दूधनाथ सिंह: ता-हश्र जहाँ में मिरा दीवान रहेगा

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चन्दन पांडेय/

दूधनाथ सिंह अब स्मृतियों में मिला करेंगे। और चर्चाओं में। अपनी बेहतरीन रचनाओं में मिला करेंगे। उनके स्वास्थ्य संबंधित चिंतित करने वाली खबरें पिछले कुछ दिनों से आभासी माध्यमों पर मिल रही थी।

यह महज इत्तफ़ाक ही है कि दूधनाथ सिंह दूसरे लेखक थे जिनको इस नाचीज ने लक्ष्य साधकर एक समय समग्रता में पढ़ा। उनकी कहानियाँ निसंदेह कमाल हैं। यह भी एक रीति ही है कि जिस तरह लोगों ने महान कवि रिल्के की कविताओं से अधिक उनकी एक अन्य रचना ‘युवा कवि को पत्र’ का जिक्र किया है उसी तरह हिंदी में लोग कहानीकार की कविताएं पसंद करते हैं, कवि की कहानियाँ पसंद करते हैं, कहानीकार के संस्मरण पसंद करते हैं, उपन्यासकार की आलोचना पसंद करते हैं, आलोचक की वो रचनाएँ पसंद करते हैं जो उनने अपने बचपने में लिखी होती है। रीति के इसी तर्ज पर लोग दूधनाथ सिंह का सबकुछ पसंद करते हैं सिवाय उनकी कहानियों के। यह तर्ज अब दर्ज है।

रचनाशीलता के उनके अनेक आयाम हैं। उनकी कहानियों का मुरीद कौन नहीं होगा? कथा की हर विधि को उन्होंने अपनाया, सुलझाया और लिखा है। उन पर तो असंख्य बातें होंगी और होनी भी चाहिए लेकिन मैं एक अनन्य बात उनकी रचनाओं से सीखने को मिली कि वो चमकीले, कोटेबल, वाक्यों से परहेज करते थे। उनकी रचनाएँ अपने प्रभाव में  खूब याद होंगी लेकिन कोई चमकदार किन्तु असंपृक्त वाक्य शायद ही दिखे।

एक अनन्य बात उनकी रचनाओं से सीखने को मिली कि वो चमकीले, कोटेबल, वाक्यों से परहेज करते थे।

सबसे पहले जो मैंने उनकी कहानी पढ़ी थी, वो थी: धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे। रीछ, सुखांत और सपाट चेहरे वाला आदमी जैसी कहानियाँ बेहतरीन फैंटेसी की बानगी हैं। वहीँ धर्मक्षेत्रे-कुरुक्षेत्रे इकलौती कहानी है जिसमें कथा का प्रस्थानबिंदु कल्पित है। एक ऐसे समय की कल्पना जहां स्त्रियों की खरीद-फ़रोख़्त में भी कायदा बना हुआ है। वो आज की यजीतरह बेकायदा समय नहीं है। इस कल्पना के उपरांत पिता-पुत्र को धर्मयुद्ध में उतार लेने का अद्भुत किन्तु दहला देने वाला आख्यान है। इस कहानी को पढ़ने के बाद हर कोई यही करेगा कि दूधनाथ सिंह की कहानियाँ ढूँढ़ ढूंढ कर पढ़े।

इसके बाद जितनी भी कहानियाँ पढ़ीं उनमें से अधिकतर यथार्थवादी कथा परंपरा की बेमिसाल मिसाल हैं। और वह यथार्थवाद लद्धड़ नहीं था, दूधनाथ सिंह उसके बीजतत्व तक पहुँचते थे।  दूधनाथ सिंह की वर्णन शैली अद्भुत थी। मंझे चित्रकार की तरह वो घटना और दृश्य को ठहरा देते थे। नपनी कहानी कितनी खूबसूरत है! उसमें जो रोड टैक्स के नाम पर गुंडा टैक्स वसूलने का प्रकरण हो या नपनी का दूसरी कन्या से संवाद, सब बर्फ की तरह मन में जम जाते हैं।

लेकिन नपनी कहानी के पहले पढ़ी थी, नमो अन्धकारम। जब मैने उसे पाया तो साहित्य जगत में सिर्फ और सिर्फ संजय कृष्ण से परिचित था। उन्हीं के घर यह कहानी हंस के एक विशेषांक में मिली थी। यह बताना इसलिए भी जरूरी है कि जैसे जैसे परिचय का दायरा बढ़ता गया उस कहानी के बारे में बहुत सी खराब बातें सुनने को मिली, यहाँ तक कि वो कहानी उनके इर्द गिर्द के लोगों पर बुनी गई है। यह जानने के बाद उस रचना का नापसंद करना चाहा। लेकिन नहीं कर पाया क्योंकि उसे जब मैंने पाया था तो कहानी की तरह और बतौर कहानी वह लाजबाब लगी थी। क्या स्ट्रक्चर था! वाग्वीर किंतु किंकर्तव्यविमूढ़ वाचक। छोटे छोटे अनेक समूह या संगठन और सबमें वही वही लोग। विश्वविद्यालय और शिक्षक। और फिर समूहों, संगठनों की आड़ में कभी न खुलनी वाली व्यक्तित्व की खामियाँ: निर्णायक खामियाँ। इतने सारे पहलुओं को अपने लेखन कौशल से जब निखारा तो दूधनाथजी ने क्या खूब निखारा।

उन दिनों दूधनाथजी के संग्रह लोकभारती से प्रकाशित थे। विश्वविद्यालय प्रकाशन वालों से निवेदन किया तो एक एक कर सारे संग्रह उन लोगों ने मँगाए। सपाट चेहरे वाला आदमी, माई का शोकगीत, प्रेम कथा का अंत न कोई। एक पर एक कहानियां: रीछ, माई का शोकगीत, सपाट चेहरे वाला आदमी, सुखांत, दूसरा इंद्रधनुष। यह कहने में गुरेज नहीं कि प्रेम कहानियों का उनका संकलन ‘प्रेम कथा का अंत न कोई’ प्रेम पर लिखी बेहतरीन कहानियों का संकलन है। जिन दिनों मैं उनके नए संग्रह ‘जलमुर्गियों का शिकार’ पर लिख रहा था उन दिनों पता नहीं क्यों बार बार प्रेम कथा का अंत न कोई दुहराने का मन होता था।

उनके लेखन में कमाल का नैरंतर्य था। इन सब कहानियों के बाद उनकी लंबी कहानी ‘निष्कासन’ कथादेश में प्रकाशित हुई। एक ऐसे मुद्दे पर कहानी जिस पर लोग दबी छुपी जबान में ही बात करना पसंद करते हैं। पिछले दिनों एक फ़िल्म देखी जिसमें एक हाई प्रोफाइल और शक्तिशाली दलाल है जो लड़कियाँ सप्लाई करवाती है। उसके जलवे हैं। लोगों को सामने से गोली मार देती है, पिटवा देती है। उसके पास एक दिन किसी रसूखदार मंत्री के पी ए का फोन आता है, कहता है, मंत्रीजी के अमुक फार्महाउस पर एक लड़की भेज दो और फिर जोर देकर कहता है, कॉलेज की लड़की भेजना। इस दृश्य को देखते हुए दूधनाथ सिंह की कहानी निष्कासन कौंध गई थी। इस फ़िल्म का दृश्य तो चलताऊ है लेकिन इस व्यवसाय और कॉलेज-हॉस्टल आदि में इनकी घुसपैठ को लेकर लिखी यह कहानी ‘निष्कासन’ सोचने पर मजबूर कर देती है।

उपन्यास भी उन्होंने बेहतरीन लिखा। आखिरी कलाम पर तो अलग से लिखना होगा। पहले उनके परिचय में अक्सर छपता था कि एक उपन्यास ‘अबूझमाड़’ लिख रहे हैं। बाद के दिनों में यह परिचय में दिखना बंद हो गया।

चूँकि मैं निजी स्मृतियोँ को सार्वजनिक करने का मुरीद नहीं इसलिए संस्मरण राह चलते सुनना ठीक है लेकिन बतौर विधा मुझे लगभग नहीं भाती है। अच्छे गद्य के लिए पढ़ लूँ तो पढ़ लूँ लेकिन उस पाठ से तो सिर्फ उसी व्यक्ति के बारे में राय बनती है जिसने लिखा है, उसके बारे में नहीं जिस पर संस्मरण लिखा गया है। इस लिहाज से ‘लौट आ ओ धार’ व्यक्ति दूधनाथ सिँह से बेहतरीन परिचय कराती है। बलिया से बनारस पैदल आने का संघर्ष, बीमारी, प्रेम, मित्रताएँ: दूधनाथ सिंह के अनेक पहलू खुलते हैं।

पहले उनके परिचय में अक्सर छपता था कि एक उपन्यास ‘अबूझमाड़’ लिख रहे हैं। बाद के दिनों में यह परिचय में दिखना बंद हो गया।

ऐसे गजब लेखक का हमारे बीच से चले जाना बहुत बड़ी रिक्ति पैदा करता है। अपूरणीय क्षति में अपूरणीय को परिभाषित करता हुआ।

हम एकलव्यों से उनकी मुलाकातें न के बराबर थीं। एक बार 2005 में 06 में, प्रेमचंद पर जलेस ने बनारस में कोई कार्यक्रम आयोजित किया था उसमें दूधनाथजी को देखा था। उनसे मिला भी। साथ में कुंदन और अनिल थे। हमने अपना परिचय दिया। वो मुस्कुराए। वो व्यस्त रहे होंगे इसलिए उन्होंने हमें एक शख्स से मिलवाया, ये सुधीर हैं, इनसे मिलिए, और आगे बढ़ गए। उसी कार्यक्रम में राजेंद्र यादव, मुरली मनोहर प्रसाद सिंह को पहली बार देखा था।

इसके अलावा एक बार उनसे फोन पर की बात है। मेरे मन में वो इतने सिद्धहस्त कहानीकार की तरह विराजित हैं कि जब उन्होंने ‘कवि’ कहानी की तारीफ में फोन किया तो झेंप हुई। वो उनका बड़प्पन था। एक बात उल्लिखित करने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा कि जो लोकप्रिय चार यार हैं हिंदी साहित्य में, इन सबमें नई पीढियों से अप्रतिम प्रेम रहा है और अभिभावक भाव रहा है, काशीनाथजी से जब भी मिलो वो आपकी सद्य-प्रकाशित रचना पर अपनी राय जरूर देते हैं। ज्ञानजी ने तो, जब मैंने नौकरी पकड़ी और दो महीने हो गए थे, हिदायत वाली वत्सल सलाह दी थी कि दो महीने हो गए, अपना घर व्यवस्थित कर लिए होगे, अब लगातार लिखना शुरु कर दो। जो मैं नहीं कर पाया। कालियाजी तो प्रोत्साहन की मिसाल थे। दूधनाथजी ने भी उस दिन फ़ोन पर एक से अधिक मर्तबा यह सलाह दी थी कि लगातार लिखो। एक बार फिर, जो मैं नहीं कर पाया।

दूधनाथजी की कहानियाँ, उपन्यास, आलोचना और अन्य गद्य हर उस किसी के लिए प्रेरणास्रोत रहेगा जो रचना चाहते हैं। इस तरह वो हमारे जेहन में हमेशा रहने वाले हैं, जैसे हम खुद अपने साथ रहते हैं।

 

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