आर के नारायण जयंती विशेष: मालगुडी के स्रष्टा

0

प्रभु नारायण वर्मा/

(लेखक हिंदी के बेहतरीन कथाकार हैं . संगीत, कला, साहित्य पर इनकी समझ के मुरीद हुए बिना नहीं रहा जा सकता.)

हम हिन्दी वाले आर के नारायण को गाइड फ़िल्म के लेखक के रूप में ज़्यादा जानते हैं। लेकिन उनका लेखकीय व्यक्तित्व बहुत विशाल है। पन्द्रह उपन्यास, छह कहानी संग्रह और दस बारह अन्य पुस्तकों के लेखक होने के साथ साथ वे भारतीय परम्परा और मिथकों के गहरे जानकार थे।

उनकी अधिकतर रचनाओं के पात्र मालगुडी नाम के एक गाँव के होते थे, जो कि वास्तव में एक काल्पनिक गाँव है। भारत ही नहीं, विदेशों में भी इस मालगुडी के बारे में अनेक रिसर्च हुए हैं। उनकी रचनाओं का कथानक प्रायः परम्परागत लेकिन रहस्यपूर्ण और प्रतीकात्मक है। और उनके पात्र सीधे सादे देहाती या कस्बाई होते हुए भी आपको बीच बीच में बड़ी ख़ूबी से चौंकाते रहेंगे।पद्मभूषण और पद्मविभूषण के अलावा उन्हें साहित्य अकादमी अवार्ड भी मिला था। फिल्मफेयर पुरस्कार भी। तीन देशी विदेशी विश्वविद्यालयों से डॉक्टरेट मिली थी, सो अलग। कई बार नोबेल पुरस्कार के लिए नामांकित हुए थे। हिन्दुस्तान के सर्वश्रेष्ठ कार्टूनिस्ट आर के लक्ष्मण उनके सबसे छोटे भाई थे।

अपने उपन्यास पर बनी गाइड फ़िल्म उन्हें पसन्द नहीं आई थी। उपन्यास में रेलवे राजू नाम का बहुत चालू गाइड है, जो अन्त में साधु बनता है, अकाल के निवारण के लिए उपवास करता है और अन्त में दूर पहाड़ पर आती बारिश को देख कर गिर जाता है। अकाल और राजू का आगे क्या हुआ, यह नहीं बताया गया है। लेकिन फ़िल्म में रेलवे राजू नहीं सिर्फ़ राजू है, जो मज़ेदार और जज़्बाती है और अन्त में स्वर्गीय होता है। आर के नारायण ने इस फ़िल्म को ए मिसगाइडेड गाइड कहा था।

द गाइड पर इंग्लैन्ड में एक नाटक के भी बहुत शो हुए थे, जिसमें स्वयं पण्डित रविशंकर ने संगीत दिया था। उनके मिस्टर सम्पत उपन्यास (मालगुडी का प्रेसवाला /द प्रिन्टर ऑफ़ मालगुडी) पर सम्पत नाम की फ़िल्म बनी थी। मोतीलाल की बहुचर्चित फ़िल्म है। यह सफल तो नहीं हुई पर बहुत सराही गई थी। उनके कहानी संग्रह मालगुडी डेज़ और दो उपन्यासों -स्वामी एन्ड फ़्रेंड्स और वेन्डर ऑफ़ स्वीट्स के आधार पर दूरदर्शन के लिए शंकर नाग ने स्वामी सीरियल बनाया था, जो अद्भुत और लगभग जादुई सीरियल है। अनन्त नाग ने भी उसमें काम किया है। इसमें कर्नाटक संगीत के प्रख्यात एल वैद्यनाथन का संगीत और आर के लक्ष्मण के स्केच भी अद्भुत हैं। ज़रा कोने में आकर यह भी सुन लीजिए कि मलयालम फ़िल्म मालगुडी डेज़ से हमारे आर के नारायण का कोई लेना देना नहीं।

इस समय उनका  द फाइनेंशिल एक्सपर्ट पढ़ने लायक उपन्यास है। 1952 में छपा था।सहकारी बैंक के सामने एक पेड़ के नीचे बैठने वाला दलाल है, जो गाँव के लोगों को तिकड़म और जुगाड़ से सही ग़लत बैंक लोन दिलाता है। बाद में वो अपना बैंक चालू करता है, जिसमें अनाप शनाप ब्याज का लालच देकर वह पब्लिक का बहुत पैसा जमा कर लेता है। अंततः वो बैंक डूब जाता है।

कैसे उन्हें मालूम था कि आगे इस मुल्क में दलालों और चारसौबीसों का स्वर्णयुग आयेगा? क्या इसे ही प्रोफ़ेसी ऑफ़ क्लासिक कहते हैं?

मैं तो पढ़कर  चकरा गया। हिन्दी अनुवाद है मालगुड़ी का चलतापुर्ज़ा। इस उपन्यास पर एक कन्न्नड फ़िल्म  भी बनी है। बैंकर मर्गय्या।   इसे  कई अवार्ड मिले हैं।

कभी कभी मेरे दिल में ख़याल आता है कि काश, उनके मैनईटर ऑफ़ मालगुडी (मालगुडी का आदमख़ोर) पर कोई फ़्रेन्च या लैटिन अमरीकी फ़िल्मकार एक सपाट सुर्रीयलिस्ट फ़िल्म बनाता। अजीब सम्मोहित करने वाला उपन्यास है वह।

2011 में आर के नारायण के नाती पोतों ने मैसूर स्थित उनके घर को गिराने की अनुमति माँगी थी। आर के नारायण के प्रशंसकों ने इसका बहुत विरोध किया। अन्ततः इस पर स्टे लगा, सरकार ने उनके वारिसान को पैसा देकर भवन अधिग्रहित कर लिया, उसे ठीक ठाक किया और आज वह आर के नारायण संग्रहालय है।

अगर वो हिन्दी के लेखक होते और ऊ बिल्डिंगवा बिहार, उत्तर प्रदेश, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश में होता तो का होता?

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here