परिवार (राज्‍य) और निजी संपत्ति 

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राकेश मिश्र हिंदी के उन कुछ चुनिन्दा कथाकारों में से हैं जो लागातार लिख रहे हैं और अच्छा लिख रहे हैं। इनकी कहानियों का सिरा थामकर पाठक वैश्वीकरण, बदलते समाज और वहाँ व्याप्त विडंबना और वर्ग चरित्र की गुत्थियाँ समझ सकता है। राकेश की कहानियाँ ‘बालू’ का किरदार निभाते हुए हमें बारम्बार वैश्वीकरण के सम्मोहन और उसके खतरों से आगाह करती हैं। वैश्वीकरण से उपजी सारी दुश्वारियों को राकेश की कहानियाँ पुख्ता तरीके से दर्ज करती हैं। 

राकेश मिश्र

पांडे वैसे तो लम्‍बा- चौड़ा था, लेकिन वह ऊंचा होना चाहता था। ऊंचा होने के उसके अपने तर्क थे और उन तर्कों को पूरा करने की तरकीबें भी ! इन तर्कों में सबसे मजबूत तर्क था कि यह कतई जरुरी नहीं कि आदमी अपने कद या कर्मों से ही ऊंचा उठे, यह ऊंचाई किसी की पीठ या गर्दन पर चढ़कर भी पाई जा सकती है, शर्त केवल इतनी है कि यह भी नजर मत आने दो कि तुम किसी गर्दन या पीठ पर सवार हो। सारी कुशलता और सामर्थ्‍य इसी में है कि तुम इसे कितनी खूबसूरती से छुपा सकते हो। उसके पास शहर के तमाम सफल और ऊंचे लोगों की सफलता की सच्‍ची और बजबजाती कहानियां उपलब्‍ध थीं, जिन्‍हें वह जरुरत पड़ने पर सुनाता भी था और गुनगुनाता तो खैर हमेशा ही था।

लेकिन इन कहानियों में अपराध और वह भी हत्‍या जैसा जघन्‍य अपराध भी एक प्रेरक और मुख्‍य तत्‍व हुआ करता था, इ‍सलिए उसे लगता था कि वह जल्‍दी ऊंचा नहीं उठ सकता है। इसके अलावा इन कहानियों में कहीं न कहीं कुछ गुप्‍त, कुछ पुश्‍तैनी और किसी लफड़े वाले पैसों का भी जिक्र था, इसलिए भी उसकी सम्‍भावना तुरंत नहीं पैर पसार सकती थी, क्‍योंकि अपने वास्‍तविक अर्थों में वह गरीब था और इस गरीबी के लिए अपने पिता जी को वह जिम्‍मेवार मानता था।

ऐसा नहीं था कि उसके पिता यानि नंदकिशोर पांडे में कोई ऐब हो। वे जुआ खेलते हों, दारु पीते हों या औरतबाज़  हों या कि बेरोजगार हों बल्कि इसके विपरीत वे काफी सुलझे और समझदार आदमी थे। पढ़े-लिखे थे और सोचने- समझने वाले थे। और हमारा शहर जिस बडे़ उद्योग के कारण एक राष्‍ट्रीय पहचान रखता था, उसमें वे बतौर फोरमैन कार्यरत थे। लेकिन अपने इन्‍हीं सोचने-समझने और पढ़ने-लिखने की आदतों के कारण उनका परिवार बहुत पहले सड़क पर आ गया था। वे कामरेड थे, और उस दौर के कामरेड थे जब इस उपाधि को हासिल करने के लिए बहुत कुछ दांव पर लगाना होता था। शहर चूंकि मजदूरों का था और सर्वहार का अधिनायकत्‍व देश में हो न हो, उस कम्‍पनी में तो जरुर होना चाहिए जहां की नींव अब्‍दुल बारी और विधान चंद राय जैसे कम्‍युनिस्‍टों ने रखी हो और जहां की चिमनियों से कामरेड केदार मुखर्जी और सरदार हजारा सिंह की गर्म सांसों का धुआं निकलता हो। वह दौर ही अजीब था जब मजदूर यूनियर और प्रबंधन के फैसले किसी वातानु‍कूलित कक्ष में व्हिस्‍की और काजू की प्‍लेटों से तय न होकर हजारों मजदूरों के सामने आंदोलन स्‍थल पर ही तय होते थे। आंदोलन धरना-प्रदर्शन जैसे शब्‍द अपनी सम्‍पूर्ण गरिमा और अर्थवता में उपस्थित थे और उसमें शामिल होने पर लोग किसी खास कर्तव्‍यबोध से भर जाते थे।

नंदकिशोर पांडे ऐसे ही किसी खास कर्तव्‍यबोध का शिकार हो गए और एक ऐसे ही जबरदस्‍त आंदोलन में उनको नौकरी से बर्खास्‍त कर दिया गया। यह बर्खास्‍तगी उस समय निश्‍चय ही उनके लिए पीड़ादायी नहीं रही होगी क्‍योंकि इस बर्खास्‍तगी के बाद वे और उनके चार-पांच साथीसमूचे शहर में हीरो के तौर पर उभरे थे। उस समय वे सभी शहर भर के मजदूर आंदोलनों के पोस्‍टर ब्‍वाय थे। तमाम छोटी-बड़ी मंझली कपनियों के मुख्‍य द्वार पर उनके सम्‍मान में सभाएं आयोजित की गईं, उन्‍हें हार पहनाए गए और शहर से निकलने वाले एकमात्र हिन्‍दी दैनिक में उनका साक्षात्‍कार भी छापा गया। लेकिन जल्‍दी ही उन पोस्‍टरों का रंग बदरंग हो गया और हार के फूलों के कांटों की चुभन भी तेज हो गई, जब कम्‍पनी की सारी सुविधाएं उनसे छीन ली गईं। बच्‍चे अपने आप कम्‍पनी के स्‍कूलों से निकलकर सरकारी स्‍कूल पहुंच गए, परिवार बिष्‍टुपुर के ए-टाइप क्‍वार्टर से निकलकर  नदी किनारे के शास्‍त्री नगर के अपने पुश्‍तैनी मकान में हिस्‍सेदारी के तर्क से रहने लगा और सबने खामोशी से यह तय कर लिया कि दुनिया में कैंसर, टीबी, हार्ट अटैक जैसे ही बड़े रोगों का अस्तित्‍व है,खांसी, गर्दी, बुखार,जुकाम जैसी नगण्‍य चीजों पर ध्‍यान ही नहीं देना है, और यदि यह कभी हो ही जाए तो अदरक, काली मिर्च, तुलसी का पत्ता, अजवाईन और न जाने ऐसी ही अनगिनत चीजें तो हैं ही!

इस पुश्‍तैनी मकान की हिस्‍सेदारी नंदकिशोर पांडे के जीवन में सबसे बड़ा सम्‍बल साबित हुई। उनके हिस्‍से में एक बरामदा समेत दो कोठरियां और दो कमरे आए। दो कोठरियां दो बैचलर टाइप के लोगों को किराये पर उठा देने के बाद समूचा परिवार उन दो कमरों में शिफ्ट हो गया। नंदकिशोर जी के लिए बरामदा रह गया जहां वे पहले-पहल अपने कामरेड दोस्‍तों के साथ बैठते बहस करते और ‘सहर होगी कोई स्‍याह रात के बाद’ की उम्‍मीदों को जिन्‍दा  रखते। लेकिन धीरे-धीरे उन दोस्‍तों की आमदरफ्त कम होती गई और अंतहीन बहसों की जगह बरामदे में एक ठोस और ठस  किस्‍म की चुप्‍पी पसरती गई, लेकिन अकेलापन नहीं रहा वहां। उस मुहल्‍ले में कई ऐसे लोग थे जिनके पास कोई काम नहीं था, उनमें से अधिकांश रिटायर थे जो कम्‍पनी की नई योजनाओं के तहत स्‍वैच्छिक सेवानिवृत्त थे। कुछ अपनी पढ़ाई पूरी करने के बाद के बेरोजगार लड़के थे जो अपने पिता के नाम पर कम्‍पनी में रजिस्‍टर्ड थे और अपने बुलावे का इंतजार कर रहे थे। धीरे-धीरे ये लोग उस बरामदे में जमने लगे और वहां बाकायदा शिफ्टों में ताश खेला जाने लगा। प्रत्‍येक शिफ्ट में नंदकिशोर पांडे एक स्‍थायी खिलाड़ी के तौर पर उपस्थित और शामिल रहते।

पांडे यानि धीरज पांडे अपनी गुरबत के लिए अपने पिता यानि इन्‍हीं नंदकिशोर पांडे को जिम्‍मेवार मानता था, लेकिन सिर्फ जिम्‍मेवार मानता था, उन्‍हें कोसता नहीं था। उसका मानना था कि उसके पिता जी की सबसे बड़ी चूक यही थी कि वे ईमानदार थे, नहीं तो कम्‍युनिस्‍टों में भी लोग कहां से कहां पहुंच गए ! वह उन तमाम कम्‍युनिस्‍ट नेताओं को जानता था जो एक समय में उसके पिता जी के मित्र थे और आज ठेकेदार, बिल्‍डर, नेता और न जाने क्‍या-क्‍या थे!  उसके पास इन तमाम कम्‍युनिस्‍ट नेताओं की विकास यात्रा का प्रामाणिक लेखा-जोखा था और उनके व्‍यवहारों का तो वह प्रत्‍यक्षदर्शी भी था क्‍योंकि कभी-कभी तंगहाली में नंदकिशोर जी उसे अपने पत्र के साथ शहर के दूसरे छोर पर स्थित पार्टी ऑफिस भेजते थे और वह दस-बारह किलोमीटर साइकिल चलाकर वहां पहुंचता था। उन पत्रों में अक्‍सर हजार-पांच सौ की गुजारिश का जिक्र होता था।

धीरज पांडे ने कभी अपने पिता को नहीं बताया कि उसे वहां से लौटने में सुबह से शाम क्‍यों हो जाता है? पार्टी ऑफिस में पंहुचकर पहले तो उस शख्‍स का इंतजार करो जिसके नाम वह पत्र होता था। लोग उसके पहुंचते ही उससे वह पत्र ले लेते थे और वहां उपस्थित सारे लोग आंखों-आखों में मुस्‍कराते हुए बारी-बारी उस पत्र का मौन वाचन करते थे, फिर पत्र उसी तरह मोड़कर उसे वापिस दे दिया जाता था कि फलां बाबू अब आने ही वाले होंगे। वहां उपस्थित तमाम लोगों की आंखों से निकलते दया और अफसोस के भार के नीचे वह वहां बेंच पर बैठा रहता। बीच-बीच में कोई नेता किस्‍म  का आदमी वहां पहुंचता तो ऑफिस में चाय-पान का एक शोर-सा उठता था, और बच्‍चा होने के कारण उसे ही कहा जाता-बेटा जरा चाय के लिए  बोल देना या जरा चार पान बंधवा लाना, फिर किसी की सिगरेट की फरमाइश हो जाती। उस पत्र में उल्‍लेखित राशि के हाथ में आते-आते वह शर्म और बेचारगी से इतना थक चुका होता कि वापसी में साइकिल के पैडल पर उसका पैर जवाब दे चुका होता और अक्‍सर वह साइकिल हाथ में थामे ही लगभग घिसटता हुआ घर पहुंचता। पिता अक्‍सर उसकी लेट-लतीफी पर बरसते और वह चुपचाप घुटता हुआ सुनता। लेकिन एक दिन उसका धैर्य जवाब दे गया और उस हास्‍यनुमा लोमहर्षक घटना के बाद पत्रवाहक वाली उसकी भूमिका समाप्‍त हो गई और लगभग उसी दिन से उसने साइकिल पर भी चढ़ना छोड़ दिया। दरअसल उस दिन उसके पिता ने पत्र लेकर उसे पार्टी ऑफिस के बजाय किसी साथी के घर भेजा था। घर काफी दूर था लेकिन उसे इसकी आदत थी।

इस बार दरवाजा खुलने की बजाय ऊपर बालकनी में वही गोरी-चिट्टी लड़की नमूदार हुई। उसने वहीं से चीखकर कहा – ‘डैडी ने कहा है कि वे घर पर नहीं हैं, गांव गए हैं और दस-बीस दिन बाद आएंगे।’

घर का कॉलबेल दबाने पर उसी की हमउम्र एक गोरी-चिट्टी लड़की ने दरवाजा खोला। लड़की को देखते ही उसका ध्‍यान अपने घिसे और पैबंद लगे हाफपैंट और लगभग घिस चुकी हवाई चप्‍पल पर गया और शर्मसार आवाज़ से उसने बताया कि वह नंदकिशोर जी का बेटा है और उसके पिता से मिलने आया है। लड़की ने उसे वहीं बाहर रुकने को कहा और डैडी-डैडी चिल्‍लाती हुई अंदर भागी। वह वहीं बाहर साइकिल हाथ में थामे धूप में खड़ा रहा। उसे प्‍यास भी लग रही थी और यह लालच भी अंदर-अंदर था कि थोड़ी देर में जब उसे घर के अंदर ले जाया जाएगा, तो गर्मी को देखते हुए उसे रसना या रुहआफजा़ भी पिलाया जा सकता है। लेकिन साइकिल थामे बीस मिनट से भी ऊपर हो गए और घर से कुछ ऊंची आवाजों के शोर के अलावा कोई नहीं निकला। थोडी़ देर असमंजस में रहने के बाद उसने फिर से बेल बजाई, और इस बार दरवाजा खुलने की बजाय ऊपर बालकनी में वही गोरी-चिट्टी लड़की नमूदार हुई। उसने वहीं से चीखकर कहा – ‘डैडी ने कहा है कि वे घर पर नहीं हैं, गांव गए हैं और दस-बीस दिन बाद आएंगे।’ उसका जवाब सुनकर वह अकचका गया। ‘डैडी ने कहा है कि वे घर पर नहीं हैं’ के निहितार्थ को जब तक वह समझ पता, वह लड़की तत्‍काल वहां से अंतर्ध्‍यान हो गई और चूंकि यह बात उसने चीखकर कही थी, अतः उस मुहल्‍ले से गुजरने वाले कई लोग ठिठककर उसकी ओर हास्‍य और संदेह से देखने  लगे। वह हड़बड़ा गया और गिर पड़ा। उसकी ऐसी स्थिति में लोगों की मुस्‍कुराहट खुले हास्‍य में बदल गई। वह किसी जादू के जोर से मय-साइकिल वहां से अदृश्‍य हो जाना चाहता था, लेकिन दृश्‍यमान भौतिक संसार में जादू कहां ! वह अपमान, पीड़ा और चोट को सहलाता हुआ धीरे-धीरे उठा और चुपचाप साइकिल की हैंडिल थामे खरामा-खरामा बढ़ता हुआ मुहल्‍ले से बाहर आ गया।

पिता उसका इंतजार करते हुए दरवाजे पर ही मिल गए, इसके पहले कि वह कुछ पूछते उसने इतनी जोर से साइकिल पटकी कि पिता सहम गए। फिर उसने पिता की सवालिया सहमी निगाहों के सामने ही उस पत्र को चिन्दी-चिन्‍दी कर डाला और भागता हुआ अपने कमरे में जाकर सुबकने लगा। पिता अनुभवी थे, तपे-तपाये थे, वे चुपचाप अपने मित्रों के बीच जाकर बैठ गए जैसे कुछ हुआ ही न हो, लेकिन उस दिन के बाद से पत्राचार का वह सिलसिला हमेशा के लिए थम गया और धीरज ने भी उस पटकी हुई साइकिल को दोबारा हाथ नहीं लगाया। सिर्फ इतना ही नहीं, उस दिन से उसे साइकिल से घृणा जैसी भी हो गई होगी ! क्‍योंकि उस घटना के दो-चार साल बाद जब उससे मेरी पहली मुलाकात हुई थी तो उसने मेरी साइकिल देखकर लगभग जुगुप्‍सा वाले अंदाज में पूछा था-कितने साल से चला रहे हो? मैं जब तक उसके सवाल को समझ पता, उसने फिर कहा कि दरअसल साइकिल बहुत घटिया सवारी होती है। कोई आदमी जब साइकिल से चल रहा होता है तो जैसे वह अपना विज्ञापन स्‍वयं अपनी तख्‍ती पर गले में टांगे होता है – भाइयो, मैं निहायत गरीब और लाचार हूं। मुझे धक्‍का मारिए, मुझे गिरा दीजिए, और मुझे कुचल दीजिए। मैं अपनी साइकिल पर उस के इस अप्रत्‍याशित हमले से बुरी तरह बेचैन हो उठा था। मैंने अभी-अभी मैट्रिक की परीक्षा पास की थी और यह साइकिल उसी के उपहार स्‍वरुप अपने पिता से पाई थी, बल्कि साइकिल पर बैठते मैंने लगभग तल्‍ख और तीखे स्‍वर में कहा –तो सर, आपकी कार कहां? मेरी तल्‍खी पर वह थोड़ा हंसा, फिर निहायत अपनेपन से उसने मेरे गले में अपनी बांहें डाल दीं—अरे यार, तुम तो गुस्‍सा हो गए लगते हो। मेरे पास कहां से कार होगी! मैं तो पैदल आया हूं। उसके इस अपनेपन से मेरा गुस्‍सा जाता रहा और पैदल ही उसके साथ कुछ दूर चलता रहा।

उसी कुछ दूर के सफर में हम दोनों को लग गया कि हमारा संग-साथ काफी दूर तक रहेगा। हम दरअसल एक कवि गोष्‍ठ में आये थे। नब्‍बे-बानवे का वह दौर हमारे शहर में कई बदलावों के साथ एक रचनाशील वातावरण भी लाया  था। कई कॉलेजों में युवा महोत्‍सव हो रहे थे, कई संस्‍थाओं के सांस्‍कृतिक कार्यक्रमों की समूची श्रृंखलाएं थी। शहर से अचानक दो-दो तीन-तीन दैनिक अखबार निकलने लग गए थे, जिनमें सप्‍ताह में एक दिन एक पूरा पन्‍ना शहर के कवियों, कहा‍नीकारों के लिए आरक्षित हो गया था। आकाशवाणी का प्रायोगिक केन्‍द्र अब पूर्ण प्रसारण केन्‍द्र हो गया था और वहां युववाणी, वार्ता और सुवर्ण रेखा जैसे कई कार्यक्रमों में युवाओं की खासी भागीदारी होती थी। कई साप्‍ताहिक अखबारों की योजनाएं बनाते हुए कई किस्‍म के संदिग्‍ध नेता ठेकेदार किस्‍म के लोग थे जो कहानियों, कविताओं और नाटकों को खास तरजीह देते थे, ऐसे में हर गोष्‍ठी, हर नाटक, हर आयोजन और हर प्रतियोगिता में हम पांच-छः लोग मिलते-मिलाते गहरे दोस्‍त बन गए थे। इसमें मैं था, धीरज पांडे था, नवीन अग्रवाल था, संदीप मुरारका था …… और भी कई लोग थे जिनसे हम मित्रता करना चाहते थे। चरनजीत और उसकी बहन हरप्रीत कौर, मौपाली डे, एस.वी. पद्मलक्ष्‍मी …… दरअसल इनके होने मात्र से हमारी कविताओं में ताजगी आ जाती थी, हमारे तर्क पैने हो जाते थे, हमारी कलम धरदार हो जाती थी, हमारी आंखों में एक अजीब पैनापन आ जाता, हमारी चाल थोड़ी चुस्‍त और गर्वीली  हो जाती। हम एक अनजाने विशिष्‍टता बोध से भर उठते। हम लगभग सारी प्रतियोगिताएं जीत लेते, हर महफिल लूट जाते। हम हर अखबार के साहित्यिक परिशिष्‍ट पर अपनी फोटो के साथ होते।

हम अपने बड़ों के प्रोत्‍साहन को अपनी जायज प्रशंसा माने ऐसे उद्दंड बछड़े होते जा रहे थे जो अपने चारों ओर की हरियाली को देखकर यह तय ही नहीं कर पा रहे हों कि कहां से चरना शुरु करना चाहिए और इसी गफलत में खुशी और उत्तेजन में चोरों ओर कूद-कूदकर उस हरियाली का सत्‍यानाश किए दे रहे हों। कुल मिलाकर हम अस्‍पष्‍ट, धुंधले लेकिन अपने शहर के प्रतिनिधि युवा चेहरे थे, शहर की युवा पीढ़ी थे और इस नाते भविष्‍य की संभावनाओं का अनंत द्वारा हमारे लिए ही खुलना था। पांडे यकीनन हमारी उस मंडली का सबसे मध्दिम सितारा था, लेकिन अपनी सोच और योजनाओं में वह कतई धुंधला और अस्‍पष्‍ट नहीं था। वह हमारे मुकाबले लद्धड़ कविताएं पढ़ता था, भाषण और वाद-विवाद में उसके तर्क काफी कमजोर पड़ जाते थे। कहानियां  तो खैर वह लिख ही नहीं सकता था, लेकिन इन सबके बावजूद वह हमारा नेता था। उसका व्‍यक्तित्‍व आकर्षक था। वह लम्‍बा –चौड़ा था। हमारी मूंछों की रेख अभी फूटती ही थीं और वह कोमल-कोमल दाढ़ी-मूंछ रखता था। हम उभरते हुए किशोर थे, वह फूटताहुआ जवान था। गोष्ठियों या प्रतियोगिताओं में वह पहले से कोई तैयारी करके नहीं आता था बल्कि उनके शुरु होने से पहले ही वह किसी कागज पर दो-चार पंक्तियां लिखकर कविता की तरह सुना देता था। वाद-विवाद में दूसरों के तर्क को ही हू-ब-हू दुहरा देता। मैंने एक बार उससे उसकी रचना प्रक्रिया और इसमें उसके भविष्‍य के बारे में जानना चाहा तो वह ठठाकर हंस पड़ा। उसने बताया कि दरअसल उसे कभी कवि  नहीं बनना है और न ही उसकी कोई महत्वाकांक्षा राष्‍ट्रीय स्‍तर का डिबेटर बनने की है। इन सबसे क्‍या हासिल होगा? ऐसे कवि कलाकार तो कंकड़ फेंकने से भी हासिल हो जाते हैं। वह तो यह सब इसलिए करता है कि उसका नाम अखबार में छपता रहे, उसका फोटो छपता रहे ताकि लोग उसे तेज, ज़हीन और होनहार युवा मानें। उसने बताया कि इस शहर में हजारों युवा होंगे लेकिन कितनों का नाम इस तरह के कामों के लिए अखबार में छपता है?

— लेकिन नाम छप जाने से भी क्‍या हो जाएगा? मैंने हल्‍का-सा प्रतिवाद किया।

— कुछ खास नहीं, लेकिन एक छवि बनेगी तुम्‍हारी कि तुम वाकई एक जेनुइन फिल्‍म के बौध्दिक लड़के हो। फिर होने से ज्‍यादा महत्‍वपूर्ण है कि तुम्‍हारी छवि कैसी है? फिर उसने तफसील से बताया कि दो-तीन साल पहले तक जब वह यह सब नहीं कर रहा था और ऊंचा उठने की कोशिश में तमाम छुटभैये नेताओं और ठेकेदारों के पीछे चलता था, तो मुहल्‍ले के तमाम पिता अपने बच्‍चों को उससे दूर रखने की कोशिश करते कि नेता के साथ दिखाई दिए तो पैर तोड़ दूंगा, और आज जब उसका नाम और फोटो अखबार में छप रहा है, तो वही सारे बाप अपने बच्‍चो से कहते हैं कि कुछ सीखो नेता से। गरीबी में पला-बढ़ा और आज कितना नाम कमा रहा है, और तुम सब साले खा-खाकर मुटा रहे हो केवल। उसने यह भी बताया कि इस तरह अखबारों में रोज छपने से वे नेता  और ठेकेदार भी उससे पर्याप्‍त सम्‍मान से बात करते हैं और वह उनको नाम चमकाने के कई टिप्‍स भी देता है। इस तरह उन लोगों के सामने उसकी एक स्‍वायत्त छवि निर्मित हुई है जो उनका प्रतिद्वंद्वी नहीं बल्कि कहीं न कहीं उनके समाजीकरण में मददगार भी है। उसने कई छोटे-छोटे नेताओं को कम्‍बल वितरण, होली-दीवाली पर चीनी-तेल का गरीबों में वितरण, पार्टी के बड़े नेताओं के जन्‍मदिन पर अस्‍पतालों में मरीजों को फल वितरण जैसे उपयोगी सुझाव दिए, उनके कार्यक्रमों में भाषण दिए,और इस तरह से छोटा-मोटा ही सही एक नेटवर्क बनाया जिसमें उसके पीछे अपने पिता से सीख पाए उसके मुहल्‍ले के बच्‍चे थे जिन्‍हें लेकर वह इन तमाम तरह के छोटे-मोटे आयोजनों में पहुंचता और इस तरह एक ऐसे युवा के रुप में उसकी पहचान बढ़ती जा रही थी, जिसके पीछे हमेशा आठ-दस लड़के थे। उस शहर में जहां लोग सिर्फ  अपने आप से काम रखते हों,और हर के काम में अपना नफा-नुकसान देखते हों, आठ-दस लड़कों का अपने हर काम में उपयोग कर लेना एक बड़ी बात थी। धीरज पांडे हमारे सामने ही इस बड़ी बात को करता दिख रहा था, लेकिन वह अक्‍सर हंसते हुए बताता कि यह कोई बड़ी  बात नहीं। इस तरह के कई ग्रुप और लड़के शहर में हैं। यह तुम भी कर सकते हो, लेकिन मैं जानता था कि यह केवल वही कर सकता था हमारे ग्रुप में।

दरअसल इस मुहल्‍ले में लोग उसे पीठ पीछे नेता और सामने नेताजी ही कहते हैं, इस लिहाजा से सोचो तो इस गली में मेरा घर होने के कारण इसका नाम ‘नेताजी मार्ग’ पड़ गया। अब नेताजी तो नेताजी ही होता है, सुभाषचंद्र बोस हों, या धीरज पांडे !

अब जैसे कि उसने तय किया कि जिस मुहल्‍ले शास्‍त्री नगर में वह रहता है उसकी उस गली का नामकरण नेताजी सुभाषचंद्र बोस के नाम पर किया जाए। मुहल्‍ले के लोगों को भला इस पर क्‍या ऐतराज हो सकता था। कुछ चंदा-चिठ्ठा काटकर शामियाना माइक लगाकर बाकायदा नेताजी की जयंती मनाई गई और उस गली का नाम ‘नेताजी सुभाषचंद्र बोस मार्ग’ का ऐलान कर दिया गया। यह एक स्‍वायत्त घोषणा थी जिसका हमारे शहर के नगर निगम इत्‍यादी से कोई ताल्‍लुक नहीं था। यह कोई मांग नहीं थी, बल्कि घोषणा थी। उसने पहले से एक पट्टी बनवा रखी थी, जिसे उसने अपने घर के आगे टांगकर अपने पिताजी से उसका अनावरण करवा दिया। ‘नेताजी मार्ग’ नाम के उस पट्टी के वहां लटकते ही उसने अपने तमाम मित्रों को ललकारने वाले अंदाज में हिदायत दी कि अब अपने चिट्ठी पत्री या फार्म के पते वाले कालम में वे निश्चित ही नेताजी मार्ग का उल्‍लेख करें ताकि यह नाम स्‍थायी रुप से विभिन्‍न रिकार्डों में दर्ज हो जाए। बहुत दिनों के बाद उसके पिता यानि नंदकिशोर पांडे को भी कोई मंच उपलब्‍ध हुआ था और वह भी अपने घर के सामने ही। उन्‍होंने भी लगभग एक घंटे तक उपस्थित श्रेाताओं के सामने जो उनके मुहल्‍ले के ही लड़के थे सुभाषचंद्र बोस के जीवन और उनके अवदान पर प्रकाश डाला और उनके बताए मार्ग पर चलने की नसीहत दी। उन्‍होंने यह भी जोर देकर बताया कि कल से जब वे इस गली से गुजरेंगे तो उन्‍हें हमेशा अहसास होगा कि वे नेताजी के बताए रास्‍ते पर चलने की तरफ बढ़  रहे हैं। कार्यक्रम के बाद चाय-समोसा के दौर में उसने मुझसे कहा कि दरअसल इस गली का नाम नेताजी मार्ग रखने के दो फायदे हैं, पहला तो यह कि हम युवा देशभक्‍त हैं और अपने नायकों को भुले नहीं हैं और दूसरा …., दूसरा बताते हुए थोड़ी कमीनगी से हंसते हुए कहा कि दरअसल इस मुहल्‍ले में लोग उसे पीठ पीछे नेता और सामने नेताजी ही कहते हैं, इस लिहाजा से सोचो तो इस गली में मेरा घर होने के कारण इसका नाम ‘नेताजी मार्ग’ पड़ गया। अब नेताजी तो नेताजी ही होता है, सुभाषचंद्र बोस हों, या धीरज पांडे! कहकर वह इतनी से मुस्‍कुराया कि मैं थोडा़ नर्वस हो गया। मेरी नजर में यह पहली बार इतिहास के महानायकत्‍व का टुच्‍चेपन में विसर्जन था और वह भी बिना किसी अतिरिक्‍त प्रयास के।

मैं पहली बार ही उसके घर आया था और उसके परिवार से मिल रहा था। उसी दिन मुझे पता चला कि पांडे तीन भाई हैं, और उसकी दो बहनें भी हैं। भाइयों में वह दूसर नम्‍बर पर है, उसके बड़े भाई प्रमोद पांडे, जो उस अवसर पर अपने ही घर में कोट-पैंट, टाई में थे, से मिलकर मुझे थोड़ा अजीब लगा। वे भैंगे थे, मुझसे बात करते समय वे नवीन की ओर देख रहे थे, और बोलते समय उनका निचला होंठ एक ओर लटक जाता था। छोटा सुनील पांडे जिसका परिचय उसने महालिक कहकर दिया, वह काफी खुशदिल लेकिन काइयां टाइप का लगा, पर जल्‍दी वह मुझसे खुल गया और धीरज की ओर आंख दबाते हुए मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए बोला — अब ‘नेताजी मार्ग’ पर हमेशा आते रहिएगा। उसके ऐसा करने से नेता यानि धीरज मुस्‍कुराकर रह गया, लेकिन बड़ा भाई बड़े ही भौंडे तरीके से हो-होकर हंसने लगा। मैंने नंदकिशोर जी की तरफ देखा। वे शायद ताड़ गए थे, वे जानबूझकर दूसरी ओर देखने लगे। मैं और सिहर उठ। यह कोई संयोग नहीं था, इस ऐतिहासिक स्‍खलनवाद में पूरा परिवार शामिल था।

कार्यक्रम के बाद जब मैं चलने को हुआ तो वह नुक्‍कड़ तक मुझे छोड़ने आया। मेरे हाथ में बीस का नोट जबरदस्‍ती ठूंसते हुए वह हंसा-अच्‍छा हुआ तुमने भी साइकिल छोड़ दी। ऑटो से आने-जाने में सामने वाले को हमेशा अपनी औकात का भ्रम होता है। औकात तो आती-जाती है, या समझो कि आते-आते आती है, लेकिन औकात का भ्रम यदि एक बार टूट  जाए तो समझो कि तुम मैदान से बाहर। मेरे हाथ में उसके दिये बीस रुपये थे जो उस समय की मेरी औकात से बहुत ज्‍यादा थे। फिर भी मैं बीस रुपयों के वजन से दब जाना बिल्‍कुल नहीं चाहता था। मैंने लगभग उपहास उड़ाने वाले अंदाज में कहा- नेताजी नाम रख लेने से कोई ‘नेताजी’ नहीं हो जाता है। समूचे देश में, इतिहास में ‘नेताजी’ का स्‍थान है।

–अरे तुम तो फिर बुरा मान गए। हंसते हुए उसने मेरा कंधा दबाया। मैंने कब कहा कि मैं नेताजी सुभाषचंद्र बोस हो गया हूं या फिर मुझे उनके जैसा बनना है। अभी देखा नहीं, कार्यक्रम में सब लोगों ने सुभाषचंद्र बोस के नाम पर ही तो भाषण दिया। मैं तो केवल थोड़े दिनों में मुहल्‍ले की स्‍मृति के कन्‍फ्यूजन और उसमें थोड़ा-बहुत अपने फायदे की बात कर रहा था। अब कोई महीने भर बाद इस चौराहे पर आए और पूछे कि नेताजी का मकान कौन सा है तो काई भी पान, चाय  या अंडे वाला बता देगा—वेा सामने ‘नेताजी मार्ग’ पर उनका घर है बस यूं ही।

कंधे पर उसके हाथ के दबाव से मेरा हाथ पसीजने लगा था। यह कुचक्र यदि थोड़ा-सा कन्‍फ्यूजन था, और बस यूं ही था तो इसकी इंतहा कहां होनी थी? मैंने गौर से उसकी आंखों में देखना चाहा तो वहां एक ऐसे हिंस्‍त्र और बनैले पशु की चमक थी कि एक सिहरन, एक कंपकंपी के अलावा मैं कुछ और महसूस नहीं कर पाया।

पांडे का ‘नेताजी’ में यूं कायांतरण अनायास नहीं था। दरअसल हमारा शहर इस्‍पात बनाने वाली जिस कम्‍पनी के उजरत की देन था, उसकी नींव निहायत खोखली और भुरभुरी थी। कम्‍पनी के खिलाफ यदि शहर में कोई छींक भी देता तो कम्‍पनी को नजला-बुखार हो जाता था। विधानसभा, लोकसभा तो खैर बड़ी चीज थी, ग्राम पंचायत के चुनावों में भी वह हर जीतने वाली संभावित पार्टी को पैसा देती थी कि यदि वह जीत जाए तो कम्‍पनी की पोल न खोलने लगे। कम्‍पनी की पेाल या उसका भांडा हमेशा खुलने या फूटने के मुहाने पर होता। किसी को नहीं पता था कि इस पोल या भांडे में क्‍या था, लेकिन सबको लगता था कि यदि यह खुल या फूट गया तो एक सैलाब आएगा और कम्‍पनी, शहर सब कुछ तबाह हो जाएगा, बह जाएगा।

शहर के लोग कम्‍पनी का भांडा फूटते जरुर देखना चाहते थे, लेकिन शहर का तबाह होना उन्‍हें डरा जाता था, इसलिए हर चुनाव में भांडा फूटने के डंक के बावजूद कम्‍पनी का भांडा सुरक्षित  रह जाता था, उसकी पोल भी कमोबेश बंधी ही रहती।

लेकिन उस वर्ष  जब पांडे विधिवत् नेताजी बन रहा था तब कम्‍पनी का भांडा बर्तन, पोल-पट्टी सब अचानक दांव पर लग गया था। यह बिल्‍ली के भाग्‍य या अंधे के हाथ से भी ज्‍यादा नाजुक और नर्म मामला था। दरअसल कम्‍पनी का एक बहुत बड़ा अधिकारी जो काफी योग्‍य और सूझबूझ वाला आदमी जाता था, और अपनी कुछ नीतियों के कारण मजदूरों का हितैषी भी माना जाता था, के मन में यह महत्‍वाकांक्षा जागी कि यदि वह कम्‍पनी का इतना बड़ा अधिकारी है तो सबसे बड़ा अधिकारी क्‍यों नहीं बन सकता? अपनी योग्‍यता और अनुभव के बल पर उसे यह महत्‍वाकांक्षा पालने का हक था, लेकिन चूंकि कम्‍पनी के मालिकाना हक वाले परिवार का वैध संतान अभी अस्तित्‍व में था इसलिए उसकी यह महत्‍वाकांक्षा अवैध साबित की गई। इसे षड्यंत्र या तख्‍तापलट जैसी किसी खतरनाक संज्ञा से नवाज़ा गया और रातोंरात उस बड़े अधिकारी की हैसियत भारतीय राष्‍ट्र राज्‍य में सामान्‍य नागरिक की कर दी गई। कम्‍पनी के इस फैसले से समूचे शहर सन्‍नाटा छा गया। जो अब तक सारे फैसले किया करता था, उस पर फैसले की ऐसी गाज बिल्‍कुल अनहोनी और नई घटना थी। इतिहास की तारीखें बताती हैं कि ऐसी घटनाओं से तारीखें पलट जाती हैं, लेकिन उस समय के वर्तमान में इतिहास के क्रांतिकारी तत्‍वों का नितांत अभाव था। कम्‍पनी का ट्रेड यूनियन यह जानता था कि उक्‍त अधिकारी के कई फैसले और उसकी कई नीतियां मजदूरों के हित में थीं, लेकिन वह अधिकारी था मतलब वर्ग शत्रु था, अतः उसने कम्‍पनी के इस निर्णय को प्रबंधन का आपसी मामला मानकर उसे कम्‍पनी के दारु-मुर्गें में उड़ा डाला।

परंतु उस शहर की रिहाइश का अधिकांश हिस्‍सा मजदूरों का था और उसे अपने वर्ग शत्रुओं और सत्तापक्ष के प्रगतिशील तत्‍वों के बीच के बारीक अंतर के बारे ठीक से पता था, इसलिए उस बड़े अधिकारी के प्रति एक भावुक किस्‍म की सहानुभूति का ज्‍वार था।

उस अधिकारी को भले ही कम्‍पनी ने सामान्‍य नागरिक की हैसियत में ला खड़ा किया था, लेकिन वह अपने असामान्‍य धन बल और बुध्दि से जानता था कि इस लोकतांत्रिक राष्‍ट्र राज्‍य में एक सामान्‍य धनशाली बुध्दिमान और सहानुभूति प्राप्‍त नागरिक की कितनी बड़ी हैसियत होती है।

अपनी इसी हैसियत की बदौलत अपने निकाले जाने के एक वर्ष के भीतर ही उसने आगामी विधानसभा चुनाव में अपनी उम्‍मीदवारी ठोंक दी और पहली बार कम्‍पनी और उस शहर की जनता को भी लगा कि अब भांडा सचमुच में फूट सकता है। जनता भांडा फूटने के बाद की तबाही से परिचित थी, लेकिन इस बार उसमें एक भोला विश्‍वास काम कर रहा था कि इस बार भांडे को फोड़ने वाला ज्‍या़दा मजबूत है और फोड़क‍र वह दूसरा भांडा बना सकता है।

टी. एन शेषण के बाद वाले दौर में यह बात अजीब लग सकती है, लेकिन उस समय तक हमारे शहर क्‍या, समूचे देश में निर्वाचन आयोग नामक संस्‍था के बारे में संविधान विशेषज्ञों को छोड़कर शायद ही किसी को पता था। उस बार का विधानसभा चुनाव भारतीय राष्‍ट्र राज्‍य के लोकतंत्र के इतिहास में एक अजीब चुनाव था। अधिकारी पारसी था और शहर में उसके धर्म और जाति की संख्‍या नगण्‍य थी। तमाम राष्‍ट्रीय क्षेत्रीय पार्टियां पहले भी कम्‍पनी से पैसा पाती थीं  और आगे भी पाना चाहती थीं, इसलिए किसी भी दल से तो उसे टिकट मिलना नहीं था, वह निर्दलीय ही मैदान में था। कम्‍पनी की नई वी.आर.एस.नीति के कारण शहर में बेरोजगारी की कमी नहीं थी इसलिए उसे अपना नेटवर्क खड़ा करने में कोई खास दिक्‍कत नहीं हुई। कम्‍पनी इस बार जबरदस्‍त असमंजस में थी। हर बार उसका अनुभव सारे संभावित विजेता प्रत्‍याशी को पैसा मुहैया करा देने का था कि कोई जीते, उसका भांडा न फोड़े बस। इस बार उसे किसी को चुनाव में हराना था किसी भी कीमत पर। यह उसके लिए लड़ाई का नया क्षेत्र था इसलिए उसके हाथ-पांव फूले थे। हर बार की तरह इस बार भी उसके पास सिर्फ पैसा था, लेकिन यह पैसा किस-किसको कितना देना है, इसका उसे कोई अनुमान नहीं था।

कम्‍पनी के इसी गैर-अनुमानित क्षेत्र में पांडे की जबरदस्‍त एंट्री हुई। उन तमाम छोटे-मोटे नेताओं को जिनको उसने फल और कम्‍बल वितरण की सलाह दी थी, सबके अलग-अलग टोलियों में लेकरवह कम्‍पनी के जनसंपर्क कार्यालय पहुंचता रहा,चुनाव की तिथि के नजदीक आते-आते कम्‍पनी के तमाम छोटे-बड़े अधिकारियों को पांडे काम की चीज लगने लगा। उसने अपने कालेज के कुछ हुड़दंगी दोस्‍तों के साथ उस भूतपूर्व अधिकारी की सभा मे हुल्‍लड़बाजी भी की। एक बार तो वह उनकी कारों के काफिले के सामने लेट भी गया। जब तक उनके कार्यकर्ता और पुलिस वाले उसे वहां से हटाते, वह सड़क पर ही फैल गया और चीख-चीखलकर चिल्‍लाने लगा- मोदीगो बैक। मोदी गो बैक। वहां उपस्थित पत्रकारों को ललकार कर उसने पुलिस की लाठियां खाते हुए चिल्‍लाना जारी रखा-बाहरी तत्‍वों से शहर की व्‍यवस्‍था को हम खराब नहीं होने देंगे। शहर को बरबाद करने वाले का विरोध करते हुए मेरी जान भी चली जाए तो परवाह नहीं।

इस घटना के बाद से तो पांडे जैसे कम्‍पनी की नजरों में हीरो हो गया। बरसों पहले जब उसके पिता की फोटो अखबार में छपी थी, जनता की नजरों में वह हीरो और कम्‍पनी के लिए विलेन वाली तसवीर। आज पांडे की तसवीर थी जिसमें पुलिस उसे घसीट रही थी। जनता  की नजर में वह कहीं बड़ा विलेन था, लेकिन कम्‍पनी की नजर में कहीं बड़ा, बहुत बड़ा हीरो। कम्‍पनी के सारे अधिकारी उसे व्‍यक्तिगत तौर पर जानने लगे थे और उसकी राय को अहमियत देते हुए कम्‍पनी ने उसके तमाम लोगों को नोटों से जैसे तौल दिया। एक खामोश चुनावी हवा जो कम्‍पनी को आने वाले किसी बड़े तूफान का अंदेशा दे रही थी, पैसों की गर्मी ने उसे चुनाव के पहले ही पक्ष, विपक्ष, हार-जीत के अंधड़ में बदल दिया। सहानुभूति, परिवर्तन और भांडा फूटाने की मासूम जिज्ञासा की भोली लहर इस अंधड़ से परास्‍त हो गई और कम्‍पनी का वह भूतपूर्व अधिकारी एक हजार से कम मतों से ही सही, लेकिन चुनाव हार गया।

उसके जीतने से पता नहीं क्‍या होता, लेकिन उसके हार जाने से कम्‍पनी को जैसे उसे निकाले जाने की वैधता का प्रमाण हासिल हो गया। उसके पक्ष में उठने वाली सहानुभूति लहर को नजरअंदाज करते हुए कम्‍पनी ने बिना किसी हीलहुज्‍जत के मजदूरों के 20 प्रतिशत बोनस पर सहमति जताई और ट्रेड यूनियन ने इस मसले पर प्रबंधन  का इतना गौरवगान किया कि उक्‍त भूतपूर्व अधिकारी की याद शहर से हमेशा के लिए  धुल-पुंछ गई। मैंने अपने घर में भी महसूस किया कि मेरे पिताजी भी जो दो दिनों से अधिकारी की हार के गम में थे, बोनस की चर्चा से एकदम हरे हो गए। शहर के अधिकांश  मजदूरों की तरह उन्‍होंने भी कहना शुरु ने तो यहां तक कहा कि कोई भी सरकारी व्‍यवस्‍था अपने नागरिकों का उतना ख्‍याल नहीं रख सकती जितना कम्‍पनी अपने शहर के रहवासियों का रखती है।

लेकिन मेरी जिज्ञासा बोनस और नागरिक समाज से परे पांडे के हासिल को लेकर थी। आखिर उस अधिकारी की हार से पांडे को क्‍या मिलने वाला था? लोग समझ रहे थे कि कम्‍पनी पांडे को जनसंपर्क विभाग में ही कोई नौकरी दे देगी। एक-दो बार मैंने उससे जानना भी चाहा कि आखिर उसे क्‍या मिलने वाला है, लेकिन हर बार वह अपने उसी जालिम मुस्‍कुराहट वाले अंदाज में, बात चल रही है, कहकर टाल जाता।  क्‍या बात चल रही है और किससे बात चल रही है, के आजिजी सवालों के बीच एक दिन उसने बताया कि बात हो गई है। और यह ऐसी बात थी कि तमाम  बात चबाने वालों को अपनी उंगलियां चबा लेनी पड़ीं। कम्‍पनी ने नंदकिशोर पांडे पर चल रहे सारे मुकद्दमे उठा लिए और उनके निष्‍कासन को रद्द करते हुए निष्‍कासित अवधि के तमाम लाभ,पी.एफ., बकाया इत्‍यादि सूद समेत वापस करने पर राजी हो गई।

इस समूचे प्रकरण में उल्‍लेखनीय जैसा यदि कुछ था तो यह कि नंदकिशोर जी कम्‍पनी से निकाले गए थे गाजे-बाजे के साथ, लेकिन वापसी एकदम खामोश और रुटीन तरीके से हुई। उनका अपने पुराने मजदूर साथियों से सामना न हो इसलिए उनकी नई नियुक्ति कम्‍पनी के वित्त विभाग में की गई थी

इस घोषणा से ट्रेड  यूनियन और वह पार्टी भी जिसके नंदकिशोर पांडे सदस्‍य थे, अवाक् रह गई। वह न तो कम्‍पनी के इस निर्णय का समर्थन कर सकी और न ही विरोध। पार्टी ऑफिस में उनके मित्रों के बीच इस पर चर्चा हुई जरुर, लेकिन वह किसी मीटिंग के एजेंडे में नहीं आ पाया। लोग मीटिंग के बाहर ‘पुरषस्‍य भाग्‍यम्, या पूत-सपूत जैसी गैर-मार्क्‍सवादी शब्‍दावली में ही बात कर पाए। इस समूचे प्रकरण में उल्‍लेखनीय जैसा यदि कुछ था तो यह कि नंदकिशोर जी कम्‍पनी से निकाले गए थे गाजे-बाजे के साथ, लेकिन वापसी एकदम खामोश और रुटीन तरीके से हुई। उनका अपने पुराने मजदूर साथियों से सामना न हो इसलिए उनकी नई नियुक्ति कम्‍पनी के वित्त विभाग में की गई थी, और यदि पुरानी जगह नियुक्ति होती तो भी नंदकिशोर जी की आंखों में अभी-अभी मिले पैसों की इतनी ताव थी कि शायद ही उनका कोई मित्र उनसे आंख मिला पता।

यह सब कुछ सबकी आंखों  के सामने हुआ। देखते-देखते तीन कमरों के उस पुश्‍तैनी हिस्‍से की जगह ने अपना तीनमंजिला स्‍वरुप आख्तियार कर लिया। ताश खेलने की जगह ने एक शानदार बैठक की शक्‍ल ली जहां नंदकिशोर जी शाम को अपने नए-पुराने मित्रों के साथ देश-दुनिया की चर्चा  करते, धीरज की तारीफों के पुल बांधते, लेकिन भूल से भी उसका नाम नहीं लेते। उसका जिक्र आने पर वे बड़े अदब से उसे नेताजी संबोधित करते। उस मुहल्‍ले में किसी के बाप का अपने बेटे के लिए इतना आदर एक सांस्‍कृतिक धक्‍के और अचम्‍भे  से कम नहीं था। लोग और सदमे में आकर धीरज का घनघोर आदर करने लगे थे। इतना आदर कि धीरज को भी घबराहट और जुगुप्‍सा हो जाए। सांस्‍कृतिक विचलन और भाव के विगलन के इस शोर में सबसे सिहराने वाली बात फिर इतिहास की उसी बदसलूकी से जुड़ती थी – पांडे की उस तीन मंजिला इमारत का नाम – था नेताजी निवास। पांडे का पता था — नेताजी निवास, नेताजी मार्ग, शास्‍त्री नगर।

पांडे स्‍वयं भी उस कम्‍पनी में नौकरी पा सकता था। उस चुनाव के बाद कम्‍पनी में ‘पर्सनल ऑफिसर’ पद की जैसे बाढ़ आ गई थी। कई पुराने छात्र, नेता, माफिया, ठेकेदारों, भूतपूर्व विधायकों के छोटे  भाई बेटे उक्‍त पदों को सुशोभित कर रहे थे, लेकिन पांडे का मानना था कि कम्‍पनी में एक बार नौकरी कर लेने पर उससे बराबरी के स्‍तर पर बातचीत या बारगेनिंग की सुविधा जाती रहेगी। एक मुलाकात में उसने बताया भी कि एक पुराना छात्र नेता जो इस चुनाव के बाद नया-नया ऑफिसर नियुक्ति हुआ था, ने जनसंपर्क अधिकारी के केबिन में बैठे पांडे को खुद अपने हाथों से कॉफी सर्व की थी, और कॉफी पी चुकने के बाद अधिकारी के कहने पर जूठे कप को भी टेबुल से हटाया था। यह वही छात्र नेता था जिसकी पार्टी में पांडे कभी एक कार्यकर्ता की हैसियत से शामिल था। ‘पर्सनल ऑफिसर’ का मतलब अपने से बडे़ अधिकारी का व्‍यक्तिगत चपरासी। कहते हुए उसने मेरे कंधे पर अपने हाथों का दबाव बढ़ाया — अभी देखो, मैं कम्‍पनी के जनसंपर्क विभाग का अघोषित लेकिन स्‍वयंभू सलाहकार हूं।

— और मैं? मैने अपने कंधे को उसकी पकड़ से ढीला करता हुआ कसमसाया।

— अरे तुम ! तुम तो मेरे यार हो। कहते हुए वह खुलकर हंसा  उसकी हंसी का मतलब था कि अब तुम कहां हो? मैंने देखा मैं वाकई कहीं नहीं था। सामने उसका छोटा भाई सुनील पांडे नई बाइक ‘हीरो होंडा’ लेकर खड़ा था। पांडे फिर मिलते हैं, कहता हुआ, उस पर ऐसे बैठकर चला गया जैसे वह जन्‍म से ही मोटर बाइक पर बैठता रहा हो।

‘फिर मिलते हैं’ पांडे का नया जुमला हो गया, हालांकि अब उससे बहुत मुलाकातें संभव नहीं थीं। इंटर की परीक्षा देने के बाद मैं अपने शहर के ही एक अखबार में प्रशिक्षु पत्रकार हो गया। उसी अखबार के मार्फत पांडे की नित नई सूचनाएं मिलती थीं। कभी वह दिल्‍ली के किरण बेदी के साथ खड़ा था तो कभी कलकत्ता में ‘नोबेल विजेता’ अमर्त्‍य सेन के साथ फोटो में मुस्‍कुराते हुए। इन तमाम फोटो में उसका छोटा भाई सुनील भी बिना यह जाने कि वह किनके साथ खड़ा है, दांत चियारे रहता। हमारे छोटे से शहर में इतने बड़े लोगों के साथ पांडे की फोटुओं ने उसके बड़प्‍पन का बड़ा मायाजाल रचा था। हर छपी फोटो के साथ उसका एक समाचार भी रहता कि जल्‍द ही ये बड़ी हस्तियां हमारे शहर आएंगी और कम्‍पनी द्वारा उनका नागरिक अभिनंदन किया जाएगा। यह दीगर बात है कि उनमें से कोई भी हस्‍ती अपना अभिनंदन कराने नहीं पहुंची। लोगबाग पांडे से जब तक पूछते कि यह आयोजन कब हो रहा है, तब तक वह किसी नई हस्‍ती के साथ फोटो में नमूदार हो जाता। कम्‍पनी के खर्चे से दिल्‍ली,कलकत्ता, बम्‍बई की यात्रा करते हुए उसका एक नेटवर्क डेवलप हुआ जो एक निश्चित रकम लेकर लोगों  को सम्‍मान और उपाधियां बांटता था। अखबार का काम सीखते हुए भी कवि गोष्ठियों,भाषण प्रतियोगिताओं में जाने का मेरा पुराना चस्‍का छूटा नहीं था। ऐसे ही एक गोष्‍ठी में वह मुझे मिला और मुझे अलग ले जाते हुए बोला—मुझे मालुम था कि तुम यहां जरुर मिल जाओगे। तुम्‍हारे अखबार में गया था, लेकिन तुम्‍हारे सम्‍पादक मेरी इतनी चापलूसी करने लगे कि वहां मेरा तुमसे मिलना ठीक नहीं लगा। कहकर वह फिर अपनी ही शैली में हंसा।

अपनी ऊंचाई से मेरे छोटेपन पर हंसते हुए मुझे उसने एक अलबम दिखाई। उसमें वह तमाम बडे़ नेताओं के साथ मुस्‍कुराते हुए खड़ा था, साथ ही उसमें शहर के कई जाने- पहचाने चेहरे भी थे, जो उन नेताओं के हाथ से बड़ी सी ट्रॉफी ग्रहण कर रहे थे।  उन ट्रॉफियों में उद्योग रत्‍न, आयुर्वेद रत्‍न जैसे सम्‍मानों के प्रशस्ति थे।

— क्‍या है यह सब? मैं कुछ समझने की कोशिश करता हुआ बोला।

— बिजनेस है माई डियर। उसने फिर कंधे पर अपने हाथ का दबाव बढ़ाया। वो जो तुम अपने अखबार में विज्ञप्तियां छापते हो, अमुक को ये रत्‍न, फलां को वो रत्‍न। ये पुरस्‍कार, ये सम्‍मान —– सब मैं ही मैनेज करता हूं।

— मैनेज करता हूं मतलब?

— मतलब क्‍या? तुम क्‍या समझते हो इन बड़े नेताओं, मंत्रियों को और ये सम्‍मानित करने वाली संस्‍थाओं को कोई सपना आता है कि हमारे शहर में, शिक्षा में, उद्योग में काम करने वाले ऐसे महारथी, महापुरुष गुमनामी का जीवन जी रहे हैं, और उन्‍हें पुरस्‍कृत सम्‍मानित कर उनका और समाज का भला किया जाए। मेरे दोस्‍त, यह सब शुद्ध धंधा है, बिजनेस है।

— कैसा बिजनेस है यह? मैं हतबुध्दि था।

— आसान है ….. मैं शहर में ऐसे लोगों की पहचान करता हूं, जिनके पास पैसा है, लेकिन सम्‍मान नहीं है। उनसे साठ-सत्तर हजार लेकर इन सम्‍मान करवाने वाली संस्‍थाओं से उनका किसी बड़े मंत्री या राज्‍यपाल, नेता आदि से सम्‍मान करवा देता हूं। चालीस से पचास प्रतिशत तक का कमीशन मेरा। है न कमाल का बिजनेस ! एक पैसा का इंवेस्‍टमेंट नहीं और …. और ….. वह जोर से हंसा। मेरे सामने पचासों ऐसे छोटे-मोटे उद्योगपतियों, प्राचार्यों, साहित्‍यकारों के चेहरे घूम गए, जिनके सम्‍मानकी खबरें मैंने खुद यह सोचते हुए बनाई थीं कि एक दिन मुझे भी साहित्‍य का  या समाज सेवा का कोई पुरस्‍कार मिलेगा। ये पुरस्‍कार ऐसे  मिले हैं। मुझे वितृष्‍णा-सी हो आई।

–लेकिन तुम यह सब मुझे क्‍यों समझा रहे हो? मैं असमंजस में था।

— घर चलो पहले, तुम काफी दिनों से घर नहीं आए हो, पापा भी पूछ रहे थे तुमको।

यह उसने साफ झूठ कहा था, लेकिन मैं उसके घर गया। नेताजी निवास की ऊंचाई से मैं अपने बौनेपन पर किसी भी तरह अपनी बौध्दिकता और सत्‍यनिष्‍ठा से विजय प्राप्‍त नहीं कर पा रहा था। घर पर उसका बड़ा भाई जो भैंगा था, उसी तरह सूट-बूट और टाई में मिला, और मुझसे हाथ मिलाते हुए – कैसे हो साहित्‍यकार महोदय कहकर हो-होकर हंसने लगा। उसी दिन मुझे पता चला कि अपने भैंगेपन के बावजूद एक मोटी रकम दहेज लेकर उसकी शादी हुई है और अब वह सोते समय ही अपना कोट-पैंट उतारता है।

खाने की मेज पर पांडे ने तफसील से मुझे समझाने की कोशिश की कि इस धंधे में तीन सौ प्रतिशत मुनाफा है। वैसे तो उसके दोनों भाई भी इस धंधे में लगे हैं, लेकिन मैं उन दोनों से ज्‍यादा कारगर हो सकता हूं। भाषण,वाद-विवाद प्रतियोगिताओं में हिस्‍सेदारी करने के कारण मेरे पास ऐसी भाषा है, जो आसानी से लोगों को प्रभावित कर सकती है। इसके अलावा मैं एक अखबार के दफ्तर में बैठता हूं, जहां कई तरह के लोगों से मेरा परिचय हो सकता है, साथ ही इंटरव्‍यू लेने के बहाने मैं आसानी से किसी का भी अपाइंटमेंट ले सकता हूं और इंटरव्‍यू लेने के क्रम में ही मैं उसे असली मुद्दे पर खींच सकता हूं।

मुझे समझाते हुए उसकी आंखों में वही हिंस्‍त्र बनैले पशु की-सी चमक थी जिसमे मैं पहले भी वाकिफ था। मैं उसके प्रस्‍ताव से बैाखला गया था। लगभग झटकने वाले अंदाज में मैंने कहा कि मैं ऐसे टुच्‍चे कामों के लिए पैदा नहीं हुआ हूं। मै एक प्रतिष्ठित युवा हूं। मेरी  कविताएं ‘हंस’ में स्‍वीकृत हो चुकी हैं, और आगे की पढ़ाई के लिए मेरा ए‍डमिशन बनारस हिन्‍दू विश्‍वविद्यालय में होनेवाला है। मैं उनके प्रस्‍ताव की प्रतिक्रिया में न जाने क्‍या अनाप-शनाप बोलता गया। मेरी तल्‍खी का उस पर जरा सा भी असर नहीं हुआ। पूर्ववत् मुस्‍कुराता हुआ वह चालू रहा-यह तो अच्‍छी बात है, बी.एच.यू. के स्‍टूडेंट होओगे तो तुम्‍हारी बात में और बजन आएगा। और रहा ‘हंस’ पत्रिका में छपने का सवाल तो दो-तीन सालों में तुम ऐसी पत्रिका खुद निकाल सकते हो।

मुझे उसकी बुध्दि पर तरस आया। वह अपने इस नए बिजनेस की चमक में हंस और बाकी पत्रिकाओं को बराबर का समझ रहा था, उसके लिए अकादमी, ज्ञानपीठ के पुरस्‍कारों और शिक्षा रत्‍न, समाजरत्‍न और पुरस्‍कारों में भी कोई अंतर नहीं था।

मैं काफी खिन्‍न और उखड़े मन से उसके यहां से लौटा, लेकिन घर आते-आते मुझे अपने ऊपर खीझ आने लगी थी, मैं नेताजी निवास और पांडे की ऊंचाई के समक्ष खुद को बौना महसूस कर रहा था। पांडे देखते-देखते हमारे सामने एक ऐसा वटवृक्ष बन गया था जिसके नीचे हम-जैसे किसी भी पौधे का उग पाना नामुमकिन था। मैं महसूस कर रहा था कि अपने शहर में मैं और जितने दिन रहूंगा कुंठा, खीझ और कुढ़न में घुटता ही रहूंगा। मैं पांडे, नेताजी के जयकारे और अपने पिता के तानों के शोर से किसी भी तरह निजात पाना चाह रहा था, और खुदाया खैर बनारस से कॉल लेटर मिलते ही मैं पहली गाड़ी से शहर छोड़कर भागा।

लेकिन मैं सिर्फ भौतिक रुप से ही अपने शहर से अनुपस्थित हो पाया। अपने शहर से मतलब पांडे की चेतना से। पांडे की योजनाओं ने स्‍थाई रुप से हमला किया था। अपनी छुटियों में मैं जब भी अपने शहर आता, पांडे की नई उपलब्धियों और योजनाओं से आक्रांत होता। उसने शहर की न जाने कौ-सी दुखती रग पकड़ ली थी कि कोई भी उसके बाहर जाता नहीं दिखता था। वह ‘सर्वधर्म समभाव’, ‘समाज में बढ़ती  अनैतिकता’, ‘शिक्षा की स्थिति’, ‘अधिकार और कर्तव्‍य’ जैसे विषय पर बड़े-बडे़ परिसंवाद आयोजित करता और उसमें शहर के तमाम सेठ साहूकारों, मझौले व्‍यवसायियों, ठेकेदारों, परचूनियों को बतैर मुख्‍य अतिथि या विशिष्‍ट अतिथि के तौर पर आमंत्रित करता। इन तमाम कार्यक्रमों में आर.टी.ओ., इकम टैक्‍स कमिश्‍नर, कलेक्‍टर या एस.पी.की भी एक अनिवार्य उपस्थिति होती। उन दो-ढाई घंटों के कार्यक्रम में मंच पर बैठे अधिकारी और सेठों व्‍यवसायियों में ‘अधिकार और कर्तव्‍य’, नैतिकता अनैतिकता’और ‘समभाव’ जैसी स्थितियों पर व्‍यापक चर्चा हो जाती और उनके संबंध दूरगामी परिणामों तक पहुंचते। पांडे अधिकार और कर्तव्‍य के बीच की एक महत्‍वपूर्ण कड़ी होता जा रहा था जिसे नजरअंदाज करना अब शायद ही संभव था। मेरी उन छुटि्टयों का पांडे भरपूर उपयोग करता क्‍योंकि ऐसे भारी विषयों पर बोलने और प्रभावित करने की कला उसके स्‍टॉक में उपलब्‍ध नहीं थी। मैं देखता, मेरे उस दौर के तमाम साथी जो कविता, कहानी, वादविवाद, भाषण आदि में सक्रिय थे, धीरे-धीरे पांडे के बौध्दिक स्‍टॉक का माल बनते जा रहे थे। पांडे मंच से उन लोगों की भरपूर प्रशंसा करता और कार्यक्रम के बाद सबको पांच-सात सौ रुपए भी देता। हम उन्‍हीं रुपयों से खुश थे, हमारी छुटि्टयों का फीकापन उन पांच-सात सौ रुपयों लजीज और जायकेदार हो उठता। बल्कि धीरे-धीरे मैं अपनी छुटि्टयों को प्‍लान ही इस ढंग से करने लगा कि मैं पांडे के कार्यक्रमों में शरीक हो पाऊं।

लेकिन एक बार जब मैं शहर में था, छुटि्टयां खत्‍म हो रही थीं और पांडे का काई कार्यक्रम होता नजर नहीं आ रहा था तो यूं ही हालचाल लेने और उसकी योजनाओं की दरयाफ्त करने उसके घर पहुंच गया। पांडे वैसे ही गर्मजोशी से मिला, लेकिन उसके घर का माहौल  मुझे बड़ा ठंडा-ठंडा सा लगा। उसके पिता नंदकिशोर पांडे अपनी उस शानदार बैठक में बनियान और लुंगी पहने ‘कल्‍याण’ जैसी कोई पत्रिका पढ़ रहे थे, उसका वह बड़ा भाई जो मुझे हमेशा कोट-पैंट और टाई में दिखता था,  पजामा और बनियान पहने भूंजा जैसा कुछ खा रहा था। छोटा सुनील पांडे बाइक साफ कर रहा था। उस घर को इतना सुस्‍त और नीरस और इतने रोजमर्रे से जुड़ा हुआ मैंने पहले कभी नहीं देखा था। मैं सीधे उसके पिताजी के पास चला गया। उनके बैठक में मार्क्‍स की ब्‍लैक एंड व्‍हाइट तस्‍वीर अजीब लग रही थी क्‍योंकि उसकी बगल में ‘आसामराम बापू’ की एक बड़ी-सी रंगीन तस्‍वीर लटक रही थी। नंदकिशोर जी ने नजर उठाकर मुझे देखा और यूं ही पूछा- कहां हो आजकल?

— जी वहीं। बनारस में।

— पापा इस साल रिटायर हो गए हैं। पांडे मेरी परेशानी भांप रहा था।

— तुम आए नहीं धीरज की शादी में। नंदकिशोर जी ने लेटे-लेटे ही कहा। मैंने पहली बार उनके मुंह से धीरज का नाम सुना था, इसके पहले वे हमेशा उसे नेताजी ही पुकारते थे। मैं बताता कि मुझे पता ही कहां था कि शादी हो गई, धीरज मुझे उठाता हुआ बोला – ऊपर चलते हैं।

–जल्‍दबाजी में ही शादी हो गई। मौका ही नहीं लगा किसी को बुलाने का। सीढि़यां चढ़ते जैसे वह सफाई दे रहा था। यार-दोस्‍तों में किसी की शादी नहीं हुई थी इसलिए कैसे बात की जाए, मैं समझ ही नहीं पा रहा था।

धीरज ने ही औपचारिक परिचय सा कराया। ये मेरा दोस्‍त है …….. बनारस में पढ़ता है ……. कवि है …….. आदि आदि। उसकी पत्‍नी की गोद में दो-ढा़ई साल का बच्‍चा था; शायद धीरज के बड़े भाई का लड़का। वह काजू खा रहा था और ज्‍यादा मांगते हुए मचल रहा था। तभी लगभग दनदनाती हुई धीरज की मां कमरे में घुसी और उसने बच्‍चे को झटककर गोद से उतार दिया। उसके हाथ से काजू छीनते हुए बोली- जा। अपनी मां से काजू मांग। मैं इस दृश्‍य से खुद को जोड़ नहीं पा रहा था। उसकी मां धीरज की पत्‍नी के माथे को सहलाती हुई बोली- सब राच्‍छस हैं। तुम अपना खाओ, किसी को कुछ देने की जरुरत नहीं।

धीरज लाचारगी से अपनी मां को देखता हुआ मुझे लेकर नीचे आ गया। मैं अब भी, अभी-अभी देखे दृश्‍य और उसके घर की सुस्‍त रोजमर्रा की स्थितियों के बीच कोई अंतर्संबंध ढूंढने की कोशिश कर रहा था। तब तक ऊपर से चक-चक, चिख-चिख की आवाज़े आने लगीं। उस बच्‍चे की मां ने शायद अपने बच्‍चे को पीटना शुरु कर दिया था—और जाएगा महारानी के कमरे में। धीरज की मां की भी चीखने की आवाजे़ं आ रही थीं – हां, अब अपना-अपना देखो। बहुत हो गया कोल्‍हू के बैल की तरह मेरा बेटा खटे और सब बाबू मिलकर मौज उड़ाएं।

अब मेरे देखे दृश्‍य का सही बैकग्राउंड म्‍यूजिक बज रहा था।

पांडे अपने घर के इस दृश्‍यबंध से खासा विचलित दिखा। एक अफसोस करती-सी उसकी आह निकली –रोज का नाटक हो गया है। पिताजी के रिटायरमेंट के बाद पता नहीं मां ऐसा क्‍यों बिहेव करने लगी है?

मैं उसकी पारिवारिक स्थितियों के बारे में यह सब बिल्‍कुल नहीं जानता था। मैंने जब भी उसके परिवार के सदस्‍यों को देखा था तो वे एकदम टीप-टाप, चाक-चौबंद और इतिहास,समाजशास्‍त्र की आंख पर पट्टी बांधकर अर्थशास्‍त्र को साधने को आतुर ही दिखे। यह कोई भिन्‍न किस्‍म का परिवारशास्‍त्र था जो आज तक मेरे संवेदनात्‍मक ज्ञान से बाहर था।

छोटा भाई सुनील बाइक स्‍टार्ट कर ज्‍यों ही गुजरने को हुआ, ऊपर बालकनी से एक कर्कश आवाज़ सुनाई दी- ऐ लाट साहब ! गाड़ी क्‍या आपके ससुर की है …. लगाइए नीचे। अभी जाना है इनको बाहर।

इस अयाचित परिवारशास्‍त्र के कारण ही सही, पांडे अपनी ऊंचाई से कुछ गिरता-सा लगा, यह महसूस करते ही मैं एक हिंसक पुलक से भर उठा। लेकिन पांडे को शायद अभी कुछ और देखना था, बल्कि यूं कहें कि मुझे उस दृश्‍य को देखते हुए देखना था। छोटा भाई सुनील बाइक स्‍टार्ट कर ज्‍यों ही गुजरने को हुआ, ऊपर बालकनी से एक कर्कश आवाज़ सुनाई दी- ऐ लाट साहब ! गाड़ी क्‍या आपके ससुर की है …. लगाइए नीचे। अभी जाना है इनको बाहर। मैंने ऊपर देखा- यह कर्कश आवाज़ धीरज की भाभी की थी। वह शायद ‘अपना-अपना देखा’ का माकूल जवाब दे रही थी। मैंने लक्ष्‍य किया, यह बाइक जरुर वह अपने दहेज में लाई होगी। मैंने यह भी देखा कि धीरज का बड़ा भाई जो भैंगा था, उसकी बगल में अपने बच्‍चे को गोद में लिए खड़ा था, वह निश्‍चय ही सुनील को देख रहा था जबकि मैंने अपनी नजरें झुका लीं।

सुनील ने एक झटके से बाइक रोकी और स्‍टैंड पर लगा उसे जोरदार लात दे मारी। ऊपर से चीखने और शाप देने का जैसे दौरा पड़ गया था। आसपास के घरों से भी कई लोग बाहर निकल आए थे।

धीरज इस समूचे घटनाक्रम में खम्‍भे की तरह खड़ा था, उससे कुछ भी बोलते नहीं बन रहा था ….. उसे यूं परेशान देखकर मुझे उससे दोस्‍ताना जैसा महसूस हो रहा था। मैंने यूं ही उसके कंधे पर हाथ रखकर उसे सड़क की तरफ खींचता हुआ बोला-तब आजकल कौन सी योजनाएं चल रही हैं? कोई नया कार्यक्रम?

मैं सायास उस डल लैंडस्‍केप को पोंछ देना चाहता था।

–नहीं, अभी कोई कार्यक्रम तो नहीं है। पांडे अपनी आदत के विप‍रीत धीरे-धीरे बोल रहा था- दरअसल इस प्‍लान में अब सेचुरेशन आ गया है। हॉल भरना तक मुश्किल है। फिलहाल तो वही सम्‍मान-पुरस्‍कार वाला बिजनेस ही …। कहते-कहते  वह रुक गया।

–उसमें सेचुरेशन नहीं आया है? आखिर सब तो अब तक ‘रत्‍न’ बन ही चुके होंगे।

— नहीं यह तो संक्रामक है। कोई भी समान धंधे का आदमी दूसरे के नाम के आगे रत्‍न देखना जल्‍दी गंवारा नहीं करता। वह स्‍वयं भी रत्‍न होना चाहता है। अभी तो इतने छोटे-छोटे कस्‍बों में लोगों के पास इतना रुपया है …..। वह धीरे-धीरे रौ में आता जा रहा था – लेकिन मैं अभी कुछ और सोच रहा हूं …. वह क्‍या सोच रहा है? पूछने पर उसने नया जैसा कुछ नहीं बताया। उसका सोचना था कि सम्‍मान, पुरस्‍कार वाला बिजनेस छोटा सुनील अब अच्‍छी तरह चला लेता है। वह स्‍वयं कोई जमीन खरीदने के बारे में सोच रहा था जहां उसकी योजना स्‍माल स्‍केल की कोई इंडस्‍ट्री लगाने की है।

उसकी योजना सुनकर मुझे थोड़ी हंसी आई। अब तक के उसके सारे बिजनेस हवा में उड़ने के थे, हवाई थे, अब वह सीधे जमीन की बात कर रहा था। मैंने परिहास में उससे कहा भी-इतनी ऊंचाई से सीधे जमीन पर लैंड कर रहे हो, सावधानी से उतरना ; सावधानी हटी …… दुर्घटना घटी।

–शादी के बाद सबको जमीन पर आना पड़ता है। मैं समझ रहा था, वह यह हंसकर कहेगा – कहा उसने यही, लेकिन संजीदा होकर।

उस दौर की मेरी छुटि्टयां लम्‍बी थीं और शहर में करने को कुछ नहीं था। मैं उस दौरान तीन-चार बार धीरज के यहां गया। अपने परिवार की गुत्थियों में धीरज हर बार मुझे कुछ झुका-सा नजर आया। वह जितना ज्‍यादा झुकता दिखता मुझे उससे और नजदीकी महसूस होती। आखिर देवताओं के दुःख भी हम मनुष्‍यों जैसे ही होते हैं। अपने दुःख में वह मनुष्‍यों की वाणी में ही कभी-कभी मुझे अपनी पीड़ा भी बता जाता-पिताजी के रिटायरमेंट का सारा पैसा तो घर बनाने में पहले ही चला गया। एक बहन की शादी की। एक की अभी होनी है …… ऊपर से महिलाओं की ये किच-किच।

मैं जितना उसके दुःखों को जानता जा रहा था, उतना ही मैं चीख-चीखकर दुनिया को बताना चाहता था- देखो, अपने बच्‍चों को पांडे का ताना मारने वालो ! नेताजी निवास की नींव के खोखलेपन की आवाज़ को सुनो। मैं चीखकर पांडे से भी कहना चाहता था – दुनिया में किसी भी तरह ऊंचा उठ जाने की कोशिशों से कोई ऊंचाई नहीं छू लेता, जितना वह ऊपर जाता हुआ दिखता है, उसके पैर उतने ही कीचड़ में धंस रहे होते हैं। जीवन का गणित भी ज्‍यामिति के गणित से अलग नहीं होता। ऊंचाई और निचाई मापने का फार्मूला एक ही होता है मेरे भाई।

लेकिन मैंने कहा कुछ नहीं, मैं चुपचाप उसकी परेशानियों और भविष्‍य में किसी अनहोनी की पदचाप को सुनने की कोशिश करता हुआ अपनी छुटि्टयां उसके साथ काटता रहा। छुटि्टयों के बाद मैं वापस बनारस लौट आया। पांडे की कार्यक्रम श्रृंखला बंद होने के बाद वैसे भी अपने शहर जाने में मेरी दिलचस्‍पी कम होती गई। मैं धीरे-धीरे सांड़, सीढ़ी संन्‍यासियों में रमने लगा। जिन्‍दगी का अपार सूखा पाट मेरे सामने था, उस सूखेपन को हरा कर सकने लायक संसाधन मेरे शहर में नहीं के बराबर थे, मुझे आगे ही जाना था- दिल्‍ली, बम्‍बई या कहीं और…..बाहर रहते मुझे पांच साल हो गए और पांच बातें भी ऐसी मेरी जिंदगी में नहीं थीं, जिन्‍हें मैं अपने घरवालों या अपने शहर के दोस्‍तों को बता पाता। घर पर फोन करके हालचाल बता पाने लायक स्थिति भी पहुंच से दूर होती जा रही थी। ऐसे में यूं ही जब एक दिन घर फोन किया तो मम्‍मी ने हालचाल जानने के बाद एक निस्‍संग तटस्‍थ-सी जानकारी दी-धीरज को जानते थे न तुम?

–कौन धीरज? धीरज पांडे? एक आशंका मेरे मन में कौंध गई।

— हां वही पांडे। उसकी हत्‍या हो गई।

— कब? कैसे? किसने? मैं जैसे काठ का हो गया था।

— कई तरह की बातें हैं …… कभी आना तो बताऊंगी….। मम्‍मी को क्‍या पता कि धीरज मेरा कौन था? मेरा कितना गहरा नाता था उससे?

पांडे चाहे जैसा भी रहा हो, मेरा दोस्‍त था। अब कभी मैं उसकी जालिम हंसी से नहीं चिढ़ पाऊंगा, कभी उसके पंजे के दबाव से अपने कंधे छुडांने की कोशिश नहीं कर पाऊंगा …. मैं उसे अब कभी नहीं देख पाऊंगा, यह महसूस करते ही मैं देर तक अपने कमरे में हिचकियां लेता रहा। मैं होश संभालने के बाद कभी नहीं रोया था। सही ढंग से रोने की कोशिश में मैं देर तक विचित्र किस्‍म की आवाजे़ निकालकर हिलकता रहा।

आखिर किसने मार डाला पांडे को? जाहिर है, मेरे शहर में उसकी कामयाबियों से जलने वालों की संख्‍या कम न रही होगी, लेकिन सिर्फ किसी की कामयाबी से कोई किसी को मार नहीं डालता। मैं इस सूचना के लगभग पंद्रह दिनों बाद यानि पांडे की हत्‍या के लगभग डेढ़ महीने बाद अपने शहर पहुंच पाया। शहर के अखबारों में अब भी उसकी हत्‍या की गुत्‍थी को लेकर अटकलें जारी थीं। अब तक हमारे शहर में दैनिक अखबारों के सांध्‍य संस्‍करण भी निकलने लगे थे जिसमें सच्‍ची घटनाओं पर आधारित सनसनीखेज उत्तेजक कहानियां कोई खबरीलाल लिखता था। उन अखबारों में काल्‍पनिक नामों के साथ एक सत्‍यकथा शास्‍त्री नगर मुहल्‍ले की भी थी। स्‍पष्‍ट तौर पर वह पांडे की ही कहानी थी, जिसमें धीरज की पत्‍नी और उसके छोटे भाई सुनील अवैध संबंधों के कारण बड़े भाई की हत्‍या का जिक्र था। अखबार के मेरे पुराने मित्र भी यही सेफ लाइन लेकर चल रहे थे। पुलिस ने सुनील पांडे के बयान के आधार पर उसके किरायेदार संतू रजक जो लॉण्‍ड्री का काम करता था, को गिरफ्तार किया था। सुनील के मुताबिक वह अपराधी चरित्र का था और अक्‍सर ‘गुंडा टैक्‍स’ मांगा करता था। उसकी धमकी को गंभीरता से नहीं लेने के कारण ही उसने घर के बाहर घात लगाकर पीछे से धीरज के सिर में गोली मार दी और अंधेरे का फायदा उठाकर फरार हो गया। कोई किरायेदार जो लॉण्‍ड्री का काम करता हो, अपने को मकान मालिक से गुंडा टैक्‍स मांगे और न देने पर उसकी हत्‍या कर दे, यह बात किसी के गले नहीं उतर सकती थी। पुलिस को इस लचर –सी कहानी पर यकीन करने के लिए नोटों के कितने बंडल अपने दिमाग में ठूंसने पड़े होंगे, यह भी किसी से नहीं छुपा था।

मेरी एक बुआ जिन्‍हें मैं नहीं जानता था, जो पांडे के बगल के मुहल्‍ले में रहती थीं, के हवाले से मेरी मम्‍मी ने बताया कि घर की आपसी रंजिश में ही पांडे की हत्‍या हुई। आपसी रंजिश का कारण मम्‍मी ने किसी जमीन की बड़ी डील के बारे में बताया जो पांडे ने अपनी पत्‍नी के नाम से खरीदी थी। मम्‍मी की बात पर यकीन करने का जी चाहा क्‍योंकि अपनी  आखिरी मुलाकात में पांडे ने भी जमीन खरीदने की योजना का जिक्र किया था। कवि  गोष्ठियों के दिनों के मित्र नवीन अग्रवाल ने भी अपनी शंका कुछ इसी बिन्‍दु पर जाहिर की थी। उसके अनुसार पांडे ने कुछ दिन पहले हमारे शहर की कम्‍पनी के एक नए ब्रांच के कुछ शेयर खरीदे थे। चूंकि नवीन कामर्स का विद्यार्थी था और एक सी.ए. के अधीन अकाउंटेंसी का कोई काम भी सीखता था, और उस समय तक हमारे शहर में शेयर मार्केट जैसी कोई चीज नहीं थी इसलिए वह नवीन को अपने शेयर के कागजात दिखाने अपने घर ले गया था। नवीन के अनुसार उस दिन पांडे के पिताजी अपनी बैठक में रामचरित मानस का पाठ कर रहे थे और काफी देर तक नवीन को मानस में वर्णित परिवार की एकता का महत्‍व समझाते रहे थे। नवीन के अनुसार वे उसे नहीं, शायद पांडे को समझा रहे थे कि दुर्बल होने के बावजूद राम ने अपने भाइयों की सहायता से रावण पर  विजय प्राप्‍त की। रावण कितना भी शक्तिशाली क्‍यों न रहा हो, भाइयों को मिलाकर नहीं रख पाने के कारण ही मारा गया।

मैं नवीन को साथ लेकर जब दुःख प्रकट करने पांडे के घर ‘नेताजी निवास’ पहुंचा तो वहां जैसे दुःख जड़ों में बैठ चुका था। एक आम रोजमर्रा का-सा वातावरण फैला था जिसमें शोक या दुःख की कोई गर्द बाकी नहीं थी। हम लोग सीधे बैठक में गए जहां अब मार्क्‍स और ‘आसाराम बापू’ की बगल में धीरज पांडे की भी बड़ी-सी मुस्‍कुराती तस्‍वीर लगी थी, वही जालिम मुस्‍कुराहट वाली तस्‍वीर।नंदकिशोर जी तख्‍त पर लेटे हुए ‘वचनामृत’ जैसा कुछ पढ़ रहे थे। हमें देखकर वे लाचारगी से मुस्‍कुराये और बैठने का इशारा कर पुनः वचनामृत में डूब गए। सुनील पांडे हमारे आने की खबर सुनकर नीचे आया और उजबक की तरह बैठा रहा। उससे हम लोगों का ज्‍यादा परिचय भी नहीं था। थोड़ी देर बाद वह खुद ही कहने लगा- हम लोगों को तो लगा ही नहीं है कि नेताजी अब हमारे बीच नहीं रहे। लगता है जैसे अभी कहीं से लौटने वाले हों। अब तो उनका दिखाया मार्ग है ……. बस उसी पर चलना है। उसके बनावटी व्‍याख्‍यान से जरा भी नहीं लगा कि वह अपने बड़े भाई की मृत्‍यु पर कुछ कह रहा हो और वह भी घर में बैठकर।

मैं उसे लेकर बैठक से बाहर आ गया। ‘कैसे और क्‍यों हुआ’ पूछने पर जो उसने बताया, उससे मेरा मन उसका मुंह नोचने को हो आया। क्‍या वाकई रजक ने गुंडा टैक्‍स के लिए ….. मैंने जानना चाहा तो उसने मेरा हाथ पकड़ एकांत में खींचते हुए कहा—मारा तो रजक ने ही है, लेकिन बात दूसरी है, किसी से कहना नहीं …

मैं चौकन्‍ना हो गया। यह क्‍या नई मिस्‍ट्री सुनाने वाला है …..

–देखो पुलिस को भी हमने सच्‍ची बात बता दी है, लेकिन लड़की का मामला है वो भी शादीशुदा इ‍सलिए पुलिस हम लोगों का फेवर कर रही है।

मैं आशंकित हो उठा – तो क्‍या धीरज की पत्‍नी ….

— नहीं …… नहीं …… भाभी तो कोमा में हैं। चंदा …… चंदा मेरी बहन को तो जानते हो न, जिसकी पिछले साल शादी हुई थी ……..

मैं वाकई चंदा को नहीं जानता था।

— तो यह संतू रजक चंदा का आशिक था। चंदा भी …. तुम तो जानते हो नाजुक उमर का मामला, उससे फंस गई थी। हम सबको यह बात पता थी इसलिए भाई और हम सबने मिलकर उसकी शादी जल्‍दीबाजी में कर दी।

— रजक को लगता था कि नेताजी के कारण ही चंदा की शादी उससे नहीं हो पायी। जब भी हम उसकी लॉण्‍ड्री से गुजरते तो उसे लगता जैसे हम उसे चिढ़ाने के लिए वहां से गुजरे हों। उसकी खुन्‍नस बढ़ती गई और अंततः एक दिन घात लगाकर… उसने बात अधूरी छोड़ दी।

— तुम लोग कहां थे उस समय ? मैंने पूछा।

— अरे हम दोनों तो साथ ही लौटे थे। मैं बाइक से उतरकर ऊपर चला गया और भाई नीचे बाइक लगा रहा था …… तभी ……..

मैंने पूछना चाहा कि बाइक तो हमेशा तुम चलाते थे, तो उस दिन ….. लेकिन मैं चुप रहा।

हम लोग ऊपर धीरज की मम्‍मी से मिलने गए। वह हमें देखते ही पछाड़ खाकर गिर पड़ी। उनकी करुण रुलाई के जवाब में हम अबोले ही बने रहे। मैं चूंकि एक बार पहले रो चुका था इसलिए दुबारा रोना चाहकर भी संभव नहीं था

हम लोग ऊपर धीरज की मम्‍मी से मिलने गए। वह हमें देखते ही पछाड़ खाकर गिर पड़ी। उनकी करुण रुलाई के जवाब में हम अबोले ही बने रहे। मैं चूंकि एक बार पहले रो चुका था इसलिए दुबारा रोना चाहकर भी संभव नहीं था। वो बड़ी अजीब आवाज़ में रोते हुए चिल्‍ला रही थी कि उनका बेटा चला गया। लेकिन शायद वह यह भी कह रही थी कि उसका बदला लेना है। सुनील उन्‍हें पकड़कर चुप करा रहा था, लेकिन वे बार-बार उसकी पकड़ से छूटकर हम पर गिरती—बाबू ! तुम लोग दोस्‍त थे उसके।उसको मारा है हरामियों ने, उसका बदला लेना तुम लोग।

मैं समझ नहीं पाया था या संभवतः समझ भी गया था कि वह हरामी किसे कह रही थी?

घर आकर जब मैंने अपनी मम्‍मी को बताया कि धीरज की मम्‍मी किस तरह रो रही थीं तो वह भी रोने लगी। लेकिन जब मैंने उसे बताया कि वह मुझसे उसकी हत्‍या का बदला लेने के लिए कह रही थी तो वह झटपट चुप हो गई। अपने आंसू फट से पोंछते हुए उसने कहा—तुम क्‍यों लोगे बदला? उसके अपने भाई नहीं हैं क्‍या?

— कौन भाई मम्‍मी … मैंने पूछना चाहा ….. लेकिन तब तक मम्‍मी शायद कुछ ताड़ गई थी और तेजी से अंदर चली गई।

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