रपटीले राजपथ: नए कथानक का पठनीय उपन्यास

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प्रभात रंजन/

कई बार कुछ रचनाएं हमें अप्रत्याशित रूप से चौंका देती हैं- अपने कथानक से, अपने कहन से। इंदिरा दांगी के उपन्यास ‘रपटीले राजपथ’ को पढ़ते हुए ऐसा ही अहसास हुआ। इंदिरा दाँगी हिंदी युवा लेखन का जाना पहचाना नाम है। बहुत कम समय में उन्होंने अपनी कहानियों से हिंदी जगत में अच्छी पहचान बनाई है। साल 2015 में उनको युवा साहित्य अकादेमी पुरस्कार भी मिल चुका है। ‘रपटीले राजपथ’ उनका नया उपन्यास है।

एक ज़माना था जब हिंदी में लेखक होने का मतलब कुछ खोना माना जाता था। हिंदी के लेखकों को न नाम मिलता था, न दाम। लेकिन अब समय बदल चुका है। लिटरेचर फेस्टिवल, बेस्टसेलर के इस दौर में हिंदी के लेखकों का ग्लैमर बढ़ रहा है। उनको बड़े-बड़े पुरस्कार मिल रहे हैं, देश-विदेश की यात्राएं हो रही हैं। ‘रपटीले राजपथ’ उपन्यास की कथा के केंद्र में साहित्य की यही दुनिया है और किस तरह से छोटे छोटे शहरों में हिंदी के केंद्र में पहुँचने के लिए राजनीति, जोड़-तोड़, उठापटक होती रहती है लेखिका ने इसको बहुत दिलचस्प तरीके से इस उपन्यास में इसका वर्णन किया है। पहली बार हिंदी के उपन्यास में हिंदी विभागों का परिदृश्य आया है, किस तरह से संपादकों द्वारा लेखक-कवि सांचे में ढाले जाते हैं, किस तरह दिल्ली यानी साहित्य के केंद्र में पहुँचने की महत्वाकांक्षा काम करती है, लेखिका ने बड़े रसदार तरीके से उपन्यास में इसका वर्णन किया है।

उपन्यास की कथा मध्य प्रदेश के दतिया नामक एक छोटे से क़स्बे से शुरू होती है। जहाँ मातादीन मिरौंगिया और विद्या रैदास हिंदी में एमए की पढ़ाई कर रहे हैं। दोनों का सपना एक दूसरे के साथ घर बसाने और हिंदी की साहित्यिक दुनिया में अपना नाम बनाने का है। एक आदिनाथ सर हैं जिनकी दिल्ली तक पहचान है। ‘कविता, कहानी, उपन्यास, संस्मरण, यात्रा वृत्तान्त, रिपोर्ताज, रेखाचित्र, समीक्षा-उमीक्षा- कमबख्त कौन सी विधा है जिसे सर ने न रपेटा हो? आलोचक के तौर पर स्थापित कितने बड़े नामवर!!! सर के ड्राइंग रूम, सीढियों, कमरों में बड़ी-बड़ी तस्वीरें सजी हैं… किसी में वे अज्ञेय के पैर छू रहे हैं… किसी में ‘नागार्जुन’ का आशीर्वाद ले रहे हैं…” आदिनाथ सर से मातादीन ‘विराट’ उपनाम लेकर ग्वालियर होते हुए दिल्ली पहुँच जाता है। विद्या से विवाह कर लेता है लेकिन बड़े साहित्यकार बनने की आकांक्षा में उसको और सब कुछ पीछे छोड़कर आगे निकल जाता है।

यह हिंदी की नई पीढ़ी का नई तरह का लोकप्रिय लेखन है, जो अपने लेखन के भरोसे आगे बढ़ना चाहता है। जो बड़ी सफाई से गंभीर लेखन की धूल को झाड़ते हुए जरा भी नहीं हिचकता।

यह उपन्यास अपने कथानक के लिए नहीं बल्कि इसमें जिस तरह से दतिया, ग्वालियर, दिल्ली के बहाने हिंदी साहित्य के अलग-अलग स्तरों पर लेखक-लेखिका बनाने के खेल, संपादकों की सत्ता, पुरस्कारों के लिए की जाने वाली जोड़-तोड़ का जो वर्णन है वह अधिक प्रभावी बन पड़ा है। साहित्यिक शुचिता के भ्रम को यह उपन्यास पूरी तरह से तोड़ कर रख देता है। सतह पर जो उच्च, दिव्य दिखाई देता है उसके पीछे कैसा नरक होता है, ‘रपटीले राजपथ’ को इसके लिए पढ़ा जाना चाहिए। साथ ही, अपने समय के विमर्शों पर लेखिका की बेबाक टिप्पणियों के कारण भी यह उपन्यास पठनीय बन पड़ा है। उदाहरण के लिए, हिंदी के समकालीन स्त्री विमर्श पर उपन्यास में आई यह टिप्पणी- ‘एक बार मेरे ही सामने एक डॉन संपादक एक नई उम्र की लेखिका को प्रसिद्ध उक्ति सुना रहे थे कि इतिहास पेन से नहीं पेनिस से लिखा गया है… और अब जबकि स्त्रियों के हाथ में भी पेन की ताकत है तो उसका पेन सम्पूर्ण स्त्री जाति का प्रतिनिधित्व करे, ऐसा उसे लिखना चाहिए। और स्त्री हक़ की लड़ाई देह-विमर्श से शुरू होकर देह विमर्श पर ही ख़त्म होती है। अब ऐसी बहसों-विमर्शों से क्या होता है कि भोलीभाली और अति महत्वाकांक्षिणी युवा लेखिकाएं बहक जाती हैं और वे ‘अपनी देह, अपना हक़’ का नारा बुलंद करने के चक्कर में अपने लेखन को साहित्य की सीमाओं से बहुत आगे ले जाकर ‘पोर्न लिटरेचर के चरम शिखरों तक पहुंचा देती हैं।’

यह हिंदी की नई पीढ़ी का नई तरह का लोकप्रिय लेखन है, जो अपने लेखन के भरोसे आगे बढ़ना चाहता है। जो बड़ी सफाई से गंभीर लेखन की धूल को झाड़ते हुए जरा भी नहीं हिचकता। उसे पता है कि स्थानीय से राष्ट्रीय स्तर तक साहित्य की सच्ची प्रतिभाओं को कुचलने का काम किया जाता है। साहित्य की दुनिया भी राजनीति की तरह घृणास्पद हो चुकी है। अकारण नहीं है कि ‘विराट’ बनने के लिए दिल्ली पहुंचा मातादीन उपन्यास के अंत में वापस दतिया लौट जाता है।

अब सवाल है कि उपन्यास की विधा में इस तरह के कथानक को साहित्य माना जाना चाहिए? जाहिर है, लेखिका ने बहुत सुचिंतित तरीके से साहित्य बताई जाने वाली कृतियों के पीछे की दुनिया की कारगुजारियों को उजागर करने का प्रयास किया है। उपन्यास को पढ़ते हुए बहुत सारी कविताओं, कहानियों, किस्सों की अंतर्पाठीयता का सुख भी मिलता है। बहुत से गॉसिप भी पढने को मिलते हैं, जिनमें से कुछ मैं समझ पाया, बहुत सारी नहीं। लेखिका ने जहाँ एक तरफ स्त्री विमर्श के नाम पर देह विमर्श का एक जरूरी सवाल उठाया है। दूसरी तरफ समकालीन लेखिकाओं से जुड़ी कई ‘गौसिप्स’ को भी उपन्यास के कथानक का हिस्सा बनाते हुए वह इस बात को भूल गई हैं कि लेखिकाओं को बदनाम करने के लिए इस तरह की कहानियां कही-सुनी जाती रही हैं। लेखिका को इससे बचना चाहिए था। बहरहाल, एक नए कथानक का पठनीय उपन्यास है ‘रपटीले राजपथ।’

समीक्षित उपन्यास: रपटीले राजपथ; इंदिरा दाँगी; प्रकाशक-राजपाल एंड संज; मूल्य- 265 रुपये।

(प्रभात रंजन प्रतिष्ठित कथाकार हैं।  नई संवाद तकनीकों के जरिए साहित्य प्रसार के हिमायती। लोकप्रिय साहित्य के प्रबल पक्षधर। हिंदी की कुछ चर्चित एवं सफल वेबसाइट में से एक जानकीपुल के मॉडरेटर हैं।)

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