भवेश दिलशाद की चार ग़ज़लें

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भवेश दिलशाद

मध्य प्रदेश के शिवपुरी में जन्म. पत्रकारिता और लेखन से जुड़े भवेश दिलशाद साहित्यिक पत्रिका ‘साहित्य सागर’ का प्रकाशन और अब संपादन भी करते हैं. इनकी  रचनाएँ नवनीत, साक्षात्कार, अरबाबे-कलम और राग भोपाली आदि पत्रिकाओं के साथ ही दैनिक भास्कर व दैनिक जागरण जैसे अखबारों में प्रकाशित हो चुकीं हैं. इनकी रचनाओं का पुणे और भोपाल आकाशवाणी से प्रसारण भी हो चुका है. भवेश ने गीत अष्टक के चार में से दो खंडों का संपादन-प्रकाशन किया है. इनसे इनके मोबाईल नंबर – 09560092330 पर संपर्क किया जा सकता है.

 

1

दिल हमेशा जवान दे तू मुझे
और सूफ़ी रुझान दे तू मुझे।

इससे पहले ज़ुबान दे तू मुझे
चाहता हूँ कि कान दे तू मुझे।

ज़ुल्म हो तो न हो लहू ठंडा
कुछ उबाल और उफ़ान दे तू मुझे।

लेके आलाप तान ले लंबी
ऊंचे सुर में उठान दे तू मुझे।

प्यास सहरा सी दे रहा है तो
दर्या का भी गुमान दे तू मुझे।

कुछ कठिन इम्तिहान ले मेरा
गर कोई आसमान दे तू मुझे।

बेख़ता कश्तियाँ तो डूब गयीं
चल समंदर बयान दे तू मुझे।

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 2

आइए मो’तबर बयां रक्खें
मुंह में दिल दिल में हम ज़बां रक्खें।

एक पौधे ने ये नसीहत की
गुल को काँटों के दरमियां रक्खें।

सारा सामान हमने फेंक दिया
रोज़ थी फ़िक़्र क्या कहां रक्खें।

हुस्न वाले हैं क़त्ल के शौक़ीन
हाथ पर दिल रखें कि जां रक्खें।

बेहुनर लोग अक़्ल भी कम कम
उसपे गज़ भर की फिर ज़बां रक्खें।

ये अदब है कि कारोबार हुज़ूर
अपनी अपनी सभी दुकां रक्खें।

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  3

शराफ़त नंगी होती है हर इक ग़ैरत उतरती है
ये है बाज़ार हर किरदार की यां नथ उतरती है।

हमारे जिस्म बासी हैं हमारी रूहें प्यासी हैं
हमीं से गंगा मैली है बड़ी इज़्ज़त उतरती है।

अरे बस वह्म गिरते हैं या फिर धोखे बरसते हैं
कहाँ इन आसमानों से कोई बरकत उतरती है।

अंधेरों बदबुओं में घुट रहे बोसीदा कमरों में
हवस की रात दिन अब भी कोई वहशत उतरती है।

तरक़्क़ी हो गयी? अच्छा! यहाँ की तो ख़बर है ये
कभी दिल बैठ जाता है कभी सूरत उतरती है।

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4
कुछेक बुझ न सके कितने ही बुझाये गये
यूं दिल सराय में जुगनू हज़ार आये गये।

तरह तरह के उजालों में जगमगाये तो क्या
बदन थे वो जो अंधेरों में झिलमिलाये गये।

शिकायती रखा लहजा मगर कसर ये रही
बग़ावती कभी तेवर नहीं दिखाये गये।

मरा हर एक यहां कर्ज़दार की ही मौत
चुकाये कुछ तो मगर कुछ कहाँ चुकाये गये।

हैं मुद्दतों से बदन क़ब्र ज़ेहन जेल यहां
हमें निजात के नुस्ख़े नहीं बताये गये।

बुरा लगे न ज़रा भी हुज़ूरे-आली को
तसव्वुरात में भी अच्छे दिन ही लाये गये।

मुझे जो छान के देते थे धूप बीन के छाँव
यतीम सर से मेरे मुहतरम वो साये गये।

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