क्लासिकी परम्परा के आलोचक का सम्मान

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रमेश कुंतल मेघ

प्रभात रंजन/

कभी-कभी कुछ कुछ ऐसे व्यक्तियों, ऐसी रचनाओं को पुरस्कार मिलता है जिससे पुरस्कारों की विश्वसनीयता पुख्ता होती है। इस साल साहित्य अकादमी का पुरस्कार रमेश कुंतल मेघ को उनकी कृति ‘विश्व मिथक सरित्सागर’ के लिए दिया गया है। यह एक कोश है जिसमें संसार की अलग-अलग सभ्यताओं के मिथकों को संकलित किया गया और उनकी व्याख्या प्रस्तुत की गई है। यह एक साभ्यातिक पुस्तक है जिसका उद्देश्य है अनादि-अनन्त के रहस्यों की खोज द्वारा संस्कृति के उस मूल तक पहुंचना जो मानव-सभ्यताओं का मूल रहा है- प्रेम, करुणा, अच्छाई पर बुराई की विजय। ‘विश्व मिथक सरित्सागर’ को पढने से यह बात समझ में आती है कि धर्मों के आधार पर बैर फैला लेकिन मिथकों के आधार पर, उनके संदेशों के आधार पर संसार एक है।

प्रभात रंजन

इस पुरस्कार का महत्व इस बात से भी समझा जा सकता है कि हिंदी में पहली बार किसी कोश(एन्साइक्लोपीडिया) को साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया है। यह रमेश कुंतल मेघ जी के दशकों के श्रम का सम्मान तो है ही, साथ ही हिंदी की एक ऐसी विधा का सम्मान भी है जिस विधा की उल्लेखनीय कृतियों को हिंदी में उचित महत्व नहीं दिया गया। मिथकों के संकलन के लिए रमेश जी ने अनेक देशों की यात्रा की। दुनिया के अनेक पुस्तकालयों में जिन मिथक प्रतीकों के चित्र लेने की मनाही थी उनके चित्र उन्होंने अपने हाथ से बनाए, जो इस पुस्तक में संकलित भी हैं। यह सब उन्होंने ऋषि भाव से हिंदी के मौलिक ज्ञान भण्डार में वृद्धि के लिए किया। इसके पीछे न किसी संस्थान की शोधवृत्ति थी न ही इस बात की सम्भावना कि पुस्तक में रूप में इसका समुचित प्रकाशन हो पायेगा।

हजारी प्रसाद द्विवेदी के शिष्य रहे रमेश कुंतलमेघ स्वयं को ‘कार्ल मार्क्स का ध्यान शिष्य’ कहते हैं, लेकिन उन्होंने मार्क्सवाद के भौतिक द्वन्द्ववाद से अधिक कलाओं और सौंदर्य के द्वन्द्वों को लेकर चिंतन-लेखन किया। उनकी एक पुस्तक है ‘अथातो सौन्दर्य जिज्ञासा’ जिसमें उन्होंने कला और सौन्दर्य के विविध सिद्धांतों और विचारों के आधार पर कलाओं की एकता का विचार प्रस्तावित किया। उदाहरण के लिए, काव्य में अलंकार और शब्दार्थ शक्ति की तुलना वे चित्रकला से करते हैं और यह स्थापित करते हैं कविता में बिम्ब निर्माण की कला असल में चित्रकला से आई।

हिंदी में पहली बार किसी कोश को साहित्य अकादमी पुरस्कार दिया गया है। यह रमेश कुंतल मेघ के दशकों के श्रम का सम्मान तो है ही, साथ ही हिंदी की एक ऐसी विधा का सम्मान भी है जिसकी उल्लेखनीय कृतियों को हिंदी में उचित महत्व नहीं दिया गया।

रमेश कुंतल मेघ के चिंतन के केंद्र में कला, सौन्दर्य, मिथकों की ऐतिहासिकता रही है। इस अर्थ में वे हिंदी के सबसे मौलिक आलोचक हैं कि उन्होंने समकालीन हिंदी आलोचना को विराट ज्ञान की परम्परा से जोड़ने का काम किया और उस रूप में साहित्य-कला की प्रासंगिकता पर विचार किया। उनकी सबसे मौलिक स्थापना भारतीय इतिहास के मुग़ल काल को लेकर है। अपनी पुस्तक ‘तुलसी: आधुनिक वातायन से’ में उन्होंने लिखा है,‘सारे मुग़ल काल में दो ही व्यक्ति व्यापक इतिहास के प्रतीक हैं- अकबर और तुलसी।’ आगे उन्होंने लिखा है कि इन दोनों के बीच एकसूत्रता को स्थापित करने के लिए हिन्दू-इतिहास और मुस्लिम-इतिहास की गलत मनोवृत्तियों से आजाद होना पड़ेगा। उन्होंने तुलसीदास को मध्यकालीन समाज के अंतर्विरोधों से मुक्त न मानते हुए भी यह मौलिक स्थापना की है कि तुलसी मध्यकालीन संस्कृति के दर्पण हैं। दुर्भाग्य से इस दिशा में हिंदी में आगे काम नहीं हुआ।

जयशंकर प्रसाद के महाकाव्य ‘कामायनी’ पर भी हिंदी के अनेक विद्वानों ने लिखा है। अनेक कोणों से इसका मूल्यांकन किया गया। रमेश कुंतल मेघ ने साभ्यातिक द्वंद की इस कृति का मूल्यांकन करते हुए यह लिखा है ‘एक कृति के रूप में कामायनी में महान असफलताओं तथा महत्वपूर्ण श्रेष्ठताओं और महत्तम संभावनाओं का संयोग हुआ है। ‘मिथक और स्वप्न’ नामक उनकी पुस्तक संभवतः अकेली ऐसी पुस्तक है जिसमें देश और काल से हटकर विशुद्ध सौन्दर्यशास्त्रीय मानकों पर ‘कामायनी’ का विश्लेषण किया है।

यह कहा जा सकता है कि रमेश कुंतल मेघ ने एक आलोचक के रूप में समकालीन रचनाशीलता से गुरेज किया। लेकिन समकालीनता कोई मूल्य नहीं है जिसके निष्कर्ष पर किसी लेखक की रचनाओं का मूल्यांकन किया जाये। असल में रमेश जी ने एक आलोचक के रूप में समकालीन रचनाशीलता के लिए आधार तैयार करने का काम किया है। हिंदी की समकालीन आलोचना जहाँ सामाजिक-राजनीतिक परिप्रेक्ष्य को केंद्र में रखती आई है वहीं रमेश जी के साहित्यिक मूल्य देश-काल के द्वंद से मुक्त क्लासिकी मूल्य हैं, शाश्वत भाव हैं। 86 साल की उम्र में भी निरंतर सृजनरत हैं और साहित्य चिंतन की नई सरणियों के निर्माण में साधनारत हैं।

(प्रभात रंजन प्रतिष्ठित कथाकार हैं।  नई संवाद तकनीकों के जरिए साहित्य प्रसार के हिमायती। लोकप्रिय साहित्य के प्रबल पक्षधर। हिंदी की कुछ चर्चित एवं सफल वेबसाइट में से एक जानकीपुल के मॉडरेटर हैं।)

 

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