परिवार,(राज्य) और निजी संपत्ति: धनतांत्रिक विकृतियों की निर्मम शिनाख़्त 

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कैलाश बनवासी/

यों तो हमारा यह समय सभी कलाओं के लिए बेहद कठिन समय है जहाँ कलाएं समाज से बाहर ही नहीं हो रहीं, बलिक गैरजरूरी करार कर दी जा रही हैं,ऐसे में कहानी विधा की अपनी ही कठिनाइयां हैं, यह मुश्किल और मुश्किल होता जा रहा है। जब हम देखते हैं हमारा यथार्थ बिजली की गति से बदल रहा है, हर पल सूचनाओं का अंबार लग रहा है जो मस्तिष्क को महज सूचना संग्रहण केन्द्र में बदलता जा रहा है। यही नहीं, इन तेज बदलावों से हमारे वे मूल्य, सिद्धांत, आदर्श जिन पर भरोसा करके जीवन टिका रहता था, सहसा धराशायी हो चले हैं और उनकी जगह जो बाजार आधारित मूल्य आदर्श स्थापित हो रहे हैं, और जिनका वर्चस्व दिन-ब-दिन बढ़ता ही चला जा रहा है, ने बौद्धिकों को भौचक्का-सा कर दिया है। कहानियों में अपने समय के इन बदलावों, अंतर्विरोधों, विडम्बनाओं, षड़यंत्रों, अपराधों और बर्बरताओं को निडरतापूर्वक दर्ज कर पाना आज वाकई किसी चुनौती से कम नहीं है।ज्यादा दिन नहीं हुए कि कहानी में हमारा काम सरल नुस्खों से चल जाता था, वे सहज स्वीकार्य भी थे, चर्चित भी हो जाते थे। वे कवि कथाकार सरलतापूर्वक बन जाने के आसान दिन थे। लेकिन आज की स्थिति दूसरी है। इन बरसों में पाठक बदले हैं, उनकी चेतना का भी तीव्र विकास हुआ है और उन्हें अपने मानसिक स्तर की खुराक चाहिए। यह भी है कि उन्हें आप पहले वाले तौर तरीकों से प्रभावित करना तो दूर, आकर्षित भी नहीं कर सकते। हम जो कभी अपने खास जनवादी पैटर्न पर आसानी से कहानियां बुन लेते थे, और जिन्हें गाहे-बगाहे हमारे समय के आलोचक भी सराह लेते थे क्योंकि वे खुद भी कहानी को अपने बंधे-बंधाये पैटर्न में देखने के हिमायती ही नहीं, बल्कि आदी हो चले थे। बदले समय में उन्हें भी झटका लगा है,और अपने औजारों की जांच-परख फिर-फिर करने की जरूरत उन्हें भी महसूस हो रही है। कुल जमा यह कि कहानी की आरामतलबी अब चीन्ह ली जा रही है और मौजूदा समय उनसे कुछ नया  और ऊर्जावान-सा कुछ मांग रहा है।

मैं अपनी ही बात करूं।तो अपने जीवन के चंद अनुभव, और उनसे जुड़कर, कुछ जोड़-जाड़कर कहानी जिस सरलता से कहानी लिख लेता था, आज के दौर में वह पद्धति मुश्किल में है, क्योंकि अब अनुभववाद या यथार्थ को अपनी भाषा में प्रस्तुत कर देने की शैली अपर्याप्त लगने लगी है। लग रहा है मौजूदा समय के तनावों, जटिलताओं को इस पद्धति से अब नहीं व्यक्त किया जा सकता। चीजों को अब ज्यादा गहराई, ज़्यादा अपनापे, ज़्यादा संश्लिष्टता और संपूर्णता में देखना होगा। इस चाह के साथ कि कहानी महज चंद बातें नैरेट करके समाप्त न हो जाए, वह पाठक के भीतर  किसी शूल-सा धंसे,उनमें तेजाबी बेचैनी पैदा कर,और यथास्थिति के खिलाफ एक ठोस आक्रोश जगाए। यानी हमारा मौजूदा सुविधाप्रद रचनात्मक क्षणिक भावनात्मक उद्रेक, कचोट, या अनुभववादी प्रेक्षण नाकाफी है। इसलिए कि वितीय पूंजी के इस दौर में वे शक्तियां आज नित नये-नये औजारों से लैस होकर हमारी चेतना पर ज्यादा सूक्ष्म,ज्यादा व्यापक और ज्यादा स्थायी आक्रमण कर रही है। इसे ही ख्यात वरिष्ठ कथाकार ज्ञानरंजन ने अपने लेख ‘समय समाज और कहानी’ में लिखा है-‘यथार्थ ठोस नहीं, वह हर दिन बदल रहा है। वह ज्यादा अप्रत्यक्ष, अमूर्त और सूक्ष्मता में कैद होने के साथ, उतना ही जटिल और लुका-छिपा है।उसमें गहरी और समरस मिलावट  हो गई है। उसमें परदेस आ गए हैं और दीर्घकालिक संधियाँ। उनमें विश्व प्रसिद्धवित्तीय संस्थान आ गए हैं,उनमें कूट,अप्रतिम प्रभावशाली और फुर्ती से भरे हुए दलाल आ गए हैं,उन्हें दलाल शब्द देना भी झूठ और हिम्मत का काम लगता है। क्योंकि वे बेहद खूबसूरत,सम्पन्न और स्वीकृत हैं।’

आज एक पाठक के तौर पर मैं ऐसी रचनाएं ढूंढता हूँ जिसमें रचनाकार हमारे समय की धड़कनों को,उसके तनावों,जटिलताओं को उसी ताप में पाठक को न केवल महसूस करा सके,बल्कि अपनी एक ठोस राय बनाने पर विवश कर सके। कि वह किसी सरलीकरण का शिकार न हो,बल्कि समय की आंख से आंख मिलाने की चुनौती को स्वीकार करता हो। जो स्थापित मान्यताओं को निर्भीकता से न केवल ध्वस्त करता हो,और नयी राह बनाने में मदद करता हो।मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि अपने समय की वास्तविकताओं से जूझने वाले कहानीकार हिन्दी में कम ही हैं। इस संदर्भ में काशीनाथ सिंह,स्वयंप्रकाश,असगर वजाहत,चित्रा मुद्गल, संजीव, उदय प्रकाश, शिवमूर्ति, अखिलेश, यागेन्द्र आहूजा, पंकज मित्र और ओमा शर्मा कुछ महत्वपूर्ण नाम हैं।

राकेश मिश्र की यह कहानी ‘परिवार,(राज्य) और निजी संपत्ति (तद्भव अक्टूबर 2012) किसी जादुई यथार्थ की कहानी नहीं है, लेकिन यह हमारे अभी के संक्रमण कालीन भारतीय समाज के तह में जाने की कोशिश करती है

इनमें नया नाम राकेश मिश्र का है। राकेश नये हैं, लेकिन अपनी कहानियों के लिए उन्होनें यही कठिन मार्ग चुना है। वह उदय प्रकाश से काफी प्रभावित हैं। वही क्यों कहानीकारों की नयी पीढ़ी के अधिकांश कथाकार उनसे प्रभावित हैं। निश्चय ही उदय प्रकाश ने कहानी लेखन में कुछ मील के पत्थर गाड़े हैं। उन्होंने पिछली सदी के आखिरी दो दशकों में जैसी कहानियां लिखीं, उसने लम्बे अरसे से कहानी लेखन में चले आते और लगभग जड़ता को प्राप्त कर चुके ‘प्रचलित यथार्थवाद’ को लैटिन अमरीकन मार्खेज के जादुई यथार्थवाद का बेहद प्रभावशाली भारतीय संसकरण अपनी ‘टेपचू’, तिरिछ’, छप्पन तोले का करधन’ या ‘हीरालाल का भूत’ जैसी कहानियों के माध्यम से पाठकों का ध्यान ही नहीं खींचा, बल्कि कहानी को केन्द्रीय विधा बना दिया।

उदयप्रकाश की इस शैली ने कहानी के बने-बनाये फार्मेट को ही नहीं तोड़ा, वरन कहानी को औपन्यासिक विस्तार देते हुए एक विमर्श में बदल देने का जोखिम भी उठााया। निश्चय ही उस दौर में ऐसा करने वाले वे अकेले मात्र कहानीकार नहीं थे। लेकिन यह श्रेय तो उन्हें ही जाता है। इस प्रभाव में कहानीकारों की नयी पीढ़ी भी उन्हें अपना आदर्श मानते हुए इसी शैली पर कहानियां लिखने लगे। और आज हम पाते हैं कि हमारे समय के सभी महत्वपूर्ण युवा कथाकार इसी ढंग पर कहानियां लिख रहे हैं।

राकेश मिश्र की यह कहानी ‘परिवार,(राज्य) और निजी संपत्ति (तद्भव अक्टूबर 2012) किसी जादुई यथार्थ की कहानी नहीं है, लेकिन यह हमारे अभी के संक्रमण कालीन भारतीय समाज के तह में जाने की कोशिश करती है और तद्जनित हमारा नया बनता चेहरा हमारे सामने उपस्थित करता है।

कहानी की पहली पंक्तियां ही इस दौर में बन रही प्रवृत्ति को पाठक के सामने बेलौस और साहसिक ढंग से रखकर इस नये बन रहे व्यक्ति का परिचय देती है- ‘‘पांडे वैसे तो लम्बा चैड़ा था,लेकिन वह ऊँचा होना चाहता था। ऊँचा होने के उसके अपने तर्क थे और उन तर्कों को पूरा करने की तरकीबें भी! इन तर्कों में सबसे मजबूत तर्क था कि यह कतई जरूरी नहीं कि आदमी अपने कर या कर्मों से ही ऊँचा उठे,यह ऊँचाई किसी की पीठ या गर्दन पर चढ़कर भी पाई जा सकती है, शर्त केवल इतनी है कि यह भी नजर मत आने दो कि तुम किसकी गर्दन या पीठ पर सवार हो। उसके पास शहर के तमाम सफल और ऊँचे लोगों की सफलता की सच्ची और बजबजाती कहानियां उपलब्ध थीं,जिसे जरूरत पड़ने पर वह सुनाता भी था और गुनगुनाता तो खैर हमेशा ही था।’’

यह वह युवा है जिसकी मसें नवें दशक के दम तोड़ते राष्ट्रीय पूंजीवाद, करोड़ों के बोफोर्स दलाली, शेयर घोटाले, स्टाम्प घोटाले और सोवियत विघटन काल में फूट रही हैं, और मुक्त बाजार के मनमोहनी नयी आर्थिक नीति और भूमंडलीकरण के जोर पकड़ते दौर में युवा हो रहा है। यह उस दौर का जैसे प्रातिनिधिक चरित्र है। धाीरज पांडे उस औद्योगिक शहर का रहवासी है जहाँ देश की एक प्रतिष्ठित निजी इस्पात कंपनी है, जिसमें उसके पिता-नंद किशोर पांडे- फोरमेन पद पर काम करते हुए ट्रेड युनियन लीडर हैं, जिन्हें आगे चलकर अपनी आंदोलनकारी कामरेडी के चलते नौकरी से बर्खास्त कर दिया जाता है। ‘वे पढ़ने-लिखने वाले, सोचने-समझनेवाले कामरेड थे,‘ और उस दौर के कामरेड थे जब इस उपाधि को हासिल करने के लिए बहुत कुछ दांव पर लगाना होता है’।

उस दौर की संक्षिप्त लेकिन जीवंत और सार्थझांकी लेखक इन पंक्तियों के माध्यम से करता है-‘शहर चूंकि मजदूरों का था और सर्वहारा का अधिनायकत्व देश में हो न हो, उस कंपनी में तो जरूर होना चाहिए जहाँ की नींव अब्दुल बारी और विधानचंद्र राय जैसे कम्युनिस्टों ने रखी हो और जहाँ की चिमनियों से कामरेड केदार मुखर्जी और सरदार हजारा सिंह की गर्म सांसों का धुआं निकलता हो। वह दौर ही अजीब था जब मजदूर युनियन और प्रबंधन के फैसले किसी वातानुकूलित कक्ष में विस्की और काजू की प्लेटों से तय न होकर हजारों मजदूरों के सामने आंदोलन स्थल पर ही तय होते थे।आंदोलन धरना प्रदर्शन जैसे शब्द अपनी सम्पूर्ण गरिमा और अर्थवता मं  उपस्थित थे और उसमें शामिल होने पर किसी खास कर्तव्यबोध  से भर जाते थे।’

नंद किशोर पांडे मजदूर आंदोलनों के जोर वाले इसी दौर में बर्खास्त कर दिए गए।कंपनी द्वारा दी जाने वाली सुविधाएं छीन लेने के बाद उनका परिवार अपने शास्त्री नगर के पुराने तीन कमरे वाले पुश्तैनी मकान में रहने आते हैं। और तब वास्तविक गरीबी से इस परिवार का सामना होता है। राकेश अपने पात्रों के गरीबी के इन मुश्किल क्षणों में भी उनके प्रति करूणागत अश्रुविगलित हुए बिना या दया दिखाए बिना उनकी गरीबी की गरिमा को बनाए रखते हुए लिखते हैं-‘‘और सबने खामोशी से यह तय कर लिया कि दुनिया में कैंसर, टीबी, हार्ट अटैक जैसे ही बड़े रोगों का अस्तित्व है, खांसी, सर्दी, बुखार, जुकाम जैसी नगण्य चीजों पर ध्यान नहीं देना है, और यदि यह कभी हो ही जाये तो अदरक, काली मिर्च, तुलसी का पत्ता,अंजवाइन और न जाने ऐसी ही अनगिन चीजें तो हैं ही।’ इन पंक्तियों में देश के सौ करोड़ से भी अधिक लोगों के जीवन का मार्मिक सत्य छुपा है जिसे राकेश बेहद गहरी पीड़ा और क्षुब्धभाव से व्यंग्य में बयां कर रहे हैं। परसाई कहते ही रहे हैं कि व्यंग्य बहुत सच्ची और गहरी करूणा से निकलती है। लेखक की यह एक ठोस और विकसित जीवन-दृष्टि है जिसमें उसकी पक्षधरता बगैर कुछ कहे आपको महसूस हो जाती है।

इस कहानी में यह बरामदा अपनेआप में एक महत्वपूर्ण किरदार है जिसमें यह सब घटित हो रहा है। यह बरामदा मानो अपने समय का इतिहास दर्ज कर रहा है

कहानी में आगे इसी निर्मम तटस्थता से नंदकिशोर पांडे के आगे के दिनों को बताया गया है।‘ नंदकिशोर जी के लिए बरामदा रह गया जहाँ वे पहले पहल अपने कामरेड दोस्तों के साथ बैठते बहस करते और ‘सहर होगी कोई स्याह रात के बाद’ की उम्मीदों को जिन्दा रखते। लेकिन धीरे-धीरे उन दोस्तों की आमदरफ्त  कम होती गयी और अंतहीन बहसों की जगह बरामदे में एक ठोस और ठस किस्म की चुप्पी पसरती गयी।’’ इस कहानी में यह बरामदा अपनेआप में एक महत्वपूर्ण किरदार है जिसमें यह सब घटित हो रहा है। यह बरामदा मानो अपने समय का इतिहास दर्ज कर रहा है, …कामरेडों का आना-जाना कम होते जाना… उनकी बहसों का बंद होते जाना…मोहल्ले के चंद फुरसतिया लोगों का वहाँ आकर ताश खेलने लग जाना…और आगे चलकर इसकी दीवार पर मार्क्स के चित्र के साथ आसाराम बापू का चित्र टंग जाना…। मैं गुजरे समय के इस ‘अंतराल’ के बारे में सोचता हूँ, जब चीजें बाहर बहुत तेजी से बदल रही है। कामरेड अब बहसों से उकताकर आना-जाना बंद कर चुके हैं, उनके मस्तिष्कों में एक शिथिलता यहाँ तक कि निष्क्रियता व्याप गई है, और यहाँ कामरेड अब निठल्लों के संग ताश खेल रहे हैं। त्रासदी केवल नंद किशोर पांडे मात्र की नहीं है; इसी समय में धीरज पांडे देख रहा है कि कम्युनिस्टों में भी जो कभी उसके पिता के मित्र थे, आज ठेकेदार,  बिल्डर, और नेता हो गए हैं। न केवल यही,बल्कि उनमें घोर लापरवाही , गैर जिम्मेदाराना भाव और संवेदनहीनता  पसरती जा रही है। धीरज पांडे को उसके पिता इन्हीं साथियों के पास जरूरत पड़ने पर कुछ सौ रूपयों की मदद मांगने भेजता है तो उसे इनका यही रूप दिखाई देता है। यह सोवियत विखंडन के बाद विश्व के एक ध्रुवीय हो जाने और समाजवाद के अंत की घोषणाओं का समय है, जब कितने ही वामपंथी नेता और बुद्धिजीवी अपनी आस्था, अपने विचार बदलकर सत्ता मुखापेक्षी हो रहे हैं,पार्टी में वैचारिक तेज कम होते-होते जनता की वास्तविक लड़ाई और संघर्ष गायब होते जा रहे हैं,इनके लोगों में भी सुख वैभव की चाह जाग गई है, कि इनकी ताकत को भी स्वार्थ और सुविधा का फंफूद लगना शुरू हो गया है।

क्रांतिकारी कवि पाश ने उस दौर के इन्हीं विचलनों पर लिखा था-

यह शर्मनाक हादसा हमारे ही साथ होना था

 कि दुनिया के सबसे पवित्र शब्दों ने

 बन जाना था सिंहासन के खड़ाऊ

 माक्र्स का सिंह जैसा सिर

 दिल्ली की भूल-भूलैया में मिमियाता फिरता

 हमें ही देखना था

 मेरे यारो,यह कुफ्र हमारे ही समयों में होना था।’

इस कहानी के नायक धीरज पांडे को इन्हीं परिस्थितियों ने गढ़ा है। और इन परिस्थितियों ने मौजूदा आर्थिक,सामाजिक और राजनैतिक ढांचे की तस्वीर उसके सामने बहुत साफ कर दी है,और वह उन सब बातों से बिल्कुल मुक्त हो गया है जिन पर चंद बरस पहले तक उसके कामरेड पिता चला करते थे। वह कवि गोष्ठियों में जाता है,लेकिन उसे साफतौर पर कवि नहीं बनना है, न ही कवि-कर्म को अपने से कहीं भी जोडना़ है,क्योंकि वह जानता है कि इस समय में कविगण कंकड़ फेंकने से भी हासिल हो जाते हैं। वह इस सिस्टम में अपने लिए कुछ सरल और आर्थिक लाभ देने वाला रास्ता तलाश रहा है। वह अखबारों में रोज छपकर नेताओं,ठेकेदारों की नजर में सम्मानित बनकर उनका इस्तेमाल अपने लिए करना चाहता है और आगे चलकर यही उसका बिजनेस हो जाता है। कामरेड का बेटा पूंजीपतियों का मददगार बन गया है। जाहिर है कि धीरज पांडे के पास कोई वैकल्पिक राजनीति या दृष्टि नहीं है,वह मौजूदा ढांचे में अपनी सफलता चाहता है,और इसी की रणनीति वह बनाता रहता है।दरअसल सफलता का सरलीकृत सूत्र भी यही है,मौजूदा सिस्टम का ही एक हिस्सा बन जाओ, यथास्थिति बने रहने दो, बल्कि अपनी ओर से इस यथास्थिति में और इजाफा करो-प्रगति की प्रतीति देते हुए। तमाम सत्ता  प्रतिष्ठानें अपने वर्चस्व को बरसों से इन्हीं रणनीतियों के आधार पर ही तो कायम रखे हुए हैं! धीरज पांडे इसी काम को बढ़ाते हुए अपने घर वाली सड़क का नामकरण समारोह करता है-नेताजी सुभाषचंद्र बोस मार्ग।समारोह में उसके पिता एक घंटे का भाषण देते हैं। अपने यहाँ नामकरण को लेकर गली-कस्बे से लेकर दिल्ली तक की जाने वाली राजनीति से हम परिचित ही हैं। बड़े नामों को सीढ़ी बनाकर अपना उल्लू सीधा करने का खेल अरसे से खेला जा रहा है,जिसतें आजकल और तेजी आ गई हैं। यहाँ धाीरज पांडे की कुटिल महत्वाकांक्षा है कि गली को लोग नेताजी के नाम से ही जानें, क्योंकि मोहल्ले के लोग उसे नेताजी ही कहते हैं। हैरानी की बात यही है कि नामकरण के इस कुत्सित खेल में उसके बर्खास्त कामरेड पिता चुपचाप शामिल हैं, किसी महानायक के नाम के यों ‘घरेलू’ इस्तेमाल पर वे एकदम चुप हैं। कहने को यह कहानी युवा धीरज पांडे की है, लेकिन यहाँ लगता है कहानी दरअसल उसके पिता की ही है,जिसके जीवन के उतार-चढ़ाव लेखक दिखाता है। कभी बेहद ईमानदार और कर्मठ रहे कामरेड ने बर्खास्तगी के लम्बे दौर और आर्थिक कठिनाइयों से जूझते परिवार के कारण परिस्थितियों से समझौता कर लिया है ।परिवार में उनकी उपस्थिति अब हाशिए में चली गई है और नये समय में उन्हें अपने घर की चालक शक्ति का हर सूरत में समर्थन ही करना है।कभी प्रभावशाली नेता रहे उसके पिता आज अपने ही बेटे के अर्दली बनकर रह गए हैं, जो अपने बेटे को घर-बाहर में अब सदैव अदब से ‘नेताजी’ ही कहकर संबोधित करने लगे हैं। इस चरित्र के बहाने पाठक कहीं न कहीं लेफ्ट पार्टियों की गति और नियति को समझने लगता है,हालांकि कहानी में कहीं भी यह तुलना नहीं है।

धीरज पांडे अपने आगे के कारनामों में बड़ा काम यह करता है कि अपनी रणनीति के तहत वह कंपनी का भरोसा जीतकर मैनेजमेंट में अपनी पैठ बना लेता है और वह अपने पिता की बर्खास्तगी निरस्त करवा कर उस अवधि के समस्त आर्थिक लाभ उनहें दिलवाता है।यह धीरज पांडे की अब तक की सबसे बड़ी जीत थी। रूपयों के आवक के साथ ही घर का नक्शा देखते ही देखते बदल जाता है।मकान तिमंजिला हो गया।घर में चमचमाती नयी बाइक आ गई। वह मैनेजमेंट का सवयंभू सलाहकार हो गया।इसके अलावा उसने अपना नया बिजनेस शुरू कर दिया -नगर के धनपतियों को समाज सेवा के नाम पर किन्हीं सेलिब्रेटी या प्रतिष्ठित व्यक्ति के हाथों पुरस्कृत-सम्मानित करने का खेल।वह इसका रैकेट चलाता है, इवेंट मैनेजमेंटनुमा-सा कुछ,जिसमें नवधनाढ्य तबके के लोगों की नेम-फेम की गहरी महत्वाकांक्षा को वह भुनाता है।

इस कहानी में तीसरे महत्वपूर्ण पात्र के रूप में कथावाचक ‘मैं’ को पाते हैं,जो एक कवि है, धाीरज पांडे का मित्र,जो उसके सभी कारनामों को लगभग जानता है और अक्सर उसके सामने सही-गलत,नैतिक-अनैतिक या वास्तविक जवाबदेही के प्रश्न खड़े किया करता है,या उसकी गतिविधियों पर अपनी स्पष्ट असहमति दर्ज कराता है। यह ‘मै’ इसकी लीला से सच्ची नफरत करता है लेकिन यह व्यर्थ है। उसकी सफलताओं के आगे वह छोटा होता जाता है गो कि वह होना नहीं चाहता। यह ‘मै’ उसकी क्षुद्र चालाकियों और अवसरवादिता के बरक्स अपने ज्ञान, शिक्षा,

धन के सहारे छवि बनाने बिगाड़ने का धंधा हमारे समय में बहुत जोरों पर है। चुनावों में इस कुत्सित धंधे को अपने चरम पर देख सकते हैं, जब पूंजी के बल पर छवि बनाने बिगाड़ने का खेल चलता है, और इसने हमारे लोकतांत्रिक  चुनावों को  मानो धनतांत्रिक चुनाव में बदल दिया है

ईमानदारी और कवि होने पर गर्व करके उससे छोटा नहीं होना चाहता। लेकिन नहीं चाहते हुए भी पांच-सात सौ के लिए उसे धीरज के काम आना पड़ता है। वह इसलिए कि वह भी एक साधारण परिवार से है और उसे भी तो पाॅकेटमनी चाहिए।कब तक घर के बड़ों से मांगता रहेगा।

इस कहानी के जरिए हम देख सकते हैं -युवाओं में बगैर श्रम के धन बटोरने का क्रेज। धन के सहारे छवि बनाने बिगाड़ने का धंधा हमारे समय में बहुत जोरों पर है। चुनावों में इस कुत्सित धंधे को अपने चरम पर देख सकते हैं,जब पूंजी के बल पर छवि बनाने बिगाड़ने का खेल चलता है, और इसने हमारे लोकतांत्रिक  चुनावों को  मानो धनतांत्रिक चुनाव में बदल दिया है। धीरज पांडे के इस मैनेजमेंट बिजनेस में कहीं कोई रूकावट नहीं। धीरज ने अखबार मीडिया सबको साधे रक्खा है।कवि कलमकार हाशिये पर हैं, मीडियाकरों की चांदी है,और सबसे बड़ी बात इस पूरे माहौल के खिलाफ कहीं कोई आवाज नहीं है।

धीरज की सफलता की कहानी चल रही है,घर में पैसे आ रहे हैं,और यही पैसा उसके पारिवारिक कलह की वजह बनती है। घर को ऐसे श्रमरहित पैसों की आदत जो लग गई है,और भाइयों,बहुओं के बीच इसे लेकर कलह शुरू हो गया है। अनाप-शनाप तरीके से बटोरे गए धन की यह एक समस्या है। धन विलासी जीवन तो मुहैया करा देगा लेकिन वह विवेक नहीं जगा सकता जिसमें कोई किसी दूसरे के बारे में सहृदयतापूर्वक सोच भी सके। यह धन अनिवार्यतः अपराध और विकृति को जन्म देता है, जिसकी कथाएं हम रोज सुबह अखबार के पन्नों पर या टीवी पर देखते हैं। इसके बावजूद धन की यह हवस नहीं रूकती।और रूक भी नहीं सकती।यह किन्हीं नैतिक पाठों,उपदेशों या प्रवचनों से कत्तई रूकने वाली नहीं है। क्योंकि समस्या की जड़ पूंजीवादी  शोषणमूलक व्यवस्था है जिसकी गैरबराबरी की संस्कृति हमें ऐसा ही गढ़ रही है।

कहानी में आगे पाठक तब चैंक पड़ता है जब धीरज पांडे की अप्रत्याशित हत्या हो जाती है। एक रहस्यमयी हत्या,जिसके तार इन्हीं विकृतियों से जुड़े हुए हैं। यह हत्या दिखाता है कि पूंजी की सत्ता बेहद निर्मम और क्रूर होती है,कि वह हमारे जीवन की आत्मीयता,पारिवारिकता सब कुछ सोख लेती है और रिश्तों को ठूंठ बनाकर छोड़ती है जिसकी जड़ों में पानी का नामो निशान नहीं होता। कहानी संकेत करती है कि इस हत्या के पीछे उसका छोटा भाई ही है,जिसके अपनी भाभी के साथ कथित अवैध सम्बंध है।

बरास्ते भूमंडलीकरण, अवारा पूँजी के इस विराट निरंकुश तंत्र की यह एक बहुत छोटी कहानी है। इस कहानी को पढ़ते हुए मुझे मधुर भंडारकर की तमाम फिल्मों जैसे ‘चांदनी बार’‘पेज 3’,‘फैशन’,‘कारपोरेट’ और ‘कैलेण्डर गर्ल’ आदि का रह-रहकर ध्यान आता रहा ,जिनमें वे इसी कारपोरेट और पंूजी आधारित वर्चस्व की वर्तमान महानगरीय विकृतियों का यथार्थ दर्शकों तक पहुँचाते हैं। महानगरीय जीवन की आपाधापी,महत्वाकांक्षाएं ,धन की लिप्सा, आपसी होड़ यौनिक विकृतियां..सब कुछ बहुत खुले और नग्न रूप में इनमें आता है।

राकेश अपनी इस कहानी में इस तंत्र की मौजूदा शक्ल की निर्मम शिनाख्त करते हैं जो लगातार विकृत होता जा रहा है, और अपने तई इसके कारणों की पर्याप्त पड़ताल भी। इसके अलावा, इस कहानी को वे जिस ठोस,कसे हुए शिल्प में बांधते हैं,वह इसकी ताकत को दुगुना कर देता है। कहानी में किसी भी फालतू दृश्य या संवाद के लिए कोई अवकाश नहीं। कहानी अपने मुद्दे से एक इंच भी नहीं भटकती। यह कहानी हमारे जटिल समय की जटिलताओं में उतरती है,उससे कतराती कतई नहीं। और न ही किसी फार्मूले का शिकार होती है।कहन का यह बेबाक ढंग,अनुभव का खरापन और इस दौर की विडम्बनाओं की गहरी पहचान इस कहानी को सर्वथा एक नयी चमक दे जाते हंै, और ये ही बातें इसे हमारे समय की एक महत्वपूर्ण,विशिष्ट और यादगार कहानी बनाती है।

(कैलाश बनवासी  साहित्यकार हैं। इनके कहानी संग्रह : लक्ष्य तथा अन्य कहानियाँ, बाजार में रामधन, पीले कागज की उजली इबारत पाठकों के बीच चर्चित रही हैं और इन्होंने ‘लौटना नहीं है’ नाम से एक उपन्यास भी लिखा है। बनवासी, श्याम व्यास पुरस्कार (1997), प्रेमचंद स्मृति कथा सम्मान (2010) से सम्मानित हो चुके हैं।)

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