मैं अपने लिखे में हर जगह उपस्थित हूँ: विनोद कुमार शुक्ल से महेश वर्मा की बातचीत

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महेश वर्मा

विनोद कुमार शुक्ल रचनाकार की परिभाषा हैं.भाषा के भीतर उन्होंने पहले अपनी भाषा रची जो अनूठी है और सिर्फ उन्हीं की भाषा है.  भाषाई समुद्र के तैराक विनोद कुमार शुक्ल को प्रकाश स्तंभ की तरह देखते हैं. वो अपनी ईजाद की गई भाषा में कवि हैं, उपन्यासकार हैं, कथाकार हैं और इसे कौन नहीं जानता? आपकी बातचीत महेश वर्मा  से हुई है जो खुद भारतीय काव्य परंपरा में ज्ञान और दर्शन के समुच्चय की जो तेजोमय धारा है उनमें एक विलक्षण नाम हैं. पढ़िए यह काव्यात्मक बातचीत:

 

स्मृति

स्मृति को मैं जीवन के अनुभव के खजाने की तरह मानता हूँ, आगे की जिंदगी खर्च करने के लिए इसकी जरुरत है. अगर भूलने से काम रुकता है, तो परेशानी होती है. जैसे चावल खरीदने घर से निकले, दुकान पहुंचे तो मालूम हुआ जेब में पैसे नहीं हैं. रचनात्मकता में भूलना सहूलियत है. जब नया लिखते हैं तो अपना पहले का लिखा भूल जाते हैं. दूसरों का लिखा भी भूला रहता है. भूलना छलनी है, आपकी मौलिकता को बचाए रखने. भूलना रचनात्मकता का कवच है. इसमें बीती रचनाओं और दूसरों का प्रभाव उतना घातक नहीं होता.

मुझे खराब बीता हुआ अधिक याद आता है. गलतियाँ याद आती हैं. टूटा हुआ याद आता है, टूटने के पहले जो साबुत था वह उतना नहीं. बचपन बहुत याद आता है. अम्मा को, जितना सुख देना था नहीं दे सका. परिवार के घर के लोगों के साथ घर से बाहर का घूमना-फिरना मुझसे बहुत कम हुआ. मुझे लगता है कि मैंने बहुत कम देखा और दोहराव की जिंदगी जी.

नींद और सपने

नींद नहीं आती. थककर बार-बार लेटता हूँ. कुर्सी पर बैठने से तो झपकी आती है, लेटने से झपकी भी नहीं आती.कम्प्यूटर पर लिखना बंद हो गया. हाथ से लिखना भी कम हुआ. बोलकर लिखना बचा हुआ है. रात में सोचता हूँ तो लगता है नींद में सपना देख रहा हूँ. और जब सपना देखता हूँ तो लगता है सोच रहा हूँ. एक सपना मुझे कुछ वर्ष पहले बहुत आता था कि मैं उड़ रहा हूँ. मुझे उड़ना आता है. मैं उड़कर कहीं भी चला जाता हूँ. इसके बाद जो सपने आये वह भटकने का सपना था कि मैं नंगे पैर पैदल किसी का घर ढूंढते हुए भटक रहा हूँ. इत्तफाक से जब आधे-एक घंटे की नींद आती है, तो डरावने सपने देखता हूँ. तब खुद नींद से बचता हूँ.

 कविता और उपन्यास

कविता लिखते समय कि कविता लिखनी है तब कविता लिखना मेरे लिए बहुत कठिन है. उपन्यास लिखते समय मैं आसानी से कविता लिख पाता हूँ.  उपन्यास लिखना उपन्यास के साथ साथ कविता लिखना भी है. लिखना एक लागातार यात्रा की तरह है कि यह ख़तम नहीं होगी. परन्तु, प्रत्येक रचना अपने आप में एक अधूरी यात्रा होती है. लिखना निकल पड़े की यात्रा है, जिसमें उसी जगह लौटना नहीं होता. प्रत्येक रचना यात्रा की एक नई जगह होती है जिसमें बीते अनुभव के जाने-पहचाने दृश्य भी होते हैं. एक रचना की यात्रा के बाद सुस्ताना अच्छा लगता है. इस यात्रा में हम सबकुछ नहीं देख पाते जैसे सबकुछ लिख नहीं पाते. जिसे देखा जाना है उसे देखते हैं और जानबूझकर अनदेखा जैसा छूटता रहता है.

खिलेगा तो देखेंगे उपन्यास का लिखना अच्छा लगा था, क्यों अच्छा लगा था मालूम नहीं. लिख लेने के काफी दिनों बाद जो कुछ भी लिखा जाता है वह फिर अच्छा नहीं लगता. और संतोष का कोई मायने  नहीं होता. आलोचना की पहरेदारी से बचकर भी ज्यादातर रचनाएं आखिर स्वतंत्र होकर पाठकों तक तो पहुँच जाती हैं. और जिन गिनी-चुनी रचनाओं को आलोचक पीठ थपथपाकर आगे बढ़ाते हैं वे अलग गिने-चुने पाठक होते हैं. पाठकों को सोचकर मैंने कभी रचना नहीं की, जो लिख सकता था वही लिखा.

सिनेमा

बचपन में सिनेमा का गहरा प्रभाव पड़ता है. घर के ठीक सामने सिनेमाघर था. और एक दूसरे घर की तरह था. मैं अपने घर से भागकर इस दूसरे घर में ही छुटकारा पाता था. सेकंड-शो का एक-एक डायलॉग घर में सुनाई देता था. घर की मुश्किलों, कठिनाईयों और भावुकता के समय होने वाली घटनाएँ और फुसफुसाहट, चिल्लाकर बातचीत मुझे सिनेमा के डायलॉग की तरह लगती थी.

फिल्मों के गाने मुझे अच्छे लगते हैं. अब थिएटर में सिनेमा नहीं देखता. आधा एक घंटा कभी टीवी देखता हूँ तो  पांच सात मिनट के टूकड़ो टूकड़ो में, वह भी रोज नहीं. टीवी जब खराब होती है तो दो तीन साल तक घर में बनवाने की याद भी नहीं आती.

कई बार लगा कि मैंने नौकर की कमीज के एक-दो दृश्य कहीं मणिकौल की फिल्म देखकर तो नहीं लिखा. आश्चर्य अधिक था देखने में, अपने लिखे को मणिकौल की दृष्टि से. जबकि उपन्यास पर फिल्म वर्षों बाद बनी. लिखा हुआ देखे में कहीं-कहीं समानार्थी होता है. कई बार इतना समानार्थी भी कि आईने में लिखे हुए दृश्य का प्रतिबिम्ब देख रहे हैं. और हम अपना देखा हुआ ही लिखते हैं. नौकर की कमीज को लिखा हुआ देख भी  लिया. पर जो देखा वह मणिकौल की रचना थी. मेरी नहीं.

 पात्र

मेरे लिखे हुए  पात्र ज्यादातर मेरे देखे हुए जाने-पहचाने  हैं. इसके अलावा जो पात्र हैं वे, जिन्हें देखने की आशा करता था. और मैं अपने लिखे में हर जगह उपस्थित हूँ.

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