षोडशी की षोडशोपचार उपासना ७

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माँ शारदा के जीवन को केंद्र में रखते हुए अम्बर पांडेय माँमुनि उपन्यास लिख रहे हैं. फेसबुक पर सर्वाधिक पसंद की जाने वाली कुछेक रचनाओं में से एक, माँमुनि पिछले छः दिनों से सौतुक के माध्यम से आप को  उपलब्ध कराई जा रही है. आपको मालूम है कि यह पूरे नवरात्रि चलने वाला है. इसी क्रम में आज नवरात्रि के सातवें दिन प्रस्तुत है…

अम्बर पांडेय

रामाधीन केवट मुखोपाध्याय जी की बात सुनकर रोने लगा, “यह कैसी ममता मेरे माथे चढ़ गई। ऐसा तो कभी मेरे संग हुआ नहीं। देवी, तू क्या मरने के लिए ही मेरी कुटी में आई है”।

मुखोपाध्याय जी शारदा के तलवे अपनी हथेलियों से मसल रहे थे। रामाधीन केवट डिबरी शारदा के शीश के निकट रखे, बार बार शारदा की पुतलियाँ देख रहा था, “चकोर की नाईं आँखें एकटक छज्जे को देख रही है।”

“प्राण अब भी ह्रदय में धड़क रहा है। ब्रह्ममुहूर्त तक टिक जाए सम्भवतया मेरी बिटिया” कहकर मुखोपाध्याय जी फूट फूटकर रोने लगे।

काँचीपुरम के विशुद्ध रेशम की लाल-सुनहली किनोरवाली गहन नीली साड़ी पहनकर केवट की कुटिया के भीतर एक घनश्याम वर्णा स्त्री चली आई। शारदा ने देखा वह प्रौढ़ा अपूर्वसुन्दरी थी। नासिका के दोनों ओर वह बड़े बड़े हीरों की बेसर पहनी हुई थी और कण्ठ में मूँगे-वैजयन्ती की लड़। केशों को उसने बहुत सुगन्धमयी तैल में रचाकर जूड़े में बाँधा था और उसमें लंकादेश में बहुतायत होनेवाला नीला पद्म लगा लिया था। लाल जवाकुसुमों की घुटनों तक लटकती माला का एक पुष्प न मुरझाया था।

शारदा उठकर बैठ गई और उस श्यामा की माला परखने लगी। जवा तो जंबूद्वीप में बहुत होते है किन्तु उसमें ऐसे बृहद, दिव्य फूल कहाँ लगते है! श्यामा ने शारदा का मुख चिबुक से उठाकर कहा, “मुझे रक्तवर्ण वस्तुएँ बहुत प्रिय है, ठाकुरमणि।”

“तुम इतनी रात गए कहाँ से आ गयी?” शारदा ने सहसा अनुभव किया बहुत रात की बेला थी और उसके पिता और वह बलिष्ठ देहवाला व्यक्ति उसके निकट मुख झुकाए मूर्तिवत बैठे हुए थे।

“मैं दक्षिणेश्वर से आ रही हूँ। वर्षा, तिमिर, पंक और काल लाँघती यहाँ पहुँची हूँ” श्यामा का स्वर मधुर और गम्भीर दोनों था जैसे कृषक को भादों की वर्षा का स्वर लगता है; रूप ऐसा गाढ़ा श्याम जैसे कृषक की गृहिणी को ज्येष्ठांत के मेघ दिखाई देते है।

दक्षिणेश्वर सुनकर तो शारदा के लोम खड़े हो गए, लगता था पूरी देह कर्णमयी हो गई हो, वह श्यामा रमणी के नयनों में नयन डालकर कहने लगी, “मुझे भी जाना था दक्षिणेश्वर। मेरे स्वामी वहीं रहते है। अब नहीं जा पाऊँगी। उनके हाथो दाघ मिले अब यही कामना शेष है। सधवा चिता चढ़ने से बढ़कर और कौन सा सुख है!” शारदा के नयनकोरों पर मौन दो आँसू आकर ठहर गए।

“चल हट, पगली। सधवा-विधवा, कुमारी-लम्पटा सब मेरे ही रूप है। तू दक्षिणेश्वर पहुँच जाएगी पड़वा तक। तेरे लिए ही तो उस पगले को वहाँ छोड़ आई हूँ। क्या माँगेगी नहीं कुछ अपनी माँमुनि से! कोपवती होकर लेटी है, जा, तू सनातन सधवा होगी” कहकर श्यामा ने शारदा के निकट सेंदूर और दूसरे मंगलों से भरी सुहागपिटारी धरी और अपने स्थान से उठ खड़ी हुई। शारदा श्यामा की पीठ निहारती रही। एलोकेशी के पीठ पर फैले सुगन्धित मुक्तकेश, जो अभी अभी बँधे थे और अब मुक्त हैं।

शारदा उठ बैठी और कहा, “पिताजी मछली खाऊँगी भात के संग”। शारदा अपने शब्द सुनकर ही लज्जित हो गई। हाय राम, यह मेरी क्या दशा हो गई ठाकुर के कारण, कल गंगास्नान के बहाने अपने स्वामी के घर आने की पिताजी को कहते मैं न लजाई और आज आधी रात को पिताजी से मछली और भात माँग रही हूँ। यह मैं पाप कर रही हूँ या ऐसी सुधबुध खोकर भगवान मुझे मेरे पापों का दण्ड दे रहा है।

रामाधीन केवट खड़ा होकर नाचने लगा। मटकते हाथ की डिबरी की झुलती ज्योति के कारण छायाएँ भी नन्दभाव से नाचने लगी

रामाधीन केवट खड़ा होकर नाचने लगा। मटकते हाथ की डिबरी की झुलती ज्योति के कारण छायाएँ भी नन्दभाव से नाचने लगी। मुखोपाध्याय जी भी बालकों की भाँति ताली बजा बजाकर कहने लगे, “मेरी खेमनकरी का ज्वर उतर गया मेरी खेमनकरी का ज्वर उतर गया”।

शारदा को अचानक अनुभव हुआ वह बहुत गाढ़ निद्रा से उठी है। उससे पूर्व उसे किसी अदृष्टपूर्व श्याम रूपसि के स्वप्नदर्शन हुए थे।सुहागपिटारी, जवाकुसुम की माला और केशों की दिव्य सुगन्ध सब यों शारदा की इंद्रियों में अब भी स्पंदित थे वैसे तो जागरित अवस्था में भी नहीं होते। शारदा का हाथ अपने केशों पर गया तब उसने अनुभव किया वहाँ सेंदूर ही सेंदूर भरा था।

यदि दक्षिणेश्वर के कालीमण्डप तक नौका जाती तो रामाधीन केवट और उसकी स्त्री पद्मा शारदा को छोड़ने वहाँ तक नौका खेते जाते। “तुम्हें केवट होकर भी पार छोड़ने की इच्छा नहीं होती, माँ” रामाधीन केवट ने शारदा से कहा। उजाला हो चुका था और मुखोपाध्याय जी और शारदा यात्रा पर निकलने के लिए कुटी से बाहर खड़े थे।

“हाँ, तुम्हें नौका सरीखी बाँधकर रखना चाहते है, तुम्हारे केवटमामा” पद्मा ने परिहास किया।

शारदा पद्मा के गले लग गई। पद्मा भी गई रात्रि स्वप्न में आई श्यामा की भाँति गाढ़कृष्ण वर्ण की थी; केवल हृदय पर जवाकुसुम की माला नहीं पहने थे। पद्मा ने अपनी कलाई से उतारकर लौह वलय शारदा के हाथ में पहना दिया और पीठ फेरकर खड़ी हो गई। शारदा को जाते देख रूलाई रोक नहीं सकती थी किन्तु रोना भी नहीं चाहती थी।

रामाधीन केवट नाव खेता वैष्णवसहजियों का पद शारदा और मुखोपाध्याय जी को सुनाने लगा,

‘नामसंकीर्तन तो तब करती जब वह त्रिभंगीरूप
मेरे पीछे पागल न होता
कितनी बेला उसे समझाया कि
मेरी जमी-जमाई गृहस्थी है।
बलिष्ठ स्वामी और ढेर बालक है
मेरे घर गाय-घोड़े, तोता है, आँगन में सोती हूँ
तो चन्द्रमा भी दिखता है
किन्तु उसे समझाते समझाते मैं ही
उसकी बात में आ गई

उसने सहस्रचन्द्र दिखाने का लालच दिया
और मैं कुल की मर्यादा छोड़
उसके पीछे पीछे गई केले के वन में

अब मेरे पति मेरे वस्त्र उठाकर उठाकर
बीती रात्रि के चिह्न देखते है
उन्हें क्या पता शरीर मन के अधीन है
और मैं वह मन वहीं छोड़ आई

निर्लज्ज परकीया मैं,
पति का पीटना भी सुहाता है
ऐसे तप से रात्रि उससे मिलने को
मेरा शृंगार जाता है’

उधर श्रीराधासखी के रूप में ठाकुर ने दिनों से कुछ खाया-पिया नहीं। हृदयराम उनके लोचनों में अंजन लगा रहा है किन्तु ठाकुर मूर्च्छित है। उन्हें कोई समाचार नहीं, चेतन होते ही कभी तिमिर को देख कभी मेघ को और कभी अपने चरणों में पड़े बिछुवे की ध्वनि सुन वह पुनः महाभाव में लौट जाते है।

हृदय चन्द्रामणिदेवी से कहता है, “नानी, शरीर कर्पूर की सुगन्ध जितना भारहीन हो गया है। हाथ भी टूट गया। यदि आज संध्या तक कुछ नहीं खाया तो मामा जीवित न बचेंगे।”

“मेरे कालू कंत ने मुझे बहुत क्लेश दिया रे। माँ नचाती है तो भी ममता है उसमें; बीच बीच में विश्राम भी देती है किन्तु ये केष्टो तो परमदुष्ट है, नितान्त निर्दय है” बीच बीच में अल्पकाल को चेतन होकर ठाकुर कहते है।

(क्रमशः जारी..)

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