संस्मरण: बचपन के कैलेंडर से

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आरती तिवारी/

तुम इसे शिकवा समझ के किसलिए घबरा गए,

बाद मुद्दत के जो देखा था तो आँसू आ गए

आरती तिवारी

अक़्सर ये ख्याल मन की गलियों में इधर से उधर हिरण सा कुलाँचे भरता है और मुझे किसी टाइम मशीन में बिठाकर दशकों पहले एक छोटी सी लड़की से मिलवाने ले जाता है. वह लड़की जिसने एक विब वाला  काली चौखड़ी की पैंट और बन्द गले का सफ़ेद कोट पहन रखा है और अपनी छोटी-छोटी आँखों को फाड़ कर जैसे अपना भविष्य मुझमें झाँक रही हो. मैं उससे पूछती हूँ कि क्या मैं फिर से इस कोट-पैंट  के साइज़ में नहीं आ सकती और वो दोहरी होकर हंसते-हंसते एकाएक रोने लगती है.

बचपन को जब भी याद करती हूँ, बरबस ही आँखें गीली हो जाती हैं. बहुत लिखना चाहती हूँ. पर नम आँखें उँगलियों को कमज़ोर कर देती हैं और कलम छूट कर गिर जाती है. मैं यादों के झुरमुट में खोना चाहती हूँ. जी भर के रोना चाहती हूँ. पर कुछ शब्द एक सैलाब से बाँध तोड़ कर बहे चले आते हैं. कितने गड्डमड्ड,गुच्छमगुच्छा होके मुझसे लिपटे से जा रहे हैं, और इनमें से बुला रहा है अखिल ब्रम्हांड में बसा एक महाद्वीप एशिया और इसी एशिया में एक देश, मेरा भारत इसी का ह्रदय मध्यप्रदेश और इस मध्यप्रदेश नाम के ह्रदय में बसी धड़कन. सतपुड़ा की रानी मेरी पचमढ़ी, जिसके भाल धूपगढ़ के शिखर पर रोज़ सुबह सूरज एक सिंदूरी बिंदिया सजा देता है. और जिसका कर्णप्रिय नाद बीफॉल और सहस्त्रधारा के झरनों का मधुर संगीत है. जिनका पानी मेरे अंदर जीवद्रव्य सा मौजूद है.

मेरे साथ दौड़ते हैं वो अमलतास के पेड़ जो पचमढ़ी की सर्पीली सड़कों को एक पार्क एवेन्यू बनाते हैं. इनके सुनहले झूमर देख बस में से कूद-कूद पड़ने को जी चाहता था. जब भी हम मटकुली से आगे बढ़ते, एक नशा सा तारी होने लगता, और जब चेहरे पे पड़ी लटों को ठण्डी हवाएँ हटाकर कपोलों को स्पर्श करतीं, हम बन्द आँखे खोल लेते कि मटकुली से आगे बढ़ रहे हैं. और फिर उनींदी आँखों को यत्नपूर्वक खुला रखते. क्योंकि जैसे ही खतरनाक मोड़ शुरू होते क़ुदरत की बेशकीमती चित्रकारी हर मोड़ से मन को लुभाने लगती, गहरी होती जाती हरीकच्च घाटियाँ और घने जंगल.

सागवान, शीशम, साल और टीक के ये वन सूरज को खूब चिढ़ाते हैं. उसकी बेटी धूप यहाँ खेलने आने से कतराती है.

हमने उत्तरांचल में खड़े पहाड़ देखे पर इतने सघन जंगल कहीं नहीं मिले. पचमढ़ी के सदाबहार वन इतने मोहक हैं अप्सरा विहार या रम्यकुण्ड के रास्ते में वन श्री विहार हो या पत्थरचटा, कहीं भी धूप को जमीन तक पहुँचने में पसीने आ जाते हैं. सागवान, शीशम, साल और टीक के ये वन सूरज को खूब चिढ़ाते हैं. उसकी बेटी धूप यहाँ खेलने आने से कतराती है. ये सब मिलकर उसे अंदर घुसने से रोक देते हैं और वो बेचारी कबड्डी कबड्डी करती इनकी सीमा रेखा के बाहर ही इंतज़ार करती  रहती है, तब कहीं जाकर इनका मन पसीजता है और मुलायम पत्तों की छलनी से जब ये उसे छानते हैं, तो उसके थोड़े बहुत रेशे नीचे बिछी रेत और चमकीले पत्थरों पर गिरते हैं और वो शर्मीली मुस्कुराहट लिए रेत पर पाँव रखती है. मगर इतनी देर में ऊपर से अपने पिता सूरज का इशारा मिलता है, चलो बिटिया घर लौट चलें, संध्या सुंदरी सीढ़ियों से नीचे उतर आई है और वो मासूम मन मारकर चल पड़ती है सूरज की ऊँगली पकड़. जैसे कोई समझदार बच्चा मेले में घूमकर माँ की आँखों का इशारा समझ बिना कोई खिलौना ख़रीदे चुपचाप वापिस लौट जाये.

तो इन हरी घाटियों की सर्द हवाएँ जब सांय सांय करती कानों पर बंधे मफलर से अंदर घुसती और च्यूंटी काट चल देती, कभी गुस्सा कभी प्यार दोनों आता. हम इन्हें जी भर के अपने में समाना भी चाहते और डरते भी कि सर्दी हो गई तो दादी काढ़ा बनाएगी और अम्मा कोई किस्सा सुनाते-सुनाते जाने कब हमें पिला देगी. उन दिनों काढ़ा पीना ज़हर पीने सा ही लगता था. और अब मैं खुद सबको काढ़ा बनाकर पिलाती हूँ. इतिहास सच ही खुद को दोहराता है,शायद कल मेरा बेटा भी यही करे हाँ किसी बदले हुए रूप में. पर कुछ कुछ कमोबेश ऐसे ही. शायद ऐसे वेक्सीन ही आ जाएँ कि बच्चों को कोई बीमारी कभी हो ही न. हमारे डीएनए में से सारी खामियाँ हटा कर ऐसे बच्चों को सिर्फ अच्छा-अच्छा ही सब मिले. सोच कर कुछ अज़ीब सा भी लगता है कि बच्चा पैदा ही हंसते हुए हो. अरे-अरे ये टाइम मशीन लगता है आगे मुड़ गई है, इसे रिवर्स गेयर में डालती हूँ और चलते हैं उस बन्द गले के कोट वाली लड़की के पास आइये–उसी सफ़र में जो पचमढ़ी लिए जा रहा है और ठण्डी हवाएँ कानों पर बंधे वूलन स्कार्फ में से अंदर घुस कर सर्दी को अंदर ठेल चुकी हैं.

तो इस सफर में सर्दी साथ हो ली. अब क्या हो सकता था, हो ली, तो हो ली. चलते-चलते घर पहुँची. नाक जो कि मुखमण्डल का एक ऐसा अंग थी, जो मुझे थोड़ी बहुत सुन्दरता से उपकृत करती थी, लगातार पानी बहने से बार-बार रुमाल से पौंछे जाने से फूलकर कुप्पा हो गई थी. और लाल चट्ट तो इतनी कि सुर्ख गुलाब भी उसके आगे पानी भरे. आँखों से लगातार आंसू निकल रहे थे. इसकी वजहें दो थीं, एक तो सर्दी के कारण नाक बन्द थी साँस लेने में दिक्क़त हो रही थी. दूसरे कि बार-बार ये बुरा ख़्याल मन को दबोच रहा था कि एक नाक ही तो है चेहरे में जो मुझे सुंदर दिखाती है. न तो भैया जैसी बड़ी बड़ी आँखें हैं न उजली केसरिया रंगत. हे भगवान! मेरी तो नाक भी अब मोटी हो गई. मन का दुःख कहूँ तो किससे?  बस आँखें थीं कि बरसती ही जा रही थीं, कि मेरे चाचा ने मुझे बार-बार काँच उठा कर देखते जान लिया कि सर्दी ही नहीं कुछ और भी है. गुड्डन… इधर आओ, मेरे पास. और मैं दौड़कर उनसे लिपट ज़ोर ज़ोर से रोने लगी. उन्होंने थोड़ी देर मेरे सर पर हाथ फिराया फिर बोले क्या हुआ बिट्टो रानी? मुझे सही बात बताओ. मैंने सुबक-सुबक कर कहा मेरी नाक मोटी हो गई अब ऐसे ही रहेगी, कूका(मेरी एक सहेली का घर का नाम कूका था) मुझे चिढ़ायेगी कि अब तो तेरी नाक भी मोटी हो गई अब तो तू बिलकुल अच्छी नहीं लगेगी.

मेरी बात सुनकर उनको पहले तो हंसी आई फिर मुझे थपकियाँ देकर कहा, ऐसा बिलकुल नहीं होगा सुबह तक नाक एकदम सही हो जायेगी. अभी अपन जिस बस से आये हैं न, सर्दी को उसमें ही बिठाकर भेज देंगे वापिस. चलो, अब सो जाओ. कल तुम्हारे लिए नन्दन, पराग मंगवाए हैं. घर में रहकर पढ़ना दो दिनों की स्कूल की छुट्टी. मैंने कहा मुझे नींद नहीं आ रही. उन्होंने कहा चलो तुम्हारी नींद को बुलाते हैं. देखो अभी 6 बजे की बस में बैठकर वो पिपरिया से चल पड़ी है और 4 नम्बर की सीट पर सिकुड़ कर बैठी है. खिड़की में से हवा को अंदर नहीं आने दे रही. देखो अब अपने पास बैठे लड़के से कम्बल मांग कर ओढ़ कर बैठ गई है. और… ये आ गया मटकुली. मुझे बड़ा मज़ा आ रहा था. आज चाचा बिलकुल अलग अंदाज में एक कहानी सुना रहे थे. मैं रोना और सर्दी भूल कहानी में खो सी गई थी. देखो हॉर्न बजा सिँगानामा वाले उतरो ज़ल्दी ज़ल्दी! तुम्हारी नींद ड्राइवर से कह रही है, ज़ल्दी चलो भैया मोहे पंडितजी के घरे जाने है, मोड़ी मेरे लाने जग रई है. गाड़ी की स्पीड बढ़ गई है. लो पगारा आ गया. अरे ये क्या?  कम्बल वाले लड़के ने उससे अपना कम्बल छीन लिया. बेचारी ठिठुर रही है. कोई नहीं ये आया बारीआम और लो पहुँच गई पचमढ़ी. अरे पर ये तो थक गई है. बस से उतर कर इससे चला ही नहीं जा रहा. हाँ याद आया, गोमती वहीँ तो खड़ी है.

उन दिनों पचमढ़ी की एकमात्र और महिला कुली के रूप में गोमती बड़ी ख्यात थी. ऊंचे पूरे क़द की और हट्टी-कट्टी  गोमती बस स्टेण्ड पर भोपाल से पचमढ़ी आने वाली इस बस के आने के समय हमेशा ही उपलब्ध रहती थी. ये ही वो बस थी, जिसमें लोग भारी सामान जिसमें कपडे और बर्तनों के अलावा कोई इलेक्ट्रॉनिक आइटम भी हुआ करते थे जो उन दिनों एक लग्ज़री थे. खासकर बड़ा रेडियो या ग्रामोफोन वगैरह. लोग ये सब अक्सर ले आते थे और गोमती ही उनके सामान पीठ और सर पर लाद कर उन्हें घर तक छोड़ने जाया करती थी. और लोग बेचारी गोमती को चवन्नी, अठन्नी और बहुत हुआ तो रुपया, दो रुपया दे दिया करते थे.

तो उसी गोमती ने मेरी निंदिया रानी को झट से अपनी पीठ पर उठा लिया. और चल पड़ी पंडितजी के घर की तरफ. ये लो आ गई, आ गई मेरी गुड्डन की नींद और गुड्डन नींद की गिरफ्त में जा सर्दी, नाक और दर्द सब भूल आराम से सो जाती. कल के सुनहरे सूरज को देखने के लिए और देखती परियों के सपने उड़ने वाले घोड़े पर बैठा राजकुमार और टाफियों के पेड़,  शरबतों की नदियाँ मखमली दूब के गलीचे और उन पर दौड़ता लोटपोट होता बचपन.

आज के बचपन को ये दुलार ये लाड़ मुहैया नहीं है रिश्तों के दायरे एकल परिवार ने बहुत छोटे कर दिए. बच्चे अपने पेरेंट्स के अलावा हर रिश्ते से एक दूरी बनाकर रखते हैं,और बच्चों के साथ रिश्तों के कलुष जो छल व्यवहार करते नज़र आते हैं कदाचित उनका ऐसे सुरक्षित दूरी बना कर रखना अनुचित भी कैसे कहा जा सकता है? हम खुद ही डरे हुए हैं. भरोसा शब्द ही कब दगा कर बैठे कोई नहीं जानता. अतीत की इबारत वर्तमान की किताब में शायद अपने मूल्यवान अर्थ खोने लगी है, पर कहीं कुछ बचा भी है जो हमें सुकून देता है और गर्व भी.

दास्ताँ यहाँ से शुरू होती है. चाचा, बचपन और गुड्डन. चाचा वो पहले शख़्स थे जिन्होंने मुझे मेरे बचपन को इतना संवारा दुलारा कि आज गर्व होता है कि वो ख़ूबसूरत पल जो बचपन की माला में बीच-बीच में जड़े नगीने थे, अपने चाचा की बदौलत मुझे और मेरे भाई को हासिल हुए थे. चाचा उन दिनों स्थाई रोज़गार की तलाश में थे. और नौकरियों के लिए आवेदन भेजते हुए एक ऑफिस में ही दैनिक वेतन भोगी की तरह काम करते थे. एक बाँका नौजवान जिस तरह से उन दिनों हुआ करता होगा वे सारी खूबियाँ उनमें थीं. मतलब वे अपने समय को भरपूर जी रहे थे.उन्हें जासूसी उपन्यास पढ़ने का शौक था और उस दौर में वे सुरेंद्रमोहन पाठक, वेदप्रकाश काम्बोज, कर्नल रंजीत, कुशवाहा कान्त इन सबके अलावा शिवानी, प्रेमचंद, विमल मित्र, शरतचंद्र, धर्मवीर भारती के उपन्यास भी पढ़ते थे.

हमारे लिए नन्दन, पराग, चन्दामामा जैसी बाल पत्रिकाएँ मंगवाते जो पिपरिया से आती थीं . वे जो उपन्यास पढ़ते, अम्मा भी पढ़ लिया करती थीं किन्तु मेरी बाल बुद्धि को इतनी समझ तब भी थी कि अम्मा शिवानी, ऊषा प्रियंवदा, प्रेमचंद को पढ़तीं थीं वे जासूसी उपन्यास कभी भी नहीं पढ़ती थीं.

मेरी दादी पढ़ी लिखी नहीं थीं. अम्मा उन्हें धार्मिक पुस्तकों से कुछ-कुछ पढ़कर सुनाती रहतीं थीं जिसमें मेरी रूचि बिलकुल नहीं थी इसीलिए मुझे उन पुस्तकों के नाम भी याद नहीं रहे. कितनी अजीब बात है कि चाचा ने एक बार भूतनाथ और चन्द्रकान्ता संतति मंगवाई थी. और पड़ोस की रमा चाची, पास ही एक घर छोड़कर रहने वाली कृष्णा मौसी की छोटी बहन गीता जिज्जी, मेरी अम्मा सब ने देवकीनन्दन खत्री की वो किताब बहुत से काम मुल्तवी करके भी पढ़ी थी. जो मुझे याद है. बाद में एक बार और वो किताब घर में आई तब तक हम दोनों भाई-बहन थोड़े बड़े हो गए थे और हमने भी पढ़ी थी. भूतनाथ, रोहतासमठ का किला और चन्द्रकान्ता संतति भी जो मुझे कभी नहीं भूली.

मुझे कमलिनी बहुत अच्छी लगती थी, जो अपने किसी भी प्रियजन के मुसीबत में होने पर ऐसे प्रकट हो जाती जैसे बादलों को चीर के सूरज की किरणे अँधेरे को भगा देती हैं. मैं सोचती थी कि बड़ी होकर मैं भी कमलिनी बन जाऊंगी और बचपन की लालटेन को ट्यूबलाइट की रोशनी में बदल दूँगी. खैर, मेरे चाचा तो मुझे कमलिनी नहीं सरस्वती बनाना चाहते थे. वे उन बेरोज़गारी के दिनों में भी अपनी अस्थायी नौकरी से जितना भी कमाते, हमारे ऊपर खर्चते थे. पिपरिया से हम भाई बहन के लिए फेशनेबल परिधान मंहगे जूते और अच्छी पुस्तकें लाते. और बेचारे हर बार पितु यानि मेरे पिता और अपने बड़े भाई से डांट खाते. पितु कहते हम साधारण लोग हैं तो हमारे बच्चों को भी ऐसे ही रहना चाहिए. हमें इनकी आदतें नहीं बिगाड़नी चाहिए और तुम ये पैसे बचाओ कल काम आयेंगे. पर वे नहीं मानते थे. आज भी ऐसे चाचा होंगे पर उँगलियों पर गिने जा सकने वाले. वरना तो ये किताबों के वर्कों में दफ़्न यादें ही हैं खैर!

दादी और अम्मा भी कहतीं कि अपन किराये के घर में रहते हैं. कल आपकी शादी भी करनी है ये पैसा बचेगा तो काम आएगा. वे सबकी बात सर झुका कर सुन लेते पर करते अपने मन की थे. हम इतने समर्थ नहीं थे कि ऐशो-आराम से जीवनयापन करें. पर इतने खुश थे कि ऐशो-आराम हमारे सुख के सामने पानी भरते थे. ऐसे ही एक दिन शाम को हमारे घर मेहमान आये. अम्मा के साथ ही पड़ोस की रमा चाची और गीता जिज्जी भी रसोई में भिड़ी थीं और दादी और पितु उनके साथ बाहर बैठे थे. हमें कौतुहल तो था क्योंकि इससे पहले जो भी मेहमान आये थे. वे हमारे कोई न कोई रिश्तेदार या हमारे गाँव के या नाना, मामा के परिवार के लोग हुआ करते थे. ये कैसे मेहमान थे जिन्हें मैं नहीं जानती थी.

भाई तो अंदर रसोई में माँ के पास चला गया पर मैं उनके बीच ही डटी रही. दौड़-दौड़ कर चाय पानी लाती रही. जिज्ञासा मुझसे दो कदम आगे खड़ी थी कि आखिर कौन लोग हैं ये और क्यों आये हैं. इतने में चाचा भी घर आ गए. सबको भोजन कराया गया. फिर उन लोगों ने चाचा को पटले पर बिठाया तिलक निकाला और ग्यारह रूपये दिए. मुझे और भाई को भी पांच-पांच रूपये मिले. अब समझ आया अरे मेरे चाचा की तो बात पक्की हो गई थी. बसन्तपंचमी का लगन भी निकल आया था. चाची भी दसवीं पास थीं, नाम था रुक्मणी. उन्होंने सुन रखा था कि मेरे चाचा रामलीला में राम बनकर शिव धनुष तोड़ते थे. बस उन्होंने अपने जागीरदार पिता से इतना ही कहा था कि पचमढ़ी की बारात जब आये तो स्टेज पर शिव धनुष हो. मैं भी तो देखूं ये राम अभी तक कैसे धनुष तोड़ते आये हैं, जब धनुष तोड़ेंगे तब ही मैं जयमाला डालूंगी.

उई माँ! जिसने भी सुना दांतों तले ऊँगली दबा ली. सत्तर के दशक में लड़कियाँ इतनी बिंदास नहीं हुआ करती थीं. पर उनकी तो ये ज़िद थी. वे बनखेड़ी के प्रतिष्ठित परिवार के ज्येष्ठ पुत्र अम्बिका प्रसाद चतुर्वेदी की एकमात्र और लाड़ली पुत्री थीं. उनके दादा जो उस ज़माने के प्रसिद्द ज्योतिषी थे उनकी आँखों का तारा थीं. मेरे दो बड़े ताऊजी भी थे जो कभी कभार आते रहते थे. उनको थोडा गुस्सा आया और उस समय की पचमढ़ी में ये खबर, जंगल की आग की तरह फ़ैल गई कि पंडितजी का छोटा भाई राम, शिव धनुष तोड़ कर ही जयमाला डलवा सकेगा.

मेरे लिए तो ये गर्व की बात थी क्योंकि अपनी अम्मा को भी मैंने एक प्रगतिशील सोच वाली आधुनिक स्त्री के रूप में ही देखा था और अब चाची भी इतनी बेबाक जो खुलकर अपनी शर्त रख रही हैं. मैंने तो अपनी सब सहेलियों से कह दिया था मेरी चाची का स्वयंवर हो रहा है. उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ पर हम खूब खुश थे. क्योंकि मुझे तो पता था, मेरे चाचा बड़े आराम से शिव धनुष तोड़ देंगे. उस नई नवेली चाची को देखने, उनसे बात करने और उनको ये बताने के लिए कि मेरे चाचा के लिए ये बांये हाथ का खेल है. तुम रुक्मणी हो तो मेरे चाचा भी राम हैं. हरण नहीं वरण करेंगे. हम भृगुवंशी हैं. बताने के लिए मैं उतावली थी.

खूब सनसनी फ़ैल गई थी. सबको बसंत पंचमी की प्रतीक्षा थी. चाचा बिलकुल निश्चिन्त थे. घर में उत्सव का माहौल था इसी रंग में सब रंगे थे. घर मेहमानों से भर गया था. मेरी बुआयें चाची को लेकर खूब बातें करतीं. ढोलक की थाप में उनके उलाहने बिला जाते. गीतों में खूब छेड़छाड़ होती और हल्दी में सब रच जाते. पीतवसना रोचन रचे चाचा बहुत ख़ूबसूरत लगते. कोई चिट्ठी फोन उन दिनों होता नहीं था. बस दिल को दिल से राह होती थी जिसे ये विवाह गीत प्रतीक्षा के सुख को चरम तक पहुंचाते थे. हरे आम्र पत्तों से बना मण्डप जिसे फूफा, जीजा, बहनोई बनाते थे. लकड़ी की हल्दी पुती पीढ़ियाँ जिन्हें बहन बेटियाँ हल्दी से रचतीं, बीच मण्डप में महावर से रचा खाम जिसे जीजा से गड़वाया जाता और पीढ़ी पर बिठा कर दूल्हे को हल्दी तेल चढ़ाया जाता. जो बहन तेल चढ़ाती उसके भाई का नाम भी लिया जाता. मैं भी अपने छोटे-छोटे हाथों से तेल छुआ कर चाचा के सर कन्धे कोहनी पैर पर लगाती और सब गातीं, गुड्डन बाई तेल चढ़ाये टूटू भैया बेंदुलियें. मतलब गुड्डन जो तेल चढ़ा रही है उसका भैया टूटू है और वो उसके घर भात भरने आएगा.

सच कितना आनन्द था विवाह के इस उत्सव का उसका एक प्रतिशत ही इन शब्दों ने छुआ होगा. बहन के घर भात भरने का अर्थ, भाई की अर्थव्यवस्था का डांवाडोल हो जाना. उस समय जानती नहीं थी पर जब इस आत्मीयता भरी रस्म को एक धूर्त दांव की तरह देखा तो मन ही मन ये संकल्प पता नहीं कब ले लिया था कि अपने भाई को इस पारम्परिक कुरीति की हांडी में किसी को राँधने नहीं दूँगी. अपने इस निर्णय से अपने ससुराल के परिवार को जब अवगत कराया तो सबके मुँह फूल गए थे. पर मैंने तो तय कर लिया है कि ये थोथा आडम्बर है. हमें एक दूसरे के स्नेह सम्बल की ज़रूरत आज भी है और हमेशा रहेगी पर इस खोखली रस्म को मैं नहीं अपनाऊंगी.

खैर, बसन्त पंचमी के दिन पचमढ़ी की बारात बनखेड़ी के जनवासे में थी. द्वारचार मिलनी की रस्मों में मुझे अपने पिता का सम्मान होना बहुत अच्छा लगा. उन्होंने अपने पिता को मात्र पाँच वर्ष की आयु में ही खो दिया था और मेरे दादाजी पंडित गोकुलप्रसाद आचार्य की मृत्यु के सवा महीने के बाद मेरे चाचा रामस्नेही का जन्म हुआ था. मेरी चार बुआयें थीं और उनसे भी बड़े दो ताऊजी जो सब मेरे पितु से उम्र में इतने बड़े थे कि उनके बच्चे मेरी माँ और चाचा के हमउम्र थे. बुआओं के विवाह बहुत पहले हो चुके थे. दोनों में से एक ताऊजी सपरिवार जबलपुर में तो एक सागर में बस गए थे. मेरी दादी और मेरे चाचा दोनों को ही मेरे पितु से अगाध स्नेह था. उन्होंने कठोर परिश्रम करके अपने आपको स्थापित किया था.

गाँव सहलवाड़ा छोड़ने के पश्चात् वे संस्कृत पढ़ने काशी हिन्दू विश्वविद्यालय पढ़ने चले गए थे. उनकी पढ़ाई में सहायता उनके मामा के परिवार ने की थी जो कि हमारे पैतृक गाँव सहलवाड़ा के पास ही था. वहाँ से लौटकर वे अपनी माँ और भाई को अपने साथ लेकर पचमढ़ी आ गए थे. दिन-रात मेहनत करते (लोक स्वास्थ यांत्रिकी विभाग में उनकी नियुक्ति ऑपरेटर के पद पर हो गई थी) कर्मकांड और पुरोहिती का काम भी करते, ताकि अपने छोटे भाई को पढ़ा सकें. गाँव की खेती और घर मकान दोनों ताऊजी के अधीन थे. वे कब आते खेत कौली(बटाई)पे दे जाते कभी पता ही नहीं चलता था. जितना जो कुछ था गाँव में वो दादी और पितु का नहीं रहा था. उन्हें कोई दिलचस्पी भी नहीं थी वे कर्मवीर थे. और उस आड़े समय में भी उन्होंने किसी के आगे हाथ नहीं पसारे. उनकी खुद्दारी उनकी सबसे बड़ी नेमत थी और उन तीनों के बीच भावनात्मक जुड़ाव की अनमोल दौलत थी. इसीलिए इतने कष्ट उठाकर भी सम्मान से जीने वाले मेरे पितु का सम्मान होते देख उस छोटी सी उम्र में भी मैं इतनी भावुक हो गई थी.

अपने चाचा को दूल्हा बने घोड़ी पर बैठे देख मुझे कितनी ख़ुशी हुई थी व्यक्त करना मुश्किल और भैया उनके आगे बैठा एक प्यारा गुड्डा लग रहा था. बारात का स्वागत बहुत धूमधाम से हुआ और हम सब करीब आधा किलोमीटर नाचते हुए चाची के दरवाजे पर पहुंचे थे. स्टेज पर दूल्हा दुल्हन की सजी हुई कुर्सियों के सामने एक तरफ़ रखा था शिव धनुष. चाचा ने एक बार पितु की तरफ देखा और उनकी आँख का इशारा पा अपने मौसेरे भाइयों के साथ स्टेज पर चढ़ गए. मेरे भाई की  ऊँगली पकड़ मैं पितु के साथ स्टेज के बिलकुल सामने खड़ी थी. हमारे पीछे सब उत्सुकता और उत्तेजना से भरे शिवधनुष को देख रहे थे. चाची के परिवार की लड़कियाँ उन्हें लेकर आ रही थीं. उनके हाथ में जयमाला थी और आँखों में एक भरोसा.

 

मैं उन्हें लगातार देखे जा रही थी.अचानक मुझे लगा वो सामने देख रही हैं और मेरे चाचा से जैसे ही उनकी नज़रें मिलीं दोनों के अधरों पर एक सलज्ज मुस्कान मैंने देखी. चाची बहुत सुंदर लग रहीं थीं अचानक चाचा ने धनुष उठा लिया और स्टेज पर तालियाँ बजने लगीं. मैंने टकटकी सिर्फ चाचा की तरफ लगा दी थी.  उन्होंने दोनों हाथों से खींच कर धनुष तोड़ दिया और चाची ने स्टेज पर चढ़कर जयमाला उनके गले में डाल दी. चाचा ने भी उन्हें माला पहनाई. स्वस्तिवाचन के बीच फिर सबने दोनों को आशीर्वाद दिया. रात में फेरों के वक़्त हम तो जनवासे में सो गए थे. फिर जब सुबह उठे तो विदाई हो रही थी. चाची अपने परिवार के सब लोगों से गले लगकर फूट-फूटकर रो रही थीं. मेरा मन उदास हो गया. मैंने पितु की तरफ देखा उनकी आँखें गीली थीं और वे सबकी नज़रें बचा कर मुझे ही देख रहे थे. फिर उन्होंने जाने किन ख्यालों मेरे सर पर हाथ फेरा और मुझे गोद में उठा कर बस में बिठा दिया. हम चाची को लेकर घर आ गए थे. खूब चहल पहल हो रही थी, सब इधर से उधर हो रहे थे, ढोल बज रहे थे, और शुरू हो रही थी एक नई ज़िन्दगी, मुझे चाचा की शादी की पत्रिका में छपी वो चौपाई याद आ गई.

कुँअर-कुँअरि कल भांवर लेंही नयन लाभ सब सादर लेंहि

जब तक गंग जमुन में धारा अचल रहे अहिवात तुम्हारा

मुझे नीड़ में एक नए पंछी का स्वागत करना बहुत अच्छा लगा. चाचा के नवजीवन की ये एक बहुत अच्छी शुरुआत थी. आज इतनी मंहगी शादियों में पानी की तरह बहता पैसा, सुविधा और आराम तो उपलब्ध करवा देता है पर सुख और आत्मीयता को नदारद पा उत्सव के रंग फीके पड़ जाते हैं. संस्कृति को निकट से देखने-जानने के अवसर कम होते जा रहे हैं और मेजबान भी चाहते हैं कि मेहमान तुरन्त विदा हो जाएँ. समय कम पड़ने लगा है हमारे सोशल रिलेशन भी व्यवसायिक होते जा रहे हैं. आनंद के पल मिलना या पाना मुश्किल होता जा रहा है. आलीशान मैरिज गार्डन की कितनी ही शादियाँ अटेंड करते मुझे हर बार अपने चाचा की शादी याद आ जाती है. उसमें भी एक आधुनिक दुल्हन थी जबकि वो एक परम्परागत शादी थी, पर कितना आनन्द था. दुल्हन की महीने भर बाद पगफेरे की रस्म तक मेहमान घर में थे, जिन्हें ससम्मान विदा किया गया पर न ही कोई मंहगे उपहारों का लेन देन था न प्रदर्शन न अन्न की बर्बादी. सैंकड़ों व्यंजन नहीं थे पर घर में महीने भर रहे मेहमान मनुहार करके जिमाये जाते.

और हाँ, ये बताना कहीं भूल न जाऊँ वो बन्द गले के कोट और काली चौखड़ी के पेंट वाली लड़की जो थी न उसने बड़ी ख़ूबसूरत लाल फ्रॉक पहनी थी बनखेड़ी में बारात में. उसके चाचा पिपरिया से लेकर आये थे अपनी गुड्डन के लिए. उस फ्रॉक को, उस स्वयंवर को, पचमढ़ी की वादियों ने अपने सदाबहार वनों में संजो रखा है. उस संस्कृति की महक आज भी गाये जाने वाले वैवाहिक लोक गीतों में सुरक्षित है.

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(आरती तिवारी की शुरूआती शिक्षा-दीक्षा पचमढ़ी और बाद की शिक्षा डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय, सागर से हुई है. आजकल इनकी रहनवारी मध्य प्रदेश के ही मंदसौर में है. इनकी कवितायें और संस्मरण कई ऑनलाइन पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं .)

2 COMMENTS

  1. सराहनीय संस्मरण आरती जी। ऐसे ही लिखते रहिये। सौतुक का आभार की हमें भी इससे गुजरने का मौका मिला।

  2. आरती, ये बचपन की यादे पढ़कर एक अद्भुत सुख मिला।हम यू ही जिंदगी को कोसते रहते है क्योंकि हमारे पास तुम्हारी तरह एक अंतर्मुख नही है ।प्रत्येक पल को जीना कोइ तुमसे सीखे अभावो में भी एक रईसी ।जो तुमने देखी।अपने चाचा के प्रति अगाध प्रेम श्रद्धा ।आज की पीढ़ी तुम्हारे इस लेख से कुछ प्रेरणा ले।बस यही चाहती हु।तुम किसी दिव्य पवित्र दो आत्माओ के वीर्य से जन्मी एक चरित्रवान विदुषी हो।तुम्हारी लेखनी को सलूट करती हूं।

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