षोडशी की षोडशोपचार उपासना १

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वाल्मीकि रचित रामायण की प्रेरणा में वो क्रोंच युगल थे, शिकारी था, शाप बुझा श्लोक था और खुद वाल्मीकि थे. अम्बर रचित उपन्यास ‘माँ मुनि’ की प्रेरणा में क्या है, क्या-क्या है, नानी का देहावसान है, नानी से सुनी उनके बचपने की कथाएँ हैं, उन कथाओं से उपजी उद्विग्नता है, माँ शारदा हैं, उनका बचपन है, विश्वास है, प्रार्थना है, या प्रार्थियों के लिए मंगल कामना है, क्या है ये हम सब पाठक शिद्दत से जानना चाहते हैं. जानते हुए भी जानना चाहते हैं.

अप्रतिम प्रतिभा के धनी कवि अम्बर पांडेय ने अब कठिन राह चुनी है. धारण योग्य भावों की विस्तृत व्याख्या की राह. उपन्यास की राह हिंदी संसार रामकृष्ण परमहंस और माँ शारदा के नाम से परिचित है किंतु परिचित ही भर है. ऐसे में अम्बर ने माँ शारदा के जीवन को केंद्र में रखते हुए यह उपन्यास लिखना शुरू किया है. रोज-ब-रोज तकरीबन हजार शब्द लिखते हैं. यह उनकी खुद से की गई कोई प्रतिज्ञा है जिसे वो चाहते तो तोड़ भी देते लेकिन नहीं तोड़ पाएँगे.

अम्बर का यह धारावाहिक उपन्यास फेसबुक पर सर्वाधिक पसंद की जाने वाली कुछेक रचनाओं में से एक है. लोग अगले हिस्से का इंतजार करते हैं और दूसरों के बहाने दिलासा देते हैं: अम्बर भी मनुष्य है, कितना लिखेगा! लेकिन चाहते हैं कि काश आज पढ़ने को मिल जाए. 

पाठकों के असीम प्यार से लैस अम्बर इस उपन्यास से नई जमीन तैयार कर रहे हैं. अगले नौ दिन तक उनका यह धारावाहिक उपन्यास सौतुक पर प्रकाशित होगा. 

 

अम्बर पाण्डेय/

“पंचभूतों को बाँधकर बनाई पुतली में अतींद्रिय अनुराग का जन्म कैसे होता है? शरीर के भीतर मन नहीं है। मन के भीतर यह संसार और उस संसार में शरीर है इसलिए तो पंचभूतों की यह पोटली के बिखरने के पश्चात् भी अतींद्रिय अनुराग वैसा ही गाढ़ा और मीठा मन के चूल्हे पर खदकता रहता है” ब्राह्मणी ने श्रीरामकृष्णदेव से कहा, वह हँसिए से लौकी काट रही थी।

“ह्रदय, जा किसी को भेजकर तेरी मामी को तो बुलवा ले। बहुत दिन बीते उसका दर्शन किए। मन उसके लिए कैसा सजल सजल हो रहा है।” श्रीरामकृष्णदेव खड़े होकर कमरे के चारों कोनों के चक्कर काट काटकर कह रहे थे।

श्रीरामकृष्णदेव कामारपुकुर आकर बहुत सांसारिक हो गए है, ऐसा समझकर ब्राह्मणी का मन तीता हो गया।

“निताई, स्त्री के लिए कोई ऐसे छछून्दर सरीखे कमरे के चारों खूँट नापता है!” ब्राह्मणी ने क्रोध से कहा।

“अपनी स्त्री को अपने गृह लाने में क्या दोष!”

हृदय ने भी तीखे स्वर में उत्तर दिया।

कल का बालक सामने खड़ा होकर पटपट बोले, यह ब्राह्मणी को असह्य था, “तुम्हारे मामा तुम्हारी तरह कामिनीकांचन के दास नहीं है। उनकी ब्रह्मचर्या में इससे विघ्न होगा।”

“काकी आएँगी तो सहायता ही होगी। पूजा, प्रसाद, दीये बालना कितने तो काज है यहाँ” श्रीरामकृष्णदेव के सबसे बड़े भाई रामलाल की बेटी लक्ष्मी ने कहा। शारदा से उसका थोड़ा ही परिचय था किंतु इस थोड़े परिचय में ही मित्रता प्रगाढ़ हो गई थी।

श्रीरामकृष्णदेव बाहर कामारपुकुर के एक दूर के सम्बन्धी को टेरने लगे, “ऐ, गयाप्रसाद, मेरी स्त्री को तो ले आ। बहुत दिन हुए उसका मुख देखे”। भीतर सब हतप्रभ एक दूसरे का मुख देखने लगे।

“कामारपुकुर का तो जल ही दूषित है। यहाँ आकर कामेच्छा का मेढ़ा बन गया है मेरा निताई। निर्लज्ज सरीखा रास्ते पर ‘मेरी स्त्री से मुझे मिलवा दो, मेरी स्त्री से मुझे मिलवा दो’ चिल्ला रहा है। हे भगवती, गंगा का कछार त्याग यहाँ भले आए” ब्राह्मणी बड़बड़ाई। क्रोध में उसने लौकी का पूरा नाश कर दिया था।

मध्याह्न भोजन के पश्चात् श्रीरामकृष्णदेव बाहर खटिया डाले विश्राम कर रहे थे। गाँव की कुछ स्त्रियाँ उन्हें घेरकर राधागोविन्द प्रेम की चर्चा कर रही थी कि श्रीरामकृष्णदेव को अपनी स्त्री शारदा आती दिखाई दी। माथे पर बड़ी भारी डलिया उठाए गयाप्रसाद के संग चली आ रही थी।

“भाल पर बहते स्वेद के मध्य सिंदूर ऐसा लगता है जैसे गंगा से सूर्योदय हो रहा हो” श्रीरामकृष्णदेव उठकर कुछ दूर दौड़े और महाभाव में लीन दो पाँव उठाकर धड़ाम से गिर पड़े। सभी स्त्रियाँ उनकी ओर दौड़ी। भीतर वस्त्र सुधारती ब्राह्मणी भी दौड़ी आई।

श्रीरामकृष्णदेव का मस्तक अपनी गोद में धरकर ब्राह्मणी, “हरिबोल हरिबोल” कहने लगी। चित्त संसार में लौटने पर श्रीरामकृष्णदेव अस्पष्ट स्वर में कहने लगे, “देख तो, काली माँ मेरे पीछे पीछे कामारपुकुर भी आ गई। उधर से नाव में बैठी आ रही है। डलियाभर के मिष्ठान भी लाई है माँ” ऐसा कहकर शारदा जिस मार्ग से आती थी उस ओर अंगुली दिखाने लगे।

“थल पर नौका नहीं चलती रे पगले। कोई किशोरी चली आ रही है” ब्राह्मणी ने श्रीरामकृष्णदेव का ललाट दबाते कहा। दूसरी स्त्रियाँ उस ओर देखकर शारदा को पहचान गई।

ठाकुर ने उनका हाथ गह लिया। जाने नहीं दिया। गाँव की सब स्त्रियाँ विस्मित एक दूसरे को देख लजाने लगी।

“गदाई की बहू आ गई। देखो तो गदाई को अपनी वधू देखकर नौका चढ़ी दुर्गा दिख रही है” एक मुखर प्रौढ़ा बोली और सभी स्त्रियाँ समवेत स्वर में हँस पड़ी।

शारदा ठाकुर के निकट आकर खड़ी हो गई। अपनी डलिया भूमि पर धरी और ठाकुर का मुख निहारने लगी। कितने वर्ष बीत गए थे अपने स्वामी का मुख देखे। उसकी कनपटियों से स्वेद की बूँदें और अश्रु टपटप ठाकुर की आँखों में गिरने लगे। ठाकुर की आँखें खारे खारे स्वेद और अश्रु से जलने लगी। वह तुरन्त आँखें मलते उठ बैठे।

“क्या करती है तू। उनके नेत्र जलेंगे नहीं। यात्रा और धूल से भरी निताई के माथे पर चढ़ बैठी” ब्राह्मणी ने कहा। उसके निताई अर्थात् श्रीरामकृष्णदेव को कोई किंचित भी कष्ट दे तो वह खेद से भर जाती थी। शारदा शीघ्र ही खड़ी होकर हाथपाँव धोने जाने लगी।

ठाकुर ने उनका हाथ गह लिया। जाने नहीं दिया। गाँव की सब स्त्रियाँ विस्मित एक दूसरे को देख लजाने लगी। स्त्री स्वामी की प्रीति का ऐसा दृश्य देखे बिना इतने शिशुओं को जन्म दे दिया, उन्हें बड़ा किया, कुछ की संतानों के तो विवाह हो गए थे, कुछ दादी परदादी बन गई थी।

“कैसी क्लांत छबि काली की। ऐसी छबि का कौन बाड़ी कौन देवालय में दर्शन हुआ री, जननीमुनि!” ठाकुर ने ब्राह्मणी से कहा। शारदा कसमसाई और दूसरे हाथ से अपना हाथ ठाकुर के हाथ से छुड़ाने लगी। दाँत से साड़ी पकड़कर उसने अपना मुख लज्जा के कारण ढाँक लिया था।

“छोड़ दे बहू की कलाई, निताई। संसार को नाटक न दिखा। हरि बोल, नौका खे, भवसागर तर” ब्राह्मणी ने कहा। पहली दृष्टि में ही उसे शारदा से विरक्ति हो गई थी। मेरे निताई जैसे षोडशलक्षणों से पूर्ण आध्यात्मिक विभूति की ऐसी सांसारिक स्त्री। आते ही निताई के मन में हरिनाम का विलोप हो गया। पूरे संसार के सम्मुख अपनी स्त्री की कलाई पकड़कर बैठा है।

जैसे तैसे कलाई छुड़ाकर शारदा भीतर भाग गई।

“जननीमुनि, दुर्गा के आने पर सबसे पहले तो मुख में मिष्ठान देना चाहिए। नौका में बैठे उसके पाँव कितने दुखने लगे होंगे, बताओ” दूसरी स्त्रियों की ओर मुख करके ठाकुर ने ब्राह्मणी से कहा।

“इतनी थकीभूखी तो नहीं दिखाई पड़ती। डलियाभर तो अपने संग पथ्य लाई है और तुम सभी”; ठाकुर को घेरे बैठी स्त्रियों से कहा, “क्या तुम्हें घर पर कोई काज नहीं। आ जाती हो नित्यप्रति। भगवतचर्चा के बहाने संसार खोलकर बैठती हो” ब्राह्मणी अब कोप से जल रही थी। बेचारी ग्राम्यनारियाँ, सुनकर उठी और एक एक करके जाने लगी। जाते जाते भीतर देखती जाती। एक बार शारदा का जीभरकर दर्शन करना चाहती थी।

उन्हें ऐसा करते देख ठाकुर उनकी इच्छा जान गए, “अभी तो दस दिन रुकेगी, शारदा। तुम रंज न हों। कल फिर आ जाना मेरी बहू निहारने।”

भीतर जाकर ठाकुर ने शारदा की डलिया खोल ली। सीताफल, नारिकेल, सन्देश और चूड़ा धरा था भीतर। एक एक वस्तु निकालते और ब्राह्मणी को हृदय को लक्ष्मी को दिखाते जाते।

“देखो तो, कितना कुछ ले आई। साक्षात् कमला बनकर आई है इस बार। छहों रस के व्यंजन!” ठाकुर ने कहा और रस से फूटते सीताफल के गूदे से अपने अंगुलियाँ भर ली। शारदा दूर खड़ी देख रही थी।

ठाकुर उठे और शारदा की ओर हाथ बढ़ाते बोलें, “बहुत भूखी है न तू। शारदा, देख, थोड़ा सा खा ले।”

शारदा लज्जा से नेत्र तक न उठा पा रही थी किन्तु अपने दाएँ हाथ की अंगुली बढ़ाकर सीताफल का बीज उठाया और निगल गई। ह्रदय और ब्राह्मणी के हृदय यह लीला देखकर फट पड़े।

“भगवान जाने भगवती का ये कौन सा रसिक रूप है” बड़बड़ाता हृदय बाहर चला गया।

“भात बनेगा या केवल सीताफल से सब पेट भरेंगे आज” ब्राह्मणी ने कहा।

“मैं अभी चौका लगा देती हूँ” कहती शारदा चौकी की ओर दौड़ती गई।

(क्रमशः जारी…)

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