क्या पढ़नी चाहिए अरुंधती का दूसरा उपन्यास ‘दी मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैप्पीनेस’? 

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सौतुक डेस्क/

अपने पहले उपन्यास ‘गॉड ऑफ़ स्माल थिंग्स’ से बुकर जीतने वाली लेखिका अरुंधती राय का दूसरा उपन्यास ‘दी मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ करीब बीस साल बाद आया है. इनकी पहली पुस्तक का 18 भाषा में अनुवाद हो चूका है और करोड़ से ऊपर प्रतियां बिक चुकी है. शायद इन्ही वजहों से लोगों के लिए यह उपन्यास बहुप्रतीक्षित रहा है. वाजिब है कि पुस्तक-प्रेमियों में यह जानने की उत्सुकता होगी कि उपन्यास कैसा है. अपनी इस उत्सुकता के लिहाज से अगर आप अगर इस पुस्तक पर आ रही प्रतिक्रियाओं पर जायेंगे तो आपकी उलझन और बढ़ेगी. इस पुस्तक पर हो रही तमाम चर्चा में लोग बंटे नजर आ रहे हैं. जहां कुछ लोग इस उपन्यास से खासे प्रभावित दिख रहे हैं वहीँ  कुछ को इससे खासा निराशा हुई है. यह हाल सर्फ़ स्थानीय ही नहीं बल्कि अन्य देशों में छप रही प्रतिक्रिया में भी देखा जा सकता है. बानगी के तौर आईये देखते है क्या है लोगों की प्रतिक्रियाएं.

इंग्लैण्ड से छपने वाला अंग्रेजी अखबार फाइनेंसियल टाइम्स लिखता है कि अरुंधती के चाहने वाले उनके इस नए उपन्यास से निराश नहीं होंगे. इस अखबार के अनुसार अरुंधती का दूसरा उपन्यास भी पहले की तरह दमदार है.

इसी तरीके से हिंदी के प्रतिष्ठित आलोचक वीरेन्द्र यादव लिखते हैं कि अरुंधति राय का नया उपन्यास ‘दी मिनिस्ट्री ऑफ़ अटमोस्ट हैप्पीनेस’ पढ़ने के बाद आप वैसे ही नहीं रह सकते जैसे पहले थे , बशर्ते आप महज़ आस्वादपरक उपन्यास पाठक न हों. यह ऐसा Dystopia है जिसके लिए हिन्दी में उपयुक्त शब्द तलाशे जाने की जरूरत है.

हिंदी के चर्चित कथाकार चन्दन पाण्डेय समालोचन नाम के वेबसाइट पर प्रकाशित अपनी समीक्षा में लिखते हैं कि अरुंधति ने शिल्प के स्तर पर बहुत सारे प्रयोग किये हैं. उपन्यास की नायिका, एस. तिलोत्तमा, के बचपन, शिक्षा आदि का वर्णन बार बार यह आभास कराता है कि वह अरुंधति की ही लंबी होती हुई परछाईं है. या खुद अरुंधति हैं. लेकिन नहीं, वास्तव में वह एक उम्मीद है. यह उम्मीद कि जैसे इस देश में अरुंधति हैं, वैसे ही जुझारू तिलोत्तमा है, वैसे ही कई अन्य होंगे.

उनके अनुसार यह बहुआयामी उपन्यास कश्मीर के शुरुआती बहुलतावादी राष्ट्र वाले संघर्ष को एक इस्लामिक संघर्ष में बदलने की प्रक्रिया को जिस बेहतरीन ढंग से पेश करता है, वह हैरतअंगेज करने वाला है. जिस कश्मीर की शुरुआती लड़ाई इस नारे के इर्द-गिर्द थी, ‘जिस कश्मीर को खून से सींचा/ वो कश्मीर हमारा है’, उसी कश्मीर की लड़ाई भयानक धार्मिक नारे की डोर थामें आगे बढ़ती है: आजादी का मतलब क्या/ ला इलाह इल्लिलाह. यह विडंबना ही है कि कट्टर आतंकी कश्मीर के जिन सिनेमाघरों को धर्म के नाम पर बंद कराती हैं, दमनकारी शक्तियाँ उन्हें यातना-गृह में बदल देती हैं. जो ऊपरी लड़ाई है वह जेकेएलएफ से होते हुए लश्करे-तैयबा के हाथों में तक जा पहुंचती है. लेकिन इन सबके बीच वहाँ की पीढ़ियों से दमित अवाम है. नायक मूसा की पत्नी और तीन वर्षीय बेटी अपने घर की बालकनी पर होने के बावजूद मशीनगन की गोली का शिकार बन जाती हैं. मूसा तिलो से कहता है, मैं यह नहीं कहूंगा कि यह लड़ाई व्यक्तिगत है, लेकिन यह भी नहीं कह सकता कि यह व्यक्तिगत नहीं है. जिसने अपनी पत्नी और तीन वर्षीय बेटी फौजी बूटों के तले खो दी हो, वो और कह भी क्या सकता है भला?

इन्ही की तर्ज पर इंदौर के रहने वाले एक शिक्षक जितेन्द्र राजाराम  ने अपने ब्लॉग पर प्रकाशित समीक्षा में लिखा है कि इस किताब ने कुछ सवाल उठाये हैं! वो सवाल जिन्हें आज पूछना मतलब जान गवाना हैं| जिन सवालों का जवाब आज कोई नहीं दे सकता… अरुंधती ने उन सवालों को उठाया है| वो भी उस वक्तजब सवाल उठाने मात्र से चिचियती भीड़ वाली सरकार आपकी जुबान नोच लेगी, लेखिका ने उन सवालों को तमाचे की तरह जड़ दिया है.

ये तो हुई एकतरफ की कहानी जिसमे अरुंधती के प्रशंसक जो इस उपन्यास से काफी प्रभावित हैं. पर दूसरी तरफ भी इतने ही मज़े हुए लोग हैं जिनकी अपेक्षा अरुंधती से कुछ बेहतर की रही है.

अपने फेसबुक वाल पर हिंदी के दिग्गज कथाकार शिवमूर्ति लिखते हैं, “अरुन्धती राय जी का नया उपन्यास पढ़ा.मुझे उनका पहला उपन्यास  बेहद पसन्द है.उनके लेखों में व्यक्त विचारों से भी उनकी समझ और अभिव्यक्ति क्षमता का लोहा मानना पड़ता है.मैने उनके नये उपन्यास से बड़ी उम्मीद लगायी थी. मैं यह कहते हुए दुखी हूँ कि यह उनके पहले उपन्यास की ऊँचाई नहीं प्राप्त कर पाया.केवल बीच के एक तिहाई या कहिए आधे भागको,जो कश्मीर से सम्बन्धित है,उत्कृष्ट कहूँगा.कितना सुखद होता यदि इसी त्वरा परपूरा उपन्यास चलता.अरुन्धती जी ने बहुत कुछ ज़रूरी कहने का प्रयास किया जिसके लिए कई कहानियों को एकीकृत करने की कोशिश की लेकिन वह ऊँचाई नहीं आ पायी.वह सिद्धि नहीं मिल पायी.बहुतों से ऊपर मगर अपने से कम. बहुत दुख हो रहा है.”

इंदौर के जाने माने सामाजिक कार्यकर्ता राहुल बनर्जी अपने फेसबुक वाल पर लिखते हैं कि मुझे नहीं मालूम के विदेशों में बैठे लोग इसे किस तरह लेंगे पर एक भारतीय के तौर पर मुझे इस उपन्यास में ऐसा कुछ नहीं मिला जिसकी बदौलत मैं इस कृति को महान साहित्य कह सकूं. उन्होंने तो यहाँ तक लिखा है कि पिछले दो दशकों में अरुंधती के बतौर कार्यकर्ता गैर-साहित्यिक लेखन उनकी साहित्यिक क्षमताओं पर प्रतिकूल प्रभाव डाला है.

अमेरिका से छपने वाली दी अटलांटिक.कॉम में पारुल सहगल लिखती हैं कि इतिहास में सही पक्ष के साथ होने का भरोसा खतरनाक है. खासकर एक लेखक के लिए. खुद के प्रति इतना मोह एक निश्चिंतता ला सकती है. जबकि एक अच्छे गद्य के लिए हमेशा खुद पर संदेह करना होता है.

इन प्रतिक्रियाओं को देखा जाए तो एक पाठक के लिए यह समझना मुश्किल होगा कि यह किताब पढ़ी जाए या नहीं. पर इतना तो तय है कि अगर वर्तमान में रचे जा रहे साहित्य को समझना है तो एक पाठक के लिए इस पुस्तक को नजरअंदाज करना मुश्किल होगा.

 

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