पंखुरी सिन्हा की चार कवितायें

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पंखुरी सिन्हा/

युवा लेखिका, दो हिंदी कथा संग्रह ज्ञानपीठ से, दो हिंदी कविता संग्रह, दो अंग्रेजी कविता संग्रह। कई संग्रहों में रचनाएं संकलित हैं, कई पुरस्कार जीत चुकी हैं -कविता के लिए राजस्थान पत्रिका का 2017 का पहला पुरस्कार,  राजीव गाँधी एक्सीलेंस अवार्ड 2013, पहले कहानी संग्रह, ‘कोई भी दिन’ , को 2007 का चित्रा कुमार शैलेश मटियानी सम्मान, ‘कोबरा: गॉड ऐट मर्सी’, डाक्यूमेंट्री का स्क्रिप्ट लेखन, जिसे 1998-99 के यूजीसी, फिल्म महोत्सव में, सर्वश्रेष्ठ फिल्म का खिताब मिला, ‘एक नया मौन, एक नया उद्घोष’, कविता पर,1995 का गिरिजा कुमार माथुर स्मृति पुरस्कार, 1993 में, CBSE बोर्ड, कक्षा बारहवीं में, हिंदी में सर्वोच्च अंक पाने के लिए, भारत गौरव सम्मान. इनकी कविताओं का मराठी, पंजाबी,  बांग्ला और नेपाली में अनुवाद हो चुका है.

पुरानी  तस्वीरें

ये कहना था उनका
कि हो ख्यालों में अगर कोई
तो वो नज़र आता है
उठने, बैठने में
चलते, फिरते में
चलते में पेड़ों की ओर देखने में
चलते में फूलों की ओर देखने में
फूलों के आगे रुक जाने में
रुके रहने में
चलते, चलते के ठिठकने में
ऐसे नहीं कि दस्तक हो
किसी बेमिसाल ख्याल की
हो भी तो दिखे न
दिखे भी तो कोई बूझे न
दिखे केवल, चलते, चलते का रुक जाना
थम जाना
कि और आगे चला न जाए
अजब सी खामख़याली
ये फूलों के आगे की चुप्पी
ख़्वाब भरी आँखें
या केवल अब और आगे चला न जाए
ऐसी मांग समर्पण की
अर्पण की, तर्पण की
जो बूझे न पहचानकर ठिठकना
फूल नहीं, तस्वीर सही
बड़ी दुकानो के दरवाज़ों पर
साप्ताहिक सेल के दाम नहीं
जबकि किसी सुषुप्त ज्वालामुखी के अचानक जाग उठने की तरह
है इर्द गिर्द का विस्फोट
जो जैसे है,  निरंतर साबित करते रहने का विस्फोट
आपकी उपस्थिति यहाँ कैसे है
हर आदमी की जिज्ञासा
हर आदमी उनका भेजा हुआ
खारी, खारी होती जाती है
कविता, हिंसा के समुद्र से
और जब डूब रहा हो
सारा ज़मीर
समूची हस्ती आपकी डूब रही हो
गुण, और गुणवत्ता के बाद
बल्कि युद्ध के बाद उस पर
जब खारा होता जाता हो मिज़ाज़
खारे सब शब्द
खारी होती जाती हो कविता
बहुत दर्दनाक हो बारिश हर कहीं
तो ढूंढ पाना अपनी किसी जेब में पुराना बटुआ कोई
ढूंढ पाना किसी की तस्वीर
जो प्रेरणा भी हो, प्रिय भी
तत्काल, मिठास भर दे
भयानक खराश में
भींग भी गयी हो तो भी
नज़र आये
बोले बतियाये
गाए भी
कि बारिश अब संगीत नहीं हो
बारिश महसूस होती हो
जैसे बेघर की बारिश
चुभती हो, बहुत दर्दनाक हो बारिश
कोई तो ऐसी तस्वीर हो
ताप दे कुछ भाप दे
जो बाँध ले
जिसके रंग नज़र आये
और बिखर भी जाएँ
रंगों की यादाश्त हो पुरानी
और चमकता हो उस रंग का सबसे खूबसूरत लम्हा
सूरज की तरह
बारिश के हाहाकार में…
और पाने पर कि कई बार ये तस्वीर अपनी भी होती है
कहना जानकारों का
कि ये फितरत है…

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ट्रांसजेंडर बातें

 

 

 

 

 

 

हंसने की फितरत वाले लोग
ढूंढ लेते हैं कोई न कोई बहाना
हंसने के लिए
खुद पर भी हंसा जा सकता है
परिस्थिति पर भी
स्थिति के जो निरंतर बनाये जा रहे शिकंजे हैं
कैसे भेदा जाए उन्हें
कैसे तोडा जाये उन्हें
कोई तो युक्ति हो
कोई तो सूक्ति हो
कितना बदलना हो खुद को
गिरफ्त से उसकी निकलने को
कसता जाता है जो फंदा
वो काटने को
केवल उनका बोलबाला
केवल उनकी जय
उनकी शर्तें
उनकी बात
उनके अट्टहास
इसतरह बदलने की माँग
कि अपना निशान ही न रहे
भयानक राजनी ति तो है
अस्मिता की
पहचान की
ये बातें भी हैं
कि बिलकुल लुप्त हो रहे हैं
परिचय कुछ लोगों के
या तो जंगलों में ठेली जा रही हैं
जातियां, जनजातियां,
या फिर शहरों में भटकती हुई
बहुत प्रताड़ित
बहुत सताई प्रजातियां
बिलकुल किसी दूसरी दुनिया के जीव सरीखे लोग
शायद अब आप भी उनके जैसे दिखते हुए
ऐसी थी भयानक बदलाव की मांग
बदलाव यानी कुछ समर्पण
अहम का
खुद्दारी का
अधिकारों का
सबसे ज़रूरी अधिकारों का
बदलना खुद को
कुछ कम अधिकार मांगते व्यक्ति में
जब बहुत भयानक हो बदलाव की यह प्रक्रिया
तो गौर तलब है ये याद रखना
कि वो सभ्यताएं हैं
जहाँ कई बार लड़के, लड़कियां बनना चाहते हैं
लड़कियां लड़के बनना चाहती हैं
ऐसे नहीं कि वस्त्र, हाव, भाव, मुद्रा
नाटक में रोल नहीं
बातें, विन्यास नहीं,
समूचा जिस्मी परिवर्तन
ऑपरेशन, सर्जरी
और सवाल ये
कि जब आधी दुनिया
के पास आधारभूत चिकित्सा नहीं
तो ऐसी अय्याशी क्यों है उपलब्द्ध
दुनिया के धनी, बहुत धनी लोगों को
और जबकि मुद्रा स्फीति की दर पर
इतनी लड़ाई है
तो धनी देशों के
धनी लोगों के
धन की कितनी निजी गणना संभव है?
बहुत वाजिब और बहुत जायज़ है ये सवाल
कि आपके देश की मुद्रा
पारे की तरह दो इंच ऊपर
और ऊपर रोज़ चढ़ती जाती हो
और महंगा हुआ जाता हो
दूध, अंडा, ब्रेड
और बहुत महंगा हुआ जाता हो
मक्खन
तो इन अति धनी लोगों
कई बहुत धनी देशों के बसे हुए लोगों की
कड़कड़ाती हुई करेंसी की अकड़
जो और और तरीकों में व्यक्त होती है
लोगों को भूखा मारकर
पालतू बिल्ली के खाने को बर्बाद करने में
यूँ भी आजकल बर्बादी की हिमायत में बहुत ज़्यादा तर्क हैं
और उसके आसपास और कई खतरनाक बातें…

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पानी पर की ज़िन्दगी

 

 

 

 

अब कहने को कह तो गयी वह
कि कोई बात है कागज़ पे लिखना
और बात तो वाक़ई है
कलम थाम लेती है
और उससे भी ज़्यादा
कागज़ पे किस्से का वादा
लिखे जाने वाले किस्से के बनते बिगड़ते शब्द
उँगलियों को अभ्यास  स्याही से लिखने का
नित नए शब्द, उंगलियां बुनती, गुनती शब्दों के आकार
छूती उनके भाव,
जैसे छुआ जा सकता हो दर्द को
ख़ुशी को
से कविता तोड़ती है
मूर्त और अमूर्त के नियम
जैसे कविता जोड़ती  है
शब्दों को रंगों से
रंगों को भावों से
और भावों को शब्दों से
और बनाती है अद्भुत संगम
अद्भुत त्रिवेणी सी नदी
बहुत ढेर सारी बातों का कोलाहल हो जिनमे
खिचपिच
ऊबड़ खाबड़ रंगों के ढूह
जिनके बाद सफ़ेद का सपाट
भाता है, गाता है, गाता तो है
पर केवल धुन
और कहना है केवल तुम्ही को
और पूरी तरह खाली हो गयी हो भाषा
वो अक्षरों से कहने वाली
और पानी पर चलते, चलते थक गए हो आप
बर्फ पर फिसलते थक गए हों आप
और कागज़ को उठाना है
कि मुट्ठी में भुरभुराती हुई बर्फ को
हर लम्हा
पिघलकर बह जाये
कुछ भी नहीं रह जाये
सह जाएँ हम सारा एकाकीपन
कि कह जाएँ हम सारा बेगानापन
अजब रिक्तता है
सन्नाटे को तोड़ती है
केवल कागज़ के फड़फड़ाने की आवाज़
दिल मेरा कोई पक्षी नहीं
कहीं कोई पक्षी नहीं
नज़र आये भी कोई अद्भुत जीव
तो कोई माने नहीं
बस दिखे ज़रा सा ईश्वर
उस अद्भुत रंग संयोजन में
वह है कहीं
कि सृष्टि है
बदलते हैं मौसम
बर्फ पिघलती है
और हमें चलने को मिलती है
ठोस ज़मीन
और चकमकाती हुई धूप में
चमचम मिज़ाज़ लिए
चलते हो हम कि भूमि पूजन है
ये कंठस्त करते कि जहाज़ किनारे लगते हैं…

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उन दिनों का जादू

 

 

 

 

और जादू की तरह
बिल्ली जाग गयी थी
अपने बहुत लम्बे नाखूनों
शेर से दाँतों का जादू बिखेरती
बिल्ली जाग गयी थी
कुछ दिव्य था उसका जागकर
एक एक पंजा आगे बढ़ाना
दिव्य था उसकी आगे बढ़ती
अंगड़ाई के साथ
बहुत लम्बे नाखूनों का निकलना
दिव्य थी उसकी दृष्टि
दुनिया की सारी रौशनी समेटे
दिव्य थी
लम्बी जम्भायिओं में
दिखते दाँतों की चमक
बिल्ली के दांत देखना
सुखकर और स्वास्थ्यकर था
जब नोचा जा रहा था उसे
भोथे, इंसानी दाँतों से
इस तरह नोचा जा रहा था उसे
कि केवल ताक़त की भूख थी
हवस
या बिलकुल अकारण भी था शिकार
शिकार ही नहीं
शतरंज की चाल की मात
कि एक प्यादे से हलाल
ओछी नोच खसोट
राजनेताओं की ही नहीं
हर आदमी की राजनीति
आस पड़ोस की राजनीति
महिलाओं की राजनीति
स्त्रैण
कुछ भी पुरुषोचित नहीं
लेकिन पुरुषों के प्रश्रय में
उनके माध्यम सेआती राजनीति
बड़ी त्रासद
बड़ी मारक राजनीति
दारुण दंश दे जो
कल्पा दे लोगों के आगे
हाथ न आने दे
कोई हथियार
तो बिल्ली का ख्याल
कि कैसे समेटती है वह अपने धारदार
बहुत धारदार नाखून
अपने गुदगुदे मुलायम पंजों के भीतर
न करके वार
लगातार
न करके वार
कि बिल्ली है बहुत समझदार
दिलदार
कि जबकि चढ़ सकती है
वह कोई भी देवदार
करती है अक्सर इंतज़ार
जबकि इतनी है भूख कि भोजन, भक्ष्य, प्राप्य, देय
की सीमाएं बदलती हैं लगातार
बस शाश्वत है बिल्ली की समझ
उसकी समझ में रिश्तों के कई त्रिकोण हैं
पंचकोण हैं
उसकी बातों में होती है
हमेशा उस तीसरे व्यक्ति की जगह
जिसके मार्फ़त हमारा परिचय है
जिसके मकान में हमारा आवास
वास, संपर्क, संसर्ग, सहयोग
बिल्ली बताते नहीं थकती
कि किस कदर वफादार है
किस कदर उसे प्यार है
रूठने के हर पल में
रूठकर मानने के हर पल में
समझते समझाते के हर पल में
किसी तीसरे का इंतज़ार है
और बिल्ली भूलती भी थी
उसकी बाहों में झूलती भी थी
पर बिल्ली का भूलना
उसकी नादानियों के
उसकी परेशानियों के दिन होते थे
जबकि बिल्ली को रिश्तों के त्रिकोण समझाना
वह फक्र की बात मानती  थी
और समझना भी
तिकोने रिश्तों की बिल्ली की समझ
बातें करना उससे उस त्रिकोण पर
उस बहुत ताकतवर
अनुपस्थिति की जगह पर
जिसके आने पर
बिल्ली को उसे सलामी देना भूलना नहीं था
बिल्ली को इसतरह नहीं होना था
उसके सानिध्य में
उसके प्यार में
उसकी दोस्ती में
कि वह बताना भूल जाये
अकेलापन अपना
चूक जाये सलामी देने में
पर और भी पेचीदगियां थीं
इस रिश्ते के त्रिकोण की
फिलहाल, वह केवल दे सकती थी
बिल्ली को हड्डियां
और उनके भीतर का मज्जा
और वह भी गैरहाज़िरी में
और जैसे, जैसे होता था
बिल्ली की इस तिकोनी समझ में इजाफा
गहराती थी उनकी बातें
कुछ भी नहीं था
दुनिया में ऐसा
बिल्ली से बातें करने जैसा…

2 COMMENTS

  1. और पाने पर कि कई बार ये तस्वीर अपनी भी होती है
    khoobsoorat bimb,prateeko ka istmal karke kavita ko itni man me utar gayi. vivshta,nazeedak hoke bhi akelapan,(duri) kamal kiya hai tumne is kavita me. Vaise to sabhi kriti me karti ho. dil ki mubarakbad kabool karo.

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