कुलपतित कथा

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आनन्द पाण्डेय/

आनन्द पाण्डेय राजनीति विज्ञान मे डाक्टरेट हैं और अध्यापन इनका पेशा। इनकी पुस्तक ‘भारतीय कम्युनिस्ट आन्दोलन और मुसलमान’ 2016 मे प्रकाशित हुई। पंद्रह से अधिक वर्षो से रूपान्तर नाटय मंच से जुड़ाव। आप समयान्तर, फिलहाल, दस्तक  जैसी पत्रिकाओं मे नियमित लेखन करते रहे हैं। इसके अतिरिक्त लेखक की व्यंग रचनाएं हिन्दुस्तान तथा राष्ट्रीय सहारा जैसे दैनिक अखबारों में भी प्रकाशित हो चुकी हैं। आप गोरखपुर में रहते हैं और आपसे  9451512113 पर संपर्क किया जा सकता है।

भाग एक

कुलपति चार तरह के होते है। चर्चित, परिचित, लज्जित और मूर्छित। एक अपवाद केटेगरी है। मौनी।

यह विश्वविद्यालय (विवि) को ऐसे ही  चालते है जैसे दीमक। उपर वाले चारो काम की चर्चा मे तीन साल  बीता देते है। मौनी सबसे कम बात करता है। सबसे कम दावे करता है। सबसे कम अनुशासन थोपना है। उससे सब खुश  रहते है ।

उसका कार्यकाल पूरा होने के बाद  पता चलता है कि अब यह विश्वविद्यालय चलने लायक नही है।

भाग  दो

नया कुलपति चार्ज लेते हुए

नया-कितना बचा है?

पुराना-बहुत

नया-साले बहुत ईमानदार बनते हो

पुराना-ही ही ही अब गुरू तुमसे क्या छिपा?

नया-गुरू क्यो बे?

पुराना- मेरी एक्टेंशन रोक, तुम आ गये। सो गुरू हुए न?

नया-ही ही ही

पुराना-आता रहूगा

नया-बुलाता रहूगा।

ही ही ही (समवेत)

भाग -तीन

आ गये बेटा।

हा पापा।

आज क्या रहा?

ठीक ही था।

पापा आपने मुझे भी कुलपति क्यो बनवाया? बवाल ज्यादे है उस हिसाब से आमदनी कम है?

बकलोल। और किस लायक हो। चुतिया थे इसलिए सिविल सेवा मे नही जा पाये। प्रोफेसर बने और प्रोफेसर बनकर कुलपति न बन पाये। ऐसा चुतियापा मैं दुबारा नही होने देता।

हा पापा। सब ठीक है लेकिन सीधे की एक्टिग करते करते मुह  टेडा हो गया है।

ही ही ही(समवेत)

भाग चार

बधाई हो सर आप कुलपति बन गये।

हा हा हा। धन्यवाद धन्यवाद।

सर फलाने बन गये थे उसके बाद से ही आपके लिए बुरा लग रहा था। बताईये वो दो दिन का आदमी। न ठीक से लिख सकता है न बोल सकता है। बहुत देर बोलने को कहा जाये तो दस पंद्रह मिनट बाद मुह से गाली छूटने लगती है। वह कुलपति हो गया और आप रह गये थे। बहुत दुख होता था।

हा हा हा। सब भाग्य का खेल है। और हा कुछ सेटिग भी है।

हां सर। बिना भाग्य और सेटिग के किसी के कहा कुछ होता है? भाग्य से ही सेटिग होती है। वरना देखिए सर आपको ही कौन पूछ रहा था?

नही मेरी तो प्रतिभा है इस पद लायक।

जी आपकी प्रतिभा अभी टीवी पर आ रही है। कह रही है प्रदेश मे भाई भतीजावाद और भ्रष्टाचार होने नही दिया जायेगा। रामराज्य आ चुका है।

ही ही ही(समवेत)

भाग -पांच

वो लड़का गांव से आया। विश्वविद्यालय जहां उसकी फीस जमा थी उसे छोड़कर वह केवल किताबो के महाकवियो और विचारको को जानता था। लेकिन उसपर जीते जागते वेतनभोगी अध्यापको की नजर थी। वह उसे भोगना चाहते थे जैसा कि उसके पहले कई को भोगा था जिनकी अकादमिक लाशे परिसर मे यहा वहा बिखरी पड़ी थी।

प्रोफेसरो ने लड़के को विश्वास दिलाया कि वे केवल अध्यापक नही है विद्वान भी है। और वही विषय की सूनी मांग भरते है। विषय उनके न रहने पर विधवा हो जायेगी। लड़के ने विश्वास किया जैसे की पहले के लोगो ने किया था। अब अध्यापकगण निश्चित थे कि यह पांच साल सुखपूर्वक बीतेगा। वह अध्यापक उतना बड़ा माना गया है जिसके हरम मे जितने विद्यार्थी/शोधार्थी रहे है।

अध्यापक  उसको विश्वास दिलाता गया कि तुम विषय के भविष्य हो और तुम्हारे बिना परिसर श्मशान होगा। समय बीतता गया और वो लाश बनता गया।

अचानक विश्वविद्यालय मे अध्यापक की पोस्ट आई। मरणासन्न लड़के लड़कियां खिल उठे। वे भागे उस अध्यापक की ओर। वह अध्यापक भोर मे ही कुलपति के बंगले पर बैठा राग प्रशस्ति गाता पकड़ा गया।

शिष्य- गुरूवर अब गुरू के कर्तव्य का समय है।

गुरू- गुरू का कोई कर्तव्य नही होता।

शिष्य- आखिर पद खाली तो नही रहेगा।

गुरू- हां नही रहेगा उसपर मेरा लड़का बैठेगा।

शिष्य- मैं कुलपति से शिकायत करूंगा।

गुरू- वो किसी के लड़के होने के नाते ही कुलपति है।

शिष्य- आएएएए

भाग छह

विश्वविद्यालय मे एक रात गुजरे जमाने के शिक्षको के भूत घूमते भटकते आ पहुंचे। देखा यूनिवर्सिटी बदल गयी है। वे बहुत खुश हुए । बोले अब यहा बहुत चहल-पहल है। समाज मे जो प्रसिद्धी और मान्यता हम  नही दिलवा सके। वो काम आज की पीढ़ी ने कर दिया।

भूत ने बूढों का रूप धरा और उस भीड मे पहुंचे जहां बहुत गहमागहमी  थी।

समाजशास्त्र के  मरे प्रोफेसर के भूत ने पूछा, “ये लोग कैसे है? क्या एम एल श्रीनिवासन के किसी संकल्पना पर बहस हो रही है।”

“नही ये शहर के माफिया लोग है अपने बीच के एक आदमी को प्रोफेसर पद पर ज्वॉइन कराने आये है।” किसी ने धीरे से कहा ।

भूत “कितना बढिया जमाना है माफियाओ तक  शिक्षा की लहर पहुँच रही है। वैसे ये किस क्षेत्र के माफिया है?

“जी शराब के। इनका कहना है कि शिक्षा भी एक नशा है इसलिए विश्व विद्यालय मे भी टेंडर डाल दिया। अब टेंडर निकल गया है।

बाकी भूत प्रोफेसरो मे से एक “यह तो शिक्षा के गिरते स्तर  का प्रतीक है। इनकी नियुक्ति कौन कर रहा है?”

उस अन्जान से आदमी ने कहा “चाचा उन मरे हुए  प्रोफेसरो के पुत्र  पुत्रियो ने। जिनकी नियुक्ति सब बुद्धि  और विचार रखते प्रोफेसर लोग कर गये थे। वे द्रोणाचार्य  थे और अश्वत्थामा को  अबकी बार  दूध के लिए तड़पता नही देखना चाहते थे।“

यह सुनकर सारे भूत एडी बिल्डिंग के पीछे  फिर  इकठ्ठा हुये और बिना कुछ  बोले चलते  बने।

भाग- सात

किसी जमाने मे कंचनपुर नामक शहर मे एक विश्वविद्यालय खुला। राजा था सो चाटुकारिता पसन्द था। विवेकवान राजा घर की लड़ाई मे ही मारा जाता है। राजा ने परिचय के ऋषियो को प्रोफेसर बनाया। और हिदायद दी कि भूले से भी विश्वविद्यालय मे ऐसे ऋषि प्रवेश न पाये जो भोर मे न उठते हो। ऋषि चौके। एक ने संकोच मे पूछा “महाज्ञानी राजन यह भोर मे उठने से आदमी लायल यानि स्वाभिभक्त कैसे बनता है?”

राजन- जैसे कुत्ता बनता है। यदि ऋषि भोर मे उठता है तो इसका मतलब वो रात मे पढ़ता नही है। रात मे पढ़ता तो भोर मे कैसे उठता। दिन मे ऋषि राजा के यहाँ और शाम को कुलपति के बगले पर होता है तो दिन मे पढ़ने का प्रश्न कहा है?  कुत्ता भी भोर मे उठता है। वो कभी नही पढ़ता लेकिन स्वामिभक्त होता है।

ऋषिगण बाग बाग हो जाने का दिखावा करते हुए सोचने लगे- बुद्धिमान राजा के समय चाटुकारो की जान हथेली पर होती है।

फिर भी वो जयजयकार करने लगे। वरिष्ठ मुहलगू ने कहा “राजन आप को राय देना सूरज को दिये दिखाने के समान है। लेकिन अगर आप साजिशन सीधा रहने वाला कुलपति दे दे और हेड को नियुक्ति का अधिकार तो मजाल है विश्वविद्यालय से कोई प्रतिभा निकले। हर विश्वविद्यालय की डिग्री को दो कौड़ी का बना देंगे। लोगबाग पीएचडी पर दालमोट खायेंगे।

राजा को खुश होना था सो हुआ।

वह आदेश पर साईन करके प्रजा को हड्काने चला गया कि मेरे राज्य मे अधिकारी सुधर जाये और अपराधी प्रदेश छोड दे।

ऋषि गण गर्मियो की छुट्टियो पर सपरिवार घूमने गये।

विश्वविद्यालय मे लू चल रही है। पेड़ पौधे झूलस गये और एक चौकीदार ने कहा “जुलाई से हो हो शुरू होई। अभी शान्ति है। उल्लू बोलत हवे अभईन।“

भाग -आठ

वे जब कुलपति बनकर आये तो लोग ही नही देवलोक भी भौचच्का रह गया।

मां सरस्वती की मूर्ति जिनकी छाया मात्र से कांपती थी वह माल्यार्पण की स्थिति मे थे।

सरस्वती को कनखनी से देखते हुए लक्ष्मी उल्लू को सहलाते हुए बोली और कितनी बार हारोगी?

तुमको हराते हराते मै बोर हो गयी हूं।

सरस्वती बोली “मै विद्या की देवी हूं लोग डिग्री की समझ लेते है। जैसे हनुमान को पुलिस वालो ने हड़प लिया है वैसे मुझे विद्यालय का धन्धा करने वालो ने। ज्ञान पंचर वाला भी दे सकता है। स्पिनोजा शीशा ढालते थे और जेम्स  मिल क्लर्क थे। कार्ल मार्क्स को विवि मे पढ़ाने के लिये योग्य नही पाया गया और विश्व मे सबसे अधिक पीएचडी मार्क्सवाद पर हुई है। उतनी ईश्वर पर भी नही है।”

लक्ष्मी बोली- फर्जी बात मत करो। जिसका नाम लिफाफे पर होता है। वही सिकन्दर है। प्रोफेसर या कुलपति चाहे जैसे हो आलोचना करने वाला भी इज्जत देता है। देखो इसको लिखने वाले को कितनी कम लाईक मिलती है। ही ही ही।

(इस मीठी झड़प के बीच एक शोर सुनाई देता है)

ये शोर कैसा है?

वो रामलोटवा जा रहा है। अरे वही कुलपतिया।

भाग- नौ

मै बिना बताये उनके बंगले पर जा पहुंचा। वे गरूण पुराण सुन रहे थे। मैने कहा, ये कब हुआ? कौन गया। क्या वो पिताजी जिन्होने आपको कुलपति बनवाया या वो पिता जो आपकी काया को इस मृत्यु लोक पर ले लाये थे।

वे बोले “वे दोनो सहित सभी दस बारह बाप सलामत है। दरअसल विश्वविद्यालय मे चयनप्रक्रिया पूरी हो गयी। सोचा अब गरूण पुराण सुन लूं।”

मैने कहा “तब अधूरा काम क्यो? सभी विभागाध्यक्ष के साथ सिर भी मुडवा लीजिए? आपके ज्ञान का अन्तिम संस्कार कर दिया है। अब पितृ-विसर्जन कर छुट्टी पाईये।“

वे बोले “इसी अधीरता के कारण तुम किसी लायक नही हुये। मेरा काम गरूण पुराण सुनना था। ज्ञान को ना मैने फूंका है ना गाडा है। उसे परिसर मे छोड़ दिया है। उससे दुर्गंध उठेगी।“

मै चौका “इससे क्या होगा कुलपति जी?”

वे विचित्रवीर्य बोले- ज्ञान के दुर्गंध से विद्यार्थी इधर आना जाना छोड़ेंगे और उसकी लाश दिखाकर अच्छा खासा ग्राण्ट भी मिलता है।

जय हो । मै अज्ञानी ठहरा।

वे बोले “तभी तो तुम वहा हो और हम यहाँ।“

ही ही ही

भाग -दस

मैडम बंगले पर बोर हो रही थी और साहब आफिस मे। जब साहब घर लौटे तो मैडम बोली “तुम्हे कुलपति पापा ने फाईल निपटाने के लिए नही बनवाया। मै दिनभर घर मे बोर होती हूं। तुम कुछ कर नही सकते?”

वे बोले “डार्लिग उसी इन्तजाम मे लगा था। यूनिवर्सिटी मे सलेक्शन लगा कर आ रहा हूँ। अब दो तीन महीने तुम्हारा खूब मनोरंजन होगा।”

दूसरे दिन अलसुबह गणित का प्रोफेसर कुलपति बगले पर राग न्यौछावर गाता मिला। मैडम उसी से जगी। वे बोली “तुम गणित के प्रोफेसर हो इतना अच्छा राग कैसे लगा लेते हो।“

वे बोले “मैडम गणित राग ही है। बचपन मे दो दूनी चार दो तिया छह राग मे गाता था इसलिए दोनो पर पकड़ बन गयी। मैं राग बेगैरत भी गा लेता हूँ।“

मैडम “कोई कह रहा था कि ला वाले प्रोफेसर बढ़िया गाते हैं और केमिस्ट्री वाले बढ़िया नाच लेते है ।केमिस्ट्री वाले का नाचना देख एक मोर ने आत्महत्या कर ली थी।“

प्रोफेसर बोले “मैडम सब अफवाह है। मेरे इतना बढिया कोई नाच गा नही सकता। उस हीरोइन के घूघरू टूटे थे मै नंगा होकर नाचता हूँ। बस काम होने का आश्वासन ही मुझे रोक सकता है।

मैडम हंसने लगी। बस करो प्रोफेसर एक दिन मे इतना मनोरंजन बहुत है। बस ये बताओ ये हिन्दी वाले क्या करते है।

मैडम वे बस राग दरबारी गाते है। वे रोजे मे नदी के भीतर पानी पीने वाले लोग है।

बस बस बस हंसी रोकते हुए मैडम ने कहा “तुम्हारा किसका करना है”

“मैडम आपसे क्या छिपाना। पुरानी दोस्त है। दक्षिण मे एक विश्वविद्यालय मे फंसी है। इधर आ जाती तो बुढ़ापा ठीक से कट जाता।“

ही ही ही

भाग- ग्यारह

रात के दो बजे पुलिस चौकी पर हंगामा हो रहा था। दो अधेड़ एक सिपाही से चिरौरी कर रहे थे। सिपाही उनकी बात अनसुना कर दरोगा साहब को फोन पर कुछ बता रहा था।

“साहब जल्दी आईये। दो चोर हाथ लगे है। हाई-प्रोफाइल चोरी का मामला है। मुझे बहुत परेशान कर रहे है। अंग्रेजी मे बोलकर भौकाल भी झाड़ रहे है। आप आ जाईये साहब ।”

“ठीक है उसे सम्भालो। न माने तो दो चार रसीद करो। मै आता हूं।”

आधे घण्टे मे दरोगा कुर्सी पर आ गया। सिपाही बोला “साहब यही दोनो है। चालान करिये दोनो का शातिर चोर है।”

“तुम्हे इनपर शक कैसे हुआ?”

“साहब मै विश्व विद्यालय की ओर गश्त पर था। जहां मै खडा था वही एक कार मे ये दोनो चोरी की योजना बना रहे थे।”

“क्या बात कर रहे थे ये दोनो?”

“ये मोटा वाला कह रहा था कि कुल छह है। दो तेरे दो मेरे। दो उपर वाले को दे देगे।” फिर ये पतला बोला “मै अबकी बार फ्रेश वाले दो लूंगा। तुम साले बनारस मे आरक्षण वाला दे आये थे। सही भाव ही नही मिला था।“

साहब मोटा इतने पर बिफर पड़ा। बोला इसी लिए तुम्हे बुलाने का मन नही करता। रीवा वाले मे भी तुमने इतनी ही नौटंकी की थी।

साहब यही शोर सुनकर मै समझ गया। ये अन्तर्राज्जीय चोरी का गिरोह है। पकड़ कर मैने आपको बुलाया ।

दरोगा बोले “साले हाई-प्रोफाइल शहर मे हाई-प्रोफाइल चोर।”

पकडे गये आदमी मे एक बोला “सर हमारी बात भी सुन ले। हम प्रोफेसर हैं। यह बाहर से  आया एक्सपर्ट् है। विभाग मे छह पदो पर  इंटरव्यू होने वाला है। उसी  के बारे मे बात हो रही थी।“

दरोगा “ये उपर वाला कौन था जिसे दो दे रहे थे?

प्रोफेसर “जी वो कुलपति है।”

दरोगा “तुम्हारे यहां उपर वाला तैंतीस ही लेता है मेरे यहा तो पचास लेते है।”

प्रोफेसर “लेते तो वो भी पचास ही है ये वाला थोडा संतोषी है।”

दरोगा “दीवान जी छोड़ दो। ये वो वाले चोर नही है। ये वाले चोर हम पकड़ेंगे तो हमे भी कोई पकड़ लेगा।“

जाओ गुरू जाओ। और इतनी सेलरी पाते हो किसी बढ़िया होटल मे सेटिंग किया करो।”

प्रोफेसर “जी हम चोर नही प्रोफेसर हैं।

ही ही ही

भाग- बारह उर्फ *एक शोहदे का कुलपति को चैलेन्ज*

सैकड़ों की नियुक्ति कर झण्डा फहरा चुके एक कुलपतित को एक शोहदे ने चैलेन्ज किया है। जिसका कोई मतलब नही है।

उस शोहदे ने कहा कि चुप्पा विद्वान कुलपतित ने गणित विभाग मे जिन दस प्रोफेसरो को नियुक्त किया है उसमें से दो को छोड़कर आठ अगर पाइथागोरस प्रमेय हल कर दे तो वह सुधर जायेगा और सार्वजनिक जीवन से सन्यास ले लेगा।

कुलपतित ने कहा- पाईथागोरस प्रमेय हल करना किसी को आ सकता है। नियुक्ति का प्रमेय हर किसी से हल नही होता। उन लड़कों ने नियुक्ति के प्रमेय को हल कर लिया है इसलिए उन्हे पाईथागोरस प्रमेय हल करने की जरूरत नही है।

शोहदा बिफर पड़ा- तुम्हे पता नही है तुमने देश समाज का कितना नुकसान किया है।

कुलपतित- तुम्हे नही पता है तुमने अपना कितना नुकसान किया है। अगर तुमने कही से भी कभी की पीएचडी की होती और तीस लाख दिये होते तो तुम आज विद्वान होते। तुम्हे शहर मे इज्जत मिलती और खुद अपनी ही तरह नियुक्ति करने का मौका।

शोहदा- तुम्हे शर्म नही आती। उपर से भारत का झण्डा फहराते हो?

कुलपतित- शर्म मुझे नही तुम्हे आनी चाहिये। अपने को शोहदा कहते हो और नैतिकता की बाते करते हो। इतनी नैतिकता की बात हम भी नही करते। झण्डा फहराने से सारे पाप धुल जाते है।

शोहदा- अच्छा गुरू। ये बताओ तुम उन लोगो के टच मे कैसे आते हो जिनको नियुक्ति देनी रहती है?

कुलपतित- तुमसे क्या डरना। बताता हूँ तुम्हे। अव्वल तो आधे से ज्यादे शिक्षक पाल्य और पालनी होते है। कुछ दामाद कुछ होने वाले दामाद। कुछ अफसरो की बीबीयाँ। कुछ रखैल।

जो जगह बचती है उस पद पर वे नियुक्ति होते है जो मालदार चेले होते है। इसकी शुरूआत मछली का मूडा (सिर) खिलाने से होती है। फिर वह अच्छी वाली दारू पिलाता है। वर्षो सेवा करने के बाद हम प्रसन्न होते है और पच्चीस तीस लेकर नियुक्ति कर देते है।

शोहदा- तुमको डुबने के लिए महासागर भी कम है। तुम बहुत बडे घाघ हो।

कुलपतित- तुम बच्चे हो। एक बात गौर करो बेटा। विश्वविद्यालय मे सब चुप क्यो है? ला वाले का मामला कैमिस्ट्री मे है। हिन्दी वाले का राजनीतिविज्ञान मे। कैमिस्ट्री वाला प्रोफेसर संगीत मे बेटे के लिये दण्डवत है।

जब इतने सारे को डुबना होगा तो सागर मे भी सबके हिस्से चूल्लू भर भी नही आयेगा। हम वहा भी नही डुबेगे। तुम अलबत्ता आश्चर्य से मर जाओगे।

भाग तेरह

किसी के मरने के बाद जैसे महापात्रो को बुलाना और खिलाना अनिवार्य होता है वैसे ही किसी कार्यक्रम मे विश्वविद्यालय से प्रोफेसर को बुलाकर कर्मकाण्ड सम्पन्न माना जाता है। ऐसे ही एक कार्यक्रम जिसमे महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान बरतने वाली सावधानियों को बताया जाना था, हिन्दी के प्रोफेसर को बुलाया गया।

प्रोफेसर का परिचय देते हुये संचालिका ने कहा कि “ये विद्वान रीतिकाल मे कवियो के समक्ष मासिक धर्म की मासिक उलझन” विषय पर कालजयी शोध कर चुके है। इनके पापा ने वीरगाथाकाल मे वीरो के समक्ष मासिक धर्म की चिन्ता विषय पर शोध किया था। पापा का आधे से ज्यादा शोध बेटे की किताब मे है। ये पैतृक विद्वान है और अब वैश्विक विद्वान होने की चिन्ता मे घुले जा रहे है। इस विभाग के अधिकारी इनके रिश्तेदार है इसलिये इन्हे मुख्य वक्ता बनाया गया है। अब ये मासिक धर्म के साहित्यिक गुणो पर प्रकाश डालेगे। और साहित्यिक तरीके से मासिक धर्म और अधर्म के बारे मे बतायेगे।

प्रोफेसर- (बडबडाते हुये) हम प्रोफेसर है प्रोपराईटर नही ।अब इतना तो समझते ही है कि प्रशंसा की जा रही है या आलोचना। खैर अगर एपीआई नही बढ़ानी होती तो रात की बची दारू पीकर सो रहा होता।

देखिये इस संसार मे सब मासिक है। वेतन, बच्चो की फीस, दूध का दाम, घर का सामान, डीटीएच का बिल, बिजली का बिल सब। ऐसे मे केवल एक को मासिक कहना गलत है। सभी को समय से चुकाना ही धर्म है। आप अपने धर्म का पालन करे। ईसाई और इस्लाम वाले अपने तो धर्मो के बीच लडाई ही नही होगी। लडाई किसमे नही होती। बीबी बच्चो की लडाई से दुनिया परेशान है। सन्तोष से शान्ति मिलती है लेकिन अगर शान्ति और संतोष मे शादी हो जाये तो भी कलह हो जाता है। इसलिये मै कहता हूं (अच्छा समय हो गया) मासिक धर्म मानसिक है। तुलसीदास भी पत्नी को मासिक धर्म मे ही छोडकर गये थे। गालिब ने कहा “हजार बार जमाना इधर से गुजरा है फिर भी”

तिवारी जी ने लिखा “फिर भी कुछ रह जायेगा”

कुल मिलाकर देर हो रही है। मै समझता हूं मैने अपनी बात पहुंचा दी है। धन्यवाद।

तालियाँ बजी और वे चले गये।

दो महिलाएं जो इस सरकारी कार्यक्रम मे खर्चे पर बुलाई गयी थी। उनकी बातचीत

पहली- ये कौन था?

दूसरी- प्रोफेसर थे।

पहली- प्रोफेसर कैसे बनते है?

दूसरी- बात से तो यही लगा कि मासिक धर्म से बनते है।

भाग चौदह

(कुछ फुटकर संस्मरण)

1, प्रशासनिक भवन का एक बाबू चार लोगो को लेकर घूम रहा था। अचानक एक आदमी बेहोश हो गया। लोगो ने होश मे लाकर पूछा “कौन सी बीमारी है?”

“असिस्टेण्ट प्रोफेसर बनना है।” उसने कहा।

“तो बेहोश क्यो हो गये?”

“कुछ नही। एक महीने से इनके पीछे घूम रहे है। कमजोरी हो गयी है।”

“ये प्रोफेसर बनवाते है क्या?”

“हां पहली बार मे ठेका ठीक से पूरा हो गया। हम दूसरे चरण का हूं।”

ये बाबू है कि ठेकेदार?”

“ये भगवान है। सरस्वती को बन्धक बना रखा है। हम सरस्वती की वीणा के तार बनना चाहते है। इसमे लक्ष्मी मेरी मदद कर रही है।”

“तो उल्लू कौन है कुलपतित?

“नही वह चतुर बुरबक है। उल्लू तुम हो।“

(ही ही ही)

2, सुबह की जलेबी लेकर लौट रहे प्रोफेसर को एक कातर लड़के ने घेर लिया। कहा गुरू जी नियुक्ति हो रही है। आप के सहारे वर्षो से हूँ। लिख् पढा भी है। किताब शोधपत्र अंक सब अच्छा है। कर दीजियेगा।

जलेबी वाले गुरू- देखो। उसका होगा जो विषय को जानने के साथ विषयातीत होगा। वो यहांका होकर भी सबका हो। पक्ष चुनकर भी निर्गुट हो। लिग धारण करते हुये भी अलिंगी हो। कम से कम विपरित लिंगी हो और और और

शिष्य “बस गुरू जी। समझ गया। आपने टहला दी दिया और जलेबी भी खिला दी। भगवान का ही होगा न।“

3, जिन शिष्यो ने गुरू जी लोगो का शोध पत्र लिख कर उन्हे प्रमोशन दिलवाया है उनका नही होने पर श्राप देने की बाढ आ गयी है। अगर श्राप से कुछ होगा तो जल्द ही ऐसे गुरूजन काल के गाल मे समा जायेगे।

और उनकी सीट पर वही शिष्य धन देकर प्रतिष्ठित होगा।

(एक ठलुये का मजाक परिसर मे)

4, कुलपतित घर लौटे बोले “पापा मैने कर दिखया। सब कुछ ओके हो गया पापा। मैने गड्डी से सरस्वती का गला घोट दिया। और लाश को परिसर मे गाड़ दिया।

पिता- देखो ये सब ठीक है। कपडे बदल लो। तुम्हे मेरे साथ थोडी देर मे “बदलते समय मे घटती नैतिकता” वाले सेमिनार मे चलना है।

“ओके पापा”

5, गुरू ने अंगूठा दिखाया।

पांच साल देशी रोहू, बढ़िया शराब और मुफ्त का ऐश उड़ाने के बाद भी प्रोफेसर ने ज्यादा कैश को मान्यता देते हुये शिष्य को अगूठा दिखा दिया।

6,भौतिक विभाग मे अगर भौतिकतावादियो का चयन न हो तो भौतिकी कौन पढ़ेगा?

ही ही ही

(काईया प्रोफेसर का स्वगत बयान)

भाग- पंद्रह- सच्ची घटना

लोकल क्लियो पैक्ट्रा और मोछू चौकीदार

विवि के मोछू चौकीदार मार खाये बच्चे की तरह खाली आसमान देख रहे थे। सन अस्सी से नौकरी करते हुये आसमान को यू न देखा था। अचानक उन्ही के साथ प्रोफेसर पद पर नियुक्त हुई एक महिला प्रोफेसर गुजरी और बोल पड़ी “चाचा कैसे हैं?” आप तो पापा के समय से विवि मे है। दिखाई नही देते आजकल?

मोछू- हां बिटिया (मन मे एक झटके से पहाड सा टूटा) बूढा हो चला हूं न। लेकिन बिटिया तुम फुर्गुदी जैसी दिख रही हो बरसो से। (मन मे च्यवन ऋषि का नोटस चुराया था क्या?)

प्रोफेसर- यू नो अंकल एकचूली मै योगा करती हूँ। जिम जाती हूं। हेल्दी फूड्स भी।

मोछू- आ पारलर्वा(ब्यूटी पार्लर)

प्रोफेसर- यू छोटे लोग छोटी मानसिकता।

मोछू- मेमसाहब जमाना बदल गया है। खाने टहलने से स्वास्थ बनता तो चौकीदार का सबसे अच्छा होता। अब फेशियल जरूरी है। सबसे पहले ब्लिचिग आत्मा का होना चाहिये। आप लोग कालेजो मे जाकर प्रैक्टिकल मे पैसा लाते है। और मेनीक्योर पेडीक्योर कराते है। वहाँ गाँव का लड़का धान बेचकर फीस जमा कमा करता है। उनको प्रबंधक लूटते है आप प्रबंधक को।

प्रोफेसर-चुप रहो बदतमीज।

मोछू आज तैश मे था कहने लगा-चुप नही रहेगे तो मार खायेगे।

अबकी बार ऐसे प्रोफेसर नियुक्त हुये है जो प्रशन पूछने पर छात्रो पर कट्टा चला देगे।

एक तो पक्का काट खायेगा। उसके स्थायी डाक्टर डा. बेरी है।

प्रोफेसर-तुम चौकीदार हो। अपनी औकात मे रहो।

चौकीदार- हाँ। मेरी कहा बढनी घटनी है। बढेगी तुम्हारी और भाई बिरादरी की। विधि वाले का कैमिस्ट्री मे हो गया। देशभक्तो का, बसपाई प्रोफेसर का बेटा बेटी, सपा नेता का, एक ही घर से दो भाई, विभागाध्यक्ष के बेटो का सबका मिल बाटकर हो गया और थेथर कुलपतित लिखता है विद्वान शिक्षको की तलाश पूरी हुई। लक्ष्मी ने सरस्वती को ऐसी लात मारी है कि वे दिव्यांग हो गयी है।

प्रोफेसर- इतना दर्द है तो उपर वाले से मिलो।

मोछू चौकीदार हंस पडा “उपर वाला थोडी उमर मे ही बाबा बन गया। सब उसके नाती है। उसके लिये यह नातियो का खिलवाड है।

प्रोफेसर तुनक कर चलती बनी। मै बडी देर से खडा देख रहा था। मोछू से बोला “क्या हुआ है। इतना तो उपर वाला चौकीदार भी उतेजित नही है। आप क्यो है?”

“बाबू बडी मेहनत से बेटे ने नेट निकाल पीएचडी किया था। गरीबी मे पढाया सोचा प्रोफेसर बन कर दिन बदल देगा। लेकिन हरामियो ने एक एक सीट खा ली।” वो बिलख गया।

“हाँ ये हरामी खाते बहुत है। जेब का नही लगता न।” मैने कहा। और खाने के बाद उसे लखनऊ के रास्ते गुजरात भी पहुंचा देते है।

हम दोनो हॅसे।

भाग सोलह

(यह अन्तिम भाग है। यह  सोलहवे कर्म के समान है। यह कथा सुनकर पंचलकडी भेज कर आप श्रद्धालु जन अपने अपने कर्म सम्पन्न करे। कथा का श्राद्ध करने के बाद सब पवित्र हो जायेगा। कुलपतित जग मे यश प्राप्त करेगा। अभ्यर्थी पद और दलाल पैसा। हम श्रोता श्रवण सुख लेकर पुन सांसारिक कर्म मे लग जाये।)

त्रेता युग के बाद पहली बार गरूण जी और काग भुसुण्डी पुन जंगल कुसुम्ही के पास एक यशस्वी महाविद्यालय मे मिले। दोनो अपने अपने कैन्डिडेट को विश्वविद्यालय मे नियुक्त कराना चाहते तो और किसी ने कहा था जैसे राम यश प्राप्त करने के लिये जंगल की ओर गये थे वैसे आप विद्वत जन भी जंगल मे स्थित किसी महाविद्यालय की ओर जाये और पैतृक यश पाये।

दोनो को जंगल मे स्थित ऋषि ने गच्चा दे दिया और वे निराश होकर आपस मे सुख दुख बांटने बैठ गये।

गरूण जी- असलाम वैलेहकुम रहमतुल्लाह बरकात हूँ

काग भुसुण्डी- धीरज रखे ऋषिवर। असफलता मिलने पर आदमी क्या देवता भी बौरा जाते है। आप स्वदेशी मे बात करे।

गरूण जी- क्षमा ऋषिवर। मगर क्या करूँ। मन विचलित है। मन मे कुछ जिज्ञासा है। अनुमति हो तो पूछे आपसे। आशा है आप प्रश्न पूछने पर कट्टा नही चला देगे।

काग भुसुण्डी- नही नही। आप निश्चित होकर पहले की भाति सात प्रश्न पूछे।

(गरूण जी के प्रश्न और काग भुसुण्डी के उत्तर दिये जा रहे है)

प्रशनः ऋषिवर विश्वविद्यालय की भर्ती मे कौन सबसे प्रसन्न और कौन सबसे दुखी हुआ?

उत्तर: ऐ गरूण महाराज। आप भी 2016 का प्रश्न 2018 मे रिपिट टाईप प्रश्न पूछ रहे है। वैसे बताता हूं। इस भर्ती से सबसे अधिक खुश दलाल है और सबसे अधिक दुखी वे अध्यापक है जो पाल्यो की नियुक्ति नही करा पाये। भूगोल विभाग से जो रोने की आवाजे आ रही है उन्ही पिताओ की है।

पश्नः कुलपतित को भर्ती करने से क्या मिला?

उत्तर: उसे उसी प्रकार का यश मिला जो कोठे या ठेके का पता बताने वाले बालक को मिलता है।

प्रश्न: भर्ती से असन्तुष्ट लोग क्या करेगे ऋषिवर?

उत्तर: वे वही करेगे जो पहले करते आये है। गुरू का पैर छुकर वे ढेर सारी कापिया चेक करने की जुगत लगायेगे। वे फार्म भरेगे। वे आर टी ओ पर भूजा खाकर व्यवस्था को कोसेगे और फिर एक दिन मर जायेगे।

प्रश्न: परिसर मे वामपंथी,अम्बेडकरवादियो,गाधीवादियो,देशभकतो और दक्षिणपंथीयो की क्या भूमिका रही।

उत्तर: जी सभी विद्या के गैग रेप मे शामिल रहे।मेरा मुंह और मत खुलवाईये।मेरे एक शुभचिन्तक साहित्यकार पूर्व अधिकारी नाराज हो जायेगे।

प्रश्न: नये शिक्षक किस तरह की भूमिका निभायेगे?

उत्तर: जैसा दुर्योधन के भाईयो ने द्रौपदी की साड़ी खिचने के दौरान निभाई थी। कुछ विद्या की साड़ी खींचेंगे। कुछ ताली बजायेगे?

पश्न: आप आक्रोशित होकर क्यो उत्तर दा रहे ऋषिवर?

उत्तर: मै आक्रोशित नही हूं। मै परिहास कर रहा हूं। मेरे उखाड़ने से घास नही उखड़ेगी। यह तो परमात्मा की माया है।प्रारब्ध मे मेरा हस्तक्षेप कैसा।

प्रश्न:जब प्रारब्ध है तो पैसे का लेनदेन क्यो हुआ?

उत्तर: यह भी प्रारब्ध है।यदि कुलपति का लड़का कुलपति बनता है तो प्रोफेसर का लड़का प्रोफेसर क्यो न बने। इसी तर्क पर बाबू का लड़का बाबू ही बनना चाहिये। उस आनन्द को समझाओ।

प्रश्न: कुलपतित कथा के लेखक आनन्द बाबू नामक दुष्ट बालक का क्या होगा?

उत्तर: उसका जो होना था हो गया। इस कथा लेखन के कारण ही लोग उससे कटना शुरू हो गये है। उसने महापातक कृत्य किया है। उसे नरक के अंतिम स्थान कुम्भी पाक मे जगह मिलेगी। गुरू की आलोचना महापातक है। कोठे से लौटता गुरू भी कुमारी कन्या भी भांति पवित्र होता है।

यह सत्संग होने के बाद दोनो अपने अपने रास्ते उस दलाल को कोसते चले जिसने बडे बडे वायदे करके पैसा लेकर बाद मे पैसा वापस कर दिया। इस संसार मे सबसे बुरा काम दलाल द्वारा पैसा लेकर वापस कर देना है।

सुधि जनो को धन्यवाद।

जो लाईक करके पढते है वे किसी विवि मे कतई नही होगे।

चोरी से पढने वाले चौर्य कर्म मे पारगंत है ऐसे लोग निश्चय ही विवि की शोभा बढायेगे।

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