सामान्य समस्याओं की परिपक्व कविताएँ: नीली आँखों में नक्षत्र

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आलोक रंजन/

नीली आँखों में नक्षत्र, विपिन चौधरी की लिखी किताब है। बोधि प्रकाशन से आयी यह पुस्तक हरियाणा साहित्य अकादमी के सहयोग से प्रकाशित हुई है। इस किताब के मुख्यतः दो हिस्से किए जा सकते हैं। पहले हिस्से में स्त्रियाँ ही स्त्रियाँ है और दूसरे हिस्से में व्यक्ति आधारित कविताएँ, राजनीति का स्वाद और कुछ आत्मपरकताएँ हैं। पहला हिस्सा बड़ा है, दूसरा अपेक्षाकृत छोटा।

किताब का एक बड़ा हिस्सा उन कविताओं से तैयार हुआ है जो स्त्री की कविताएँ हैं। उन कविताओं के केंद्रीय विषय के रूप में स्त्रियों का दुख है। आरंभ में ही ऐसा कह देना उनलोगों को अनावश्यक भागदौड़ से बचा सकता है जो कविताओं के मूल स्वर तक जाने की जल्दी में रहते हैं, कविताओं की ‘मुख्य थीम’ ‘पकड़ना’ चाहते हैं। आइये इस किताब के एक बड़े भाग में आयी हुई स्त्री-छवि से परिचित होते हैं। इसे दरअसल एक स्त्री की छवि कहने के बजाय स्त्रियों की छवियाँ कहना उचित होगा। वह स्त्री लड़की, माँ, पत्नी और अनेक संभव रूपों में इन कविताओं में आती है। यहीं से बात इन कविताओं को विमर्श के दायरे में ले जाती है। फिर यह प्रश्न स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या ये कविताएँ कुछ नया कह पा रही हैं जो स्त्री विषयक विमर्श को समृद्ध करे।

स्त्री विमर्श का हर अंग महत्वपूर्ण है लेकिन आज का विमर्श बहुसंख्यक स्त्रियों द्वारा रोज़-ब-रोज़ झेले जा रहे यथार्थ के प्रति उदासीन दिखता है

हम ऊपर ऊपर से कितनी भी बात कर लें लेकिन हमारे यहाँ स्त्री के प्रश्न ज्यों के त्यों बने हैं। इसलिए जब बात विमर्श की होगी तो निश्चित रूप से उस विमर्श की ओर चलना ही होगा जो स्त्री के मूल प्रश्नों से जूझते हों। स्त्री विमर्श का हर अंग महत्वपूर्ण है लेकिन आज का विमर्श बहुसंख्यक स्त्रियों द्वारा रोज़-ब-रोज़ झेले जा रहे यथार्थ के प्रति उदासीन दिखता है। ऐसे में विपिन चौधरी की कविताओं में आई हुई स्त्रियाँ स्त्री विमर्श में उन असंख्य स्त्रियों को लेकर आती हैं जिनकी कहानियाँ चमकदार नहीं हैं बल्कि साधारण हैं। इस किताब के एक बड़े हिस्से में उन समस्याओं को बारीकी से दिखाया गया है जो लंबे समय से बने हैं।  वक्त के साथ लोग इनके साथ जीना सीख चुके हैं। परिणामस्वरूप स्त्रियों की वे समस्याएँ, समस्या न लगकर सामान्य सी बात लगती हैं। समस्याओं का इतना सामान्य हो जाना कि वे समस्या न लगकर जीवन का हिस्सा लगने लगे  बहुत खतरनाक है। कवि पाश ऐसी ही स्थिति के लिए ‘सबसे खतरनाक’ मुहावरे का प्रयोग करते हैं। विपिन चौधरी की इस  किताब में स्त्रीयों  के वे मुद्दे बहुत से संदर्भों के साथ आए हैं।

किताब की शुरुआत एक ऐसी माँ से होती है जो अपने पति से अलग रहते हुए या अलग होकर पुरुषों से भरी दुनिया में अपने बच्चों की खुशी के लिए हर वो काम करती है जो एक पिता के लिए निर्धारित थे। वसंती मौसम में पतंगबाजी में हार रहा बच्चा माँ को छत पर ले आता है और माँ की पतंग उड़ती भी खूब है। इस छोटी सी बात में अकेली रहकर बच्चों की बेहतरी के लिए  माँ  द्वारा किया जा रहा सारा संघर्ष सिमटकर आ जाता है। यहाँ एक बात गौर करने वाली है कि, पतंग उड़ाना एक लैंगिक गतिविधि नहीं है इसके बावजूद हमारे समाज की वास्तविकता में यह एक लैंगिक गतिविधि ही है इसलिए स्त्री का पतंग उड़ाना एक घटना बन जाती है।

विपिन की इस किताब में स्त्रियाँ प्रेम करती हैं लेकिन प्रेम में भी उनके हिस्से बहुत कुछ नहीं आता है। वे शादी कर के पारिवारिक जीवन जीती हैं पर वहाँ भी वंचना ही है। एक दर्द है जो उनका अपना है। इन स्त्रियों के हिस्से आता है इंतज़ार। इन कविताओं में आया हुआ इंतज़ार शब्द बहुस्तरीय है। प्रेमिका को प्रेमी का इंतज़ार है, एक किशोर होती हुई लड़की को प्रेम का , पति और बच्चों के साथ जी रही स्त्रियों को अपनी ठस्स और दुखदायी दिनचर्या के परिवर्तित होने का, और इन सबको एक उम्मीद का ! लेकिन उम्मीद के पार भी कुछ नहीं धरा ठहरा। वहाँ की कल्पना से निर्रथकता बोध और गहरा जाता है।

उस पार भी क्या

प्यार एक मृगतृष्णा है

उम्मीद एक धोखा   ।

इंतज़ार की तरह ही याद इन स्त्रियों के हिस्से में प्रमुखता से आती है। याद उन्हें अपनी खुशियों से बांधे रखती है। यकीनन वह समय बीत गया है और उतना ही सच यह भी है कि उनका वर्तमान उनकी खुशियों से नहीं जुड़ा है। वहाँ बंधन है , हीनतर लिंग का सतत एहसास दिलाया जाना है और सबसे बढ़कर निर्बाध शोषण है। शारीरिक और मानसिक शोषण!  यादें उन्हें वापस उन दिनों में ले जाती हैं जब वे खुश थीं। यादों के सहारे वे अपने भीतर कहीं दबी कुचली रस की पोटली तक पहुँच जाती हैं जिससे क्षणिक ही सही लेकिन आनंद तो मिलता है। इस याद का भी अपना ही किस्सा है। वे उन चोर दरवाजों की तरह हैं जो दुखों के बीच से निकाल ले जाते हैं।  जब यादों का सामना यथार्थ से हो जाता है तो वह द्वंद्व भले ही स्त्री के भीतर हो लेकिन उसे संभालना आसान नहीं होता –

आखिर मन के खुले हुए इतने सारे दरवाजों का

झटके से मुंह बंद करना आसान काम तो नहीं ।

स्त्री और पुरुष दोनों की अपनी यादें होती हैं लेकिन प्रेम प्रसंगों और आकर्षण से जुड़ी यादों को बरतने में समाज ने स्त्रियों का साथ नहीं दिया है। पुरुष जहां खुलकर इसे एक गर्व के साथ व्यक्त करते हैं वहीं स्त्री के लिए यह एक वर्जित क्षेत्र होता है। क्योंकि समाज ने उसे जिस पुरुष की सत्ता से जोड़ दिया होता है उसका अहंकार स्त्री के पुराने प्रेम और आकर्षण की याद भर  से भी खंडित होने की संभावना रखता है।

इस किताब में एक कविता है – स्त्रियों के नाम सावधानी की कई परतें। उस कविता के केंद्र में है स्त्री का स्नान। नहाना एक सामान्य क्रिया है। भारत जैसे देश में जहां एक पूजनीय प्रतीक तालाब में नहाती हुई स्त्रियों के कपड़े लेकर पेड़ पर चढ़ जाता है वहाँ ‘नहाती हुई स्त्री’ एक रोमांचक और अश्लील मुहावरा बनकर पुरुषों में दौड़ता है यह कहना कोई नयी स्थापना नहीं है। अंततः स्त्री की सत्ता एक नग्न शरीर तक सीमित कर दिए गए वातावरण में नहना एक अति गोपनीय सावधानी से किया जाने वाला कार्य बन जाता है। यह कविता स्त्री के जीवन की उस सामान्य जरूरत को रेखांकित करती है जिसमें छिप के नहाने की कवायद में वह साफ पानी भी हासिल नहीं कर पाती। स्त्री विमर्श अब यह सोचने की जरूरत महसूस नहीं करता कि आज भी नहाने का साफ पानी किसे कहते हैं लाखों स्त्रियॉं क्यों नहीं जान पातीं।

इसी तरह ‘जब लड़कियों के खेल में गोबर शामिल होता है’ कविता अपने लिए अलग चर्चा की मांग करती है। यह कविता उस पूरे परिदृश्य को हमारे सामने रखती है जिसमें गोबर बीनना एक खेल बन जाता है। यों कहें कि लड़कियों ने अपनी रचनात्मकता से इसे खेल का रूप दे दिया है। गोबर चुगकर उसे सहेजना एक आर्थिक क्रिया है जिसके लिए लड़कियाँ दिन भर धूप में जानवरों के पीछे दौड़ती रहती हैं और अपने द्वारा समेटे गए गोबर को लेकर हार-जीत तय करती हैं। खेलों की दुनिया में ऐसा खेल शायद ही होगा जो इस तरह स्त्री की निरीह दशा को उघाड़ता हो ।

इस सहेजी गयी निपुणता को

गाँव – गुवाड़ की निरक्षर लड़कियों ने

एक चुस्त खेल बनाकर ही दम लिया है।

यह किताब अपने दूसरे हिस्से में जब प्रवेश करती है तब तक पाठक के मन पर कविता में आई हुई स्त्री का एक अक्स बन चुका होता है। इस बीच उन तमाम दृश्य विधानों से पाठक गुजर चुका होता है जो कई बार दुहराव की श्रेणी में गिर जाते हैं। कुछेक  भावों के दुहराव भले ही हों लेकिन किताब यह स्थापित करने में सफल हुई है कि बहुत सारे काम जो सामान्य होने चाहिए , वे भी ‘जेंडर्ड एक्टिविटी’ के खाते में चले गए हैं।

कुछेक  भावों के दुहराव भले ही हों लेकिन किताब यह स्थापित करने में सफल हुई है कि बहुत सारे काम जो सामान्य होने चाहिए , वे भी ‘जेंडर्ड एक्टिविटी’ के खाते में चले गए हैं

आगे, किताब में ठीकठाक संख्या में ऐसी कविताएँ हैं जो किसी न किसी व्यक्ति को केंद्र में रखकर लिखी गयी हैं। व्यक्ति केन्द्रित इन कविताओं में भी एक स्पष्ट विभाजन देखा जा सकता है। कुछ कविताओं में वे किरदार आए हैं जो इतिहास या समकालीन रूप से किसी न किसी तरह चर्चित रहे हैं और कुछ कविताएँ उन सामान्य लोगों की कविताएँ हैं जो रचनाकार के जीवन से जुड़े रहे हैं। पहली श्रेणी में, मदर टेरेसा, भगत सिंह, इरोम शर्मिला, बहादुर शाह जफर, यासर अराफ़ात आदि आते हैं और दूसरी श्रेणी में पुलिया पर बैठने वाला मोची, रसूल रफूगर, सलामत भाई, तीजन बाई, सिरफिरा आदि। दोनों ही श्रेणियों में इन लोगों के संघर्ष मुख्य हैं। हाँ संघर्ष की प्रकृति अलग अलग है। एक ओर तो व्यक्तिगत स्तर या ज्यादा से ज्यादा परिवार का संघर्ष है वहीं दूसरी ओर समुदाय के लिए किए गए संघर्ष सामने हैं। दोनों ही प्रकार के संघर्ष अपनी अपनी विशेषताओं के साथ आए हैं जिन्हें कवयित्री ने बखूबी शब्द दिए हैं –

फटे कपड़ों पर जालीदार पुल बना

कपड़ों का खोया हुआ मधुमास लौटाता रसूल 

या फिर,

एक इंसान के जितने रूप हो सकते हैं उससे कहीं अधिक में

दिखाई देते तुम यासर अराफ़ात

किताब के पहले हिस्से में दुहराव दिखता है और थोड़े समय के बाद कविताएँ प्रेडिक्टेबल हो जाती हैं। विपिन की ये कविताएँ अपनी सजगता से पूर्ण हैं। इनमें इनकी समकालीनता नहीं छूटती। कविता राजनीति के शाश्वत विपक्ष में जिस तरह खड़ी होनी चाहिए उस तरह से भी देखें तो ये कविताएँ मजबूती से खड़ी होती हैं। हरियाणा राज्य कन्या भ्रूण हत्या के लिए कुख्यात है तो इन कविताओं में उसके बिम्ब भी आए हैं। विशेष बात यह कि उसे तय तरीकों से अलग तरीके से कहा गया है । किताब अपनी समकालीन राजनीति के दंगों से होकर भी गुजरती है, निश्चय ही ऐसी कविताएँ कम हैं लेकिन कम में भी बात कह दी गयी है।

विपिन चौधरी की इस किताब से गुजरते हुए एक बात स्पष्ट रूप से कही जा सकती है कि रचनाकार ने जिन विषयों को उठाया है उससे उसकी गंभीर जूझ और सूझ सहज ही दिख जाती है।

(आलोक रंजन केरल में बतौर शिक्षक कार्यरत हैं)

 

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