व्यंग्य: पटेल की मूर्ति और गर्व करने का संघर्ष

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उमंग कुमार/

मुझे गर्व करना था। सरकार ने कहा था। सरदार पटेल की मूर्ति के उद्घाटन के साथ दुनिया की सबसे ऊंची मूर्ति का रिकॉर्ड अब भारत के नाम हो गया था। ऐसा अखबारों में छपा था।

हमने किसी को चित किया था और अब इस उपलब्धि पर गर्व करना था। किसको चित किया था यह मुझे नहीं मालूम था। अखबार ने ही बताया कि पटखनी खाने वाले का नाम चीन है। सबसे ऊंची मूर्ति वहीं थी और अब यह उपलब्धि भारत के नाम हो गई है।

मैं सोच में पड़ गया कि आखिर ये गर्व कैसे महसूस किया जाता है! इसके पहले मुझे कभी गर्व करने के लिए नहीं कहा गया था। मैंने किया भी नहीं था। मुझसे हमेशा पढ़ाई करने और नौकरी करने के लिए कहा गया था। हो सकता है बचपन में कहा गया हो, पर मुझे याद नहीं। पढ़ाई और नौकरी का शोर इतना ज्यादा था कि और कुछ सुनाई नहीं पड़ा। नौकरी शुरू होने के बाद तो अब गर्व जैसा कुछ सोचने का सवाल ही नहीं उठता। नौकरी कैसे बची रहे, यही सोचते हुए सारा समय निकल जाता है।

लेकिन सरकार का फरमान था कि मुझे गर्व महसूस करना चाहिए। मैंने अगल-बगल देखा कि इस फरमान के बाद क्या कुछ बदला है। पर मुझे चारों तरफ सबकुछ वैसा ही नज़र आया जैसा कि 31 अक्टूबर के पहले था। वही दीवारें सीलन भरी, वही खूंटी पर टंगे गंदे कपड़े। कई दिनों से धोया नहीं था। रात में खाकर बर्तन नहीं धोया था तो वहां भी वही चिर-परिचित गंदगी दिख रही थी। बाहर से बाल्टी भर पानी लाना होगा तब जाकर बर्तन धुलेगा।

लेकिन ये सब करने से पहले मुझे गर्व महसूस करना था। मैं असमंजस में था। मैंने अपनी आंखें बंद की और लंबी सांस लेते हुए दो बार मन ही मन गर्व, गर्व बोला। मुझे अब थोड़ा-थोड़ा गर्व महसूस होने लगा था। अखबारों में विज्ञापन के माध्यम से सरकार ने इसे ही महसूस करने के लिए कहा था।

फिर भी मन में संदेह था, तो सोचा बाहर निकल कर देखूं कि बाकी लोग कैसे ‘गर्व’ महसूस कर रहे हैं।

घर से निकलकर जैसे ही चौराहे पर पहुंचा तो पाया कि वहां भी सबकुछ वैसा ही है जैसा कल था। टेम्पो वाले लोगों का इंतजार कर रहे हैं। टूटी सड़क पर एक रिक्शा वाला एक महिला को लिए जा रहा है। वह महिला कह रही थी, “भईया थोड़ा आराम से चलो”। नौकरी के लिए फॉर्म बेच रहे दूकान पर पहले जैसे ही भीड़ थी। युवा फॉर्म खरीद रहे थे। कुछ तो परेशान थे कि आजकल सरकार कोई भर्ती भी नहीं निकालती है। कुछ युवा पैसा नहीं खर्च करना चाहते थे तो उन्होंने रोजगार समाचार वहीं खोल कर पढ़ना चाहा। इसपर दुकानदार बिदक गया। वे दोनों युवक खींखीं करते हुए उस दुकान से चले गए।

इनको देखकर मुझे कहीं से कोई अंतर महसूस नहीं हुआ। मुझे लगा कि कैसे युवा हैं भाई! आज जब इनको देश की एक उपलब्धि पर गर्व करना चाहिए, तो ये क्या कर रहे हैं। कम से कम आज तो अपनी बेरोजगारी का प्रदर्शन नहीं करते। आज थोड़ा गर्व महसूस करने में समय देते।

मुझे अपनी याद आई और मैंने एक बार फिर अपने गर्व को टटोला। ऐसे कि किसी को पता न चले। मैंने महसूस किया कि मेरा गर्व अभी भी वैसा ही था, जस का तस। जैसा सरकार के चाहने पर मैंने महसूस किया था। एकदम से महसूस होता हुआ।

मैं थोड़ा आगे बढ़ा यह सोचते हुए कि युवा हैं, इनको इतनी गंभीरता से नहीं लिया जाना चाहिए। पलटू चाचा के चाय की दूकान पर पहुंचा। मन में था कि चाय पीते हुए वहां के लोगों का मुआयना करूंगा कि उनको गर्व महसूस हो रहा है कि नहीं!

संयोग देखिये कि वहां पटेल की ‘ऊंची मूर्ति’ पर ही बात हो रही थी। कुछ लोग बता रहे थे कि इस ऊंची मूर्ति पर गर्व किया जाना चाहिए। मैं खुश था क्योंकि मुझे पहले से ही गर्व महसूस हो रहा था। अगर मुझसे कोई पूछता तो मैं सीधा बोल देता कि भईया मैं तो महसूस कर रहा हूं।

लेकिन उन्होंने मुझसे नहीं पूछा। उनके पास सबसे पूछने का समय नहीं था। जो सामने था उसी को घेरे हुए थे। गर्व करने के विरोध में एक पतला-दुबला जवान बोल रहा था। देश की व्यवस्था और संस्थाएं चौपट हो रही हैं। भ्रष्टाचार की जांच करने वाली सीबीआई खुद भ्रष्टाचार की शिकार हो गई है, देश का सबसे बड़ा बैंक सरकार से हस्तक्षेप नहीं करने को कह रहा है, कितने सरकारी बैंक बर्बाद होने की कगार पर पहुंच गए हैं, अमीर लोग देश को अरबों-खरबों का चूना लगाकर भाग रहे हैं और सरकार उनको रोक नहीं पा रही है, शेयर बाज़ार गिरता ही जा रहा है, डॉलर के मुकाबले रुपये की हालत पतली होती जा रही है, डीजल-पेट्रोल के दाम आसमान छू रहे हैं,  रेल हादसे में हजारों लोग मारे जा चुके हैं, पंजाब में रावण दहन के दिन करीब सौ लोग रेल के नीचे आ गए। इसका तो अभी पखवाड़ा भी नहीं गुजरा, ऐसे में आदमी इसपर गर्व करे कि एक ऊंची मूर्ति बना ली है। वह भी तीन हजार करोड़ खर्च कर के!

यह सब बोलकर वह आदमी थोड़ा समझदार दिखने की कोशिश कर रहा था। मुझे लगा कि वह आदमी आयं-बायं कुछ भी बोले जा रहा है।

मैंने धीरे से कहा कि भाई इसी ‘गर्व’ के लिए सरकार ने करीब तीन हजार करोड़ रुपये फूंक दिए और अगर आपने गर्व भी नहीं किया तो सारा पैसा पानी में चला जाएगा

मैंने धीरे से कहा कि भाई इसी ‘गर्व’ के लिए सरकार ने करीब तीन हजार करोड़ रुपये फूंक दिए और अगर आपने गर्व भी नहीं किया तो सारा पैसा पानी में चला जाएगा। मैं उसे समझाना चाह रहा था कि यह कोई छोटी मोटी रकम तो है नहीं। अगर इतना पैसा खर्च हुआ है तो कुछ तो फायदा होना ही चाहिए। कुछ नहीं तो ‘गर्व’ ही सही।

“मैं भी तो यही कहना चाह रहा हूं”, उस लड़के ने अपनी बात को आगे बढ़ाते हुए कहना जारी रखा। “सरकार चाहती तो इस पैसे से क्या-क्या नहीं हो जाता। साढ़े चार सौ करोड़ में मंगलयान भेज दिया। कहते हैं कि इतने पैसे में कम से कम चार आईआईटी खुल जाते। मोदी जी ने सारी गर्भवती महिलाओं को 6 हजार रुपये की मदद करने का वादा किया था। बाद में पैसे की कमी दिखाकर आज सिर्फ पहले बच्चे के समय ही मां को मदद दी जाती है। इस पैसे से कितनी माओं को पोषण सुरक्षा मिल सकती थी। ब्ला.. ब्ला.. ब्ला..”

वहां बैठे बाकी लोग अब थोड़ा परेशान हो रहे थे। उनका कहना था कि पहले ‘गर्व’ बाद में यह सब। उसमें से एक बोला कि यह सब पहले से चलता आ रहा है और आगे भी चलता रहेगा। लेकिन पहली बार हमलोगों ने चीन को किसी मामले में पछाड़ा है, यह क्यों नहीं दिख रहा है।

मुझे भी उसकी बात में दम लगा कि यार ये तो सही है। सरकार ने चीन को पछाड़ने के लिए ही तो इतना कष्ट उठाया है। सरकार ने इस ‘ऊंची मूर्ति’ के लिए क्या-क्या नहीं किया! सरकारी कंपनियों से जबरन पैसे खर्च करवाए। इसके लिए सीएजी ने सरकार को फटकार भी लगाई कि क्यों ओएनजीसी, एचपीसीएल, बीपीसीएल, आईओसीएल जैसी कंपनियों से करोड़ों रुपये लिए जा रहे हैं। लेकिन सरकार की लगन देखिये कि फिर भी पूरे जतन से इस गर्व के काम में लगी रही। चीन को पछाड़ने के लिए चीन की कंपनी को ही मूर्ति बनाने का ठेका दे दिया। उनको बस रोजगार मिला और हमलोगों को इस विशालकाय मूर्ति पर गर्व करने का अवसर। यह सब कौन करता है!

मुझे लगा कि यह सीएजी भी इस रोतलू आदमी की तरह होती जा रही है। मनमोहन सिंह सरकार के समय में समझदार थी। देशभक्ति में आकर इसने सरकार के कितने भ्रष्टाचार उजागर किये। पर देश के चौकीदार के सत्ता में आने के बाद भटकती हुई नजर आ रही है। इसको देशभक्ति और भ्रष्टाचार में अंतर ही समझ में नहीं आ रहा है।

वह रोतलू आदमी फिर से शुरू हो गया। “इसके लिए ही सरकार को वोट दिया गया था? यह काम तो पिछली सरकार भी कर सकती थी। तीन साल में न सही पांच साल में ही। पर वह तो अधिकार वाले कानून बनाने पर जोर देती रही। शिक्षा का अधिकार, सूचना का अधिकार, वनाधिकार। कुपोषण को तो उन्होंने राष्ट्रीय शर्म तक कह दिया।”

वही तो! टीका लगाए एक बुजुर्ग ने कहा, जो अब तक तीसरी चाय पी चुके थे। “बताओ देश के बारे में भला कोई प्रधानमंत्री ऐसे बोलता है! क्या करे बेचारा, सीधा आदमी था। ये इटली वाली उससे जो बोलने को कहती थी, वह वही बोल देता था। उसको न देश पर गर्व करने का शौक था और न लोगों को गर्व महसूस करवाने का।”

रोतलू का मुंह लाल हो रहा था। उसने फिर शुरू किया, “मुझे तो सिंह साहब पर ही गर्व होता है कि कम से कम वह लोगों की समस्या पर तो काम कर रहे थे। यहां तो सब हवा-हवाई है। विकास के नाम पर आई सरकार सब कर रही है, बस विकास छोड़कर। महिलाओं की सुरक्षा का वादा कर उनके शिकायत का मजाक उड़ा रही है।”

उसके इतना बोलते ही दो लोग खड़े गए। उन्होंने उससे पूछा कि सिंहवा पर तुझे गर्व होता था। वह रोतलू जोश में बोला ‘हां’। दोनों उसके और नजदीक गए और पूछे कि कैसे महसूस होता है ‘गर्व’? रोतलू डर गया था। उसने डर से अपनी आंखें बंद कर ली, यह सोचते हुए कि अब तो वह पिटने ही वाला है। उसने लंबी सांस ली।

दोनों लड़के बोले, “बता कैसे गर्व महसूस किया जाता है!” रोतलू को कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उसने शायद बचने के लिए कह दिया कि अभी महसूस कर के दिखाया तो। उसके इतना बोलते ही दोनों युवा जाकर अपनी जगह पर बैठ गए। सब शांत थे। ऐसा लग रहा था कि सब अपने गर्व महसूस करने के तरीके से उसके तरीके की तुलना कर रहे थे।

मुझे भी थोड़ी राहत मिली। मैं घर की तरफ निकल लिया। बर्तन धोना था। खाना बनाना था। फिर नौकरी पर निकलना था।

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