यह खट-खट बारीक सी चोट है समय पर: अरुण देव की महत्वपूर्ण कवितायें

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अरुण देव के दो कविता संग्रह ‘क्या तो समय’ और ‘कोई तो जगह हो’ क्रमश: भारतीय ज्ञानपीठ और राजकमल प्रकाशन दिल्ली से प्रकाशित हैं . वर्ष  2014 में उन्हें मैथिलीशरण गुप्त राष्ट्रीय सम्मान से सम्मानित किया गया है. वह पिछले सात वर्षों से हिंदी की  बेहतरीन वेब पत्रिका ‘समालोचन’ का संपादन कर रहे हैं. उनकी कविताओं का बांग्ला, मराठी, कन्नड़, नेपाली, असमी, तमिल और अंग्रजी आदि भाषाओँ में अनुवाद हुआ है. उनसे इस मेल  [email protected] पर सपर्क किया जा सकता है.

1.

पालतू लोग
दूसरे के लिए दूसरों पर गुर्राते हैं
वे अपने लिए रो भी नहीं पाते
उनके रोने को
अपशकुन कह
उन्हें चुप करा दिया जाता है.

2.

बच्चे की नाक माँ पर गयी है
और
गुड़िया के होंठ अपने पिता जैसे हैं
इसका कद दादा की याद दिलाता है
बच्चा अपने चाचा की तरह कुशाग्र है

मृत्यु के बाद हम इस तरह
जीवित रहते हैं अपनी
संततियों में.

3.
दिनचर्या

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शाम होती है
पर अब रात नहीं होती
सूरज उगता है
पर अब कहाँ सुबह होती है.

4.

जीवन के उत्सव के दीये टिमटिमाते हैं
बच्चों की आँखों में
बच्चों से घर
मनुष्यता के आँगन में बदल जाता  है

5.

जब भी कुछ बोलना चाहता हूँ
गले में अटक जाता है उसका झूठ
जिसे बार-बार उगलने वाश बेसिन जाना पड़ता है.

6.

घास और धूल मुझे प्रिय हैं
एक जीवन की याद दिलाता है दूसरा अंत की
घास को मैंने पत्थरों पर भी उगते देखा है
धूल घिर आती है सात तालों में बंद आइनों पर भी.

7.

छत पर लटके पंखे ने कहा
गर्मियां आ गयीं
कूलर ने भर लिया जल
ए.सी. ने कहा क्या फर्क पड़ता है ?

बिजली ने कहा मुझे पता है गर्मियां आ गयीं
और वह चली गयी एकाएक
तब उठा हाथ से बना और हाथों से ही बुना
एक हाथ का पंखा

अपने हाथ पर विश्वास की तरह.

8.

भीड़ नहीं बनना
भेड़ नहीं बनना
नही तो कोई हांक ले जायेगा.

9.

मन्दिर की घंटियाँ हैं पुजारियों के लिए
मस्जिद के अज़ान हैं नमाजियों के लिए
इनके सिवा भी लोग हैं
चलों उन्हें कविताएँ सुनाएँ

10.

मैं तुम्हें पुकारूँ तुम नदी बन जाओ
तुम्हारे कल कल में डूब जाए मेरी पुकार
फिर तुम मुझे आवाज़ दो

रात में खो जाएँ हम तुम और और यह आवाज़ भी.
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 समय रे समय

घड़ी की आवाज़ से हिलता है दिन
हिलते हैं चाँद, तारे
और चलने लगता है सूरज

यह खट-खट
बारीक सी चोट है समय पर

यह एक ऐसा समय है जिसमें बड़ी-बड़ी चकरियां हैं, दांते और पट्टे
और एक दूसरे से जुड़े असंख्य कल पुर्जे

इसका शोर अकेले में सुनाई पड़ता है

समय के विस्तार और अनंत को
अपने टिक-टिक से कुतरती  यह घड़ी
करती जाती है इकट्ठी  रोजनामचे की रद्दी

अक्सर कुसमय यह मांगती है  पल-पल का हिसाब.
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 यह जो है

यह जो पिघलता है और दहकने लगता है
जिसकी आंच झुलसाती नही
वह क्या है

होंठ जहाँ जहाँ छूते हैं वहीँ खिल जाते हैं फूल
यह जो महकता हुआ फूल है वह तुम्हारी देह में कहाँ खिलता है

यह जो मद है होश नहीं लेने देता
वहां कहाँ से चढ़ता है

वह कौन सी जगह है जहाँ मुद जाती हैं आखें
मैं चूमता हूँ तुम्हें बार बार

घास की मुलायम हंसी हो तुम
तुम्हारी नदी में डूबता हूँ मैं साँझ की तरह.
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आज गाना चाहता हूँ गीत

तुम्हारे लिए गाना चाहता हूँ कोई गीत

जब खिलेंगे रंग
बटोर कर रख दूंगा तुम्हारीं आखों में

तुम्हारे होठों पर सुबह की फिसलती धूप में
किसलय का रक्ताभ है

आज गाने दो मुझे वह गान
जिसमें तुम्हारी गरिमा के चाँद सितारें हों
तुम्हारे होने की नदियाँ बहती हों

अपने ही भार से झुकी वह टहनी
और काँपता वह एक शबनम तुम्हारी आभा में
मिलन की घाटियाँ फूलों से भरी हुई

किले की दीवारों पर उकेरी मूर्तियों में आज फिर खट-खट है
गीतों को लिख रहे हैं पत्थर
उन्हें सुनना आखों से

हालाँकि आज मेरा कंठ रुद्ध है
और बैठ गयी है मेरी आवाज़

उसमें भीड़ से घिर गया एक बेहद डरा हुआ आदमी है

मैं फिर भी गाऊंगा
मैं अँधेरे की कालिमा खुरचते हुए गाऊंगा सुबह का गीत

मैं गाऊंगा कि मैं करता हूँ इस पृथ्वी से प्रेम.

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