचित से हो सकती है पर माथुर की उस आदत को क्या कहा जाए जो उसे ही चैन नहीं लेने देती – सियासतबाजी.

इंसान सबकुछ छोड़ सकता है – रिश्ते नाते, प्रेम, नौकरी, खान-पान पर एक चीज जो इंसान से नहीं छूटती वह है उसका शगल. जिसे कहने वाले “पैशन” भी कह सकते हैं. इस कहानी में यह पैशन ‘सियासत’ की आदत के बतौर सामने आती है. कहानी का नायक माथुर कुछ इस तरह सोचता है – “माथुर को लगा, कोई घूसा सा पड़ा है उसके दिल पर …. उसके ( माथुर) अन्दर की सियासत की स्कीम में तान्या का नाफिक्र होना कहीं नहीं था, उलटे फिक्रमन्द और भरपूर हो लचक जाना था, ठीक माथुर की दिशा में. वह निराश हो गया”.

तान्या की तरफ से न कोई इशारा है न कोई फरेब बस एक भीना सा सद्भाव है जिसे माथुर यह समझ बैठता है कि तान्या उसे ‘आमंत्रित’ कर रही है. यहाँ अगर नायिका के मन में हद से हद कुछ हो सकता है तो वह है पति के सीनियर अधिकारी के प्रति एक सम्मान. ऐसा नहीं कि तान्या माथुर की बदमाशियों से या छूट लेने की आदतों से अवगत नहीं है. मौके ही पर अपने हाव भाव से विरोध दर्ज करा कर वो उन्हें भूलना बेहतर समझती है. कहानी में ऐसे दो मौके आये हैं..”मगर जिस दिन सीट के नीचे गिरी चाभी ढूँढने के बहाने उसने तान्या की एड़ी में अपने बढ़े नाखून वाली ऊँगली चुभोई, तान्या सामान्य नहीं रह पाई थी. उसकी आँखे बन्द हो गई थीं. माथुर पढ नहीं पाया उन आँखों में क्या था.”

कहानीकार यहाँ यह आशंका जाहिर करती हैं कि पता नहीं तान्या के मन में क्या था – आनन्द, दु:ख या वितृष्णा ? यह दरअसल माथुर के मन से उपजे भ्रम हैं कि वह अपनी हरकत की प्रतिक्रिया में आनन्द देखना चाहता है. कहानीकार माथुर की इस “पुरुषोचित” उलझन को आगे सुलझाती हैं – “स्टेशन पर उन दोनों को विदा करते हुए …. उसने तान्या की पीठ पर भी एक औपचारिक ठंडा, निस्पन्द हाथ फेरा और बाय कह दिया. आदतन, उसने तान्या की आँखों में झाँककर, पार जाना चाहा और जानना चाहा कि इस ठंढी विदाई पर तान्या क्या सोच रही होगी. ….मतलब तान्या को उसकी बेरुखी अच्छी नहीं लगी, वह उससे कुछ अधिक की अपेक्षा कर रही थी.. उसे अचानक ही सारा माहौल अपने पक्ष में लगने लगा. उसकी सियासती चाल कुछ कामयाब रही थी.

इसके बाद कहानी में तान्या और उसके पति अतुल दिल्ली चले जाते हैं. दोनों की नौकरी है. उधर माथुर अपने “नायिका विजय’ पर मुग्ध है. वो दिल्ली आता है और नायिका को फोन करता है. समझता है – वो डरी सहमी या संकोच करती हुई मिलेगी. माथुर महाशय की इच्छाओं पर वज्रपात होता है जब तान्या फोन पर बेबाक मिलती है. वो माथुर के फोन से बेहद खुश होती है. समूचा सम्मान देते हुए. बताती है कि उसका पति बाहर गया हुआ है. वो प्रस्ताव रखती है – क्यों न मिला जाए ?

माथुर को समझ ही में नहीं आता – यह क्या हो गया ? उसने रिश्ते में जिस समर्पण की कल्पना तान्या की तरफ से की थी उसका नामोनिशान तक उसे नहीं मिलता. उसने यह सोच रखा था कि खेल उसके बागडोर मे रहेगी और वो जैसा चाहे, तान्या एक प्यादे की तरह चलेगी. यहाँ तान्या को आगे बढ़ कर प्रस्ताव रखते देख उसकी ‘सियासत’ सहम जाती है. खेल अपने अनुरुप होता न देख वो मिलने से मना करता है. तान्या से झूठ बोलता है कि अभी इसकी फ्लाईट है और मिलने के बारे में आगे कभी सोचेगा.

मजा तब आता है जब वो अपने आप से ही झूठ बोलता है और कहता है कि “ मैं बच निकल आया”. इसके दो आशय हैं और दोनों ही स्थितियों में वो पराजित है. पहला – नैतिकता का पुराना और घिसा पिटा आग्रह. दूसरा – प्रेम में सियासत खेलना और सियासत के खेल में जीत कर निकलना. यह भी उसकी भूल है. यह सिरे से खारिज होने वाली बात है. तान्या के लिए यह पूरा मामला कभी सियासत रहा ही नहीं, इसलिए उसके लिए यह कोई खेल भी नहीं फिर हार जीत की बात नहीं उठती. वह तो स्वत:स्फूर्त सम्बन्ध निभा रही है. वह प्रेम हर्गिज नहीं है और दोस्ती भी नहीं. एक आदमी जिससे कभी कभी मिलना, बाते करना अच्छा लगता हो.

रिश्तों के उतार चढाव तथा उनके आविष्कार की जरूरत से अलग नमक कहानी बताती है कि अगर आप अपने मूल्यों पर खड़े होते हैं तो भूल-गलती की सम्भावना बेहद कम है.

(श्रुति कुमुद विश्व भारती, शान्तिनिकेतन में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर कार्यरत हैं.)

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