स्वगत कर रहा है नाटक का हर पात्र: कृष्णमोहन

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तस्वीर- विकिमेडिया कॉमन्स से साभार

परिचयात्मक लेखन तक सिमट चुकी हिंदी आलोचना के इस दौर में, जहाँ बकौल आलोक धन्वा, आलोचनात्मक ‘बहस चल नहीं पाती/ हत्याएं होती हैं/फिर जो बहस चलती है/ उनका भी अंत हत्याओं में होता है’, कृष्णमोहन का लिखा पढ़ना समृद्ध करता है। ऐसी आलोचना, जिस तक बार बार पहुँचने की, उसे नए नए अर्थों में समझने की इच्छा बनी रहती है, जो नई सूझ पैदा करती है। जहाँ हिंदी में समग्र मूल्यांकन के प्रयासों में रचनाकार-सम्बंधित किसी आखिरी निर्णय तक पहुँचने तक अधीरता दिखती है, वहाँ कृष्णमोहन चुनिंदा रचनाओं को अपने मूल्यांकन का केंद्र बनाते हैं। उनकी चारों पुस्तकें मुक्तिबोध : स्वप्न और संघर्ष, आधुनिकता और उपनिवेश, कहानी समय और आईनाख़ाना धीरे धीरे आलोचना और भाषा से जुड़े धीर-गम्भीर लोगों के सेल्फ में जगह बना रही है। गालिब की रचनाओं पर उनकी टिप्पणियों की किताब बहुप्रतीक्षित है। इस लेख में हिंदी के अग्करिम पंक्ति के कवि राजेश जोशी की कविताओं पर प्रकाश डाल रहे हैं – सौतुक 

 

कृष्णमोहन

राजेश जोशी की कविता “हँसी” की आरंभिक पंक्तियाँ हैं:

“हँसी कम होती जा रही है धरती पर

अब तो नाटकों में विदूषक और सर्कसों में मसखरे भी

कभी-कभार ही दिखते हैं

अपनी तमाम कोशिशों के बाद भी सिर्फ़ बच्चों को ही

हँसा पाते हैं वो बामुश्किल”

कवि के शब्दों में, यह कविता “रघुवीर सहाय को याद करते हुए” लिखी गई है। रघुवीर सहाय अपनी कविता “नई हँसी” में कहते हैं:

“महासंघ का मोटा अध्यक्ष

धरा हुआ गद्दी पर खुजलाता है उपस्थ

सर नहीं,

हर सवाल का उत्तर देने से पेश्तर

बीस बड़े अख़बारों के प्रतिनिधि पूछें पचीस बार

क्या हुआ समाजवाद

कहें महासंघपति पचीस बार हम करेंगे विचार

आँख मारकर पचीस बार वह,  हँसे वह, पचीस बार हँसे बीस अखबार”

स्पष्ट है, रघुवीर सहाय हँसी को किसी विशिष्ट अर्थ में व्यवहृत करते हैं। उनकी कविताएँ “हँसो, हँसो, जल्दी हँसो” और “आपकी हँसी” आदि इसकी बानगी देते हैं। ऐसा लगता है कि रघुवीर सहाय हँसी को सत्ता और उसकी चापलूसों के बीच का मामला मानते हैं, या फिर सत्ता के कोप से बचने के लिए जनता दयनीय और झूठी  हँसी का सहारा लेती है।  राजेश जोशी का इस बिंदु पर उनसे बुनियादी मतभेद है। वे हँसी को प्रतिरोध के एक औजार के रूप में देखते हैं। “हँसी” शीर्षक कविता की अंतिम पंक्तियाँ हैं:

“ओ मेरे समय के लोगो!

मैं अनुरोध करता हूँ कि हँसो

शासक की अंधी ताक़त से बचने के लिए डरकर नहीं

हँसो कि हँसने के पल कम हो रहे हैं हमारी धरती पर

हँसो कि स्वप्न देखने का रोमान चुक रहा है!

हँसो!”

यहाँ हँसने को विरोध की ताक़त और स्वप्न देखने के रोमान के साथ समीकृत किया गया है। कहना अनावश्यक है कि यह अन्तर दृष्टियों के बुनियादी फ़र्क़ की वजह से पड़ा है। शासन-सत्ता का अत्याचार दोनों कवियों की नज़र में बढ़ा है, लेकिन रघुवीर सहाय आधुनिक युग की सत्ता का भोंडा विद्रूप रचते हैं, जो अपने सामने मौजूद चुनौती को बहुत कम करके आँकना है। सचमुच की लड़ाई लड़ने वाले यह रवैया अफोर्ड नहीं कर सकते। उनकी जनता का सत्ता के सामने घिघियाने लगना इस रवैये का कारण भी है,और परिणाम भी। जबकि राजेश जोशी का ख़याल है कि हँसकर लोग सत्ता के आतंक का तिलिस्म तोड़ सकते हैं। इसे समझने के लिए हम राजेश जोशी की एक पुरानी कविता “चुटकुलों के पक्ष में एक दलील” को देखते हैं:

“जबकि वे एक ख़तरनाक वायरस की तरह

फैल सकते हैं

हद और बेहद को पार करते हुए

रातों-रात किसी भी तंत्र में सेंध लगा सकते हैं

और नाक में दम कर सकते हैं किसी भी तानाशाह की

कई संगीन ख़तरों की महीन सूचनाएँ छिपी होती हैं उनमें

अपना स्वतंत्र संचार-तंत्र विकसित कर लेने के लिए

वो किसी भी व्यवस्था के मोहताज नहीं होते

निर्भय होने का एक मंत्र जो छिपा होता है

उनकी आंतरिक तहों में

डरी और सहमी जनता उसे बहुत अच्छी तरह जानती है

अत्याचारियों को पल भर में ही वो एक मखौल में बदल सकते हैं।”

(चाँद की वर्तनी)

पुरानी कहावत है कि सावन के अंधे को हरा ही हरा सूझता है। तुलसी ने भी लिखा है कि, “जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी।” आशय यह कि हम अपनी इच्छा और कामना के अनुरूप यथार्थ को परिभाषित कर लेते हैं। यानी वस्तुगत यथार्थ पर आत्मगत यथार्थ को आरोपित कर लेते हैं। यहाँ इस बात को ठीक से समझना आवश्यक है अन्यथा रघुवीर सहाय जैसे कवि की नीयत पर शक करने जैसी बात हो जाएगी, जबकि यह मामला इतना सीधा-सादा नहीं है।

हमारा मन हमारे साथ खेल खेलता है, ख़ास तौर पर हमारा मध्यवर्गीय मन। मुक्तिबोध ने इसे ही “ओ मेरे आदर्शवादी मन, ओ मेरे सिद्धांतवादी मन” कहकर याद किया था। आदर्श और नैतिकता का संदेश यह घुट्टी में लेकर बड़ा होता है। लेकिन बारी जब इनके अनुरूप आचरण करने की आती है तो इसे अब तक अर्जित की हुई धन-मान की पूँजी की चिंता सताने लगती है। आदर्श का रास्ता एक सीमा के बाद स्थापित व्यवस्थाओं के विरुद्ध जाने लगता है, दोनो में टकराव अनिवार्य हो जाता है। यहीं मध्यवर्ग की दुविधा प्रकट होती है। धूमिल के मुहावरे में कहें तो, वह चाहता है कि मुट्ठी भी तनी रहे और काँख भी ढँकी रहे। इस दुविधा का शमन उसके रूपांतरण में हो सकता है जिसकी कोशिश मुक्तिबोध करते हैं। तब वह अपनी अब तक अर्जित पूँजी की चिंता छोड़कर बड़े उद्देश्य के लिए ख़ुद को दाव पर लगा सकता है। निष्ठा और समर्पण की इसी काररवाई को कबीर ने “सीस उतारकर भुंइ धरना” कहा था।

बहरहाल, इस रूपांतरण के लिए ज़रूरी आत्मसंघर्ष से बिरले ही गुज़र पाते हैं। ज़्यादातर तो इस आग के दरिया की आँच का एहसास होते ही विचलित होकर लौट आते हैं। व्यवस्था के विरुद्ध खड़े होने पर जो पहला अनुभव होता है, वह है पुराने रिश्ते-नातों, मित्रों, सहयोगियों का छूट जाना, और व्यक्ति का अकेला पड़ते जाना। बक़ौल मीर:

“बैठने कौन दे है फिर उसको

 जो  तेरे आस्ताँ से  उठता है”

इस राह में हिम्मत के साथ डटे रहने पर नए समानधर्मा लोग मिलते हैं लेकिन पीछे लौट जाने वालों को तो अकेलेपन का दारुण अनुभव ही याद रह जाता है। इसके बाद एक नया सिलसिला शुरू होता है। उनका मन उन्हें यह विश्वास दिला देता है कि पीछे लौटकर उन्होंने बिलकुल ठीक किया। जब सच के लिए जूझने वाला और कोई बचा ही नहीं है तो उनका आवश्यक कर्तव्य है कि वे कम से कम ख़ुद को सत्य के एक संदेशवाहक के रूप में बचा रखें, वरना आने वाली पीढ़ियाँ जान ही नहीं पाएंगी कि सत्य नाम की कोई चिड़िया भी कभी होती थी। यह परिस्थिति उन्हें घनघोर निराशा में डाल देती है, और अनजाने ही वे निराशावाद के प्रचारक बन जाते हैं।

अब अपनी इस स्थिति का औचित्य निरन्तर साबित करते रहना उनके अवचेतन की ऐसी ज़रूरत बन जाती है जो उनके अस्तित्व के लिए अनिवार्य है। यहीं से दूसरों के संघर्ष के प्रति उनके अंधेपन की शुरूआत होती है। यह कोई जानबूझकर की हुई अवहेलना नहीं होती। वे पूरी ईमानदारी से विश्वास करते हैं कि हर व्यक्ति (ज़ाहिर है, उनके अलावा) डर या लालच से मानवद्रोही व्यवस्था का अंग बन गया है। किसी वजह से अगर कोई ऐसा करने से इनकार करता है तो उसकी हत्या होकर रहती है जिसमें ‘मार तमाम लोग’ तमाशाई की भूमिका में होते हैं। रघुवीर सहाय की प्रसिद्ध कविता “रामदास” की यही विषयवस्तु है।

बहरहाल, राजेश जोशी मध्यवर्ग की दो धाराओं के बीच छिड़े इस द्वंद्व में जुझारू धारा की चेतना को स्वर देते हैं। अपने ख़ास अंदाज़ में भाषा और शिल्प को बरतते हुए  वे मध्यवर्ग के बाहरी और आंतरिक संघर्ष का मार्मिक चित्रण करते हैं। “ज़िद” शीर्षक कविता में वे इसी संघर्षशील धारा के प्रतिनिधियों के बारे में कहते हैं:

“दुनियादार लोग अक्सर उनका मज़ाक उड़ाते हैं

असफलताओं का मखौल बनाना ही

व्यावहारिकता की सबसे बड़ी अक्लमंदी है

कभी-कभी छेड़ने को और कभी-कभी ग़ुस्से में पूछते हैं दुनियादार लोग

क्या होगा आपके छोटे-से विरोध से?

पर वे किसी से पलटकर नहीं पूछते कभी

कि तुम्हारे चुप रहने ने ही

कौन सा बड़ा कमाल कर दिया है

इस दुनिया में?

पलट कर उन्होंने नहीं कहा कभी किसी से

कि दुनियादर लोगो! तुम्हारी चुप्पियों ने ही बढ़ाई है

अपराधों और अपराधियों की संख्या हर बार

कि शरीफ़ज़ादो! तुम्हारी निस्संगता ने बढ़ाए हैं अन्यायियों के हौसले

कि मक्कार चुप्पियों ने नहीं छोटी-छोटी आवाज़ों ने ही

बदली हैं अत्याचारी सल्तनतें”

यहाँ एक बात समझ लेनी चाहिए कि पिछली सदी के ’60 और ’70 के दशक में हिंदी कविता और समाज के सामने सामाजिक बदलाव के हालात अधिक स्पष्ट थे। मध्यवर्ग को उसकी कमजोरियों से उबारकर उसे सर्वहारा की जुझारू चेतना से लैस करने का एजेंडा भी निर्विवाद था। लेकिन ’80 और ’90 के दशक में हालात बदल गए। भूमंडलीकरण और एकध्रुवीय नई विश्वव्यवस्था ने तकनीकी क्रांति से जुड़कर सर्वहारा वर्ग को धीरे-धीरे अप्रासंगिकता की तरफ़ धकेल दिया। पूँजी के चौतरफ़ा हमलों के बीच अपने अस्तित्व के लिए लड़ते सर्वहारा वर्ग की बची-खुची शक्ति भी वेतन, भत्ते और दूसरी सुविधाओं के लिए मोलतोल करने में ही चुक गई और दुनिया को बदलने की बातें पुरानी पड़ती चली गईं। इससे हालात में एक बुनियादी बदलाव यह हुआ कि मध्यवर्गीय चेतना सर्वव्यापी हो गई। इक्कीसवीं सदी में कवि के सामने प्रेरणा देने के लिए वर्गचेतना से युक्त सर्वहारा करीब-करीब नामौजूद है।

बहरहाल, वृहत्तर लक्ष्य के लिए ख़ुद को दाव पर लगाने का विकल्प मनुष्यता के सामने हमेशा मौजूद रहता है क्योंकि यह जज़्बा किसी की बपौती नहीं है। आज भी कविता के सामने छोटे-मोटे लोभों से उबरकर सत्ता के चरित्र की पहचान करने और उसके प्रतिरोध की दिशा में क़दम उठाने की चुनौती है। परिस्थितियों को देखते हुए आज की कविता एक क़दम पीछे हटकर अपनी शक्तियों को पुनर्संयोजित करते हुए और मित्र-शत्रु की नए सिरे से पहचान करते हुए  इसका प्रयास करती है। राजेश जोशी की कविता “अँधेरे के बारे में कुछ वाक्य” की आरंभिक पंक्तियाँ देखें:

“अँधेरे में सबसे बड़ी दिक्कत यह थी कि वह किताब पढ़ना

नामुमकिन बना देता था

पता नहीं शरारतन ऐसा करता था या किताब से डरता था

उसके मन में शायद यह संशय होगा कि किताब के भीतर

कोई रोशनी कहीं न कहीं छिपी हो सकती है

हालाँकि सारी किताबों के बारे में ऐसा सोचना

एक क़िस्म का बेहूदा सरलीकरण था

ऐसी किताबों की संख्या भी दुनिया में कम नहीं,

जो अँधेरा पैदा करती थीं

और उसे रोशनी कहती थीं”

‘अँधेरे में’ का एक ब्योरा मुक्तिबोध ने भी दिया था। उस में तस्वीर साफ़ थी, दोस्त और दुश्मन की पहचान स्पष्ट थी। मध्यवर्ग को अपनी कमजोरियों से निजात पाना था। लेकिन अभी चीज़ें थोड़ी गड्डमड्ड हैं। यहाँ तक कि किताबें भी जो हमेशा से ज्ञान का पर्याय रही हैं, अँधेरा पैदा करके उसे रोशनी बता रही हैं। ज़ाहिर है, रोशनी की पहचान भी संदिग्ध है। कविता में आगे आने वाली कुछ पंक्तियां देखें:

“एक शायर दोस्त रोशनी पर भी शक करता था

कहता था उसे रेशा-रेशा उधेड़ कर देखो

रोशनी किस जगह से काली है

अधिक रोशनी का भी चकाचौंध करता अँधेरा था”

आत्म-औचित्य की स्थापना को उत्सुक लोग इन पंक्तियों को बड़े आराम से नई विश्वव्यवस्था के समर्थक बुद्धिजीवियों और उनकी पुस्तकों के खाते में डाल कर निश्चिंत हो सकते हैं, लेकिन वास्तव में ये पंक्तियाँ आत्म-आलोचना की देन हैं। सत्ता और नव-साम्राज्यवाद समर्थक लेखकों की किताबें खुले तौर पर ताक़तवर शक्तियों के स्वार्थों की रक्षा करती  रोशनी का भ्रम नहीं खड़ा कर सकती हैं। रेशा नहीं उनकी बखिया उधेड़ी जाती है। दरअसल, यह हमारे मित्रों की, जनता की समर्थक शक्तियों की लचर वैचारिकी है जिसने हमें इस अँधेरे दौर में निहत्था कर दिया है। समूचे हिंदी समाज में, उसकी प्रगतिशील जनवादी शक्तियों के बीच, देश-दुनिया के सामने आई ऐसी विपरीत परिस्थितियों में भी किसी क़िस्म की वैचारिक बहस नहीं है। न अतीत के अनुभवों की कोई समीक्षा है, न भविष्य की कोई नई योजना। पिछली सदी में हमारी नियति का बोझ अपने कंधों पर ढोने वाले घोड़ों ने शुतुरमुर्गों की शक्ल अख़्तियार कर ली है। बहरहाल, कवि यहीं नहीं रुकता। वह इस परिस्थिति के लिए ज़िम्मेदार सबसे प्रमुख कारक को भी चिह्नित करता है:

“लेकिन इससे भी बड़ा अँधेरा था

जो सत्ता की राजनीतिक ज़िद से पैदा होता था

या किसी विश्वशक्ति के आगे घुटने टेक देने वाले

ग़ुलाम दिमाग़ों से!

एक बौद्धिक अंधकार मौक़ा लगते ही सारे देश को

हिंसक उन्माद में झोंक देता था”

यहाँ सत्ता की राजनीतिक ज़िद से पैदा होने वाले अँधेरे के बाद विश्वशक्ति के आगे घुटने टेक देने वाले ग़ुलाम दिमाग़ों की कारस्तानी का उल्लेख है। अमरीका नाम की एकमात्र महाशक्ति के सामने दंडवत करने वालों के बीच वाम और दक्षिण का भेद मिट चुका है। याद रहे कि अमरीका एक मूल्य-प्रणाली और जीवन शैली का भी नाम है। प्रस्तावों, बयानों और घोषणाओं से अलग अमरीका के प्रति किसी के रवैये का पता उसकी कारगुजारी से चलता है। हमारे देश में वामपंथ के ऊपर दुहरी ज़िम्मेदारी आ पड़ी है। सत्ता में आने पर उन्हें अमरीका समर्थित नीतियों को लागू करना होता है और विपक्ष में रहने पर उनका विरोध करना पड़ता है। इस चरित्र को दिमाग़ी ग़ुलामी से जोड़ना बिलकुल उचित है। देश को हिंसक उन्माद के लिए तैयार करने का काम इसी दिमाग़ी ग़ुलामी से पैदा हुए बौद्धिक अंधकार ने किया है। बहरहाल, यह कविता ब्रेख़्त और फ़ैज़ के स्वर में स्वर मिलाती हुई इन पंक्तियों के साथ ख़त्म होती है:

“अँधेरे में जब बहुत सारे लोग डर जाते थे

और उसे अपनी नियति मान लेते थे

कुछ ज़िद्दी लोग हमेशा बच रहते थे समाज में

जो कहते थे कि अँधेरे समय में अँधेरे के बारे में गाना ही

रोशनी के बारे में गाना है

वे अँधेरे समय में अँधेरे के गीत गाते थे

अँधेरे के लिए यही सबसे बड़ा ख़तरा था।”

इस जज़्बे के विरोध में निराशा के प्रचारकों का तर्क होता है कि ये किताबी बातें हैं। कभी इनकी प्रासंगिकता थी लेकिन अब का यथार्थ यही है कि आमतौर पर लोगों ने सत्ता के सामने समर्पण कर दिया है। वे हत्यारों के करतब पर ताली बजाते हैं, या सहम कर चुप रह जाते हैं। ऐसे में सत्ता के विरुद्ध छोटे-मोटे, सांकेतिक या प्रतीकात्मक विरोधों से आगे जाने की बात सोचना या उसका मुखर विरोध करना प्रतिरोध के अंतिम आधारों को भी दुश्मन के सामने एक्सपोज कर देने जैसा है। हालात का तकाज़ा है कि ऐसा न किया जाए और सही वक़्त का इंतज़ार किया जाए। ज़ाहिर है कि ऐसी कविताएँ अंततः सत्ता के हक़ में ही इस्तेमाल होती हैं। रघुवीर सहाय की कविता ‘दो अर्थ का भय’, केदारनाथ सिंह की ‘हक़’, और कुँवर नारायण की ‘शिकायत’ जैसी कविताएँ इसी श्रेणी में आती हैं। मैं इन कविताओं पर अन्यत्र विस्तार से लिख चुका हूँ, इसलिए यहाँ फ़िलहाल इतना ही।

एक सवाल फिर भी बचा रहता है कि अपने दौर में जारी बिखराव और पलायन की पहचान कवि ने किस रूप में की है। अगर वह इसे चिह्नित नहीं करेगा तो यह भी शुतुरमुर्गी प्रवृत्ति ही होगी। तनिक तलाश करने पर उसके पास भी इस मुद्दे से जूझती हुई कविताएँ मिल जाती हैं। इसमें से एक कविता है “गुरुत्वाकर्षण”। इसकी आरंभिक पंक्तियाँ देखें:

“न्यूटन जेब में रख लो अपना गुरुत्वाकर्षण का नियम

धरती का गुरुत्वाकर्षण ख़त्म हो रहा है

अब तो इस गोलमटोल और ढलुवा पृथ्वी पर

किसी एक जगह पाँव टिकाकर खड़े रहना भी मुमकिन नहीं

फिसल रही है हर चीज़ अपनी जगह से

कौन कहाँ तक फिसलकर जाएगा

किस रसातल तक जाएगी यह फिसलन

कोई नहीं कह सकता

हमारे समय का एक ही सच है

कि हर चीज़ फिसल रही है अपनी जगह से”

विचलन और फिसलन के इस दौर का अंकन करती इस कविता में जिस एक बात को अनदेखा नहीं किया जा सकता वह है इसका शांत स्वर। किसी भी तरह की कड़वाहट, दोषारोपण अथवा आहत भावना के बग़ैर तथ्यों का सपाट वर्णन। कहने-सुनने में यह भले ही आसान लगे, लेकिन इस विषय पर यह स्वर तभी आ सकता है जब वाचक को अपनी भूमिका के औचित्य को लेकर कोई संदेह न हो। तभी उसे उसकी स्थापना की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। दूसरी बात यह कि सारी कमजोरियों के बावजूद आम लोगों से उसे सचमुच का लगाव हो, उसने उनके साथ समानता के स्तर पर साहचर्य क़ायम किया हो, फ्रेंड, फिलॉसफर और गाइड यानी कुल मिलाकर सरपरस्त की भूमिका न अपनाई हो। इस स्वर को स्वाभाविक बनाने के लिए कवि ने एक युक्ति का भी इस्तेमाल किया है। चीज़ों के फिसलने के लिए उसने गुरुत्वाकर्षण के ख़ात्मे को ज़िम्मेदार ठहराया है। स्पष्ट तौर पर असंभव इस कारण के आगमन से कविता में विडंबना और आत्मव्यंग्य के लिए भी जगह बन गई है। आगे इस कविता की कुछ पंक्तियां देखें:

“गड्डमड्ड हो गए हैं सारे शब्द

वाक्य से फिसलकर बाहर गिर रहे हैं उनके अर्थ

ऐसी कुछ भाषा बची है हमारे पास

जिसमें कोई किसी की बात नहीं समझ पाता

संवाद सारे ख़त्म हो चुके हैं, स्वगत कर रहा है

नाटक का हर पात्र

आँखों से फिसल कर गिर चुके हैं सारे स्वप्न”

संकट के दौर में समाज के सामने मौजूद चुनौतियों का सामना करने की ज़िम्मेदारी लेने वाले जब इसे निभाने से चूक जाते हैं, तब भाषा का अवमूल्यन हो जाता है और शब्दों के अर्थ खो जाते हैं। फिर विचार-विमर्श भी संभव नहीं हो पाता क्योंकि दूसरों के मनोभाव किसी की समझ में नहीं आते, सब बस अपनी ढपली अपना राग बजाते रहते हैं। तनिक अतिरेक के बावजूद क्या यह हमारे हिंदीभाषी समाज की वास्तविक तस्वीर नहीं जान पड़ती? पुराने समय के सपने खो गए हैं, बस एक भयानक दुःस्वप्न बचा है जिससे नज़र चुराना जितना आसान है, आँख मिलाना उतना ही मुश्किल।

कविता के अंत में एक बार फिर इस तकलीफ़देह वृत्तान्त का सहनीय स्पष्टीकरण देते हुए कवि इसे एक दुःस्वप्न बताता है और इससे बाहर आने का रास्ता खोजता है:

“ओ नींद!

मुझे इस भयावह स्वप्न-सत्य से बाहर आने का रास्ता दे!”

इस तरह हमारे समय के विचलन को शब्दबद्ध करते हुए भी कवि निराशा का प्रचारक नहीं बनता, मनुष्य की जिजीविषा को झिंझोड़कर उसे दुःस्वप्न से बाहर लाने का उपक्रम करता है। निराशा के बारे में राजेश जोशी ने एक अन्य कविता में भी दिलचस्प नज़रिया पेश किया है। इस कविता का शीर्षक भी “निराशा” ही है:

“निराशा एक बेलगाम घोड़ी है

न हाथ में लगाम होगी न रकाब में पाँव

खेल नहीं उस पर गद्दी गाँठना

दुलत्ती झाड़ेगी और ज़मीन पर पटक देगी

बिगाड़कर रख देगी सारा चेहरा-मोहरा

*   *   *   *   *   *   *   *   *   *

भागना चाहोगे तो भागने नहीं देगी

घसीटते हुए ले जाएगी

और न जाने किन जंगलों में छोड़ आएगी!”

कहना न होगा कि अपने तमाम पूर्ववर्तियों और समकालीनों का हश्र देख चुकने के बाद राजेश जोशी ने यह नतीजा निकाला है।

नई सदी में पैदा हुए हालात के बारे में अपनी भावात्मक प्रतिक्रिया व्यक्त करने के साथ-साथ राजेश जोशी उसके विश्लेषण में भी उतरते हैं। परिवर्तन के वाहक नवीन भाव-संवेदनों को सही शब्द न मिल पाना, यानी भाषा के माध्यम से उनका रूपांतरण विचारों में न हो पाने को वह इस समय की प्रमुख विशेषता मानते हैं। “शब्दों का नया घर” शीर्षक कविता की शुरूआत में वे कहते हैं:

“सूनी सड़कों पर भटकती हुई हमारी आवाज़

रहने के लिए शब्दों का कोई नया घर ढूँढ़ रही है

इतनी तेज़ी से बदल रही है हमारी भाषा

कि किसी शब्द तक पहुँचती है जब तक हमारी आवाज़

कोई दूसरी आवाज़ पहले ही पहुँचकर

वहाँ अपना घर बसा चुकी होती है”

ग़ौरतलब है कि भाषा पर कब्ज़ा जमाने और उसे प्रदूषित करने की शासक वर्ग की नीतियों को हमारे समय में अभूतपूर्व कामयाबी मिली है। भाषा जो जीवन-संग्राम में मनुष्य का सबसे बड़ा हथियार है, आज सत्ता का औजार बन गई है। आधुनिक संचार-माध्यमों के सहस्रमुख से जारी बमन के सामने प्रतिरोध की इक्का-दुक्का प्रवृत्तियों का स्वर तूती की आवाज़ बन कर रह गया है। इन प्रवृत्तियों को भी खुला निमंत्रण है कि वे इस मादक अभियान से शत्रुता त्याग दें, और सहमति में आएँ। कविता की कुछ और पंक्तियाँ देखें:

“बीसवीं सदी की क्रांतियों और युद्धों के

बोझ से लदी हमारी आवाज़

समय की गति से मिला ही नहीं पाती अपने क़दम

कान के पास आकर कोई फुसफुसाता है

उतार फेंको… उतार फेंको स्मृतियों का बोझ

और दौड़ो…

वरना ढूँढ़ नहीं पाओगे कभी

अपनी आवाज़ के लिए नए शब्दों से बना कोई घर”

कहने का आशय यह कि प्रतिरोध की भाषा को भ्रष्ट करने से शुरू हुआ यह अभियान पूरा तब होगा जब उसकी स्मृति को भी नष्ट कर दिया जाएगा। जब तक मनुष्य के पास प्रतिरोध की याद रहेगी सत्ता को ख़तरा बना रहेगा। अतीत की यादों से वह वर्तमान के लिए ऐसे निष्कर्ष निकाल सकता है जो आतताई सत्ता के लिए ख़तरनाक होंगे। पहले भी ऐसा बार-बार हो चुका है। लेकिन इस बार दुनिया के सत्ताधारियों के पास विध्वंस की अकूत ताक़त है। यहाँ तक कि वे पृथ्वी को ही नष्ट करने के कगार पर पहुँच गए हैं। ऐसे में कविता का वाचक नदी, पहाड़ और जंगल की नई सदी में मौजूदगी को दर्ज करता है। आशय यह है कि अपने ऊपर आए सारे संकटों के बावजूद जब इनकी रिहाइश नई सदी में जारी है तो प्रतिरोध की आवाज़ों को भी उनके शब्दों का घर मिल सकता है, बशर्ते वे नदी, पहाड़ और जंगल के प्रतिरोध के साथ ख़ुद को जोड़ सकें। कविता का एक अंश और देख लें:

“यह कैसा समय है सोचता हूँ

मैं पीता हूँ जिन नदियों का पानी

जंगलों से आती जिन हवाओं से बनी हैं मेरी साँसें

जो धूल मेरे पाँBLवों में लगी है

ये पहाड़, ये धरती और ये आसमान

जो सदियों पुराने हैं

ये सब भी तो पिछली सदी को पार करते हुए ही

पहुँचे हैं मुझ तक”

पराजय और विचलन के इस दौर में राजेश जोशी बौद्धिक वर्ग को तो कठघरे में खड़ा करते हैं, लेकिन जनता को दोषी ठहराने का आभास उनके काव्य-संसार में नहीं मिलता। जनता की चेतना की कमजोरी समग्र वस्तुस्थिति का अंग तो है लेकिन उसके लिए ख़ुद जनता ज़िम्मेदार है, ऐसा वे नहीं सोचते। जनता का नेतृत्व करने वाला तबक़ा, वह चाहे राजनैतिक नेतृत्व हो या वैचारिक-संवेदनात्मक नेतृत्व, इसके लिए ज़िम्मेदार है। इतिहास के इस जटिल मोड़ पर हम अगर खुद को दिशाहीन पा रहे हैं तो इसकी ज़िम्मेदारी हमें दिशा देने वालों पर ही आती है। प्राथमिक रूप से सवालों के घेरे में उन्हें ही होना चाहिए। पराजय के लिए दुश्मन को ज़िम्मेफत ठहराने के बजाय अपनी कमजोरियों पर उंगली उठाना ही सही तरीक़ा है। लेकिन इस तरीक़े की हमारे वैचारिक जगत में घनघोर अनुपस्थिति है। निरर्थक आरोप-प्रत्यारोपों से भरे हुए इस समय में यह रवैया कुछ उम्मीद बँधाता है। इसकी एक सूक्ष्म और मार्मिक अभिव्यक्ति उनकी कविता “सिर छिपाने की जगह” में दिखती है:

यह कविता एक फ़ैंटेसी है जिसमें अचानक वाचक के घर में कुछ भीगे हुए लोग घुस आते हैं और उसे बताते हैं कि कक्षा आठ में पढ़ते हुए उसने अपनी ड्राइंग कॉपी में उनकी तस्वीर बनाई थी जिसमें में बारिश में भीगते हुए भाग रहे थे। उस तस्वीर में वह उनके लिए बारिश से बचने की जगह बनाना भूल गया था, जिसकी वजह से वे तब से अब तक भीगते हुए उसे ही खोज रहे हैं। इसकी एक वजह यह भी है कि:

“बड़े शहरों की बनावट अब लगभग ऐसी ही हो गई है

जिनमें सड़कें हैं या दुकानें ही दुकानें हैं

लेकिन दूर-दूर तक उनमें कहीं सिर छिपाने की जगह नहीं

शक करने की आदत इतनी बढ़ चुकी है कि तुम्हें भीगता हुआ देखकर भी

कोई अपने ओसारे से सिर निकालकर आवाज़ नहीं देता

कि आओ यहाँ सिर छुपा लो और बारिश रुकने तक इंतज़ार कर लो”

यहाँ शक की आदत की शिकार बेशक जनता है जो सत्ता की विभाजक राजनीति के चंगुल में फँस गई है, और शहर को बनाने वाले वास्तुकार तो सत्ता की योजना को ही कार्यरूप दे रहे हैं। लेकिन ये बातें तो बस प्रसंगवश कविता में आ गईं हैं। असली सवाल तो उस वाचक से है। कविता की अंतिम पंक्तियाँ देखें:

“फिर अचानक उनमें से किसी ने पूछा

कि तुम्हारे चित्र में होती बारिश क्या कभी रुकती नहीं

तुम्हारे चित्र की बारिश में भीगे लोगों को तो

तुम्हारे ही चित्र में ढूँढ़नी होगी कहीं

सिर छिपाने की जगह

उन्होंने कहा कि हम बहुत भीग चुके हैं जल्दी करो और बताओ

कि क्या तुमने ऐसा कोई चित्र बनाया है

जिसमें कहीं सिर छिपाने की जगह भी हो?”

यह प्रश्न हमारे समय के सभी कवियों, कलाकारों और विचारकों से है। उनकी बनाई हुई कार्यसूचियों में शत्रु सत्ता के हमले की बौछार निरंतर झेल रहे और उससे जूझ रहे जनसमुदाय की कल्पना तो है, लेकिन भ्रम और कुहासे से भरे हुए इस समय में उन्हें वास्तविक सम्बल और सांत्वना देने के लिए अनिवार्य आंतरिक वैचारिक जद्दोजहद सिरे से ही क्यों ग़ायब है। मुक्तिबोध ने इस संघर्ष की प्रकृति का उल्लेख करते हुए कभी लिखा था:

“बुरे अच्छे बीच के संघर्ष से भी उग्रतर

अच्छे व उससे अधिक अच्छे बीच का संगर”

सवाल यह है कि वह संघर्ष अब प्रतिरोध की ताक़तों के बीच से कहाँ ग़ायब हो गया है। क्या लम्बे समय तक पाखण्ड को जीते-जीते हमारा अगुवा तबक़ा इतना खोखला हो चुका है कि अब वह कोई सकारात्मक भूमिका निभाने के काबिल ही नहीं रहा? हाल के कुछ वर्षों में लिखी राजेश जोशी की इन कविताओं को पढ़ते हुए ऐसे ही, बेचैन करने वाले कुछ सवाल दिमाग़ में उठते हैं।

नोट: इस लेख में उद्धृत कविताएँ राजेश जोशी के संग्रह ‘ज़िद’ (राजकमल, 2015) से ली गई हैं।

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