षोडशी की षोडशोपचार उपासना ९

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प्रतिभाशाली कवि और लेखक अम्बर पांडेय के साथ हमलोगों ने लगातार नौ दिनों तक नए तरीके से नवरात्रि का उत्सव मनाया। आज के इस अंश के साथ, हमलोगों ने उनके लिखे जा रहे उपन्यास माँमुनि के भावविभोर कर देने वाले कुल नौ अंश पढ़े। इस सिलसिले में आज की किश्त आखिरी है। आज का दिन ऐसा है जैसे दुर्गोत्सव ख़त्म हो रहा हो। दुर्गा की मूर्ति घर में एक अजीब सी उदासी छोड़कर चली जा रही हो। ऐसे उदास मौकों पर राहत बस इतनी होती है कि अगले साल दुर्गा भी आएँगी और नवरात्रि का जश्न फिर मनाया जायेगा। इस बीच एक ख़ास बात यह रही कि पाठकों ने लेखक से बारम्बार इस पूरी रचना को एक मुश्त पढ़ने की इच्छा जताई। लेखक जरुर पाठकों की इस मासूम इच्छा पर विचार कर रहे होंगे। इसके लिए लेखक को सौतुक की तरफ से ढेर सारी शुभकामनाएं..

अम्बर पांडेय/

मुखोपाध्याय जी से रुपया लेकर शारदा ने ठाकुर के भक्त को देकर सुदूर मछली हाट से हिलसा और बहूबाज़ार से पेड़े मँगवाए। भक्त हाथ में मिट्टी की गागर लिए हिलसा लेने निकल पड़ा। हिलसा की हाट दूर लगती थी और लाते लाते मछली बासी न हो जाए इसलिए शारदा जीवित मछलियाँ घड़े में मँगवाती थी।

जैसे वेदान्ती अद्वैत सिद्ध करते है वैसे ही शारदा ने उस दिवस मछली सिद्ध करने का निर्णय लिए बैठी सरसों और पोस्ता पीसने सिलबट्टे पर बैठ गई। तभी उसके शैशव की सखी अघोरमणि जैसी दिखनेवाली एक स्त्री वहाँ आ गई। अघोरमणि का अतिवृद्ध रूप। अजानुलम्बित केश किंतु कांस के फूलों जैसे श्वेत। श्वेत ही धोती और हाथ में भी श्वेत कुमुदों की माला लिए सम्मुख खड़ी थी। शारदा से मिलने जैसे महाश्वेता आ गई थी।

“तू मेरे पगलेराम की स्त्री है?” वृद्धा के स्वर को सुनकर शारदा के हाथ से बट्टा छूटकर सिल पर गिर गया, एकदम अघोरमणि जैसा कण्ठ। शारदा के मुख से अनायास निकल पड़ा, “अघोरमणि!”

“बुढ़िया को नाम से टेरते है पगलेराम की ससुराल में!” वृद्धा ने कोपवती होकर कहा।

“क्षमा करना, बड़मुनि” शारदा धोती सँवारती उठ ख़ुद हुई।

“तू क्या महिषासुरमर्दिनी है? सब जानती है, मेरा नाम तो यहाँ कोई नहीं जानता तो तुझे किसने बताया अघोरमुनि का नाम” वृद्धा का नाम संयोग से अघोरमुनि ही था।

शारदा मौन ही अधोमुखी खड़ी रही यह समझते कि बड़मुनि बुढ़ापे में बड़बड़ाती होगी।

“सवा मास बीत गया परन्तु पगलेराम ठीक से भोजन नहीं करता। तू उसे खिलाकर बता थालभर भोज तो तुझे तम्बाकू का पान खिलाऊँगी। मैं तो विधवा होकर भी निधड़क पान खाती हूँ। तम्बाकू का पान” अघोरमणि ने पुतली नचा नचाकर कहा।

भक्त माथे पर मछलियों से भरी गागर लिए आ गया। शारदा गागर के भीतर मछलियाँ निहारने लगी। अघोरमणि ठठाकर हँसने लगी। पगलेराम की बड़मुनि भी पगली है, शारदा अघोरमणि को देखने लगी। अघोरमणि जीवित रहती तो इतनी वृद्ध तो न होती।

“मीननयना जल में मीन हेरेगी तो अपने नयनों की छाँह देखकर रीती गागर मोल ले आएगी। चल हट, मैं देखूँ” अघोरमणि ने कहा।

“मछली खा नहीं सकती तो क्या गन्ध का भी आनंद न लूँ” अघोरमणि गागर में झाँकते बोली। शारदा को लगा उसकी बिछड़ी सखी मिल गई। वैसी ही चंचल और जिजीविषा से भरी।

अघोरमणि ने चौके पर ऊपर लटकती दूसरी गागर खोली और दही उतार लिया, शारदा को देते कहने लगी, “सोरसे दोई इलीश जानती है बनाना? कलकत्ते की विधि से पकाना। पगलाराम तेरा दास न हो जाए तो कहना। उससे पहले मुझे चखाना न भूलना। विधवा हूँ इससे खाती नहीं बस चखती हूँ मछली। मेरा मुख क्या देखती है, क्या सरसों पोस्ता कूट, महालक्ष्मी” कहकर अघोरमणि आगे बढ़ चली। बात बात में कुमुदमाला उसने अपने ही लम्बे श्वेत केशों में बाँध ली थी।

बावन मस्तूलों के जहाज़ और भारी भरकम उलाँक भी मानुषडुबान जल में छोटे से लंगर और लहासी के चार फेरे देकर बँधी रहती है तो क्या चारप्रहर भवसागर तरने की बात कहनेवाले को छोटे से पुकुर की मछली से बाँधना कठिन है और फिर यह तो हिलसा थी हिलसा। जैसे जैसे अग्नि पर धरी मछली सींझने की गन्ध ने कालीमण्डप को बलवती होकर अपने अधीन कर लिया, ठाकुर का महाभाव शिथिल होने लगा।

बार बार हृदय से पूछते, “हृदू रे ये कौन इलीश सिद्ध करने बैठा है रे आज? कैसा दैवीय सुवास सब ओर छाया है”।

“मामा, तुम यही विश्राम करो, मैं अभी देखकर आया” हृदय ने कहा और काली के रसोईघर की ओर दौड़ा। तब तक शारदा का अपना चौका नहीं था।

ठाकुर आकुल कमरे की परिक्रमा करते थे । पैर में बँधा नुपूर सब संसार झंकृत करता था। ठाकुर सम्पूर्ण नासिकामय और शारदा सम्पूर्ण कर्णमयी हो गई थी। ठाकुर मछली की गन्ध से आकुल और शारदा के कान लगे थे ठाकुर की नूपुरध्वनि पर।

बटलोई साड़ी के छोर से शारदा उतार ही रही थी कि हृदयराम वहाँ पहुँच गया।

“वैकुण्ठ में भी ऐसी दिव्य गन्ध न आती होगी जैसी आज इस रसोईघर से आ रही है। बताओ मामी, क्या बनाया है आज?” हृदय बटलोई का ढक्कन उघाड़कर देखने लगा।

“मामा, ठीक से भोजन नहीं करते है न इसलिए दही मछली बनाई है आज” शारदा के वाक्य पूर्ण करते करते लज्जा से कपोल आरक्त हो गए। हृदय ने थाल उठाकर शारदा के आगे कर दिया। भागीनेय तो सौ ब्राह्मणों से बढ़कर होता है, उसे कैसी न परोसती।

“बड़मुनि को चखा आऊँ पहले?” शारदा ने बहुत संकोच से पूछा।

“कौन बड़मुनि?”

“अघोरमणि काकी” शारदा का उत्तर सुनकर हृदयराम, “हरे हरे” करने लगा।

“उस विधवा को तुम मछली चखाओगी! तुम भी मामा की भाँति पागल हो गई हो?” हृदय ने क्रोध से कहा।

भार्या के आगे भर्ता को कोई पागल कहे, ऐसा हो सकता है कभी। शारदा ने तुरन्त उत्तर दिया, “जो अच्छा-बुरा कहते हो सब ग्रीवा झुकाकर सुनती हूँ भैया किन्तु आगे से ठाकुर को पागल न कहना। यह मैं न सहूँगी”।

क्रोध में आकर ढेर सारी मछली और भात हृदय की थाली में उलट दिया। भोजनभट्ट हृदयराम परम निर्लज्ज स्वाद ले लेकर खाता रहा। जल से भरा लोटा आगे धरकर शारदा बाहर चली आई।

उधर मत्स्याकुल जिह्वावाले ठाकुर रसोईघर के द्वार तक आ गए।

“ऐसी मछली क्यों पकाती हो लाटू की माँ कि मुझे मेरे दामोदर बिसर गए” ठाकुर ने पूछा और भीतर हृदय को खाता देखने लगे।

“आप के लिए लाती हूँ भोजन मैं अभी” शारदा ने कहा और भीतर दौड़ गई।

ठाकुर एक पाँव टेढ़ा किए खड़े थे जब शारदा लौटी। बहुत अबेर की भोजन से भारी थाली लाने में। शारदा ने सजलचक्षु ठाकुर के हाथ में थाल दे दिया। ठाकुर कोने में बैठ गए और थकी उठा उठाकर गन्ध लेने लगे।

“लाटू की माँ, मछली की सुवास तो है किन्तु मछली का एक टुकड़ा नहीं मिलता। केवल भात भात?”

शारदा से कुछ कहा नहीं गया। नेत्रों से जल गिरता जाता था। इतने में डकारता हृदय बाहर आया, “मामा, मामी को अभी पता नहीं अपने भाँजे का भोजन। थोड़ी सी ही मछली थी, मैं खा गया”।

ठाकुर ने कुछ नहीं कहा। मौन अंगुली चाट चाटकर खाते रहे।

“हृदू ने खाया मैंने खाया, एक बात है” ठाकुर ने कहा। टूटे हाथ के कारण खाने में बहुत कष्ट था उन्हें।

“त्रयोदशी से निकले तो कल पहुँचे। बीच बाट मैं मरणशय्या पर जा पड़ी। लगा आपसे भेंट अब चिता पर ही होगी” शारदा ने कहा। मछली बनने की सुवास ऐसा आनन्द भरती है कि बड़े बड़े मौनव्रती, मितभाषी वाचाल हो उठते है तो यह तो स्वामी से बात कहने को आतुर शारदा थी।

“ठाकुर ने आधा भोजन करके ही हाथ धो दिए। तेरी बृहस्पतिवार की यात्रा के कारण ही मेरा हाथ टूटा है। घर के बड़ेबूढ़ों ने बताया नहीं कि बृहस्पतिवार को घर नहीं छोड़ते” ठाकुर की आँखों में जल भर आया ऐसा कष्ट था उन्हें अपनी टूटी हाड़ से ।

शारदा निनिर्मेष ठाकुर को देखती रही। पेड़ा थाल में बिना खाया ही पड़ा था। स्वामी का आदेश टालना तब की स्त्रियों की कल्पना में भी न था। शारदा उठी और सूखने को डाले अपने वस्त्र बटोरने लगी। सूझ नहीं पड़ता था कौन विध पिताजी से कहेगी कि मुझे भी संग जयरामवाटी ले चलो। रसोई करते दिवस बीत गया था। तिमिर घिरने लगा था। सँझबाती की बेला लग गई थी।

“रात्रि को निकलना ठीक नहीं। कल भोर होते ही जाना। इस असगुन को उलटा करोगी तब ही मेरे हाथ की हाड़ जुड़ेगी” ठाकुर ने कहा और कालीमन्दिर की ओर चले गए।

शारदा पेड़ों से भरे डाले के सम्मुख बैठी रही।

सौतुक पर प्रकाशित इस उपन्यास के बांकी अंश आप दिए गए लिंक पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं.  

षोडशी की षोडशोपचार उपासना १

षोडशी की षोडशोपचार उपासना २

षोडशी की षोडशोपचार उपासना ३

षोडशी की षोडशोपचार उपासना ४

षोडशी की षोडशोपचार उपासना ५

षोडशी की षोडशोपचार उपासना ६

षोडशी की षोडशोपचार उपासना ७

षोडशी की षोडशोपचार उपासना ८

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