छोटे लोगों की बड़ी दुनिया: स्वयं प्रकाश से मीनाक्षी बोहरा की रोचक बातचीत

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तस्वीर पोषम पा से साभार

जाने माने कथाकार स्वयं प्रकाश की नयी किताब आई है – ‘धूप में नंगे पाँव’, यह उनकी आत्मकथात्मक पुस्तक है जिसमें उन शहरों के रोचक वृतांत हैं जहां वे आजीविका के लिए रहे। इस किताब के बहाने स्वयं प्रकाश के मुंबई प्रवास के फिल्मी जीवन पर मीनाक्षी बोहरा यह रोचक बातचीत :

मीनाक्षी –   सुना है आपने अल्हड़पन के कुछ दिन हिंदी फिल्मों की दुनिया में भी कुछ ज़ोर  आज़माइश की थी! इस बारे में आपने कभी किसी को कुछ बताया नहीं! क्या हमें बताएँगे?

स्वयं प्रकाश –  फिल्मों में जाने-करने की कोई तमन्ना मुझे कभी नहीं थी. मैंने वहां किया भी कुछ नहीं। इसलिए बताने लायक कुछ नहीं है। फ़िल्मी दुनिया से मेरा परिचय केवल संयोगवश हुआ, वह भी मेरे मित्र मदन मोहन सिन्हा के कारण।

मीनाक्षी –   क्या ये वही मदन मोहन सिन्हा है जो आपके उपन्यास “जलते जहाज़ पर” में आये हैं?

स्वयं प्रकाश –  हाँ, वही।

मीनाक्षी –   इनसे आपकी मुलाकात कहाँ और कैसे हुई?

स्वयं प्रकाश –  इनसे मेरी मुलाक़ात एक नाव पर हुई।

मीनाक्षी –    नाव पर?

स्वयं प्रकाश – जयंती शिपिंग कम्पनी का मालवाहक जहाज “आदि जयंती” बम्बई के समुद्र में लंगर डाले  खड़ा था। दिन भर के काम के बाद मैं मझगांव डॉक की नाव से लौट रहा था। नाव में गोदी के मजदूर भरे हुए थे। दिन भर के काम के बाद श्लथ, चुप, निर्जीववत।  अँधेरी रात थी। चारो तरफ पानी के थपेड़े  और ऊपर तारों भरा आसमान। मैं नाव के एक किनारे पर बैठा फैज़ की नज़्म गुनगना रहा था – “ये दाग  दाग उजाला ये शब् गजीदा सहर”…. गुनगुना क्या, गा  ही रहा था शायद। जैसे समुद्र की लहरों को ही सुना रहा हूँ। सुबह से किसी से कोई बात नहीं की थी। एक शब्द  तक नहीं। अचानक मुझे लगा कोई मेरे बिलकुल पास ही बैठा है और बड़े ध्यान से सुन रहा है। वह मदन मोहन सिन्हा था।

मीनाक्षी – और फिर आपकी उनसे दोस्ती हो गयी?

स्वयं प्रकाश – हाँ।

मीनाक्षी –  आप तो  शायद उनके साथ रहे भी।

स्वयं प्रकाश – हाँ। जब उसे पता चला कि  मैं अँधेरी स्टेशन के प्लेटफॉर्म पर सोता हूँ तो वह मुझे अपने साथ अपनी दस बाय दस की खोली में ले आया। अंधेरी की उस झोंपड़पट्टी का नाम था गाँव देवी डोंगरी।

मीनाक्षी –    मदन मोहन सिन्हा का फिल्मों से क्या कनेक्शन था?

स्वयं प्रकाश –  वह फिल्मों का ही  था।  डायरेक्टर बनने ही बनारस से आया था और कई सालो से फिल्मों में असिस्टेंट डायरेक्टर का काम कर रहा था  लेकिन असिस्टेंट डायरेक्टर की कोई दस से पांच की नौकरी तो होती नहीं। ये तो फ्री लांसिंग की तरह है। शूटिंग चल रही है तो आप असिस्टेंट डायरेक्टर हैं , शूटिंग नहीं चल रही तो आप बेरोज़गार हैं। तो काम चलाने के लिए ,बने रहने के लिए कुछ न कुछ और करना पड़ता है।  सब करते हैं। कोई दरजी है, कोई केटरर। मदन शोर  फिटर  था।

मीनाक्षी – शोर  फिटर! ये किस तरह का काम होता है?

स्वयं प्रकाश – जब जहाज़ तीन-चार महीने यात्रा करके लौटता है तो उसे रंग -रोगन, सार-सम्हाल, मरम्मत वगैरह की ज़रुरत होती है। आप तो जानती है समुद्र का पानी खारा होता है। वह लोहे को भी खा जाता है। इस्पात में भी छेद कर देता है। तो जहाज़ को अगली यात्रा के लिए  तैयार करने के लिए बहुत काम करना पड़ता है। इसके लिए अतिरिक्त श्रमिकों की ज़रुरत पड़ती है। उन श्रमिकों में जो सेमी  स्किल्ड होते हैं उन्हें शोर फिटर  कहा जाता है।

मीनाक्षी – क्या वहां बहुत मेहनत करनी पड़ती थी?

स्वयं प्रकाश – हाँ, मेहनत तो बहुत करनी पड़ती थी, लेकिन मज़ा भी बहुत आता था। पहली बात तो खाना बहुत बढ़िया मिलता था। अनेक चीज़ें वहां मैंने पहली बार देखीं। जैसे  डेनमार्क का दूध, जैसे जलमुर्गी का गोश्त, जैसे शेम्पेन, जैसे पुडिंग, जैसे यूरोप का पोर्क, जैसे बीफ। .. और इतना ही नहीं, सात रुपये रोज़ तनख्वाह भी थी जो बगैर किसी झंझट नगद मिल जाती थी।

मीनाक्षी – तो मदनजी आपको फिल्मों के सेट पर ले गए?

स्वयं प्रकाश – हुआ ये की किसी ने आकर बताया कि  कमालिस्तान में कल से “दस्तक” की शूटिंग हो रही है और उन्हें असिस्टेंट डायरेक्टर की ज़रुरत है। अब मदन ने सोचा कि  जहाज़ तो फिलहाल कोई आया हुआ है नहीं। तो ये… यानी  मैं, यहाँ बैठा-बैठा क्या करेगा? तो चलो इसको भी ले चलते हैं। शूटिंग देखेगा। और कुछ नहीं तो यूनिट के साथ खाना तो इसको भी मिल जायेगा। और जम गया तो लॉरी भाई से बोल कर इसको भी लगवा देंगे। चार पइसे ही मिल जायेंगे।

मीनाक्षी – और आप जाने के लिए तैयार हो गए?

स्वयं प्रकाश – शायद नहीं होता, लेकिन जब मदन ने बताया कि  इस फिल्म के डायरेक्टर राजेन्द्रसिंह बेदी हैं और बाकी  सारी  टेक्नीकल टीम स्वर्गीय बिमल रॉय की है तो मैं एक मिनिट  में तैयार हो गया। राजेन्द्रसिंह बेदी मेरे प्रिय.. कहना चाहिए बहुत ही प्रिय कहानीकार थे।  हाल ही सारिका में उनकी कहानी “मिथुन” छपी थी, जिसे पढ़कर मैं अभिभूत था। मैंने सोचा बेदीजी से मिलना कितने बड़े सौभाग्य की बात होगी। उनके पाँव छू  लूँगा। हालाँकि उनसे मिलने के बाद पाँव वगैरह छूने की बात हास्यास्पद  लगने लगी। अच्छा हुआ इसकी कोशिश भी नहीं की, वर्ना उनके साथ-साथ दूसरे भी हंस पड़ते।

मीनाक्षी – क्यों? वो पाँव नहीं छुआते थे?

स्वयं प्रकाश – कोई पाँव छूने की कोशिश करे तो उसे गले लगा लेते थे। मैंने अपनी ज़िंदगी मैं कभी ऐसा कोई सरदार नहीं देखा था जो धकाधक सिगरेट पी रहा हो और सरदारों पर जोक सुना रहा हो। खैर, पहले दिन तो उनसे मुलाकात हुई ही नहीं, लेकिन मुझे काम पर रख लिया गया।

मीनाक्षी – लेकिन उस काम के बारे में आप कुछ जानते तो थे नहीं। फिर?

स्वयं प्रकाश – मीनाक्षी जी जैसे जहाज़ पर वैसे ही फिल्मों में। वैसे ही शादी-ब्याह में। या सभा-सम्मलेन में। जब ज़्यादा काम हो तो अतिरिक्त श्रमशक्ति की आवश्यकता पड़ती ही है। कोई ज़रा पानी पिला दे, फर्श साफ कर दे , बाहर  से फलां साहब को बुला लाये, गमले को इधर से उठाकर उधर रख दे, साहब के लिए टेक्सी बुला लाये, ड्रायवर से कहे गाड़ी ले आये। ..ऐसे छोटे-मोटे  पचासों काम होते हैं या हो सकते हैं।  तो उन्हें करने के लिए किसी भारी स्किल की तो ज़रुरत नहीं होती, बस आवाज़ दो और बन्दा  हाज़िर होना चाहिए।  और बगैर चूं-चपड़ हर काम करने को  राज़ी। उसी का डिग्नीफाइड नाम वहां है असिस्टेंट डायरेक्टर। हालाँकि मदन भी असिस्टेंट डायरेक्टर ही था, लेकिन उसका दर्ज़ा कुछ ऊंचा था। वह क्लेप  भी देता था और कंटीन्यूटी शीट भी लिखता था जोकि फिल्म निर्माण का एक जरूरी हिस्सा होता था।

मीनाक्षी– तो दूसरे दिन क्या हुआ?

स्वयं प्रकाश – हाँ, बेदी साहब आये, बेटे नरेंद्र बेदी और हीरोइन रेहाना सुल्तान के साथ, लेकिन उनसे बात करने की मेरी हिम्मत ही नहीं  हुई। बस, चुपचाप उन्हें देखता रहा। उस दिन वैश्याओं  के मोहल्ले में नायक द्वारा लिए गए घर के अंदर का दृश्य शूट होना था। बेदीजी के बेटे नरेंद्र ने उनके कान में कुछ कहा। बेदीजी ने ऊँची आवाज़ में पूछा – “कोई पान खाता है? पान?”  इत्तेफाक से  यूनिट में सिर्फ मदन पान खाता था। बेदी साहब ने दो बार पूछा तो मदन ने झिझकते हुए हाथ खड़ा कर दिया। बेदी  साहब ज़ोर से बोले – “थूको!”  मदन पान थूकने के लिए बाहर जाने लगा। बेदी साहब बोले – “यहां थूको! दीवार पर थूको।”  यानी  सेट की दीवार पर थूको। और मदन ने सेट की दीवार पर ऐसी शानदार पीक मारी कि  बेदी  साहब को मज़ा आ गया। जेब से सौ का नोट निकालकर मदन की तरफ बढाते हुए बोले –  “शाबाश पुत्तर! खूब पान खा और खूब थूक!!”  उस ज़माने में अँधेरी से चर्चगेट का मंथली पास छह रुपये में बन जाता था, चारमीनार की डिब्बी  दो आने में आती थी, और  किसी भी ईरानी होटल में जाकर आप छह आने में खाना खा सकते थे, ये मैं इसलिए बता रहा हूँ  कि  सौ रुपये तब कितनी बड़ी रकम होती थी!

मीनाक्षी – उस फिल्म में तो हीरो शायद संजीव कुमार थे।

स्वयं प्रकाश –  हाँ। उनका नाम हरिभाई था। तब तक उनकी केवल एक फिल्म रिलीज़ हुई थी – ‘’निशान ।” और उनकी फ़ीस थी दो लाख। “गौरी” बन रही थी और वह कहते थे कि “गौरी” रिलीज़ होने के बाद मैं एक फिल्म के तीन लाख लूँगा। संजीव कुमार के पास कार नहीं थी। मैं या मदन शूटिंग के बाद उनके लिए टेक्सी बुला देते थे। स्टूडियो चूंकि कमाल अमरोही का ही था इसलिए वह अक्सर कुरता-पजामा पहने आ जाते  थे और इस-उस से गप्पें लडाते रहते थे। “पाकीज़ा” बनी नहीं थी और सुनने में आ रहा था कि  कमाल  अमरोही  संजीव कुमार को “पाकीज़ा”  में लेना चाह रहे हैं लेकिन संजीव कुमार मीनाकुमारी के अपोज़िट काम करने को राजी नहीं हो रहे।

मीनाक्षी – फ़िल्मी दुनिया में आप और किस-किस से मिले?

स्वयं प्रकाश –  मीनाक्षीजी फ़िल्मी दुनिया छोटे लोगों की बड़ी दुनिया है। बड़े लोग तो दस-बीस ही हैं ,और वो जनता के लिए सुलभ नहीं हैं।  बाकी  सारे अभी हैं अभी नहीं हैं। वे न जाने कहाँ -कहाँ रहते हैं, न जाने क्या-क्या काम करके ज़िंदगी चलाते हैं और उनके भीतर एक ऐसा कीड़ा है कि  फिल्मों में आये बगैर रह भी नहीं पाते। ऐसे लोग तब फिल्म सेंटर और फेमस सिने  लेब के आसपास रोज़ देखे जा सकते थे। कोई उन्हें पहचान ले या मुड़ -मुड़कर देख ले  कि  अरे ये तो वही है जिसे हमने अमुक फिल्म  में एक छोटे से रोल में देखा था, तो उनकी आत्मा तृप्त हो जाती थी। उन्हें लगता था वे स्टार बन गए  और कि  इसीलिए तो वे आये थे!! लेकिन फ़िल्मी दुनिया इन्ही सिरफिरे फिटमारों के दम पर टिकी हुई है। ऐसे बहुत से लोगों से मैं मिला और मैने उन्हें बहुत करीब से देखा, और देखकर दुखी हुआ, बेशक मदन उर्फ़ मदन मोहन सिन्हा, असिस्टेंट डायरेक्टर भी इन्ही लोगों में से एक थे जिनका  बाद में न जाने क्या हुआ। वहां ऐसा ही होता है। दस-बारह साल स्ट्रगल करने के बाद भी जब कुछ नहीं हो पाता तो कोई ड्रग  ट्रेफिकिंग में चला जाता है, कोई स्मगलिंग में  तो कोई वैश्यावृत्ति में।  चमचमाते परदे के पीछे बहुत घना अँधेरा है।

धुप में नंगे पाँव

मीनाक्षी – क्या वहां  कामगारों की सुरक्षा की कोई व्यवस्था नहीं है?

स्वयं प्रकाश – होने को तो सब था। खुद हमारी असिस्टेंट डायरेक्टर असोसिएशन थी, लेकिन काम करवाकर पैसे न देना वहां अपवाद नहीं नियम था। इसीलिए वहां  इतना फ्रस्ट्रेशन था। अच्छे-अच्छों को मैंने इस हालत में देखा। विजय आनंद  मेरे सामने किसी से कह रहे थे  – मैंने नासिर हुसैन के लिए “तीसरी मंज़िल” बनायी और फिल्म हिट होने के बावजूद उसने मुझे एक पैसा नहीं दिया, लेकिन मैं उससे मांगने नहीं जाऊँगा, मैं डायरेक्टर हूँ, मेरी भी कोई डिग्निटी है। बताइये। और यह कोई अकेला मामला नहीं। खुद नरेंद्र बेदी का  भी यही किस्सा था। वह “मेरे सनम” जैसी हिट फिल्म बनाने के बाद भी पुरशिकायत थे।

मीनाक्षी – तो यह तो एक नियमहीन बाजार हुआ, फिर फिल्म को कला क्यों  कहते हैं? क्या आप फिल्म को कला मानते हैं?

स्वयं प्रकाश –  हर कला के पीछे की अनकही  सच्चाई यही है। क्या आर्ट गेलेरी वाले चित्रकारों को उनके चित्रों का वाजिब दाम देते हैं? क्या नाटक के कलाकारों को उचित पारिश्रमिक मिलता है? और दूर क्यों जाएँ साहित्य में ही देख लीजिये…क्या प्रकाशक लेखकों को ईमानदारी से रॉयल्टी का भुगतान करते हैं? हर कलाकार कहीं न कहीं शोषण का शिकार है।  लेकिन उसके भीतर जो आत्मा है उसे कला की ऐसी अद्भुत प्यास है कि  वह इसे छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकता। जावेद अख्तर ने गीतकारों को रॉयल्टी का बिल पास करवाया और देख लीजिये क्या हुआ! अगर भीतर की कोई विवशता नहीं होती तो मैं क्यों लिखता? आराम से किसी बाजार  में घी की दूकान खोलकर नहीं बैठ जाता? और फिल्मों में तो ऐसे उदाहरण भरे पड़े हैं. अपने उठान के दिनों में जिनके पैर  ज़मीन पर नहीं पड़ते थे वे अंतिम दिनों में फुटपाथ के भिखारी की तरह मरे। इसलिए आज हर सितारे का पैसा दूसरे धंधों में लगा हुआ है। सब समझ गए हैं -कलाकार भी और खिलाडी भी – कि  ये चार दिन की चांदनी है…इससे ज़्यादा इस पर तकिया नहीं किया जा सकता।

मीनाक्षी – कलाओं से तो कहा जाता है कि  ज़माने बदल जाते हैं। प्रेमचंद तो साहित्य को राजनीति  के आगे चलनेवाली मशाल कहते थे। कलाकारों को युगनिर्माता माना जाता है। क्या ये बातें झूठी हैं?

स्वयं प्रकाश – कौन कहता है साहित्यकार या कलाकार को युगनिर्माता? क्या आज तक किसी वैज्ञानिक ने ऐसा कहा? समाजशास्त्री ने? दार्शनिक ने? साहित्यकार खुद  ही कहे तो ये तो अपने मुंह मियां मिट्ठू बनने वाली बात हो गयी।  मुझे तो नहीं याद कि  कभी किसी कला ने या साहित्य ने ज़माना बदला हो! सामंती समाज में तो ये राज्याश्रय में थे। और आज भी ये दर्शक से ज़्यादा प्रायोजक, और पाठक से ज़्यादा प्रकाशक तथा आलोचक से ज्यादा पुरस्कारदाता ढूंढते नज़र आते हैं। कोई नाटक संस्थनिक सहायता के बगैर नहीं होता। अच्छे-अच्छे कामों के पीछे कॉर्पोरेट का पैसा नज़र आ जाता है। उनकी तथाकथित सोशल रेस्पोंसिबिलिटी का फंड। ये क्या खाक ज़माने को बदलेंगे? ये अपना शोषण बंद करवा लें वही बहुत है।

मीनाक्षी – क्या कलाएं पाठक या भावक की मानसिकता को नहीं बदलतीं? क्या मानसिकता को बदले बगैर किसी भी प्रकार का जनस्वीकार्य सामाजिक परिवर्तन संभव है?

स्वयं प्रकाश – ये तो आप ठीक कह रही हैं। लेकिन कलाकार भावुक प्राणी होता है। क्रांति के बाद जब लेनिन रूस में सामाजिक परिवर्तन के कदम उठाने लगे तो गोर्की से देखा नहीं गया। उन्होंने न सिर्फ लेनिन के क़दमों का विरोध किया बल्कि अपनी अलग पार्टी तक बना ली। तब लेनिन ने उन्हें इटली भेज दिया। जाओ दोस्त, थोड़ा घूम फिर आओ, ताकि पीछे से हम अपना ज़रूरी काम आराम से कर सकें।

मीनाक्षी -आप एक क्रॉनिक  आशावादी रहे। आपसे गतिशील और सक्रिय-सकर्मक रहने की प्रेरणा मिलती थी। क्या आप अवसाद में चले गए हैं…..  हताश हो चुके हैं?

स्वयं प्रकाश – मैं समय के साथ  थोड़ा व्याव्हारिक हो चला हूँ। यह शायद अभी आपको अच्छा न लगे। कई चीज़ें देर से समझ में आती हैं। भारतीय साम्यवादी आंदोलन की भूलों पर कभी खुलकर चर्चा नहीं हुई। केरल, त्रिपुरा और पश्चिम बंगाल की सरकारों की कारकर्दगी पर एक इतिहासकार की नज़र से दृष्टिपात करने की आवश्यकता है। साहित्य में भी प्रगतिवाद, प्रगतिशील आंदोलन और साहित्य के  संगठनों के क्रमिक क्षय का विश्लेषण मुझे ज़रूरी लगता है। सोवियत संघ के पतन के बाद मैं अत्यंत विक्षुब्ध था। मैंने अपने तमाम वरिष्ठ साथियों और मित्रों को पत्र लिखकर पूछा कि  ये क्या चल रहा है? सबने एक स्वर से कहा कि  सब कुछ ठीकठाक है। चिन्ता  की कोई बात नहीं है। इनमें वे मित्र भी थे जो स्वयं सोवियत संघ हो आये थे। उनहोंने भी हमें सच्ची बात नहीं बताई। और देखते-देखते सोवियत संघ और पूर्वी यूरोप का नक्शा बदल गया. बगैर एक भी बन्दूक की गोली या तोप का गोला  छूटे समाजवाद को हटाकर उसका  स्थान  पूंजीवाद ने ले लिया।

जब  जनवादी लेखक संघ की स्थापना हो रही थी, तब भी यह प्रश्न मैंने उठाया था कि  लेखक संगठनों को राजनीतिक पार्टियों का उपनिवेश बनने देना ठीक है क्या? फिर पार्टियों को उनकी भूलें कौन बताएगा? आप ध्यान दीजिये, इंदिरा गाँधी की हत्या के बाद के माहौल पर हिंदी साहित्य में सिर्फ दो कहानियां हैं। एक भीष्म साहनी की “झुटपुटा” और दूसरी मेरी  -“क्या तुमने कभी कोई सरदार भिखारी देखा?” जब सुभाष का नाम भी लेना कोई कम्युनिस्ट पसंद नहीं करता था, मैंने “नेताजी का चश्मा” कहानी लिखी। जब ट्रेड यूनियन के खिलाफ कोई एक शब्द भी सुनना  पसंद नहीं करता था मैंने “संहारकर्ता” कहानी लिखी, जब निर्मल वर्मा नामवर जी के लिए नई  कहानी के पहले कहानीकार थे, मैंने उनके धुंधलके जैसे कला व्यवहार पर अपने संस्मरण में सवाल उठाया। जब दलित साहित्य पर ऊँगली उठाना पाप समझा जा रहा था, मैंने सम्बोधन के अपने स्तम्भ में उसकी गफलत को रेखांकित किया।

जब कमल प्रसाद जी ने वसुधा को प्रगतिशील लेखक संघ की पत्रिका घोषित कर दिया, कई लोगों के मुंह का स्वाद कड़वा हो गया। उनका ख़याल था कि इसमें सिर्फ मध्यप्रदेश के ही लेखकों की रचनाएँ छापें तो ठीक होगा। स्त्रियों के सवाल पर मेरे मन में एक प्रश्न उठा था। प्रश्न यह था कि  1857 में स्त्रियां हैं, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में भी  स्त्रियां हैं, 1917 की क्रांति में स्त्रियां क्यों नहीं हैं? क्या इतनी बड़ी और ऐतिहासिक क्रांति जिसने ज़ार का तख्ता पलट दिया और दुनिया में पहली बार मजदूरों-किसानों की सरकार बनाकर दिखा दी, क्या बगैर स्त्रियों के सहयोग और बलिदानों के संभव हो सकती थी? फिर हम उनमें से दो-चार के नाम भी क्यों नहीं जानते? एक और ऐसा ही सवाल मैंने उठाया। जब तीसरी दुनिया के देशों की भी राष्ट्राध्यक्ष स्त्रियां हो सकती हैं तो आज तक किसी समाजवादी राष्ट्र की राष्ट्राध्यक्ष कोई स्त्री क्यों नहीं हुई? और आप जानती हैं पार्टी वालों ने मुझे क्या जवाब दिया? पार्टी वालों ने मुझे कोई जवाब नहीं दिया। कुंठित होकर मैंने वसुधा का संपादक पद छोड़ दिया।

मीनाक्षी – हम फिल्मों की बातें करते-करते कहाँ निकल आये!

स्वयं प्रकाश – ठीक है। फिल्मों पर लौटते हैं। हिंदी फिल्मों में समांतर का आंदोलन कितने उत्साह के साथ आया था! क्या-क्या आशाएं नहीं जगाई थीं उसने? फिर क्या हुआ? “मृगया” के मिथुन चक्रवर्ती डिस्को डांसर कैसे बन गए? “अंकुर”  के नसीरुद्दीन शाह तिरछी टोपीवाले कैसे बन गए? ‘आक्रोश’ के ओम पुरी कहाँ पहुंच गए? क्या इन लोगों में  कभी भी कोई सच्चा कमिटमेंट रहा था? या ये सब मौके की तलाश में वाम विचार को सीढी की तरह इस्तेमाल कर रहे थे? या वह सिर्फ जवानी का नशा था? ऐसे ही लोगों को ध्यान में रखकर मैंने कहानी “बस ” लिखी थी।

मीनाक्षी – स्वयं प्रकाश जी, आपके विचार बहुत डिप्रेसिंग, बहुत बेचैन करनेवाले और उदासी  फैलानेवाले हैं। मुझे डर है कि  आपका इंटरव्यू करने के बाद घर पहुंचकर मैं बीमार न हो जाऊं!! क्या आपको सचमुच लगता है कि  अब कोई उम्मीद नहीं बची है?

स्वयं प्रकाश –  ऐसा मैंने कब कहा? ऐसा तो मैंने बिलकुल नहीं कहा। कोई नेताओं से नाउम्मीद हो सकता है, राजनीति  से नाउम्मीद हो सकता है, कलाओं से और  कलाकारों से नाउम्मीद हो सकता है,लेकिन कोई लोगों से कैसे नाउम्मीद हो सकता है? और वो भी अपने देश के लोगों से? ये वही लोग हैं जिन्होंने सतत्तर में प्रधानमंत्री और उनके लाड़ले बेटे-दोनों की जमानत जब्त करवा दी थी और बगैर खून की एक भी बूँद गिराए दिल्ली की सल्तनत का तख्ता पलट दिया था। इतिहास में पहले कभी ऐसा नहीं हुआ था।

मीनाक्षी – तो क्या समांतर सिनेमा वालों ने जनता की उपेक्षा की?

स्वयं प्रकाश – वे अहंकारी थे। वे व्यावसायिक सिनेमा को बहुत नीची नज़र से देखते थे। व्यावसायिक सिनेमा के लोकप्रिय अभिनेता उनकी नज़र में कछुए थे। वे अपने अधकचरे ज्ञान के सामने बाकी सबको मूर्ख समझते थे। वे जनता की पसंद-नापसंद को कोई महत्व नहीं देते थे। वे कन्फ्यूज़्ड थे या शायद सूड़ो इंटेलेक्चुअल थे। मैं आज ही ये बात नहीं कह रहा हूँ, बरसों से कह रहा हूँ कि  जनता की कला को नीची नज़र से नहीं देखना चाहिए, लोकप्रिय कलाओं के प्रति साहित्यकारों  का भी  नज़रिया कोई खास  अलग नहीं है।

मीनाक्षी – ये भी तो हो सकता है कि  जो फिल्म में पैसा लगाते हैं उन्हें समांतर वालों की बात जँची  न हो!

स्वयं प्रकाश – हाँ हो सकता है। लेकिन उसके लिए फिल्म फायनेंस कॉर्पोरेशन था। मीनाक्षीजी, फिल्म एक अद्भुत कला है।   उसमें भाषण और आह्वान नहीं चलते। हिंदी फिल्मों के महान निर्देशक जनता की रुचियों को समझते थे। बिमल रॉय, शांताराम, राज कपूर, गुरुदत्त, महबूब ये पढ़े-लिखे लोग थे, सिनेमा की कला को समझते थे, कैमरे के जादू से वाकिफ थे। और कमिटेड भी थे। समय-समय पर जैसे इशूज़ उन्होंने उठाये हैं और उन्हें बेहद कलात्मक और प्रभावशाली ढंग से परदे पर उतारा  है और दर्शकों के लिए सहज स्वीकार्य बनाया है, उसे कतई  पलायनवादी सिनेमा नहीं कहा जा सकता। आप कैसे परिवर्तनकामी कलाकार हैं जो नृत्य और संगीत से चिढ़ते हैं!

मीनाक्षी – ऐसा तो उन्होने  कभी नहीं कहा कि  वे नृत्य और संगीत से चिढ़ते हैं।

स्वयं प्रकाश – ठीक है, तो इतनी समांतर फ़िल्में हिंदी में बनी हैं, आप मुझे उनका कोई एक नृत्य प्रसंग याद दिला दीजिये। या कोई एक गीत याद दिला दीजिये।

मीनाक्षी – जब एक मिशन के साथ कोई काम किया जाता है ..

स्वयं प्रकाश – … सिर्फ मिशन या सन्देश से कोई सिनेमा श्रेष्ठ सिनेमा नहीं होता। शांताराम ने “दहेज़”  बनायी, महबूब ने  “औरत” और  “रोटी” बनायीं, गुरुदत्त ने  “प्यासा”  बनायी, राज कपूर ने  “आवारा”  बनायी, बिमल रॉय ने  “दो बीघा ज़मीन”  और  “सुजाता” बनायीं। … क्या इनमें कोई मिशन नहीं था? रूस का उदाहरण देखिये। क्रांतिपूर्व रूस में  कालजयी साहित्य लिखा  गया। तोल्स्तोय, मायकोव्स्की , पुश्किन, गोर्की, दॉस्तोयव्स्की, चेखव, गोगोल जैसे महान  रचनाकार हुए। क्रांति के बाद तो इससे भी बेहतर रचनाएँ सामने आनी  चाहिए थीं! क्या वे आयीं?  क्यों नहीं आयीं? उनहोंने एक नया  टर्म विकसित किया –  समाजवादी यथार्थ। उसमें सारा ज़ोर मिशन या सन्देश पर ही रहता था। वह सारा -इक्का दुक्का अपवादों को छोड़कर -काल के गाल में समा  गया।

मीनाक्षी – लेकिन वह दौर तो बीत गया। आज का कमर्शियल सिनेमा पलायनवादी नहीं है तो क्या है?

स्वयं प्रकाश – नहीं बीता। क्या “तारे ज़मीन पर” में कोई सन्देश नहीं है? “क्या मुन्नाभाई”, “थ्री इडियट्स” और “पी के” में कोई सन्देश नहीं है ? क्या  “पीकू” बाप और बेटी के रिश्ते की एक बिल्कुल नई परिभाषा नहीं गढ़ती? क्या  “पिंक” स्त्रियों की स्वतंत्रता के पक्ष में एक ताकतवर बयान नहीं है? लेकिन इन फिल्मों में सिर्फ मिशन या सन्देश ही नहीं है… एक भरा पूरा जीवन अनुभव है। हम “चिल्लर पार्टी” और “जॉली  एलएलबी” से लेकर “क्वीन”, से होते हुए “अक्टूबर” और “न्यूटन” तक की बात इसी रौ  में कर सकते हैं।

मीनाक्षी – क्या ये बात कहानी-कविता पर भी लागू होती है?

स्वयं प्रकाश – पूरी तरह। प्रगतिवाद और जनवाद के अवसान की कहानी इसी रौशनी में देखी  जानी  चाहिए। बल्कि मैं तो एक बात और कहता हूँ। श्रेष्ठ कला हमें आनंद के एक उच्चतर आलोक में ले जाती है। वह हमारे सौंदर्यबोध को प्रक्षालित करती है और हमें सुन्दर चीज़ों से प्यार करना सिखाती है। लेकिन इससे भी पहले वह हमें सुंदरता की प्रतीति कराती है। धरती की सुंदरता…. संबंधों की सुंदरता…. मनुष्य स्वभाव की सुंदरता   वह हमें उदात्त बनाती है। हम मनुष्यता के पक्ष में और मनुष्यता के शत्रुओं के विरोध में संकल्पबद्ध हो जाते हैं। बस, कलाओं का यही काम है।

मीनाक्षी – क्या कलाएं व्यवस्था परिवर्तन की चेतना पैदा नहीं करतीं?

स्वयं प्रकाश – मीनाक्षीजी, कलाओं का जीवन में उतना बड़ा स्थान नहीं है जितना हम समझते आये हैं या जितना हमें बताया जाता रहा है। आप ताज्जुब करेंगी, इधर तो मुझे ये लगने लगा है कि सारी कलाएं मिलकर भी ज़िंदगी को जितना बदल पाती  हैं उससे ज़्यादा टेक्नोलोजी बदल देती है। आपको ऐसा नहीं लगता? आप देखिये… स्त्री विमर्श के सारे  आंदोलन एक तरफ और गर्भनिरोधक एक तरफ-किसने औरतों की ज़िंदगी को ज़्यादा बदला? सारी  दुनिया का बाल साहित्य एक तरफ और मोबाइल एक तरफ- कौन बच्चों की दुनिया को ज़्यादा प्रभावित कर रहा है? सारी  दुनिया के पुस्तकालय-वाचनालय एक तरफ और इंटरनेट एक तरफ – कौन विद्यार्थियों के जीवन को ज़्यादा बदल रहा है?

मीनाक्षी – स्वयं प्रकाशजी, आप बहस के नए-नए मोर्चे खोलते जा रहे हैं। उधर भाभीजी  तीन बार आकर झाँक गयी हैं। मैं आपका और समय लेने की धृष्टता नहीं कर सकती..लेकिन बताना चाहती हूँ कि  ये बातचीत अभी ख़तम नहीं हुई है। आपसे एक बार और बैठकर लम्बी बातचीत करना पड़ेगी। फिलहाल इस दिलचस्प, लम्बी और विचलित करनेवाली बातचीत के लिए धन्यवाद।

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