कल्‍पना का जादू – मनोज कुमार पांडेय

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भारतीय समाज के वर्तमान का जो हिस्सा दर्ज करने से छोड़ दिया जाता हैउसे जानना हो तो आपको मनोज कुमार पांडेय की कहानियाँ पढ़नी  होंगी. एक असफल अभिनेता के जीवन के किंचित किन्तु अनिर्वचनीय सुखों पर अपनी शुरुआती कहानी  (चंदू भाई नाटक करते हैं) लिखते हैंआपराधिक मनोवृति का स्पाइरल घुमाव अपनी कहानी जीन्स में दर्ज करते हैं और फिर पानी जैसे अनिवार्य मुद्दे पर  पानी‘ जैसी बेहतरीन कहानी लिखते हैं. बेचैन कर देने वाली इनकी अनेक कहानियों से गुजरते हुए आपको अपने आसपास के भारत का एहसास होगा जिससे आप दूर कर दिए गए हैं. आज हम खुद कथाकार से ही समझें कि वह अपनी कहानियों को कैसे देखते हैं. उनकी रचना प्रक्रिया क्या है और उनकी कहानियों में स्मृतियों और कल्पना में किसका बोलबाला अधिक है- सौतुक

मनोज कुमार पांडेय

रचना प्रक्रिया के बारे में लिखना रचना लिखने से जटिल काम है। मेरे लिए यह ऐसा है जैसे मैं अपनी मातृभाषा का व्याकरण लिखूँ। जो मेरे खून में बसी हुई है। जिसे मैं बोल सकता हूँ लिख सकता हूँ समझ सकता हूँ पर जिसके व्याकरण नियम मैंने कभी नहीं सीखे। इस बात की मुझे कभी जरूरत ही नहीं पड़ी क्योंकि यह भाषा मैंने माँ के दूध के साथ स्‍वाभाविक रूप में अर्जित की है। वैसे ही जैसे मैंने प्रकृति से हवा पानी और धूप अर्जित की है। इसे अलग से सीखने की जरूरत कभी नहीं पड़ी।

तो यहाँ पर विचार किया जा सकता है कि रचना प्रक्रिया क्या है? कोई खुद लिखता है कोई बोलकर लिखवाता है कोई लेटकर लिखता है कोई बैठकर लिखता है कोई कलम से लिखता है कोई लैपटाप पर लिखता है तो क्या यह सब रचना प्रक्रिया है? नहीं यह सब आदतें है। इसी तरह दिन में लिखना या रात में लिखना भी आदत है रचना प्रक्रिया नहीं। इतना जरूर कहा जा सकता है कि ये आदतें कई बार रचना प्रक्रिया से एक नजदीकी संबंध कायम कर लेती हैं। तो फिर रचना प्रक्रिया क्या है? उसे हम किस तरह से देखेंगे जानेंगे? क्या वह अविभाज्‍य है या उसके अवयवों को अलग-अलग भी देखा जा सकता है? वह हमेशा एक तरह की होती है या दुनिया के सारे लेखकों की अलग-अलग रचना प्रक्रिया होती हैं। ऐसे ही कुछ सवाल हैं जो यहाँ पर मेरे विचार के केंद्र में हो सकते हैं। क्योंकि जाने-अनजाने इन्ही सवालों के बीच से एक लेखक का यथार्थ को देखने का सलीका, स्मृतियों के साथ उसके अंतर्संबंध या उससे भी बढ़कर यथार्थ की कल्पना करने का या उसे रच सकने का कौशल आता है।

कोई घटना या विचार जब एक लेखक के भीतर घर करता है तो वहाँ से सहज ही रचना प्रक्रिया की शुरुआत मानी जा सकती है पर रचना प्रक्रिया कहीं और भी पहले से चलने वाली चीज है। यह लेखक के विषय चुनाव के साथ भी गुँथी होती है। एक लेखक क्यों एक विषय का चुनाव करता है और दूसरे को छोड़ देता है। ऐसा क्यों होता है कि कोई खास घटना लेखक की संवेदनशीलता पर गहरा असर करती है और वह उस पर रचनारत हो जाता है जबकि उसी समय में दूसरी बहुत सारी घटनाएँ और मुद्दे वह छोड़ता भी चलता है। या कि जिस भी घटना या स्थिति पर वह कहानी कविता जैसा कुछ रच रहा होता है उसमें वह कौन से कोण उठाएगा चित्रित करने के लिए कौन से छोड़ देगा, इसे भी रचना प्रक्रिया का हिस्सा माना जाना चाहिए या नहीं। इसी स्तर पर मुझे थीम की चोरी जैसी चीज कभी समझ में नहीं आई। मुझे लगता है कि रचना विषयवस्तु के प्रति अपके नजरिए और व्यवहार पर टिकी होती है। यही रचना के व्यक्तित्व को दूसरे से अलग करती है। एक ही विषयवस्तु पर एक दूसरे से अलग पर शानदार कहानियाँ लिखी जा सकती हैं। विषयवस्तु अमूमन शाश्वत होती है जैसे कि स्त्री-पुरुष संबंधों पर मनुष्यता के पूरे इतिहास में कितना कुछ लिखा गया होगा और जब तक दुनिया रहेगी तब तक लिखा जाता रहेगा। इसी तरह सत्ता के विभिन्न रूपों की निरंकुशता का प्रतिरोध एक शाश्वत विषय वस्तु है जिस पर तमाम रचनाकार लिखते रहे हैं। ये उनका इस विषयवस्तु को देखने का भिन्न दृष्टिकोण ही है जो उन्हें अलग पहचान देता है। हाँ यह जरूर होता है कि इस शाश्वत विषयवस्तु  में समय के साथ और भी आयाम जुड़ते चले जाते हैं। और भी कोण जुड़ते चले जाते हैं। तो मुझे लगता है कि रचना प्रक्रिया लेखक के इसी चुनाव में छुपी होती है कि वह कौन से विषय चुनता है कौन से कोण चुनता है। पर इस चुनाव के बहुत पहले ही रचना प्रक्रिया शुरू हो चुकी होती है जो उसे तमाम विषयों के बीच से कोई खास विषय या कोण चुनने के लिए उकसाती है।

अब अगर मैं अपने परिवेश की बात करूँ तो मेरे लिए इसका अर्थ है आसपास की वह दुनिया या वातावरण जिससे हमारा सीधा साबका पड़ता है या जो बिना किसी बिचौलिए के हमारे संवेदनात्मक अनुभव के दायरे में आ जाती है। पर जाहिर है कि बात इतने से ही नहीं बनती। एक द्वि‍तीयक परिवेश भी है जो हमारी चेतना पर तरह तरह से असर करता है। इसमें जीवित व्यक्तियों से लेकर अखबार, टेलीविजन, टेलीफोन या इंटरनेट जैसी तमाम चीजें शामिल हो सकती हैं। पर इस द्वितीयक परिवेश को मैं हमेशा शक की नजर से देखता हूँ। जैसे कि मीडिया के तमाम माध्यमों की बात की जाय तो यह जानने के लिए किसी अतिरिक्त समझदारी की कोई जरूरत नहीं है कि वे अपने क्रिया कलापों में पूरी तरह से परतंत्र हैं। उन्हें अपने विज्ञापनदाताओं और पूँजी लगाने वाले आकाओं के हितों का पूरा खयाल रखना पड़ता है। ऐसे में उनके द्वारा पेश की जाने वाली चीजें ठोस अनुभव और विचार की कसौटी पर कसी जाकर ही किसी काम की मानी जा सकती हैं। मीडिया माध्यमों का जोर सत्य से अधिक तथ्य पर रहता है। उसमें एक तात्कालिकता होती है। एक लेखक के रूप में मेरे लिए लिए घटना या तथ्य से अधिक महत्वपूर्ण उन घटनाओं को संभव बनाने वाली प्रक्रिया होती है। उन्हीं में सत्य छुपा रहता है। इस प्रक्रिया को जाने बिना हम तथ्यों के बारे में भी कायदे से कुछ सोच समझ नहीं सकते। इसी तरह हम यथार्थ की बात करें तो वह हमेशा सत्य की बजाय तथ्य के साथ हमारे सामने आता है। पर एक लेखक जानता है कि उन तथ्यों के पीछे ही असल चीजें छुपी हुई हैं। वहाँ तरह-तरह के जादुई पेंच और जटिलताएँ है। एक लेखक का काम यथार्थ की विभिन्न परतों में छुपी उन्हीं जटिलताओं को फिर फिर से रचना होता है, अभिव्यक्त करना होता है। कम से कम मुझे तो यही लगता है।

यथार्थवाद की सीमा मेरे सामने तभी से स्पष्ट थी जब मैंने लिखना शुरू नहीं किया था पर साहित्य का एक जुनूनी पाठक हुआ करता था। तभी से मुझे लगने लगा था कि यथार्थवाद को उसकी आखिरी सीमा तक निचोड़ लिया गया है और अब उसमें ज्यादा संभावना नहीं बची है।

यथार्थवाद की सीमा मेरे सामने तभी से स्पष्ट थी जब मैंने लिखना शुरू नहीं किया था पर साहित्य का एक जुनूनी पाठक हुआ करता था। तभी से मुझे लगने लगा था कि यथार्थवाद को उसकी आखिरी सीमा तक निचोड़ लिया गया है और अब उसमें ज्यादा संभावना नहीं बची है। आज यथार्थवादी होने और यथास्थितिवादी होने के बीच एक धुँधली सी रेखा भर बची है। ऐसे में यथार्थवाद का अतिक्रमण आज के लेखक के लिए अनिवार्य स्थिति बन गई है। अपना रास्ता निकालने की शुरुआती कोशिशों के रूप में मैंने अपनी कुछ कहानियों में फंतासी का सहारा लिया। ये यथार्थवाद की बंजरता से मुक्ति और उसमें तोड़फोड़ की बेचैनी से उपजी कोशिश थी पर जल्दी ही मुझे पता चल गया कि ये मेरी कमअक्ली थी। फंतासी यथार्थ की जड़ता को और भी जड़ बनाती है। फंतासी यथार्थ को कई बार और भी रूढ़ अर्थ दे देती है। तभी मुझे कल्पना का जादू समझ में आया। मैंने पाया कि कल्पना की उड़ान असीमित है। कल्पना यथार्थ की भयावह जड़ता के बीच मुक्ति का खुला आकाश है। और जब यह मुक्ति या बदलाव के सपने के साथ एक होकर आती है तो उसमें हमेशा एक बड़ी रचना की संभावना छुपी रहती है। फंतासी यथार्थ की भयावहता और विसंगतियों के वर्णन की कोशिशों से जन्म लेती है तो कल्पना  यथार्थ की भयावहता से मुक्ति की तरफ ले जाती है। एक रचनाकार के लिए कल्पना से बढ़कर कोई दूसरा इष्ट नहीं। वह रचनाकार के सामने संभावनाओं के अनंत द्वारा खोलती है और सभी मुक्ति की तरफ ही जाते हैं।

मुझे लगता है कि अब थोड़ा सा विषयांतर हो जाना चाहिए। ऊपर मैंने कई बार रचना या रचनाकार का प्रयोग किया है पर अच्छा होगा कि मेरी बातों को सिर्फ कथा साहित्य के संदर्भ में ही लिया जाय जो कि मेरे अनुभव क्षेत्र का हिस्सा है। ये मेरे भीतर की बात है कि मैं अपने कुछ प्रिय लेखकों के नाम लूँ जिनसे प्यार और झगड़े के बीच मेरी निर्मिति हुई है। आज के हिसाब से मैं अनपढ़ व्यक्ति हूँ क्योंकि अँग्रेजी मुझे नहीं आती और कंप्यूटर मैंने अभी सीखना भर शुरू किया है। तो मेरी सीमा है कि मै हिंदी लेखकों के ही नाम लूँगा जो कि मेरी चेतना में रचे बसे हैं। प्रेमचंद तो खैर हमारे बाबा आदम हैं ही उनके समकालीन जयशंकर प्रसाद भी मुझे अच्छे लगते हैं। आज के अनेक समर्थ कहानीकारों का बीज रूप मुझे प्रसाद में दिखाई पड़ता है। बाद में शैलेष मटियानी, मोहन राकेश, अमरकांत, रेणु, भीष्म साहनी, हरिशंकर परसाई, श्रीलाल शुक्ल, रवींद्र कालिया, मनोहरश्याम जोशी, सुरेंद्र वर्मा, विनोद कुमार शुक्ल, उदय प्रकाश और अखिलेश जैसे अनेक कथाकारों के पास बैठकर मैंने उनसे सवाल जवाब किया है। ऐसा करते हुए मुझे अपने अनेक सवालों के जवाब मिले हैं तो बहुतेरे नए सवाल भी जेहन में आए है। ऐसे ही अलग-अलग कारणों से मुझे राजकमल चौधरी, कृष्ण बलदेव वैद, महेंद्र भल्ला और शिवमूर्ति को भी पढ़ना पसंद है। अपेक्षाकृत नए लेखकों में राजू शर्मा की रचनाओं का मैं इंतजार करता हूँ।

मुझे बेहद मजेदार लगता है जब हमारे आलोचक इन लेखकों को अलग-अलग कैटेगरी में बाँट देते है। उनके अनुसार कोई अलावादी हो जाता है तो कोई फलावादी। पर मैं एक पाठक के रूप में और एक लेखक के रूप में भी उनके पास इस नजरिये से कभी नहीं जाता। ऐसे ही मुझे भारतीय भाषाओं के लेखकों में ताराशंकर वंदोपाध्याय, अब्दुल्लाह हुसैन, इंतजार हुसैन, मंटो, यू.आर. अनंतमूर्ति, विजय तेंदुलकर और विजयदान देथा को भी पढ़ना प्रिय लगता है। लोक कथाओं में मेरे प्राण बसते हैं। कथा सरित्सागर या अलिफलैला की कहानियाँ अपने खुलेपन और कल्पना की असीमित संभावना की वजह से शानदार लगती है। मैं नास्तिक व्यक्ति हूँ पर पुराणों की दुनिया मुझे खींचती है जहाँ अनगिनत किस्से भरे हुए है और उन किस्सों को कहने की अनगिनत प्रविधियाँ भी। और पुराण ही क्यों ये किस्से-कहानियों की असीम ताकत ही रही है जिसने संसार के सभी धर्मों को बाध्य किया है कि वह अपनी बात कहने के लिए किस्से-कहानियों का सहारा लें। भारतीय परंपरा में ही देखें तो जैन कथाएँ, जातक कथाएँ यहाँ तक कि दार्शनिक प्रश्नों से जूझने का दावा करने वाले उपनिषद भी कदम-कदम पर कहानियों का ही सहारा लेते हैं। धर्मों की जरूरतें दूसरी थी, वो बहुत कुछ अपने समय की जरूरतों से भी उपजी थीं पर एक इक्कीसवीं सदी के कथाकार के रूप में मेरी जरूरतें दूसरी हैं। फिर भी उन्हें पढ़ना मुझे तरह-तरह से भर देता है।

मैंने अपनी पसंद का खुलकर बयान इसलिए भी किया है कि शायद मेरी इस पसंदगी के खुले इजहार से मेरे बारे में राय बनाने में कुछ आसानी हो। मुझे परवाह नहीं कि इस वजह से मेरे बारे में कौन क्या राय बनाता है। मुझे पता है कि मैं अपनी अच्छी-बुरी रचनाओं की वजह से जाना जाऊँगा, कुछ मूर्धन्यों की राय से नहीं। मुझे जिंदा रखेंगी तो वे मेरी रचनाएँ होंगी और गुम करेंगी तो वे भी मेरी रचनाएँ ही होंगी। ऊपर जिनके प्रति मैंने अपने प्रेम और पसंद का इजहार किया है उनके पास मैं इसलिए जाता हूँ क्योंकि उनकी रचनाएँ मुझे अपनी तरफ खींचती हैं। वे मुझे बहुत कुछ सिखाती हैं। भाषा और कथ्य को बरतने की तमीज पैदा करती हैं। रचना के पास विनम्र होकर जाने का सलीका सिखाती हैं। मै इस बात से भी चमत्कृत होता हूँ कि कैसे वे उन चीजों के बारे में बहुत पहले ही जान चुके होते हैं जो मेरे भीतर से उठने वाली होती है। कई बार उनमें ऐसी भी अनेक बातें मिलती है जो असहमति या जिरह का स्वर पैदा करती हैं पर मैं हमेशा जिरह के मूड में नहीं होता।

अपनी कहानियों को पलटते हुए मैंने पाया कि मेरी कई कहानियों में रुलाई किसी न किसी रूप में शामिल रही है। मुझे लगता है कि मेरी कहानियों में रुलाई का ये आवेग स्मृतियों के रास्ते आया है। भले ही कहानी की संरचना में ऐसा न दिखाई पड़ता हो। आप चाहें तो यहाँ पर विख्यात रंग-निर्देशक स्ताल्निवसकी का वह सिद्धांत याद कर सकते है जिसमें वह एक अभिनेता के लिए ‘इमोशनल मेमोरी’ को अनिवार्य मानते हैं। उनका कहना था कि एक अभिनेता चरित्र के जीवन में घट रही घटनाओं की अपने निजी जीवन या अनुभव के दायरे में घटी घटनाओं से तुलना करता है और कुछ मिलती जुलती चीजें निकाल कर ले आता है। ये स्मृतियाँ अभिनेता के लिए कच्चे  माल का काम करती हैं जिन्हें कि वह विकसित करता है। मुझे लगता है कि यह बात कथाकार के ऊपर भी उसी तरह से लागू होती है। कई बार ऐसा होता है कि कहानी भीतर ही भीतर उमड़ती घुमड़ती रहती है पर कुछ ऐसा होता है जो नहीं होता और जिसके बिना कहानी पूरी नहीं होती। मैं अपनी ही कहानी ‘चंदू भाई नाटक करते हैं’ की बात करूँ तो उसमें कहानी की शुरुआत में ही एक दृश्य है जिसमें कथानायक चंदू आईना देख रहा है और रो रहा है। यह मेरे एक मित्र के जीवन की सच्ची घटना है, वह एक लड़की से प्रेम करता था। उसे लगता था कि लड़की भी उससे प्रेम करती है पर उसने एक दिन लड़की को किसी दूसरे लड़के के साथ अंतरंग मुद्रा में देख लिया। वह घर आया अपने कमरे में पहुँचा और प्रेम की असफलता से उपजी निराशा के गहन आवेग में रोने लगा। हो सकता है कि यह किसी को कॉमिक लगे पर रोते-रोते ही उसको ये खयाल आया कि देखे कि वह रोते हुए कैसा लग रहा है और वह रोते-रोते ही आईने के सामने जाकर बैठ गया। यह प्रसंग मेरी कहानी में आकर पूरी तरह बदल गया। कहानी में रोने की वजह दूसरी है पर यह भी सच है इस प्रसंग के बिना मेरी कहानी शायद पूरी नहीं हो पाती। मुझे लगता है कि कहानियाँ ऐसे ही प्रसंगों में छुपी होती है जो यथार्थ का हिस्सा होते हुए भी यथार्थ की जड़ता को ध्वस्त कर रहे होते हैं और उसे गतिशीलता दे रहे होते है। ऐसी घटनाएँ ऊपर से कितनी भी कॉमिक, असामान्य या अनहोनी क्यों न लगे पर उनमें जीवन का बड़ा सच छुपा रहता है जिसके बिना एक सत्यकथा और एक साहित्यिक कहानी में कोई अंतर नहीं बचता।

ऐसे ही स्‍मृतियाँ है जिनके बारे में मिलान कुंदेरा करते है कि ‘आदमी का सत्ता के विरुद्ध संघर्ष वस्तुतः उसका विस्मृति के विरुद्ध स्मृति का संघर्ष है’

ऐसे ही स्‍मृतियाँ है जिनके बारे में मिलान कुंदेरा करते है कि ‘आदमी का सत्ता के विरुद्ध संघर्ष वस्तुतः उसका विस्मृति के विरुद्ध स्मृति का संघर्ष है’ और जिसके बारे में हिंदी के अप्रतिम कथाकार अखिलेश ने अपनी विलक्षण गद्य कृति ‘वह जो यथार्थ था’ में लिखा है कि ‘अतीत के साथ कई बार ऐसा होता है कि हम प्रमुख वस्तु या चरित्र के जरिये गौण वस्तु तक नहीं पहुँच पाते बल्कि कोई गौण वस्तु, कोई तुच्छ सी चीज हमें केंद्रीय विषय तक ले जाती है।’ स्मृतियाँ मेरी कहानियों का अभिन्न हिस्सा हैं। उनके बिना मेरी कोई कहानी पूरी नहीं होती। यहाँ मैं स्मृतियों को हमेशा व्यापक अर्थों में लेता हूँ और उनमें व्यक्तिगत मेरा ही नहीं मेरे जैसे अनेकों का जीवन शामिल होता है। बहुतेरी स्मृतियाँ हमें अपने पुरखों से विरासत में मिली है जैसे कि लोक कथाएँ जो स्‍मृतियों की ही रचना है और स्मृतियाँ ही उन्हें सुरक्षित भी रखती हैं। और स्मृतियों की डोर के सहारे ही वहाँ स्मृति और विस्मृति, यथार्थ और फंतासी, सृष्टि और प्रकृति, स्वप्न और कल्पना के लाजवाब खेल मिलते है। यथार्थ स्मृति और कल्पना के बीच की चीज है। मेरी पसंद की रचना स्मृति और कल्पना के सहमेल के बीच यथार्थ की पुनर्रचना करती है। एक कथाकार के रूप में खालिस यथार्थ मेरे किसी काम का नहीं है। घटनाओं को जस का तस पेश करने का हुनर मुझमें नहीं है न ही मैं इसे अर्जित करना चाहता हूँ। इस रूप में यथार्थ को देखने के लिए पाठक की दो आँखें पर्याप्त है उसे किसी कहानी की जरूरत भला क्यों होगी।

मैं स्मृतियों के साथ रहता हूँ। वे प्रतिरोध की औजार हैं। वे वर्तमान के त्रासद यथार्थ के नीचे पिसते लोगों को ताकत देकर दुबारा खड़ा करने वाली हैं। वे कल्पना की जननी हैं। उनके बिना रचना मुमकिन ही नहीं है क्योंकि उनके बिना एक आंतरिक संगति और निरंतरता मुमकिन नहीं हो सकती। पर मैं स्मृतियों के प्रति मोहासक्त नहीं हूँ। इससे अतीत के प्रति एक अवांछित मोह या विरक्ति पैदा होती है जो रचना और समाज दोनों के लिए खतरनाक चीज है। मै जानता हूँ कि स्मृतियों के नाम पर दंगे भी कराए जा सकते है। उनके नाम पर तरह तरह की जघन्यता को जस्‍टीफाई करने का काम भी किया जाता है। स्मृतियों से घृणा भी पैदा की जाती है पर अपने प्रिय लेखकों से यह मैंने जाना है कि स्‍मृति के इस तरह के उपयोग से प्रतिक्रियात्‍मक संरचनाएँ जन्म ले सकती हैं, बदला लेने वाला प्रतिक्रियात्‍मक विमर्श जन्म ले सकता है पर अच्छी रचना नहीं जन्म ले सकती। स्‍मृतियों से अच्छी रचना जन्म ले इसके लिए जरूरी है कि एक तो स्मृति, समकालीन यथार्थ और कल्पना के बीच एक आवाजाही रखी जाय। दूसरे इस आवाजाही के समानांतर लेखक का मनुष्यता की गरिमा और अच्छाई में पूरा भरोसा भी हो। स्मृतियाँ बार-बार कहती हैं कि हमें गंभीरता से बरतो। इस बात की तमीज करो कि हम कहाँ सच है और कहाँ झूठ और इस बात की भी तमीज करो कि मनुष्यता के सौंदर्य की इस यात्रा में कहाँ सच तुम्‍हारे काम का है और कहाँ झूठ। क्योंकि बिना झूठ के सच्ची रचना नहीं जन्म ले सकती। पर इस झूठ के मूल में मनुष्यता की अच्छाई में भरोसा और प्रेम ही होगा। उसके अंतस में तो करुणा की धार ही बहेगी। उसके विस्तार में बदलाव की बेचैनी ही होगी।

जाहिर है कि ऐसी बहुत सारी चीजें है जिनके बारे में मैं सोचता हूँ और एक साधारण मनुष्य के रूप में अपनी बहुत सारी तुच्छ्ताएं त्याग कर इनकी तरफ बढ़ना चाहता हूँ। अपनी तुच्छ्ताएं त्यागना सबसे आसान काम होना चाहिए पर यही सबसे मुश्किल काम है। ऐसा इसलिए भी है क्योंकि मेरी जैसी जीवन स्थिति में बहुतेरे दबाव बार-बार उन्‍ही तुच्छ्ताओं की तरफ ढकेलते हैं। उनसे उबर पाना आसान नहीं है। पर जैसी व्यवस्था है उसने कुछ भी आसान नहीं है। जिस भाषा में हम लिख रहे है उसे बोलना और बरतना ही दिन पर दिन कठिन होता जा रहा है। आपसे बहुत सारे मौके सिर्फ इसलिए छीने जा सकते है क्योंकि आप उसी भाषा में लिखते पढ़ते सोचते हैं जिस भाषा का शब्द पहली बार आपके कान में गिरा था और जाकर खून में मिल गया था या जिसकी तरंगों ने आपकी त्वचा को पहली बार छुआ था और उसी पल वह हवा और पानी की तरह जीवन भर के लिए जरूरी हो गई थी या जिस भाषा को हमने उतनी ही सहजता से अर्जित किया था जितनी सहजता से जीवन अर्जित किया था। जब हम जिस भाषा के भीतर रह रहे हैं वही मुश्किल में है तो उसके लेखक को तो सदा मुश्किल में रहना ही है। मुझे लगता है कि यह मेरी और मेरे जैसे बहुतों कि नियति है। मैं इससे भाग नहीं सकता पर यही नियति बार-बार लड़ने-भिड़ने को भी प्रेरित करती है। यही बार-बार लिखने के लिए भी उकसाती है। यहीं पर स्मृतियाँ संबल बनती हैं। यहीं पर कल्पना आकर साथ खड़ी हो जाती है। इसी बिंदु पर चरित्रों के सुख-दुख और अच्छाई-बुराई, संघर्ष और पलायन मेरे सुख-दुख और अच्छाई-बुराई और संघर्ष में बदल जाते हैं। अपने चरित्रों से यह लेन देन मेरा कुछ भी व्यक्तिगत नहीं रहने देता। मैं इसे हमेशा कायम रखना चाहता हूँ।

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