वीरेन डंगवाल पुण्य तिथि विशेष: लौ की तरह एकाग्र

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श्रुति कुमुद/

‘कविता क्या है’ नामक बहस कभी कभी कविता की उम्र से भी पुरानी लगती है. जरूरी नहीं कि ‘सूरज की तरफ आँख उठाकर देखने का अर्थ उद्दंड हिमाकत का ही द्दोतक हो, यदा-कदा यह कवायद इसलिए भी की जाती है कि सूरज की आंच का ताप समझा जा सके, दिन कितना चढ़ा या किस कदर उतर गया वह दिन, यह जानने के लिए भी की जाती है. आशय यह कि बड़े कवियों की रचनाओं को देखने-गुनने के क्रम में कई मर्तबा हम खुद को किसी खुले निर्जन निचाट वीराने में पाते हैं और फिर उस कविता को उस तरह ही देखते हैं, जैसे सूरज को भरी दुपहरी में देख रहे हों. उस वक्त वह कविता ही, सूर्य की तरह, दिशा दिखा सकती है. वीरेन डंगवाल की कविताओं से गुजरते हुए ऐसी महसूसियत

श्रुति कुमुद

अनेकोनेक बार हुई.

मनुष्यता, वीरेन की कविताओं में सर्वाधिक महत्वपूर्ण सन्दर्भ है. अपनी आत्मा के जिन पहलुओं में इंसान निरंतर अकेला पाया जाता है, उन पर वीरेन की नजर पड़ती है. वे उसे न सिर्फ कविता में ढालते हैं, बल्कि अपनी कविता को संबल की तरह खड़ा करते हैं. जैसे इस कविता को देखते हैं:
किस्सा यों हुआ कि खाते समय चप्पल पर भात के कुछ कण गिर गए थे जो जल्दबाज़ी में दिखे नहीं। फिर तो काफ़ी देर तलुओं पर उस चिपचिपाहट की ही भेंट चढ़ी रहीं तमाम महान चिन्ताएँ।

( चप्पल पर भात )

तलुए आत्मा का रूप नहीं हैं पर जिस चिपचिपाहट का जिक्र कवि ने छेड़ा है, वह उस खरोंच के निकट है, जो जाने अंजाने इस जीवन संघर्ष में हमारी आत्मा पर लग जाते हैं. समझने-समझाने के लिहाज में अगर एक अधीर उदाहरण, अपमान का ही लें. संस्थाएं, सत्ताएं, कम्पनियां धीरे धीरे अपने ‘मिशन विजन स्टेटमेंट’ में ‘मूल्य / वैल्यू’ नामक हिस्से से जिस तरह ‘परस्परसम्मान’ नामक शब्द युग्म गायब होता जा रहा है, वह विचारणीय है. बाज दफे अपमान ही कोई मूल्य होता जाता है. वह अपमान भी इतना बारीक होता है, जैसा इस कविता में चप्पल पर चिपका हुआ भात. मामूली, परन्तु परेशान रखने वाला. एक ऐसी खरोंच जो आप दिखा नहीं सकते. ऐसी खरोंच, जो दिखाने मात्र से बढ़ती चली जाती है. मनुष्य के संघर्ष को एक परत बढ़ा देने वाली ऐसी अनेकों घटनाएँ वीरेन की कविताओं का विषय हैं. कई कविताओं में तो इस चिपचिपाहट से निजात पाने या उबरने की बात कवि करता है. भोजन करती हुई पी टी उषा विषयक कविता में यह बोध गहराता है कि समृद्ध वर्ग की बारीक नफासत के बोझ तले हमें अपनी मनुष्यता को दबने नहीं देना चाहिए, अब वह हमारी आदत ही क्यों न हो.[spacer height=”20px”]
आंखों की चमक में जीवित है अभी भूख को पहचानने वाली विनम्रता इसीलिए चेहरे पर नहीं है सुनील गावस्कर की-सी छटामत बैठना पी टी ऊषा इनाम में मिली उस मारुति कार परमन में भी इतराते हुए बल्कि हवाई जहाज में जाओ तो पैर भी रख लेना गद्दी परखाते हुए मुँह से चपचप की आवाज़ होती है ? कोई ग़म नहीं वे जो मानते हैं बेआवाज़ जबड़े को सभ्यता दुनिया के सबसे खतरनाक खाऊ लोग हैं।[spacer height=”20px”]

( पी टी उषा )[spacer height=”20px”]

यहाँ कवि मनुष्यता की व्यापक पक्षधरता के साथ उस बंटवारे को न सिर्फ रेखान्कित करता है बल्कि अपना पक्ष भी चुनता है. मनुष्य बनाम मनुष्य का जो आदिम संघर्ष है, उनमें से एक को दर्ज करती यह कविता दरअसल, उस अलगाववाद को भी रेखांकित करती है, जो संभ्रांतो द्वारा किया गया है. संभ्रांत से यहां आशय समाज के उस अगड़े तबके से जिनके पास दौलत है, और जिन्होंने भाषा में अंगरेजी, संघर्ष में पैसा और आम जीवन में नफासत को बतौर शिल्प और बतौर हथियार चुना है. अपने तईं नफासत भली चीज हो सकती है, लेकिन समग्रता में इसका इस्तेमाल एक अलगाव के लिए किया जाता रहा है. यह नफासत भाई-भतीजावाद और जातिवाद के इस युग में प्रतिभा पर आये दिन भारी पड़ती है. ऐसे में कवि का पक्ष स्पष्ट है. कविता इस रेखांकन से आगे निकलती है और बजाय गावस्कर के, पी टी उषा को अपना प्रतिनिधि बनाती है. ठीक इसी बिंदु पर कविता अपना पक्ष चुन लेती है. आगे की बाते दरअसल प्रतिनिधि चेहरे के साथ दर्ज अपनी अपेक्षा है, जो कि सटीक है.[spacer height=”20px”]
वीरेन डंगवाल की कवितायें मशाल की तरह, इस मनुष्य बनाम मनुष्य के बंटवारे पर रौशनी डालती हैं. ‘रात-गाड़ी’ कविता में वीरेन यों दर्ज करते हैं: इस कदर तेज जिन्दगी की रफ़्तार / और ये सुस्त जिन्दगी का चलन / अब तो डब्बे भी पाँच ए.सी. के और पाँच में ठूंसा हुआ पूरा वतन. और जिन कविताओं में इन बंटवारों को वीरेन दर्ज कर रहे हैं, उस कविता के बारे में भी एक कविता लिखते हैं, जिसमे गल्प और कविता के बीच का मानीखेज बँटवारा दिखता है. ‘कविता है यह’ शीर्षक से यह कविता:[spacer height=”20px”]
ज़रा संभल कर/
धीरज से पढ़/
बार-बार पढ़/
ठहर-ठहर कर/
आँख मूँद कर, आँख खोल कर /
गल्प नहीं है /
कविता है यह.
मनुष्य बनाम मनुष्य का यह बँटवारा किस स्तर तक है, यह जगजाहिर है. शक्तिशाली-शक्तिहीन, अमीर-गरीब, स्त्री-पुरुष, मालिक-नौकर, भूमिधर-भूमिहीन, हिन्दू-मुसलमान, वर्ण-अवर्ण, देनदार-लेनदार. प्रश्न है कि कविता में उस बंटवारे का क्या हो ? मसलन यह बंटवारे इंसानों के ही बनाए हुए हैं. तो क्या कविता किसी मूलभूत प्रश्न से टकराए, किसी शाश्वत प्रश्न को संबोधित हो ? या कि मनुष्य नए नए बंटवारे करता जाए और कवि करता रहे उन बंटवारों का पीछा ? अंतत: सारे बंटवारे शक्ति बटोरने के लिए हैं, शक्ति के सहारे ही किए गए हैं. कहना न होगा कि कविता के भीतर भी यह सवाल नए नहीं है. पर लगभग अनुत्तरित हैं.
वीरेन की कविता शक्ति बनाम अशक्ति के प्रश्न पर जिस भरपूर तरीके से चोट करती है, वह अतुल्य है. यों ही नहीं हुआ कि उनकी कविताओं ने जन मानस में जगह बनाई. कहें तो यह कहेंगे कि वीरेन की कवितायें आईना की तरह है जिनमे सुधी पाठक को गोचर-अगोचर सब दिख जाता है. उनकी एक मौजूं कविता है: मसला.
बेईमान सजे-बजे हैं
तो क्या हम मान लें
कि बेईमानी भी एक सजावट है ?
कातिल मजे में है
तो क्या हम मान लें कि क़त्ल करना मजेदार काम है ?
मसला मनुष्य का है
इसलिए हम तो हरगिज नहीं मानेगे
कि मसले जाने के लिए ही बना है मनुष्य.[spacer height=”20px”]
इस कविता में न जाने कितने पुरानो सवालों का गर्वीला आधुनिक जवाब है. हम जो किसी न किसी रूप में रोजनदारजन है, जो रोज खुद का जीवन जीने के साथ कितनों के जीवन से आड़े बेड़े तिरछे गुजरतें हैं, वहां खुद को मनुष्य बनाए रखना पहली शर्त होती है. होनी चाहिए और यह कविता एक ख्वाब की तरह आपके साथ रहती है.[spacer height=”20px”]
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बंटवारे जब स्थायी की शक्ल में दर पेश हों तो बाज दफा यह ख्याल होता है कि क्यों न रचनाओं को मनुष्यता की सार्वभौमिक कसौटी पर कसने के बाद, या उसके पहले भी, मनुष्यों द्वारा बनाए गए सांचे पर रखा जाए. वीरेन, पी टी उषा को ही चेहरा क्यों बनाते हैं, यह उन्नत प्रश्न है. एक कथन याद आता है कि रचना स्त्री के प्रति अपने रवैये से भी पहचान बनाती है. पी टी उषा के बहाने न सिर्फ वंचित समुदाय को प्रतिनिधि का दर्जा मिलता है वरन स्त्री समूह के मार्फ़त मिलता है.[spacer height=”20px”]
समता के लिए’ शीर्षक कविता में वीरेन का प्रखर स्वर खुलता है. एक रोती हुई बच्ची को मनाते हुए, उससे द्वीतीय पुरुष में बात करते हुए, कब कवि भविष्य की सुखद कल्पना में प्रविष्ट कर जाता है, यह पाठक पर दूसरे या तीसरे पाठ ही में जाहिर होता है.[spacer height=”20px”]
‘बिटिया कैसे साध लेती है इन आँसुओं को तू कि वे ठीक तेरे खुले हुए मुँह के भीतर लुढ़क जाते हैं सड़क पर जाते ऊँट को देखते-देखते भी टप-टप जारी रहता है जो
अरे वाह, ये तेरा रोना’यहाँ रोना और जाते हुए ऊँट देखना, दो सार्थक क्रियाएं हैं. सनद रहे कि रोना यहां भाव नहीं, बच्चे की भंगिमा है. बच्चों की भाषा भी रोने की स्वर लिपियाँ ही होती हैं.रोने का भाव प्रबल होता तो पिता का लहजा शायद इतना खुशनुमा न होता.[spacer height=”20px”]
‘बेटी, खेतों में पतली लतरों पर फलते हैं तरबूज और आसमान पर फलते हैं तारे हमारे मन में फलती हैं अभिलाषाएँ ककड़ियाँ ऐसी’ ( उसी कविता से )
यही वो पल है जहाँ कवि, पिता के मार्फ़त, तरबूज की लतरें थामे, आसमान के तारे तक जा पहुंचता है. वहां उसे अभिलाषाओं का अपार संसार खुलता दीखता है..ऐसी अभिलाषा, जो कोई भी प्रगतिशील और सभ्य समाज देखना चाहेगा.[spacer height=”20px”]
‘एक दिन बड़ी होना सब जगह घूमना तू हमारी इच्छाओं को मज़बूत जूतों की तरह पहने प्रेम करना निर्बाध नीचे झाँक कर सूर्य को उगते हुए देखना
हम नहीं होंगे लेकिन ऐसे ही तो अनुपस्थित लोग जा पहुँचते हैं भविष्य तक’

( उसी कविता से )[spacer height=”20px”]

आगामी पीढ़ियों के लिए हम दे सके वह समाज, जहां निर्बाध प्रेम संभव हो, इससे महान स्वप्न किसी समाज के लिए संभव नहीं है. और खुद को भविष्य में पहुंचाने की शर्त बस इतनी कि काश वो ऐसे अपेक्षित समाज के निर्माण में कोई महती भूमिका निभा सके. आलोक धन्वा भी एक ऐसे देश और समाज की कल्पना करतें हैं-‘जहां प्रेम एक काम होगा / पूरा का पूरा’. इस स्वप्न के लिए हम कितने यत्नशील रहे, कितना कुछ कर पाए इसकी विवेचना फिर कभी, पर क्या यह कम है कि हमारे अग्रज कवियों के पास अनोखे ऐसे स्वप्न रहे हैं![spacer height=”20px”]
वीरेन की नजर वहां भी है जहां उम्मीद के सूरज की रौशनी ने भी आना जाना बंद कर दिया है. हमारे जंगल, हमारे पहाड़ हमसे इतने दूर हो गए कि अजनबी की तरह जान पड़ते हैं..वैसेसंघर्षशील समाज की एक नायिका का दुःख ‘वन्या’ शीर्षक कविता में उभरता है. कविता की आख़िरी पंक्तियाँ यों तो विलाप को सामने रखती हैं पर उनमे समूह की जरूरत को करुणा के शिल्प में रखा है.[spacer height=”20px”]
‘अकेली मैं कैसे जाऊंगी वहां
मुझे देखते ही विलापने लगते हैं चीड के पेड़
सुनाई देने लगती है किसी घायल लड़की की दबी-दबी कराह’.[spacer height=”20px”]
कहना न होगा कि मनुष्य और समाज के बीच जो द्वन्द है, उसे वीरेन डंगवाल ने कविता में ‘क्लासिक्स’ की मानिंद रखा है. १९९० के बाद मनुष्य पर पड़ता चौतरफा सामाजिक प्रहार इतना प्रबल और तीव्र रहा है कि समाज के तमाम शुभचिंतकों की तरह और कार्यकार्ताओं की तरह, वीरेन भी कहीं –कहीं ( दुर्लभ मौकों पर ही ) मनुष्य का पक्ष लेते हुए उसे बचाने की मुद्रा में आ जाते हैं. जो आतंरिक संघर्ष है वो कहीं किनारे रख दिया गया है, बड़े और मजबूत हथियार की तरह, जिसे समय पर चलाया जाएगा..लेकिन हुआ यह है कि या तो ( वीरेन की कविताओ में ) समाज ने वो समय आने नहीं दिया है या कवि ही किसी बेहतर से भी बेहतरीन मौके की तलाश में है..जब वो ‘हम औरतें’ शीर्षक से कविता लिखता है. यह ढूँढना मुश्किल हो जाता है कि जिस नायिका को ‘निर्बाध प्रेम’ और ‘नीचे झाँक कर सूर्य को उगते हुए देखने के लिए’ अपनी इच्छाओं के जूते पहना कर कवि तैयार करा रहा है, वो बच्ची कहां गयी ? उसी तलाश में ‘हम औरतें’ शीर्षक की कविता मिलती है:[spacer height=”20px”]
रक्त से भरा तसला है
रिसता हुआ घर के कोने-अंतरों में
हम हैं सूजे हुए पपोटे
प्यार किए जाने की अभिलाषा
सब्जी काटते हुए भी
पार्क में अपने बच्चों पर निगाह रखती हुई
प्रेतात्माएँ
हम नींद में भी दरवाज़े पर लगा हुआ कान हैं
दरवाज़ा खोलते ही
अपने उड़े-उड़े बालों और फीकी शक्ल पर
पैदा होने वाला बेधक अपमान हैं
हम हैं इच्छा-मृग
वंचित स्वप्नों की चरागाह में तो
चौकड़ियाँ
मार लेने दो हमें कमबख्तो ![spacer height=”20px”]
कवि की इस कल्पना कि ‘हमें स्वप्न की चारागाह में तो चौकड़ियाँ मार लेने दो’ वह रक्त का तसला फ़ैल जाता है. जमीनपर या उन औरतों की आत्मा पर यह स्पष्ट नहीं होता. स्त्रियों का पत्नी-जीवन इस तरह ठस हो चुका है कि उस खांचे में फिट रखने वाली कोई कल्पना सार्थक हो ही नहीं सकती. और वीरेन हैं कि अपनी अनेक कविताओं में स्त्री को पत्नी के खांचे से बाहर निकालने को तैयार नहीं होते.[spacer height=”20px”]
यह कवि का विचार नहीं है..जीवन के बारे में कवि अपनी सुचिंतित राय व्यक्त कर चुका ‘समता के लिए’ कविता में कर चुका है. वह कविता किसी घोषणापत्र की तरह शानदार और स्पष्ट है. बात वहाँ फंसती है, जहां हम संघर्ष के मोर्चे निर्धारित करते हैं. भारत के कम्म्युनिष्ट आन्दोलनों में कुछ मुद्दे और किरदार बड़े थे और कुछ गौण रहे. यह समय बीतने के साथ साफ़ होना था कि बड़े और गौण आखिर क्या थे ? मसलन जिसे गौण कह कर दबाया गया, मसलन जातिगत बँटवारा, वही मुद्दे व्यापक साबित हुए. वीरेन की कविताओं में स्त्री, पत्नी होते हुए भी तसल्ली ढूंढ लेती हैं..[spacer height=”20px”]
‘..कुछ अनमनी मायके से
भाभी से कुछ रूठी
तनिक खुश
अपने नरक की बेतरतीबी में ही ढूंढेगी वे
अपने अपरिहार्यता की तसल्ली
खीझ-भरी प्रसन्नता के साथ.’

( जहां की महिलाए हों गईं कहीं’ शीर्षक कविता से )[spacer height=”20px”]

लेकिन वही स्त्री जब माँ बनती है तो वही सामाजिक सांस्कृतिक क्रान्ति के स्वप्न वाला जीवन अख्तियार करती है, जिसे कवि ने देखा है. यह दरअसल उसी बात की पुष्टि है जिसमें कवि के विचारो पर कोई संदेह न करते हुए इस आशय की कल्पना की गयी थी कि कवि एक बड़े स्वप्न और संघर्ष से मुखातिब है और वो जीवन की उसी संघर्ष के आईने से देख रहा है.[spacer height=”20px”]
‘क्या देह बनाती है माँओं को ? क्या समय ? या प्रतीक्षा ? या वह खुरदरी राख जिससे हम बीन निकालते हैं अस्थियाँ ? या यह कि हम मनुष्य हैं और एक सामाजिक-सांस्कृतिक परम्परा है हमारी जिसमें माँएँ सबसे ऊपर खड़ी की जाती रही हैं बर्फ़ीली चोटी पर,और सबसे आगे फ़ायरिंग स्क्वैड के सामने’[spacer height=”20px”]

( माँ की याद )

वीरेन व्यापक मनुष्यता के कवि हैं. उनकी कवितायें पाठको के लिए वीरेन की इच्छाओं की तरह है जिन्हें वो पाठको के लिए छोड़ गए हैं. यह हमें यानी पाठको को तय करना होगा कि उन इच्छाओं को जूते की तरह पहनकर, जैसा कवि की तमन्ना है, सूर्य को नीचे झाँक कर देखना चाहते हैं या रक्त तसला बन कर स्वप्न के चारागाह में दौड़ना चाहते हैं ?[spacer height=”20px”]
(श्रुति कुमुद विश्व भारती, शान्तिनिकेतन में असिस्टेंट प्रोफेसर पद पर कार्यरत हैं. इस लेख में इस्तेमाल तस्वीर समालोचन .ब्लॉग स्पॉट.इन से साभार लिया गया है.)[spacer height=”20px”]

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