बरगद का सूख जाना या मर जाना नहीं होता: मंज़ूर एहतेशाम

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मंज़ूर एहतेशाम

वर्ष 1948 में जन्में और आज़ाद भारत के अब तक के सारे उतार-चढ़ाव का गवाह बने अप्रतिम लेखक मंज़ूर एहतेशाम ने हिंदी समाज को कुछ विरल रचनाएं दी हैं। उपन्यास के तौर पर सूखा बरगद, दास्तान-ए-लापता, कुछ दिन और बशारत मंज़िल इत्यादि को याद कर सकते हैं। अपनी सबसे प्रिय विधा- कहानी- से भी इन्होंने पाठकों के संसार को काफी समृद्ध किया है। किसी भी हिंदी के गंभीर पाठक के लिए इनका संग्रह तसबीह, तमाशा तथा अन्य कहानियाँ से गुजरना ऐसी यात्रा है जिसे पाठक कभी भूलना नहीं चाहेगा। स्वर्गीय सत्येन कुमार के साथ मिलकर आपने ‘एक था बादशाह’ नाम से एक नाटक भी लिखा। इन सब के बावजूद आप तमाम साहित्यिक दाव-पेंच से एक ख़ास दूरी बनाए रखे रहे। शायद यही वजह है कि पाठकों को आपके निजी तेवर का इल्हाम नहीं है। इस दूरी को पाटने के लिए सौतुक की तरफ से अनघ शर्मा ने आपसे लम्बी बातचीत की।

अनघ शर्मा

अनघ शर्मा हिंदी के प्रतिभाशाली युवा कथाकार और साहित्य के गंभीर अध्येता हैं। व्यापक विषयवस्तु समेटे और भाषा के धनी अनघ शर्मा की कहानियाँ हंस सहित कई स्थापित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। हाल ही में इनका पहला कहानी संग्रह ‘धूप की मुंडेर’ राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुआ है। पढ़िए साक्षात्कार….

 

उम्र के इस आठवें दशक में कदम रखते हुए नागरिक मंजूर एहतेशाम, रचनाकार मंजूर एहतेशाम को किस तरह देखते हैं? सफल असफल से अलग कोई खाँचा है क्या?

मेरे ख्याल से सफ़ल और असफ़ल के बीच ही शायद कोई खांचा होता है, जो पूरी तरह से कामयाब है या पूरी तरह नाकामयाब है।उसका एक लेखक से मेरे ख्याल से सरोकार बहुत कम है। कुछ लोग अपनी समस्याओं से जूझ रहे हैं और दूसरे लोग दूसरी तरफ जूझ रहे हैं। पर एक बीच वाला आदमी भी होता है जो न कि सिर्फ़ अपना काम करता है बल्कि इसकी तरफ़ भी देखता है और उसकी तरफ भी देखता है। मेरे ख्याल से इस तरह का बंटवारा हुआ है। अगर मैं सवाल को सही समझ कर जवाब दे रहा हूँ तो, नहीं तो मुझे करेक्ट कर दीजिये आप।

आपके उपन्यासों का ‘लोकेल’ भोपाल है। उसका भूगोल है। क्या उसकी स्मृतियाँ भी हैं? या कल्पना है?

इससे मेरे लेखन पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता। लेकिन ईमानदारी की बात ये है के जो हमारा उपमहाद्वीप है और ख़ास तौर पर जो सेन्ट्रल इंडिया का पोर्शन है उसकी नुमाइंदगी, उसका प्रतिनिधित्व ये करता है। उसका जिसे हिंदी स्पीकिंग बेल्ट कहा जाता है। यकीनी तौर पर भोपाल में रहते हुए सारी रचनाएं लिखी गई हैं। यहीं मैं पैदा हुआ हूँ। यही जैसा आपने कहा और डरा भी दिया मुझे के कौन सा दशक……. लेकिन इसे पूरा करने में दस साल लगेंगे अभी तो मैं इकहत्तरवें में आया हूँ। कुछ काल्पनिक और जो यथार्थ आ ही जाता है। क्योंकि फिक्शन जो है वो पूरा के पूरा न तो काल्पनिक होता है न यथार्थ होता है। जीने में और उसका विवरण करने में शायद ये ही बहुत बड़ा फ़र्क है कि आप किस तरह से उसको इंटरमिक्स करते हैं आपस में।

दास्ताने-लापता के जमीर अहमद की आंतरिक यात्रा लेखक मंजूर एहतेशाम के जीवन से कितना अलग है? जमीर अहमद कभी यह बात सामने नहीं आने देता कि उसने कहानियों की किताब लिखी है, दूसरी तरफ मंजूर एहतेशाम भी चर्चा से कोसों दूर रहते हैं। यह संयोग है या प्रत्यावर्तन?

इसमें से जो भी अच्छा लगे वो समझ लें। ईमानदारी की बात ये है कि वो मेरी कहानी है और द्वारा रचित चरित्रों द्वारा कही गयी है। और उस तरह से देखा जाये तो मेरा सारा फिक्शन ही इस तरह से है। ये दस्ताने-लापता ज़रा दिल के ज़्यादा करीब है। क्योंकि इसमें एक रूपक, एक मेटाफर समय का है।  इसके अंदर ख़ुद मेरा वजूद है एक मायने रखता है।  और वो वज़ूद भी विभाजित हो जाता है। जो बीता हुआ समय है और जो जी रहे हैं आप, उनके बीच में एक जिस तरह से, एक अपनी सज़ा काट रहा है। लेकिन एक दूसरा उस पर हँसने वाला भी है जो बीच-बीच में आ कर कमेंट कर जाता है। बुनियादी तौर पर आपके लिखने का ये जो डिज़ाइन है, यह उसी  का हिस्सा है। इस कहानी में यही कहने की कोशिश की थी कि आज़ादी के बाद ये जो इतने साल गुज़ारे हैं, उसमें जो मूल्य थे, जो वैल्यूज़ थीं हमारी जिंदगी में उनका क्या हुआ!

ज़मीर अहमद ने कभी ये नहीं जानने दिया पूरे उपन्यास में चरित्र के तौर पर कि उन्होंने कहानियाँ लिखी हैं, आप भी इस तरह की चर्चा या इस तरह की किसी चीज़ में विश्वास नहीं रखते कि आगे बढ़-चढ़ बोलें। ये साम्य स्वाभाविक रूप से है या ये संयोग हो गया है?

संयोग तो नहीं हो सकता,मुझे नहीं लगता। कहीं मेरे, मेरा स्वाभाव जो है उसके बहुत निकट है। और फिर स्वभावगत जो चीज़ आपको अच्छी लगती है आप उसे ही अपनाते हैं। कई जगह उसको अगर ज़रूरत होती है तो तोड़ने की चेष्टा भी करते हैं। कभी हो सकता है उसमें असफ़ल भी होते हैं। लेकिन वो रहता स्वभावगत ही है बेसिकली।

हरिश्चंद्र की जिंदगी की वह शाम नामक कहानी में यों तो अनेक प्रश्न है, जैसे यही कि शाम ही क्यों? लेकिन जो सवाल मैं पूछना चाहता हूँ वह यह कि सिंह आखिर में गंदी कविता क्यों पढ़ता है? कहीं लेखक यह तो नहीं बताना चाहता कि अच्छी कविता की दुनिया अलग है जो निर्मल है। वह कोई स्वप्नदेश की कल्पना तो नहीं कर रहा? या, कर रहा?

नहीं, नहीं ऐसा कुछ नहीं है। शाम इसलिए है, अक्सर जो बड़े लोग होते हैं उनके नामों की शाम मनाई जाती है। तो यहाँ स.हरिश्चन्द्र के घर में कुछ ऐसा हुआ है जो अभी तक नहीं था। एक संतान की प्राप्ति है। और जब आप एन्जॉय कर रहे होते हैं तो उसमें बहुत सारे लोग बैठे हुए शराब पी रहे हैं, मज़े कर रहे हैं। तो जिंदगी में किया-धरा जो है उसका बही-खाता अलग होता है। मतलब कोई आपको सीरियस, अच्छी बातें सुनाये, कवितायेँ सुनाये तो एक आदमी उस कैफ़ियत में ऐसा भी होगा के वो सिर्फ़ उस रूटीन को तोड़ने के लिए ऐसा करेगा, शायद उससे ज़्यादा उसका पर्पस नहीं है। बेचारा सिंह तो वैसे भी सेल्स टैक्स जो उस ज़माने में जब बहुत ज़्यादा हावी हुआ करता था उसका नुमाइन्दा है। तो वो तो एन्जॉय करने के लिए, शाम का एक हिस्सा बनने के लिए ये सब कर रहा है।

अगला प्रश्न भी उसी कहानी से, हरिश्चंद्र की तुलना तवायफों से करना क्या तवायफों का अपमान नहीं है? तवायफें तो शायद ही चाहें कि चंद पैसों के बदले जो दौलत वो ग्राहकों को देती हैं उसके लिए उन्हें शुक्रिया कहने लोग आए, जबकि हरिशचंद्र चाहता है कि जिन लोगों की उसने मदद की है वो लोग उसे धन्यवाद देने के लिए आयें?

क्या कहीं ये ऑब्वियस नहीं है टेक्स्ट से के शायद हरिश्चन्द्र भी यही सोच रहा है जो आप सवाल के रूप में पूछ रहे हैं। वो मान रहा है कि वो उनसे किसी भी तरह बेहतर नहीं है। वह सजेशन के लेवल पर है। स्टेटमेंट नहीं है, अंडरटोन के लेवल पर है। बात वही है जो कहा जा रहा है। वो अपने आपको उनसे बेहतर किसी भी तरह नहीं समझता।

क्या वह बरगद हरा हो सकता है? कोई उम्मीद? या उसे सूख जाना चाहिए किसी नए दरख़्त को जगह देने के लिए?

नहीं, बरगद का सूख जाना, मुरदार हो जाना या मर जाना ये तो सम्भव होता नहीं है। भले ही आप उसको नया बरगद कहेंगे लेकिन वह बरगद की ही पीढ़ी को आगे चलाएगा। और बरगद से यहाँ मतलब जिंदगी है। तो अगर एक तौर तरीका, एक सिलसिला गड़बड़ होता है हमें कोशिश भी करनी चाहिए। मुझे तो यकीन है, जिंदगी में आस्था है मेरी। सारे उलझावों के बाद भी मै ये सोचता हूँ कि हमको उनसे लड़ना चाहिए। कुछ बेहतर होगा।

रशीदा और सुहैल के संघर्ष से दिल बैठ जाता है लेकिन उनका जीवट, उन्हीं मध्यवर्गीय स्थितियों में, साहस भी देता है। इन दोनों, खासकर रशीदा, को रचने की प्रेरणा कहाँ से आई?

शायद इसमें रशीदा और सुहैल दोनों ही …… किसी एक पात्र को दो में विभाजित किये गए हैं। ईमानदारी से मैं देखूँ तो ये को-एग्जिस्ट करने वाली दो क्वालिटीज़ हैं जो ख़ुद मेरे ही अन्दर हैं। एक फिक्शन लिखने के लिए आप एक डिज़ाइन चुनते हैं। एक स्वरुप जो है लड़की के रूप में रशीदा, सीधे रास्ते पर चलने वाली जिसका मतलब होता है। और सुहैल सितारे का नाम है। तो होता ये है के आप कोई सवाल उठाते हैं तो कहीं कोई एक चीज़ जो निराशा को हद से आगे नहीं बढ़ने देती वो आपका हाथ पकडती है, और जबतक ये सिलसिला जारी रहता है तभी तक जिंदगी है। वो को-एग्जिस्ट करती हैं दोनों चीज़ें पॉजिटिव और नेगिटिव के लेवल पर,तो शायद सूखा बरगद को लेकर सारी कडवी सच्चाईयों के बावजूद मैं ये कहना चाहूँगा के वो एक ज़िंदगी से मुहब्बत करने वाले परिवार से हैं। एक ऐसे बाप की, ऐसी माँ की, ऐसे परिवार की जो वक्त के हिसाब से पिछड़ गये गए हैं थोड़े से लेकिन ज़िंदगी से मुहब्बत में उनकी कोई कमी नहीं हुई है।

आपके पात्र अमूमन मध्यवर्गीय नैतिकताओं की ओट में छिपे रहते हैं। कभी इससे कोफ्त हुई? कोई ऐसा पात्र रचने की तमन्ना है जो अनैतिक हो?

कोफ़्त तो नहीं हुई, और ये हो सकता है के ज़रूर में लिखना चाहूँगा जो अनैतिक हो। अनैतिक में भी कहीं आपका ग़म और गुस्सा कहीं न कहीं उस नैतिकता के पक्ष में ही हो। दोस्तोव्यस्की का बहुत मशहूर उपन्यास है ‘द पोज़ेस्ट’ उसका जो एंटी-हीरो है वो बुनियादी तौर पर उन वैल्यूज़ के लिए,  क्योंकि उन वैल्यूज़ के लेवेल पर वो हार चुका होता है तो एंटी- हीरो बन कर अपनी लड़ाई जारी रखता है। अगर ऐसा कुछ होगा तो मैं यकीनी तौर पर करूँगा, बल्कि शायद जल्दी करूँ।

तो मतलब आप ये मानते हैं कि जो नया पात्र जो मतलब बुनियादी तौर पर अनैतिक है, उसकी अनैतिकता में भी किसी किस्म की नैतिकता का मूल्य है?

डेफिनेटली।  बहुत सही कहा आपने। अनैतिक एक शब्द है, हम उसको किस नीति के नाम पर जोडें जो कहे सुने के हिसाब पर होती है या जो पढने, समझने और करने के लेवल पर होती है। तो मैं दूसरा अर्थ जो है उसके ही लेवल पर बोल रहा हूँ।

धर्म, समाज और नैतिकता को मानव सभ्यता के विकास में किस हद तक बाधा मानते हैं? या बाधा नहीं मानते?

सभ्यता जो है जियोग्राफिकल ज़ोन्स के हिसाब से है। इंसान बड़ा हुआ है। धर्म,जो आजकल धर्म बन गया है इसमें मेरी कोई आस्था नहीं है,बिलकुल इतनी सी भी। मैं…. एक मुसलमान नाम है मेरा क्योंकि मुसलमान परिवार में पैदा हुआ हूँ लेकिन इसका मतलब ये नहीं है के जो सही सोचने वाले दीगर लोग हैं उनसे मुझे अलग किया जा सकता है। और सही सोच से मुराद,जो सही सोच होती है वही है। मैं इंसानी मुहब्बत को किसी भी पॉलिटिकल गेन्स से ज़्यादा इम्पोर्टेन्ट समझता हूँ।

वर्ष 1973 में आपकी पहली कहानी प्रकाशित हुई। उस समय के और आज के साहित्यिक परिदृश्य में कोई तीन समानता बताईये? और तीन ही असमानता?

भई ये ज़िम्मेदारी की बात है, और जैसा के आप लोग जानते हैं कि मैं जितना पढ़ना चाहता हूँ उतना नहीं पढ़ पाता लेकिन मोटे तौर पर अगर मैं कहूं तीन तीन में उसको बांटे बगैर तो जिस तरह जीवन बदला है उसी तरह साहित्य बदला है। और ज़्यादा लिखा जा रहा है। कभी कुछ बहुत अच्छा देखने को मिल जाता है और कभी कभी हतोत्साहित भी करता है, दोनों चीज़ें हैं। ये ही पहले भी होता था। अभी लिखने वालों के सामने कुछ सार्थक लिखने के बड़ा चैलेंज है. वो इसलिए क्योंकि आपतक पहुँचने के प्लेटफॉर्म्स बढ़ गए हैं।  तिहत्तर में पत्रिकाएँ कम थीं, लिखने वाले कम थे। तिहत्तर में मेरे ख्याल से मेरे लिए तो ये आसनी थी कि अच्छे लेखक कौन हैं ये मैं सिर्फ़ पढ़ कर, खुद पढ़ कर जान सकता था। उसके आगे जो कुछ हुआ उसके अंदर क्योंकि मैं खुद भी शामिल हूँ इसलिए अब मुझे नहीं लगता के मैं इतना ज़्यादा वस्तुपरक हो सकता हूँ। दीगर चीज़ें बहुत ज़्यादा हैं जैसे के हम देखते हैं आजकल सोशल मीडिया से लेकर जो चीज़ें हुई हैं तो लिखने वाले जो हैं उनकी संख्या बढ़ने के बावजूद उनके सामने चैलेंजेस भी बहुत ज़्यादा हैं। इसका मतलब ये नहीं है के कुछ अच्छा नहीं लिखा जा रहा। कुछ बहुत अच्छा लिखा जा रहा कुछ मामूली भी, और ये एक बदलाव के स्टेज पर है। हिंदी साहित्य जो है उसके अंदर ख़ास तौर पर मैं कहानी और उपन्यास के लेवल पर बात कर रहा हूँ। और कहानी मुझे सबसे ज़्यादा प्रिय है इसलिए शायद कम लिख पाता हूँ। अपने आप यह बहुत ही चेलेनजिंग विधा है। हमें कुछ अच्छे कहानीकार चाहिए, फ़िलहाल में जो पिछले दिनों मैंने देखा है अगर उसको परसेंटेज वाइज़ ब्रेकअप किया जाए तो उम्मीद मुझे पूरी है। शायद अभी वो या तो मेरी नज़रों से नहीं गुज़रा है या…… मुझे ऐसा लगता है कुछ बेहतर कहानी होनी चाहिए। ऐसा नहीं है की नहीं लिखी जा रहीं हैं बिलकुल भी लेकिन कभी कभी ऐसा लगता है। जैसे मैंने बताया एस्टेबिलिश नाम थे आप, पहले से ही मालूम थी उनकी पृष्ठभूमि की उन्होंने ये लिखा, ये लिखा, आपने ये उठाया और देख लिया कि वेद साहब क्या हैं,निर्मल वर्मा क्या हैं, और यादव जी क्या हैं, कमलेश्वर जी, भारती जी इत्यादि। यहाँ आपके समकालीन हैं, आपसे छोटे हैं और फिर आपसे बहुत छोटे हैं तो उनका अपना योगदान तो है डेफिनेटली, लेकिन मुझे लगता है इसमें थोड़ी सी और गुंजाईश है।

आज जो सामाजिक राजनीतिक स्थितियाँ हैं, उसमें बतौर मुसलमान खुद को किस स्थिति में देखते हैं?

कभी-कभी बेतुका लगता है। क्योंकि भई ज़िंदगी गुज़र गई मेरी, मेरी दोस्तियाँ, मेरे सम्बन्ध जो हैं कभी मेरे लिए धर्म ने डिफ़ाइन नहीं किये। घरेलू चीज़ें जो होती हैं कि गावतकिया रखा हुआ है या ये कि कोई आया तो सलाम कर रहे हैं आप, ये कल्चरल एक आस्पेक्ट है। लेकिन मैं दसियों बार और महत्वपूर्ण जगहों पर मंदिरों में भी गया हूँ। शायद मस्जिदों से ज़्यादा मंदिरों में गया हूँ। मेरे नब्बे फीसदी दोस्त उस समुदाय से हैं जहाँ का मैं नहीं हूँ।

तो आज की राजनैतिक और सामाजिक परिस्थिति को देख कर आप खुद को अलग-थलग या थोडा सा कटा हुआ महसूस नहीं करते?

बिलकुल करता हूँ, इन सब के बावजूद जो अभी कहा। शायद ये एक परीक्षा की घड़ी होती है। एक तो खैर बुढ़ापा भी होता है जो आपको थोडा सा, आपकी जो हर चीज़ को रोशन नज़रिए से देखने और सोचने की कोशिश है वो छीन लेता है। बहुत जल्दी आप उदास हो जाते हैं। और दूसरे पोलिटिकल गेम्स होते हैं टाइम-टाइम पर लेकिन मुझे मालूम है कि भले ही वो ……… वो शायरी में, उर्दू शायरी तो भरी पड़ी है “के रात जितनी ही संगीन होगी, सुबह उतनी ही रंगीन होगी”। ऑनेस्टली स्पीकिंग दीस आर पासिंग फसेज़ ऑफ़ लाइफ। ये परीक्षाएं भी गुज़र जाती हैं। कितने हज़ारों सालों से यहूदियों को प्रोसेक्यूट करते रहे आप, कब से ब्लैकस  को परेशान कर रहे हैं। अब यहाँ का सिलसिला जो है एक नए ऐतिहासिक आवरण के साथ बयान किया जाने लगा है कि मुसलमान जो हैं वो कहीं से उन्होंने हमला किया और जगह बना कर बैठ गए हैं। ऐसे लोगों की चलती नहीं। कुछ नुकसान करेंगे लम्बा-चौड़ा उसके बाद दुनिया सही रास्ते पर आएगी लेकिन फ़िलहाल वक़्त अच्छा नहीं है।

जिन मुसलमानों ने भारत को अपना मुल्क माना और इससे प्रेम किया, यहीं रह गए, उनका भविष्य क्या दिखता है?

एकदम नार्मल है। मुझे कोई उलझन नहीं है उसमें। जो एजुकेशन की कमी है उसमें भी मेरे ख्याल से अब मामला धीरे-धीरे सुधर रहा है। सबसे बड़ी चीज़ जो होती है वो एक बिलोंगिंग की होती है कि कहीं आप स्वीकार्य हैं। ये अहसास काफ़ी पहले से भारत में रहने वाले मुसलमानों को है। ये कह कर उनकी इज्ज़त को कम करना होगा। वो तो हैं ही भारतीय।

वह कौन सी कहानी या उपन्यास है जिसे आप दुबारा लिखना चाहेंगे?

ऑनेस्टली मेरे ख्याल से जितना भी लिखा है उसमें कोई भी ऐसा नहीं है जिसको सुधार न जा सके लेकिन अब इतनी मोहलत कहाँ है। जो मामूली गलतियाँ होती हैं जैसे पंक्चुएशन वाली। जो पहली नॉवल थी मेरी  ‘कुछ दिन और’ उसके बाद सूखा बरगद। अव्वल तो ये गलतियाँ नजर से हट जातीं हैं, उसके बाद मुहावरा बदल जाता है। तिहत्तर में जो मुहावरा था आजतक आते-आते उसमें बदलाव आ चुका है। इस तरह से मेरे लिखने का ढंग भी बदला है। बहरहाल या तो सब या ख़ासतौर पर किसी एक को रेखांकित करना ज़रा मुश्किल होगा मेरे लिए। क्योंकि इस बीच बहुत सारा कुछ तो मैंने अपना दुबारा देखा भी नहीं है। सूखा बरगद पर अभी जब मैं शिकागो में था तो वहां पे क्लास लेने के लिए उन्होंने रखा। अलग-अलग भाषाओँ वाले जो हिंदी सीख रहे हैं मैं उनके सामने था। मेरी अपनी लिखी हिंदी वो लोग जब पढ़ रहे थे और मुझे लग रहा था कि यार ये तो गड़बड़ की है मैंने। ये वो वाली भाषा नहीं है जो हम बोलते हैं। शायद मैंने इसे जल्दी में लिखा है या कुछ गड़बड़ की है। लेकिन बाद में उन की जो प्रोफ़ेसर थीं उनसे पूछा तो बोली नहीं हमें तो बिलकुल ठीक लग रहा है। क्योंकि बच्चे जिस तरह के सवाल कर रहे थे वो आपको एक दम अस्थिर कर देते हैं।

इसी बातचीत में मंज़ूर साहब आपने कहा कि तिहत्तर में जो मुहावरा था वो आज बदल गया है ये बदलाव क्या आप सामाजिक चेतना के स्तर पर, भाषिय चेतना के स्तर पर, परिपेक्ष्य को देखने के स्तर पर या लिखने के स्तर पर मानते हैं?

लिखने का स्तर तो बाकि सब चीज़ों से ही आएगा और जब भई दुनिया बदली है तो ये सब चीज़ें क्यों नहीं बदलेंगी। हम जो कुछ कहना चाहते हैं उसको भी नए शब्दों की ज़रूरत होगी। बहुत सारी चीज़ें थी ही नहीं 73 में जो आज हमारे रोजमर्रा की जिंदगी में हैं।

सत्येन याद आते हैं? किस तरह?

अरे! वो तो ….भई चक्कर तो ये है कि मैंने एक शब्द भी नहीं लिखा होता और अगर लिखा होता तो आज भी मेरे पास फाइल में रखा होता। ये सिर्फ़ सत्येन की ही उलाहना, उन्हीं के उकसाने, और ऐसे आदमी के बारे में ये कहना कि वो मुझे याद आता है ये मेरे ख्याल से अंडरस्टेटमेंट होगा। ही इज विद मी।

प्रेम तो किए होंगे, उसकी तफ्सील में नहीं जाऊँगा। बस एक वस्तुनिष्ठ प्रश्न: क्या कोई प्रेम ऐसा भी रहा जिस तक दुबारा जाने की इच्छा हो?

नहीं, बिलकुल क्यों नहीं। बिलकुल आपके सवाल में इसके आगे की कोई गुंजाईश भी नहीं है।

कोई अपराधबोध?

हाँ मुझे शायद लगता है कि वक़्त बहुत बर्बाद किया मैंने। इसको थोडा और अपने लिखने-पढने के काम में या और जो ज़िम्मेदारी के काम जो थे उनमें करना था, लेकिन वो होता नहीं है। अगर एक बार और जन्म लूँगा तो वही गलतियाँ फिर से दोहराऊंगा मैं।

अशराफ और पसमांदा के वर्ग में खुद को किस वर्ग के करीब पाते हैं?

अजीब गुड़बलीदा हूँ मैं। मैं हद से ज़्यादा मतलब झुक कर मिलने वाला और बेहद डर के चलने वाला सबकुछ, लेकिन फिर अगर बदतमीज़ी का मौक़ा आता है तो वो भी हो जाती है।

तो मतलब आप दोनों के ही नज़दीक मानते हैं अपने आप को?

हाँ जो रोल आपको प्ले करना पड़े वो तो आप करते हैं। यू कांट हेल्प इट और उसमें अशराफ़ और अजलाफ़ का चक्कर ही नहीं है। ये आपके भीतर वो होना चाहिए की जिस चीज़ की डिमांड हो आप उसे सप्लाई कर सकें।

कोई तीन किताब जो दुबारा पढ़ना चाहते हों?

मैं पढता रहता हूँ ऐसे किताबें ख़ासतौर पर ‘ब्रदर्ज़ क्रेमाज़ोफ़’ को। मैं दोस्तोव्यस्की का जो उपन्यास है हजारों बार भी पढूं तो भी मुझे नहीं लगता की मेरा दिल भरेगा। कुछ किताबें ऐसे ही पागलपने की हैं। मुझे ‘द ग्रेट गेटस्बी’ बहुत अच्छी लगती है और एक है ‘सीज़ द डे’।

इन दिनों क्या लिख रहे?

लिखने के प्रिपरेशन बहुत जमाने से चल रहे हैं, उसके नोट्स भी। उपन्यास तो मेरे ख्याल से कोई इतना लम्बा नहीं होगा,लेकिन उसकी इतनी तैयारी सिर्फ़ ये सोच कर है के उसमें कुछ गलत न आये। ऐतिहासिक पृष्ठभूमि है उसकी और कुछ पारिवारिक मामले हैं जिसको मैं फिक्शनल मोड में लिखना चाहता हूँ। इधर कुछ फिज़िकल एलेमेंट्स थे जैसे मेरी आँख में कुछ परेशानी रही थी लेकिन मैं चाहूँगा कि उसे करूँ और जल्द ही।

नए रचनाकारों को कोई एक सलाह दीजिए।

कभी जो आपसे बड़े हैं न उन्होंने जो रास्ते अपनाये थे उन पर चलने की कोशिश मत करना। न उनसे ये पूछना की हमें कुछ सलाह दे दो।

आपके बाद की तमाम पीढ़ियों में कौन ऐसा रचनाकार है जिसे आप चाहेंगे कि अगर नए सिरे से लिखना हुआ तो सूखा बरगद वही लिखेगा?

तुम लिखोगे…….. और तुम का नाम यहाँ तो अनघ ही है।

(और ये बात मैं बहुत ज़िम्मेदारी से कह रहा हूँ )

……….

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