पुण्यतिथि विशेष: इतना भी आसान नहीं है जौन तक पहुंचना- जौन एलिया मेरी नज़र में

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सौरव कुमार सिन्हा/

कोई मुझ तक पहुंच नहीं सकता ,

इतना आसान है पता मेरा।

जौन को चाहने वालों की संख्या लाखो में है और रोज उनकी तादाद बढती जा रही है।  देवनागरी में जब से जौन के कलाम आए हैं, उनके मुरीदों को ज़्यादा सहूलियत मिली है खासकर हिन्दुस्तान में।  युट्यूब पर जौन पर काफी कुछ मौजूद हैं, लोगों ने अपने अपने हिसाब से इस अज़ीम शायर को पढ़ा और समझा। मैं भी उन्हीं मुरीदो में से एक हूँ और जौन को पढ़ता रहता हूँ।  मेरे पास कोई ऐसी डिग्री नहीं है जिससे साबित हो कि वाकई मेरे अहसासात जो जौन को लेकर है उनमे कितनी सच्चाई है और हो सकता है यही एक कारण हो जो मेरे लेखों को पक्षपाती नहीं बनाता है क्योकि मैंने जौन को सिर्फ और सिर्फ एक पाठक के रूप में देखा, पढ़ा, समझा और लिखा। आप भी कोई राय कायम ना करें, बस पढ़ते रहें। इस बात में भी दो राय नहीं है कि यही वो वक्त है जब जौन की शायरी पर सही गलत जो भी हो लिखा जाएगा, ये काम शुरू हो भी चुका है।  इसी सिलसिले को आगे बढ़ाने की यह मेरी एक कोशिश है।

जौन की शायरी जिस कदर रोज़-रोज़ सोशल मीडिया पर पढ़ने को मिलती है उससे ये तो यकीं है कि लोग जौन को पढ़ रहे हैं और पसंद भी कर रहे हैं लेकिन क्या जौन का पूरा वजूद उन शायरियों के आस-पास ही है? क्या जौन की झुंझलाहट ही जौन के चाहने वालों को उनके पास लाती है ? क्या जौन का अंदाजे बयां ही था जो उन्हें और शायरों से जुदा करता है? क्या कारण था उनकी झुंझलाहट का? मुझे  लगता है जौन एक शख्सियत हैं जिसे शायरी के मेयार-ए -ख़ाम से बाहर निकल कर देखना होगा। सिर्फ चंद शेर और कुछ वाक्यात जौन की तर्जुमानी नहीं कर सकते। जौन के कई शेर आशिकों और कामरेडों की डायरियों में मिल जाएंगे। वे रोमांटिसिज्म’ और ‘रेज़िस्टेन्स’ के भरपूर मिश्रण थे, लेकिन एक और जौन था, दिवार के पीछे जो बाहिर आना ही नहीं चाहता था वो पीछे रह कर ही तंज़ करना चाहता था खुद पर भी और जमाने पर भी और इसी जौन की मुझे तलाश है।

जौन एलिया के लिए कही गई पीरजादा क़ासिम की एक गज़ल के कुछ शेर जिससे मैं अपनी बात शुरू कर रहा हूँ। ये गज़ल खुद में जौन की शख्सियत के विषय में कुछ बातें बखूबी कह देती है:

ग़म से बहल रहे हैं आप, आप बहुत अजीब हैं

दर्द में ढल रहे हैं आप, आप बहुत अजीब हैं

अपने खिलाफ फैसला खुद ही लिखा है आपने

हाथ भी मल रहे हैं आप, आप बहुत अजीब हैं

वक्त ने आरज़ू की लौ देर हुई बुझा भी दी

अब भी पिघल रहे हैं आप, आप बहुत अजीब हैं

ज़हमते जर्बते दीगर  दोस्त को दीजिये नहीं

गिरके संभल रहे हैं आप, आप बहुत अजीब हैं

दायरावर ही तो हैं इश्क के रास्ते तमाम

राह बदल रहे हैं आप आप बहुत अजीब हैं

दश्त की सारी रौनकें  ख़ैर से घर में है तो क्यूँ

घर से निकल रहे हैं आप, आप बहुत अजीब हैं

अपनी तलाश का सफर ख़त्म भी कीजिये कभी

ख्वाब में चल रहे हैं आप, आप बहुत अजीब हैं

जौन के शेर कहने का अंदाज और उनकी शायरी में झुंझलाहट एक बहुत बड़ा कारण है उनके चाहने वालों को उन तक पहुंचाने का। ज़्यादातर लोग मुशायरों में उनके अंदाज को देख कर ही उनकी और आकर्षित होते हैं। जौन के पहले भी कई शायर थे जिनका अंदाज़ लोगों को याद होगा जैसे आदिल लखनवी लेकिन जौन की निजी ज़िन्दगी  भी उनके अंदाज से मेल खाती थी, बेतकल्लुफ, बेफिक्र और बुलंद।  जौन एलिया जरुरत से ज्यादा सेंसेटिव (हस्सास) थे इसलिए किसी भी वाकये पे उनका रिएक्शन आम लोगो या दूसरे अदीबों से जुदा होता था।  हालांकि कमोबेश सभी कलाकार या कला के चाहने वाले सेंसेटिव होते है लेकिन झुंझलाहटों  को जब्त कर लेते हैं कारण वो सामाजिक और व्यक्तिगत बेड़ियाँ जिनमें वो बंधा हुआ होता है।  जौन आजाद थे इन बेड़ियों से इसलिए उस झुंझलाहट को उसी अंदाज में पेश करते थे जैसा वो महसूस करते थे। जौन का शायर होना उनकी पारिवारिक पृष्ठभूमि की वजह से था लेकिन उनके पिता शफ़ीक़ हसन एलिया ने उनको शायरी के अलावा कई ऐसी विधाओं से अवगत कराया जिसको जौनने ना केवल पढ़ा लेकिन ताउम्र उन फलसफ़ो पे चलते भी रहे। उनसे बड़े दो भाई रईस अमरोही और सैय्यद मोहम्मद तकी उस समय उर्दू अदब के प्रतिष्ठित नाम बन चुके थे।  इस संगत और माहौल का एलिया पर भी खूब असर पड़ा होगा क्योंकि कहा जाता है कि उन्होंने अपना पहला शेर आठ साल की उम्र में ही कह दिया था।  इसका बहुत बड़ा कारण उनका शिया मुसलमान होना भी है जहां मजलिसों की पुरानी रवायात है और साथ साथ उनका अमरोहा में होना जिसके बारे में सयाने कह गए हैं कि अमरोहा में बच्चा भी रोता है तो तर्रनुम में। अब किसी की परवरिश इस माहौल में हो तो शायरी तो उसके रगों में होगी ही हालांकि जौन दो कदम आगे निकले। जौन का मानना था कि किताबों को पढ़ के अगर अमल ना किया गया तो वो ना पढ़े के बराबर होता है। प्रोग्रेसिव पोएट्री और ज़माने के बदलते दौर में उन फलसफ़ो  पर अमल करना बहुत कठिन था, जौन ने अमल किया। उनकी नज्म के कुछ हिस्से:

मेरे कमरे में किताबों के सिवा कुछ भी नहीं

इन किताबों ने बड़ा ज़ुल्म किया है मुझ पर

इन में इक रम्ज़ है , इस रम्ज़ का मारा हुआ ज़हेन

मुशदा ए इशरत ए अंजाम नहीं पा सकता

ज़िंदगी में कभी आराम नहीं पा सकता !

मेरे कमरे का क्या बयां की जहां

खून थूका गया शरारत में

ये एक नज़्म ही काफी है उनका इल्म और किताबों के प्रति उनकी बेकरारी और चाहत को दर्शाने के लिए।  लोग कहते हैं कि ये फ़न उन्हें विरासत में मिला था, ये दीगर बात है कि जौन ने बड़े शिद्दत से उन फलसफों पर अमल किया जिसमे केवल विरासत का हाथ नहीं हो सकता । इस रवैये के कारण समाज का दंश झेलना तो लाजिम था। जौन को झुंझलाहट थी की कोई उनको समझा नहीं सकता उनके सिवा।  उनका ये अकेलापन और अपने आप से गुफ्तुगू शायरी में मुकम्मल तौर पे झलक के सामने आती है। जौन की शायरी में लेकिन इस अकेलेपन से पैदा होने वाली बेचारगी के बजाय एक किस्म की बेफिक्री दिखती है और जो सोशल मीडिया पर मौजूद आशिकों को खूब भाती है।

जौन का ज़िक्र आप किसी से करें, आपको पाकिस्तान या हिन्दुस्तान नज़र आए ना आए, अमरोहा ज़रूर नज़र आएगा। जौन जब कहते है

शहरे -ग़द्दार जान ले की तुझे

एक ‘अमरोहवी’ से खतरा है

अपने छोड़े हुए मुहल्लों पर

रहा दौराने-जांकनी कब तक

नहीं मालूम मेरे आने पर

उस के कूचे में लू चली कब तक.

जाइये और ख़ाक उड़ाइये आप

अब वो घर क्या कि वो गली भी नहीं

और भी बहुत सारे उदहारण हो सकते हैं जो जौन का अमरोहा के प्रति बेइन्तेहाई प्रेम दर्शाते हैं।  २३ साल की उम्र में हालात ने जौन को अमरोहा से तो अलग कर दिया लेकिन अमरोहा को जौन से अलग नहीं कर पाए। पूर्वी उत्तरप्रदेश में बोले जाने वाले देसज/देसी  शब्दों का इस्तेमाल आप जौन की शायरी में देख सकते हैं। जानकारों ने ये ज़रूर कहा है कि बहुत ज्यादा छूट होती नहीं है इस शायरी के फन में लेकिन अकबर इलाहाबादी , इब्ने इंशा जैसे शायरों ने भी इस्तेमाल किया और बखूबी किया, जौन चूँकि चलत फिरत की बातचीत को शेरों में ढाल देते थे इसलिए उनके लिए बेहद जरुरी था ऐसे शब्दों को इस्तेमाल करना और उन्हें ज़िंदा रखने के लिए बड़ी खूबसूरती से इस्तेमाल करना।  अब बात उसी अमरोहा की, जौन के भाइयों का कम्युनिस्ट पार्टी से मुस्लिम लीग में जाना एक बड़ा कारण था कि जौन अमरोहा छोड़ पाकिस्तान चले गए लेकिन जैसे कि मैंने कहा, अमरोहा से उन्हें बेइन्तेहाँ मोहब्बत थी सो वही झुंझलाहट आपको शायरी में बहुत ही बेमिसाल तरीके से दिखेगी। बहुत से शायरों कहानीकारों ने बंटवारे की दास्ताँ को बखूबी दर्शाया है, और काफी मार्मिक ढंग से भी लेकिन जौन का अंदाज उस तकसीम को ले के भी  जुदा था। धार्मिक कट्टरता पे उनका लहज़ा बिलकुल कबीर की तरह था, हालांकि कबीर की तरह व्यापक नहीं था फिर भी उन्होंने किसी का बचाव नहीं किया, चाहे मंदिर हो या मस्जिद। जब वो ‘इस्टैब्लिशमेंट’ पे हमला करते है तो खुद को भी एक ‘इस्टैब्लिशमेंट’ मान कर बखूबी तंज करते है , वो जानते है कि खुद वो एक ‘इस्टैब्लिसमेंट’ का हिस्सा है और चाहे अनचाहे उन्हें इसका साथ देना पड़ रहा है, ऐसा बहुत कम लोगों ने किया।

धरम की बांसुरी से राग निकले

वो सुराखों के काले नाग निकले,

रखो दैरो-हरम अब मुक़फ़्फ़ल

 कई पागल यहां से भाग निकले,

वो गंगा जल हो या आबे-ज़मज़म

ये वो पानी हैं जिन से आग निकले

है आखि़र आदमियत भी कोई शै

तिरे दरबान तो बुलडॉग निकले

जौन की शायरी को ले बहुत सारे जानकार ये कहते हुए नज़र आएँगे कि  शेरों में बहुत ज्यादा गहराई, मार्मिकता, सघनता की चाह रखने वालों को जौन निराश कर सकते है। कुछ हद तक मै भी ये मानता हूँ , लेकिन अभी तो उस किताब का खुलना चालू हुआ है जिसका नाम है जौन एलिया , ना जाने कितने नए पहलू है जो देखने को मिले।

(यह लेख जानकीपुल.कॉम से साभार लिया गया है.)

 
 

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