इस धुएँ का नाम शाम है|

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अनघ शर्मा/

(हिंदी के प्रतिभाशाली  युवा कथाकार. साहित्य के गंभीर अध्येता. व्यापक विषयवस्तु समेटे और भाषा के धनी अनघ शर्मा की कहानियाँ  हंस सहित कई स्थापित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है. यहाँ प्रस्तुत हैं  इनकी नई कहानी)

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एयरपोर्ट की इतनी गहमागहमी और भीड़ के बाद भी उसे अंदर ही अंदर अजीब सा डर लग रहा था कि कोई उसे रिसीव करने आयेगा भी या नहीं | वैसे उसने परसों शाम टिकिट होते ही उन्हें अपने आने की ख़बर दे दी थी| ऐसा नहीं था कि वो दिल्ली पहली बार आ रही हो, पहले भी दो बार आ चुकी है| पर इस बार का आना पिछली दोनों बार से अलग है| न आज से पहले उसके नाम कोई ऐसी चिठ्ठी ही आई थी और न ही ऐसी हैरान करने वाली मुश्किल| उसने इधर-उधर देखा सामने एक आदमी उसके नाम की तख्ती पकडे खड़ा था| सड़क पिछली रात की बारिश के बाद अभी भी गीली पड़ी हुई थी और हवा में अब भी चुभने वाली ठण्ड बरकरार थी| मार्च के ऐसे ख़ुशगवार मौसम में भी उसे पसीना आ रहा था, घबराहट हो रही थी| उसने ड्राईवर को सरसरी निगाह से देखा और खिड़की से सर टिका आँखें मूँद लीं|

दिल्ली कोई ऐसा बला का ख़ूबसूरत शहर तो नहीं | जाने कितने रंग-रोगन से इसने ख़ुद को देखने लायक बना रखा है| उसने दुनिया के कितने ही हसीन, जवान, नयी बहारों में लिपटे शहर देखे हैं| ऐसे शहर जिनकी रातों को आसमान से देखो तो दहकते लावे सी उतरती रौशनी चमकती दीखे या जिन्हें दिन में देखो तो दूर-दूर तक हरियाली की चादर बिछी हो जिसके ऊपर रंग-बिरंगे बेल-बूटे करीने से कढ़े हों| या वो शहर जो नीले पानी की गहरी चादर में कुनमुनाते सोये रहते हैं| ये शहर इन सब से बिलकुल ही अलग है| यहाँ न समंदर है न मीलों फैले हरे मैदान| गोद में रखी क़िताब झटके से गिर पड़ी तो उसकी आँख खुल गयी| इसी किताब में उसके नाम किसी भूदत्त का भेजा लिफ़ाफ़ा था| जिसे उसने आज से पहले न ही कभी देखा था और न ही इस चिठ्ठी के मिलने से पहले तक उसका नाम ही सुना था| फिर भी वो इस चिठ्ठी के सहारे इतनी दूर यहाँ तक चली आयी| गाड़ी एक बंद गली में एक पुराने से मकान के सामने जा रुकी| वो उतरी बाल सही किये और दरवाज़े पे लगी घंटी बजा दी| लगभग पांच-सात मिनट बाद एक नौकर आया दरवाज़ा खोला और उसे ड्राइंगरूम में ले जा कर बिठा दिया| उसने चारों तरफ़ नज़र दौड़ाई और कोने में जाली की दीवार के साथ लगे एक गोल सोफे पर बैठ गयी| सामने की दीवार पर किसी स्त्री का ऑइलपेंट से बना एक बहुत बड़ा पोट्रेट टंगा था जिस पर जाली से आती रौशनी धूप-छाँव का बिम्ब डाले हुए थी| सफ़ेद कपड़ों में लिपटी स्त्री की ढब कोई चालीस- बयालीस कि उम्र की थी| पोट्रेट के ठीक नीचे एक छोटी तिकोनी मेज़ पर एक तस्वीर रखी थी जो ऊपर टंगे चित्र की हू-ब-हू थी| वो उठी अपनी क़िताब मेज़ के कोने पर रख तस्वीर उठा ली| ये तस्वीर ऐसी थी जैसे किसी उदासी को फ्रेम में बाँध के रख दिया हो| चेहरे की दोनों आँखें इतनी ठहरी इतनी उदास थीं जैसे छलकते-छलकते पानी जम गया हो| अगर कोई गौर से देखे तो उस जमे पानी की लपट आँखों के किनारों पर देखी जा सकती है| उसने तस्वीर वापस उसकी जगह पर रख दी और कमरे का मुआयना दुबारा करना शुरू कर दिया| कमरे की हर चीज़ खामोश पीलेपन में लिपटी हुई थी| उसे आये कोई दस मिनट होने आये पर अब तक कोई भी तो मिलने नहीं आया|  उसने दुबारा तस्वीर उठा ली और अबके ध्यान आँखों की बजाय चेहरे की बाकी भंगिमाओं पर आ टिका था|

“ चित्रा देवी|” किसी ने पीछे से टोका|

उसने मुड़के अजनबी को देखा, उमर कोई पैंसठ-छियासठ के आस –पास होगी|

“इनका नाम चित्रा देवी था जिनकी तस्वीर आप देख रहीं हैं, और मेरा भूदत्त|” उसने कहा|

“ जी,मेरा नाम तराना है| आपने ही मुझे वो चिठ्ठी भेजी थी शायद| वैसे मैं जानती हूँ इन्हें कुछ एक फिल्में देखी हैं मैंने|” उसने कहा|

“हाँ मैंने ही भेजी थी और आने के लिए शुक्रिया, बैठिये,चिठ्ठी लायीं हैं आप|” वो मानो चिठ्ठी की बात कर तस्दीक करना चाह रहे हों कि सामने बैठी लड़की वही है जिसके नाम वो ख़त भेजा गया था|

“हाँ ये रही|”

वो उठी और क़िताब के बीच रखा लिफ़ाफ़ा निकाल उन्हें पकड़ा दिया| हालाँकि उनने उस लिफ़ाफे को खोल के भी नहीं देखा कि उसमे वही ख़त है जो उसे भेजा था या कोई और| नौकर आ कर चाय के दो बड़े प्याले सामने रख गया था| कमरे में चुप्पी थी और चाय से उठती हुई भाप| थोड़ी देर रुक कर उसने ही कहा|

“आप मुझे मेरी माँ के बारे में कुछ बताने वाले थे|”

“ये तस्वीर में जो हैं यहीं हैं|” वो उस से बोले|

उसने तस्वीर देखी पर अपने और तस्वीर वाले चेहरे में कोई साम्य नहीं पाया| उसकी आंखें सामने बैठे भूदत्त पे फिर टिक गयी| वो उसकी आँखों में आये रहस्य को भांप गए|

“ मैं उनका मैनेजर था, उनका काम संभालता था|”

“कैसा काम?”

“वही जो फिल्म वालों के मैनेजर का होता है| डेट्स देखना, प्रोड्यूसर से मिलना और उनकी लाइफ आसान बनाना| मैडम तुम्हारे लिए कुछ छोड़ के गयी हैं, जो अब तक मेरे पास था अब तुमको सौपना है|”

“क्या?”

“एक ज़मीन छोटी सी पुणे में और कुछ पैसा जो अब बढ़ कर सात साढे-सात लाख हो गया होगा|”भूदत्त ने उसे चाय का प्याला पकड़ाते हुए कहा|

“बहुत सेंसटिव थीं वो और उतनी ही मनमौजी|”

“सच?”

“यूनिकॉर्न के पंख, सूरज का कुंड और पानी का मकान ढूंढने से भी ज्यादा मुश्किल था उनका मनमौजी स्वाभाव साधना|”

“ऐसा क्या मिजाज़ था उनका?”

“मिजाज़ ऐसा था जैसे राख में दबा हुआ आलू, सोंधा-सोंधा पर भाप छोड़ता, भभकता हुआ|”
“कुछ और बताइए उनके बारे में ?”
“बीस साल से भी ज़्यादा वक्त उनके साथ रह कर भी मैं उन्हें बहुत ज़्यादा नहीं जान पाया|” भूदत्त ने उसे एक डायरी थमाते हुए कहा|

डायरी जिसके फट्टे पर उगता या डूबता सूरज और मटमैला सा खेत छपा था| वो समझ ही नहीं पायी की उस चित्र का रंग उड़ गया था या उसकी सियाही ही ऐसी थी|
डायरी के पहले दो पन्नों पर कई सारे शेर लिखे हुए थे जिन्हें पढ़ कर उसने सोचा कि एक अदाकारा ऐसे सस्ते शेर भी लिख सकती है| पर असली चीज़ तो तीसरे पन्ने पे थी|
“मेरे वारिस, ये विरसात तुम्हारे लिए ही छोड़ के जाया जा रहा है| इन चंद मामूली कागज़ के टुकड़ों पे सियाही की छाप ही मेरे जीवन का एक बड़ा हिस्सा है,बड़ा क्या कहूं तकरीबन पूरा-पूरा ही तो है|”
उसने भूदत्त की ओर देखा और सवाल दाग दिया|

“वारिस से मतलब?”

“मैडम ने तुम्हारी पढाई-लिखाई पर पैसा खर्च किया था| या ये कहूं कि परवरिश की थी| उनकी इच्छा थी कि तुम जब बड़ी हो जाओ तब तुमसे मिल कर ये डायरी तुम्हें सौंप दूं| अब जब तुम यहाँ आ गयी हो तो इस पर तुम्हारा हक़ बनता है|”
उसने डायरी को दुबारा देखा और बंद कर दिया|

“क्या मैं इसे अपने साथ होटल ले जाऊं परसों जाने से पहले वापस करती जाऊँगी आपको|” घंटों उनसे इधर-उधर की निरर्थक बातें कर के जब वो थक गयी तो उसने पूछा|

“ठीक है ले जाओ वैसे भी तुम्हारी ही चीज़ है|” उनने अनमने सा हो कर कहा|
जाली से आती धूप अब हल्की पड़ने लगी थी| बाहर जो भी दृश्य होगा उसकी शाम के अँधेरे में बदलने की संभावना बढ़ने लगी होगी| भूदत्त ने उठ कर बत्ती जलायीतो उसे ध्यान आया कि उसे यहाँ आये बहुत समय हुआ|

“मुझे अब चलना चाहिए शाम हो गयी |”

“मैं छोड़ कर आऊं?”

“नहीं, टैक्सी खड़ी है बाहर मेरी|”

गाड़ी उनके मोहल्ले से बाहर निकल सड़क पर आ गयी थी| नए-नए बनते पुलों के जालों ने सारे शहर को जकड रखा था| सारा शहर जैसे इस वक़्त घरों से निकल बाहर सड़कों पर आ के बिखर गया हो| उसकी गाड़ी इस समय जहाँ दौड़ रही है वहां बड़ी बुझी-बुझी मैली सी रौशनी है| ऐसा लगता है मानो रात का अँधेरा ज़मीन पर उतरने से पहले ही इन बल्बों में आ बैठा हो|

“हम सही रास्ते से तो जा रहे हैं न?” उसने ड्राईवर से पूछा|

“जी|”

उसने संतुष्ट होकर आँखें बंद कर लीं| कितना थका देने वाला दिन रहा आज का| दिन ही क्या पूरा हफ़्ता ही ऐसा रहा| कोई आपको ख़त भेजता है और आठ सौ-नौ सौ किलोमीटर दूर आपके बसे हुए जीवन को उलट-पुलट कर देता है| आप जाने किस मूर्खता में, किस आस में अपना झोला- बस्ता उठाये कहीं भी चले आते हैं| उसने एक सांस छोड़ते हुए सोचा और डायरी खोल ली|

 

2

“न तड़पने की इजाज़त है न फ़रियाद की है
घुट के मर जाऊं ये मर्ज़ी मेरे सय्याद की है|”

‘शाद  लखनवी’

ऐसा लगता है जैसे शाद ने ये शेर मेरे लिए ही लिख छोड़ा हो| मेरे अन्दर का सय्याद जो गिन-गिन के मेरी सांसें छोड़ता है| इसकी मर्ज़ी होती है तो किसी दिन सोने भी देता है वरना तो मेरी रातें अब जाग के ही गुज़रती हैं| ये रातें जो किसी अनजानी चीज़ की तलब में छटपटाती फिरती हैं उसे इस सय्याद ने क़ैद कर के जाने कहाँ रख छोड़ा है| इसकी झलक दिखा कर फिर कहाँ ओझल कर देता है| उजाले की हल्की आहट सुनाई देती है और फिर गुम| समय एक बेतरह पिटा हुआ मोहरा है और इसी मोहरे को आपके राजा को मारने की महारत हासिल है| ये मोहरा आज चुन चुन के मेरी बिसात को बिगाड़ रहा है| इस वक्त ने सालों तक मुझे जिस ऊंचाई पर रखा आज वहीं से धकेल रहा है| नैनीताल के इस कमरे में दो चीज़ इस वक़्त एक साथ हो रही हैं| तलब से मेरे हाथों में ऐंठन चल रही है और इन्हीं ऐंठे हुए हाथों से मैं छूटते वक़्त को कस के पकडे हुए हूँ|ओस की बूंदों से तर खड़े इस शहर के ये पहाड़, जिनकी उदास रातें जैसे बनी ही इसलिए हों कि मैं यहाँ आऊँ और इन लंबी उदास रातों में टहलूँ, अंदर के ईंधन को बूँद बूँद बुझते हुए महसूस करूं और छन्न की आवाज़ को सुनूं।ये आवाज़ मेरी सोची हुई तमाम आवाज़ों जैसे कि फूल के चटकने, बदल के उठने,पानी के इठलाने इन सब से कितनी अलग है। ये ज़िन्दगी के किरदार की आवाज़ है, जिसे किसी दिन एकदम ही ख़ामोश हो जाना होगा।ये भड़भड़ाते दरवाज़े एक रोज़ अचानक ही किसी चटखनी के लग जाने से बंद हो जायेंगे। हवा तक के ये रास्ते अचानक ठिठक कर गोल गोल घूमते हुए मेरे ही घर के सामने से लौट जायेंगे। मेरे बढ़े हुए हाथ बीच ही में रुक जायेंगे। कितने किरदार यूँ ही मेरे ज़हन में, सांसों में अटके अटके से उखड़े उखड़े से रह रहे हैं जिनसे मुझे एक ही बार में छुटकारा चाहिये| पर ये इतना आसान कहाँ? छूटना बहुत आसान कहाँ। मुझे अपने गालों पे पानी की धार महसूस हो रही है और गले में खुश्की| आजकल ये आँखें बात-बेबात पानी बहाने लगती हैं और इस पानी से मेरी प्यास बुझती नहीं| सामने मेज़ पर मेरे कल के डायलॉग पड़े हैं, पन्ने फडफडा रहे हैं| कल सुबह का शॉट है, और मैं इस क़ाबिल नहीं की कल सेट पर जा के किसी से आँख मिला सकूं| वैसे भी कल की कौन जाने? आप की बुलंदी कल किसके दामन से बंध जाये, किसे पता? बुलंदियां मुझे कभी पसंद नहीं आयीं| मैंने कभी इन्हें चाहा ही नहीं| इन्होंने मुझे आकाश पर चढ़ाया और अब मुझे यहाँ से धकेला जा रहा है|

तराना ने महसूस किया कि उसकी आँखें गीली हैं| उसने डायरी बंद कर दी| गाड़ी कब से लाल बत्ती पर रुकी हुई थी| सामने के फुटपाथ से एक बच्ची दौड़ती हुई आई और उसकी कार के कांच पर चेहरा टिका दिया| उसने देखा बच्ची का चेहरा जाने कितनी अधूरी आशाओं से भरा हुआ था| बाल मिट्टी से उलझ उलझ कर रूखी लटों में बंट गए थे| लड़की की नीली शनील की फ्रॉक उसके पैरों को नीचे तक ढके हुए थी| ये भी शायद किसी की दी हुई होगी| उसने पर्स खोला और कुछ पैसे निकल कर उसे दे दिए| शायद ऐसे ही किसी सड़क किनारे के फुटपाथ से उठा कर उन्होंने उसे अपना लिया होगा| उसकी जिंदगी संवारी होगी |पर ऐसा भी क्या अपनाना कि आप कभी किसी  को गले ही न लगा सको| बत्ती हरी हुई, गाड़ी ने रफ़्तार पकड़ ली| उसने देखा बच्ची की आँखों में भी हरा रंग चमक रहा है| हरा दुनिया का सबसे सुंदर रंग है तराना ने सोचा| उसने खिडकी से बाहर हाथ निकला और हिला दिया|

गाड़ी होटल के पोर्च में आकर रुकी| वो उतरी ड्राईवर को पैसे दिए और अगली सुबह ग्यारह बजे आने के लिए बोल कर अंदर बढ़ गयी| लॉबी में एक बहुत बड़ा झूमर झूल रहा था और उससे निकलती सतरंगी रौशनी टूट के ज़मीन पे बिखर रही थी| उस रौशनी में उसे एक अनजाने चेहरे के करहाने का भ्रम हुआ| वो पलटी और तेज़ी से चलती हुई बाहर आ गयी|एक टैक्सी रोकी,पता बताया और घंटे भर बाद टैक्सी वापस उसी बंद गली के मकान के सामने खड़ी थी|

“तुम वापस कैसे आ गयीं?”

“मुझे डर लग रहा था|”

“क्या अकेले रुकने में?”

“नहीं! रुकने में नहीं, बल्कि अकेले में इस डायरी को पढने में| क्या अपने पढ़ रखी है ये?”

“नहीं|” भूदत्त ने जवाब दिया|

उसने डायरी हाथ बढ़ा के भूदत्त को पकड़ा दी|

“मुझे ये मकान उन्हीं ने दिलाया था| इसका फर्नीचर उनके बम्बई वाले घर का है|उस घर में हर चीज़ एक हल्का पीलापन लिए हुए सफ़ेद थी| घर जो दो तरफ़ से समंदर दिखाता था| उसी की नमीदार नमकीन हवा उनको ले डूबी|”

“वो घर भी तो बदल सकती थीं?”

“जब सनक आपके बाकी सेंसेस पर हावी हो जाती है फिर आप सोचने के लायक नहीं रहते|”

दीवार पे टंगी घड़ी के पेंडुलम ने एक एक कर बारह बार आवाज़ निकाल तारीख़ बदलने की सूचना दे दी| दोनों की आँखों में नींद का अभी कोई सुराग नहीं था| उसकी आँखें अभी भी भूदत्त के हाथों में पकड़ी डायरी पर ही थीं|

भूदत्त ने डायरी खोली और पड़ना शुरू कर दिया|

“ आज मैनेजर मुझसे बहुत नाराज़ है| उसने कुछ कहा तो नहीं पर उसकी आखों का गुस्सा मुझे साफ़-साफ़ दीख रहा था| इतना साफ़ जैसे मेरे साथ बगल ही में चल रहा हो| मेरी तलब ने आज से पहले मेरे व्यवहार में इतनी मुश्किल तो खड़ी नहीं की थी| न ही आज से पहले कभी सही–शाम मुझे पीना ही पड़ा था| बेचारे को कितनी दूर पैदल चल कर आना पड़ा था | कौन जाने?”

वो सुन रही थी पर भूदत्त वहां हो के भी कहीं और थे| ये लिखावट उन्हें कितने बरसों पीछे खींच के ले गयी थी|

3

हवा के चारों ओर शाम का पतला झीना पर्दा डला हुआ था। सड़क के अंतहीन रास्ते से दौड़ती हुई गाड़ी उस नये पुते हुए मकान के आगे एकदम ही थम गयी थी जैसे मानो कहीं और जाने की हड़बड़ी में हो और अचानक रास्ता भूल कहीं और आ गयी हो| गाड़ी यूँ तो पुराने ढ़ब की थी पर शाम के चढ़ते अँधेरे में उतरते सूरज की किरणों में बिलकुल नयी सी चमक रही थी। गाड़ी का दरवाज़ा खुला और आगे की तरफ़ से एक आदमी उतरा। उसने नज़र भर सामने खड़े मकान को देखा उसकी शान को देखा और छत के कँगूरे पे नीले पत्थर का बना मोर देखा। घड़ी भर में ही पूरे मकान का जायज़ा ले उसने गाड़ी का पिछला दरवाज़ा खोल दिया।
“मैडम”
सर पर धूप का सियाह चश्मा,हाथ में एक घड़ी और चेहरे पे थकान लिए गाड़ी की पिछली सीट से लदबदाते अटपटे से कपड़े पहने वो उतरी।
“ये क्या जगह है?”
“आपका घर”
“इसपे इतने सारे कबूतर क्यों बैठे हैं?”
“कबूतर !”उसने चौंक कर सब जगह देखा पर उसे कुछ नज़र नहीं आया।
“कहाँ?”
“वहां कंगूरे के कोने पे बैठे हैं देखो कई सारे।“
“वहां तो पत्थर का मोर बना हुआ है आप ही ने तो कहा था मिस्त्री को बनाने के लिये|”
“किस मिस्त्री से?”
“जिसने ये घर बनाया है आपके लिये?”
“किसके लिये?”
“अच्छा छोडिये ये सब बातें और अंदर चल के घर देखिये|”
“नहीं”
“क्यों भला?”
“ये जगह अच्छी नहीं है| यहाँ डर लग रहा है मुझे| बेच दो इसे मुझे नहीं रहना यहाँ|”
‘………….’
“तुम भी वापस चले जाओ|”
“कहाँ?”
“जहाँ से तुम आये हो। कहीं से तो आये ही होंगे तुम? वैसे तुम्हारा नाम क्या है? मुझे याद नहीं पड़ रहा|”

वो उसे अपना नाम बताता उसने पहले ही उसने गाड़ी की चाबी उसके हाथ से छीनी और उसे सुनसान जगह अकेले मकान के सामने खड़ा छोड़ चली गयी।

“कहाँ से आये थे आप?” तराना ने पूछा|

“कलकत्ते से, सोलह की उमर में बम्बई भाग के आया| एक साल अशोक स्टूडियो में छोटा-मोटा काम किया| उसके बाद अशोक स्टूडियो की जिस फिल्म में मैडम काम कर रहीं थी उसका क्लैप बॉय था| ”

“फिर|”

“फिर क्या धीरे-धीरे मैडम के संग उनका काम देखने लगा और बाद में उनका मैनेजर बन गया| उन दिनों मैडम का बड़ा रुतबा हुआ करता था| जिसे देखो वही उन्हें फिल्म के लिए साइन किये जा रहा है|अशोक स्टूडियो वालों ने ही उन्हें एक साथ सात फिल्मों के साइन किया तो इंडस्ट्री में हंगामा मच गया|”

“क्यों?”

“उस ज़माने में किसी भी हीरोइन केलिए अशोक स्टूडियो की एक भी फिल्म करना बहुत बड़ी बात थी| और मैडम ने तो एक साथ सात फिल्में साइन की थीं| अगले तीन साल वो टॉप पर रहीं| सातों फिल्में सुपर हिट, एक से बढ़कर एक| इन्हीं फिल्मों के बाद उन्हें दर्द की रानी का टाईटल मिला| और इसी के बाद दर्द उनसे हमेशा के लिए चिपक गया| जिसने उन्हें बिलकुल बर्बाद कर दिया|”

“मैं अभी जब वापस आ रही थी तो नेट पर पढ़ा कि उनके बड़े अफेयर्स थे| क्या ये सच है?”

“आदमी जब अकेला और अंदर से खाली होता है तो कई अलग-अलग लोगों में उस चीज़ को तलाशता है जो किसी एक में उसे पूरी मिलनी चाहिए थी| अफेयर्स-वफेयर्स तो कुछ नहीं हाँ बहुत लोगों से दोस्ती थी उनकी| बाद में जब ये इंसानी दोस्त कम पड़ गए तो उन्होंने पानी से दोस्ती बढ़ा ली| अफ़ीम तो पहले से ही दामनगीर थी|” भूदत्त ने सांस छोड़ते हुए कहा|

“पानी?”

“यानि शराब|”

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बरसात लगातार पिछले कई दिनों से बरस रही है| जज़ीरा के इस कमरे से समंदर सामने ऐसे ठाठे मारता उठता दीख रहा है जैसे इन फुहारों के साथ-साथ चल कर कमरे में आ जायेगा| समाने पड़ी कुर्सी पर मेरे पास बैठ जायेगा| मेज़ पर खुले शतरंज के मोहरे उठाएगा कोई चाल चलेगा| मुझसे कहेगा कि इस बाज़ी के बाद कुछ पिलाओ गला ख़ुश्क हो रहा है| मैंने सारा घर छान मारा पर एक बूँद भी नहीं मिली| वो सब जगहें भी खाली थीं जहाँ मैं अक्सर बोतलें छुपा के रख देती हूँ| ये मैनेजर आजकल मेरे ऊपर बड़ी निगाह रखे हुए है| जब से डॉक्टर ने उससे कहा है कि अफ़ीम से मेरे ज़हन को जो नुकसान हुआ है शराब उसे बढ़ा रही है| इसीलिए मुझे अब बड़े शरीफ़ अंदाज़ से घर में अक्सर नजरबंद रखा जाता है| जब मैंने इस घर का नाम जज़ीरा रखा था तब ये कहाँ मालूम था कि एक दिन मुझे ख़ुद ही इसमें क़ैद होना पड़ेगा| डॉक्टर ने कहा है अफ़ीम ने मेरे दिमाग को सिकोड़ना शुरू कर दिया है और शराब से लिवर पर सूजन आने लगी है,जो बढ़ कर कल को जानलेवा भी हो सकती है| मैनेजर बोलता है अगर ऐसा रहा तो काम मिलना,काम करना बहुत मुश्किल हो जायेगा मेरे लिए| रंगत और चेहरे- मोहरे की इस चमकदार दुनिया में काम का नाम बहुत बाद में आता है| जब तक चेहरे में चमक की बनावट थी तब तक बेशुमार काम पाया मैंने| दिन की तीन-तीन शिफ्ट्स भी की हैं और अब सारा वक़्त ख़ाली| पलटकर देखूं तो अशोक बाबू की बस वही एक बात याद आती है |

“तुम सिनेमा का जीता-जागता दुःख हो, यही दुःख तुमको सफलता का सुख देता है| यही सुख परमानेंट है चित्रा|” कितनी गलत बात कही थी उन्होंने, जीवन में सबसे भुरभुरा सुख ही होता है कि छूने भर से ही चटक के बिखर जाये, जबकि इसके उलट दुःख चाँदी का महीन तार है जिसकी नक्काशी बहुत घनी और मजबूत होती है। मैंने इस तार से ख़ुद को ऐसा लपेटा है अब किसी और की कोई ज़रूरत नहीं| जब मैंने “साहिल और सितारा” बनाई तो राजेन्द्र को लेना चाहा पर उसने साफ़ टाल दिया| इसी राजेंद्र के साथ मैंने कितनी फिल्में की थीं इसके कैरियर को एक मुकाम पर पहुंचाया था| जब ऐन मौके पर इसने मना कर दिया तब अशोक बाबू ने साथ दिया  मेरा | खैर फ़िल्म को नहीं चलना था और नहीं चली| अकेलेपन से ये मेरी दूसरी मुलाक़ात थी| इस अकेलेपन ने मुझे ख़ुद को और मेरे साथियों को समझने का वक़्त दिया|

किसी को भीतर-भीतर जो माँझता है वो अकेलापन ही तो है| ठीक वैसे ही जैसे अकेले होने पर रात थोड़ी चमक सी जाती है,जैसे जुगनूपोसे हुए| आधे चमकदार अँधेरे में चंद्रमा की रगों में चलने वाला अकेलापन ही उसे एकांत का उजला दिया बनाता है|रद्दो-बदल की सभी संभावनाओं से परे अकेलापन बड़ा स्थायी है| नींद बीच-बीच में आ कर मेरी पलकें झुका रही है| रह-रह कर मेरे कानों में लोगों के बोलने की आवाज़ आ रही है| ये जगह जज़ीरा का मेरा कमरा नहीं कोई अस्पताल है| मेरे बिस्तर के सामने एक कैलंडर टंगा है जिसपे शिव की तस्वीर बनी है| ये तस्वीर मुझे एक सपने में अतीत के एक घर में ले आई है| सामने एक कमरा है, चौखट और उससे सटा आला| ये चौखट कभी पूरी खुली ही नहीं| अम्मा आले में रोज़ ही दिया जलाती थीं| उसकी रौशनी दरवाज़े से टकरा,ज़रा सी आड़ ले कर कमरे में दाख़िल होती और ठीक एक जगह जा कर बिखर जाती| आले में शिव की मूर्ति है और रौशनी के ठीक ऊपर मेरी एक तस्वीर है कोई इक्कीस-बाईस साल पुरानी| ये तस्वीर उन दिनों की है जब मेरे पास बेशुमार काम, नाम,पैसा था| आज कुछ भी तो नहीं,कोई साथी भी नहीं| नर्स ने आ कर इंजेक्शन लगाया और किसी से कुछ कहा| उसकी आवाज़ मेरे कानों तक आई पर लौट गयी| मेरे कानों में हर पल बीते कल की आवाजें और भी गाढ़ी हो कर गिरती हैं और दिल पर काई की एक परत सी जम जाती है| कितने चेहरे,कितने रास्ते,कितने स्टूडियोज़ क्या-क्या याद आता है मुझे सिवाय अपने नाम के| उम्र ही याद है| बारह बरस होगी जब पहली दफ़ा ख़ुद को परदे पर देखा था मैंने| नाम शायद पहले फिल्मों के लिए चित्रमलिका रखा था जिसे बाद में बदल कर चित्रा देवी रख दिया था| अब तो न मुझमें चित्रमलिका ही बची है और न ही चित्रा देवी| अब बचा है भीतर एक खंडहर जिसमें अजाने समय की चलती-फिरती तस्वीरें कभी टहलती हैं| कभी थक के घुटने मोड़ वहीं नंगी ज़मीन में सो जाती हैं या आपस में बतियाती रहती हैं| सोना बस इन परछाईयों को ही हासिल है मुझे नहीं| नींद तो कब का मेरा साथ छोड़ चुकी है| ले दे कर अब मेरे पास बची है अतीत की तस्वीर, आस्था के नाम पर एक मूर्ति और दो ख़ाली हाथ| इस आले में कभी बिजली की झालर लगी थी जिसे जाने मैंने कब का हटा दिया और इसकी जगह मैंने दिया जलाना शुरू कर दिया| पर मेरा मन चाहता था कि अकेलेपन,अवसाद,उदासी, छटपटाहट कीजिस आग में मैं जल रही हूँ उसे मैं ही क्यूँ अकेले महसूस करूं इसकी आग ज़रा उस तक भी तो पहुंचे जिसके लिए मैंने सुन रखा है कि वो नाट्य शास्त्र और रंगमंच के जनक हैं| ऐसा होता तो नहीं, मुक्ति की कामना कहीं दीप जलाने से पूरी होती है| इस कामना, इस चाहत के लिए ख़ुद ही को जलाना पड़ता है| मेरी आँखें बार-बार झपक रहीं है, ऐसा लगा जैसे मैनेजर सामने से निकल कर गया हो| अब की बार देखो इस अस्पताल में कितना रुकना पड़े|

…………………………………..

भूदत्त की हथेलियों में जाने कितने सालों का पसीना उतर आया था| उस पसीने में सालों-साल की ख़िदमत का नमक था| पिछले दस दिनों में ये उन्हें दूसरी बार अस्पताल ले कर आना पड़ा था| बंद मुठ्ठी में लिपटे हुए दवाई के पर्चे पसीज गये थे| उसके दूसरे हाथ में दवाई की थैली थी जिसमें नींद की बेशुमार गोलियां थीं| डॉक्टर पिछले कितने ही दिनों से रोज़ उन पर नयी-नयी गोलियों का प्रयोग कर रहा था| भूदत्त उनके सरहाने खड़ा है, इस उम्मीद में कि थोड़ी ही सही पर उनको नींद तो आये| वो पलंग पर हैरान और थकी हुई लेटी हुई थीं| आज तीसरा दिन था, पर उनकी आँखों में नींद का एक कतरा भी नहीं था| उनने परदे पर कितनी ही बार अस्पताल की नर्स का, डॉक्टर का किरदार निभाया था| मरीज़, पर मरीज़ तो कभी नहीं बनी थीं वो| ज़हन की नाव बार-बार डूब कर सतह पर आ जाती थी| ऐसे ही किसी जागे हुए पल में उन्होंने भूदत्त से कहा|

“अब क्या हॉस्पिटल ले आये हो?”

“हाँ”

“पैसे का कैसे होगा?”

“देख लिया जायेगा कुछ|”

वो एक पल को तमतमाई और हाथ में पकड़ा ग्लास छनाक से फ़र्श पर दे मारा| कांच किर्ची-किर्ची पूरे फ़र्श पर टूट के बिखर गया|

“तुमने उस टुच्चे आदमी के साथ मिल कर मेरा सारा पैसा लूट लिया| उसने सारा पैसा अपने घर भेज दिया| क्या था वो? मैंने काम किया उसकी फिल्मों में तब उसका नाम बना| तुमने उसके ही साथ मिल मेरा ही बटुआ साफ़ कर डाला|”

वो चुप रहा| वो जानता था ऐसे पैनिक अटैक्स उसे जब-तब आते रहते हैं|

“दफ़ा हो जा यहाँ से|”

वो फिर भी वहीं खड़ा रहा| उसे पता था ज़रा देर ही में ये लहर साहिल से टकरा के शांत हो जायेंगी|

“अच्छा सुनो वो नीली गाड़ी निकाल दें तो कितना मिल जायेगा?”

“यही कोई तीस-पैंतीस तक|”

“तो फिर बेच दो उसे|”

“ठीक है| मैं जाऊं अब मैडम?”

“जाओ|”

वो पलटा ही था की उनने फिर टोक दिया|

“सुनो! हॉस्पिटल में मेरा असली नाम ही लिखवाना|”

“क्या है आपका असली नाम?”

“अभी तो याद नहीं आ रहा|” उनकी आवाज़ में अब झुंझलाहट उतरने लगी थी|

“तुम्हें याद है क्या है मेरा नाम?”

“चित्रा देवी|”

“नहीं,नहीं, चित्रा नहीं है| शायद,……… शायद रोचना| हाँ रोचना देवी तुम यही नाम लिखवाना|

रोचना देवी, रोचना देवी देर तक उसके भीतर ये आवाज़ गूंजती रही|

“रोचना देवी कौन थीं वैसे?”

“अस्ल में तो पता नहीं पर उनकी फिल्म ‘साहिल और सितारा’ में ये उनके किरदार का नाम था| ये नाम भी जाने कहाँ से उनके दिमाग में बस गया था| पहले निशा था पर एक दिन बोलीं की फिल्म में उनका नाम रोचना रहेगा| सब डिस्ट्रीब्यूटर अड़ गए कि नाम बदले बिना काम नहीं चलेगा| पर वो मानी ही नहीं, फिल्म पांच महीने की देरी से रिलीज़ हुई और फ्लॉप हो गई| इसके फ्लॉप होने से उन्हें बड़ा सदमा सा लगा| इसी के घाटे को पूरा करने के लिए उन्हें घर बेचना पड़ा| इसके बाद बस एक आखिरी फिल्म कर पायीं वो|

“मैं कहाँ मिली उन्हें?” तराना ने भूदत्त से पूछा|

“पता नहीं| मुझे एक बार एक चेक दिया और जुहू के एक स्कूल भेज दिया| बोलीं की जाओ बच्ची की फीस भरनी है| उसके बाद सात-आठ महीने तक मैं ही जा कर तुम्हारी फीस जमा करता था| मैडम के बाद गया तो पता चला कि वो पहले ही सब इंतजाम ख़ुद ही कर गयीं है|”

“आप जानते हैं ये मुझसे मिलने क्यों नहीं आयीं कभी?”

“पता नहीं| शायद किसी को पता नहीं लगने देना चाहती होंगी|”

“पर क्यों?”

“ये इंडस्ट्री ऐसी है, जहाँ लोग अपने सच छुपा कर रखते हैं| मैंने कई हीरोइन देखी हैं जो शूटिंग की नकली शादी में अपना असली मंगलसूत्र पहन लेती है| इसलिए कि लोगों को पता नहीं चले की उनकी शादी हो चुकी है|”

रात छम्म शांत थी| तराना ने देखा कि दिन की रौशनी में चित्र उतना उदास नहीं लग रहा था,जितना की इस बल्ब की रौशनी में| ऐसा लग रहा था जैसे आँखों की उदासी अब तरल हो कर बह निकली हो, और चेहरे पर अलग अलग जगह जा कर ठहर गयी हो| सुबह माथे पर लकीरें नहीं थी पर इस समय कितनी साफ़ दीख रही है| ऐसा लग रहा है जैसे उनकी बातें सुनकर तस्वीर का चेहरा परेशान हो उठा है|

4

“ये शहर इतना हंगामाखेज़, इतने फित्ने उठाने वाला है कि मत पूछो| ये जलवे,ये फ़ित्ने सतह पर नहीं दीखते| ये तो यहाँ रोज़ गाड़ियों से क़तार-दर-क़तार उतरने वाले जवान लोगों के सीने में सोये रहते हैं| इस शहर ने जाने कितने ही शहर अपने अन्दर समा लिए वो भी एकदम चुप रह कर| इन चमकदार बत्तियों के पीछे, शॉट्स के क्लैप के पीछे, एक्शन की आवाज़ के नीचे, और टिन के इन भारी भरकम दरवाजों के अन्दर कितने ही खेत, दुकान दम तोड़ चुके हैं,जो शायद जिंदा होते अगर ये जवान यहाँ दौड़ के न आये होते | यही क्यों !ये शहर तो जाने कितनी ही जवानियों के कंगूरे पर टिका है जिन्होंने कब का दम तोड़ दिया है|” उनने मेकअप करते हुए पीछे खड़े भूदत्त से कहा|

“आप भी तो कभी यहाँ आई थीं?”

“हाँ! हर आने वाली चीज़ एक दिन वापस लौट जाती है| जानहार को मसीहा और उडी हुई फ़ाक्ता को कभी कोई मुंडेर रोक पायी है भला| हम भी उड़ जायेंगे एक दिन मैनेजर साहब| गाड़ी में न सही तो किसी काँधे पर टिक के ही| तुम कहाँ लौटोगे? मैंने तो कभी पूछा ही नहीं तुमसे मैनेजर|

“जहाँ आप जाएँगी मैडम,इतने साल आपकी हाज़िरी में दिए हैं,आगे भी वहीं रहेंगे|

“खैर करो साहब, हम तो अब अपने पर तौल रहे हैं| चलाचली की बेला है| अब तो यहाँ से आख़िरी ठिकाने ही जायेंगे| तुम क्यूँ फ़ज़ूल साथ चलने की रट लगाते हो|”

“क्यों ऐसा बोलती हैं आप? आप की राह तो बिलकुल सीधी है| अभी तो बरसा-बरस हैं आप|”

‘सीधी है राहे शौक़ प यूँ ही कभी-कभी

ख़म हो गई है गेसू-ए-दिलदार की तरह

 

‘मजरूह का ये शेर नहीं सुना तुमने| दुनिया की कोई राह सीधी रही है कभी|” कह के उनने सिंगारदानी के ऊपर लगा बल्ब बुझा दिया जिसका एक ही मतलब था कि भूदत्त अब जा सकता है| पर वो कहीं नहीं गया, वहीं खड़ा रहा| वो पलटी और उसकी दोनों हथेलियाँ पकड़ लीं|

“दोस्त और दोस्ती को इस शहर में खोजना बहुत मुश्किल काम है मैनेजर| ये शहर गरम देस की बंजर ज़मीन सा है| अव्वल तो फूल खिलना ही बहुत मुश्किल है यहाँ और अगर खिल भी जाए तो झुलसा जाता है| तुम अब कोई और काम ढूंढ लो| ये दरिया अब सूखने लगा है| भूखे-प्यासे होने की नौबत आये उससे पहले दूसरा काम देख लो मैनेजर| तुमने इतने साल अकेले मेरा काम सँभालने में बिता दिए ये क्या कम अहसान है|”

भूदत्त ने कुछ कहा नहीं पर उनने उसकी आँखों की नमी देख ली और उसकी हथेली थपथपा के छोड़ दी|

……………………………..

दिन निकल आया था| जाली की दीवार में से धूप आकर कमरे में बिखर गयी थी| घर में सबसे पहले धूप इसी कमरे में आती है| तराना उठी तो उसने देखा कि भूदत्त वहीं आराम कुर्सी पर सोये हुए हैं| डायरी उनके पैर के पास पड़ी हुई थी| उसने डायरी उठाई तो वो जाग गये|

“अरे उठ गयीं तुम? मुझे तो पता ही नहीं चला जाने कब नींद आ गयी|”

“मुझे भी|”

“तुम ब्रश कर लो मैं चाय बना कर लाता हूँ|”

“आप बैठिये मैं बना के लाती हूँ|”

“अच्छा! दूध फ्रिज में है और चाय पत्ती,चीनी चौके में सामने ही रखी है| दोनों पर लिखा हुआ है|”

“आप अभी भी मुझे उतनी ही छोटी समझ रहे है कि जिसकी फीस भर कर आया करते थे| शायद जिसे तब पढना भी नहीं आता था|”

वो उसकी बात पर हँसे तो उसने गौर किया कि ये हंसी बड़ी निश्छल है| इतने साल उनके साथ काम कर के भी उनकी उदासी इन्हें पूरी तरह छू नहीं पायी| कैसी रही होंगी वो? उसने सोचा और चाय बनाने चली गयी|

“अच्छा ये मोनालिसा की तरह मुँह बंद कर के पोट्रेट क्यों बनवाया था इनने| खुल कर हँस नही सकती थीं|”

“ये चित्र तो बहुत बाद में बना है| उनकी डेथ के कई सालों बाद|इसी फोटो से बनवाया था|ये फोटो ही बिलकुल आख़िरी दिनों की है| महाबलेश्वर में शूटिंग के वक़्त कभी खिंची थी ये फोटो|”

“इनके अपने बच्चे?” तराना ने पूछा|

“शादी ही बहुत कम वक़्त रही इनकी| मेरे ख्याल से कुल चालीस-बयालीस दिन|”

“ओह!”

“शूटिंग के बीच ही शादी हुई और बीच ही में ख़त्म| बड़ा अकेलापन रहा जीवन में|”

“हूँन्न्नन्न्न्न”

“मैं ज़रा बाज़ार हो आऊं| तुम अगर और सोना चाहो तो अंदर पलंग पे सो जाओ|”

भूदत्त के जाने बाद वो बहुत देर तक दुबारा उस तस्वीर को देखती रही| कौन सा ऐसा भाव था उस चेहरे पर जिसे वो पढ़ नहीं पायी थी अभी तक, पकड़ नहीं पायी थी| कल रात से दसियों बार तो देख चुकी है इस फोटो को| रौशनी के अलग-अलग कोण पर रख कर तो देख चुकी है फ्रेम को फिर भी कुछ छूट गया है| इन आँखों में अकेलापन,उदासी, दुनिया से जाने का ग़म नहीं है| इनमें तो कोई अधूरी इच्छा, कोई चटकी हुई आरज़ू है| उसने डायरी के खुले पन्ने पर हाथ फेरा और आगे पढना शुरू कर दिया|

5

शाम बुझते-बुझते समंदर में उतर गयी है| गली के लैंप-पोस्ट के नीचे दो मरियल कुत्ते एक दूसरे से सट कर सो रहे हैं| टैक्सी से उतर कर जब वो साया गली में घुसा तो उनने आँखें खोली और फिर बंद कर लीं| जैसे ये साया इस गली का ही कोई बाशिंदा हो जिसे ये कुत्ते पहचानते हैं| ये छोटे काश्तकारों और मछुहारों का मोहल्ला है| यहाँ सब सीपियों से बना सामान खरीदते-बेचते हैं| इसी मोहल्ले की पिछली गलियों से निकल कर पलाश स्टूडियो की तरफ़ जाया जा सकता है| ये एक छोटा स्टूडियो है और इसकी फिल्म ‘शमा’ में आजकल मुझे काम मिला है| मेरी पहली फिल्म भी पलाश की थी और शायद ये वाली आखिरी हो|

वक़्त की ढ़लान पे खड़ा आदमी कब फिसल जाए उसे पता ही नहीं चलता| गुरुर का ढेला कब आ कर आपके माथे पर लगे और आपका गुमान ज़मीन पे आ जाए| धूप में फैली परछाईं अब शाम आते-आते सिकुड़ने लगी थी|सालों फिल्मों में चमकता सितारा होने के बाद अब मुझे दूसरे दर्जे के रोल मिल रहे हैं| इस के अलावा मेरी अपनी फिल्म ‘साहिल और सितारा’ ही है मेरे पास| वो साया बढ़ते-बढ़ते दरवाज़े के सामने आ आकर रुक गया| दस्तक ने मुझे चौंकाया नहीं बल्कि मुझे मालूम था कि वो मुझे ढूंढते हुए यहाँ तक भी आ जायेंगे| ये दस्तक मुझे किसी और जहान के बाशिंदों के पास ले गई| ये ज़िक्र आज का नहीं है| पिछली सदी की वो रात किसी अंधे कुएं से निकल कर मेरे सामने खड़ी थी| अँधेरे कमरे में अम्मा हैं और मैं हूँ| रौशनी के नाम पर एक लालटेन जल रही है| जिसका चटका हुआ शीशा मेरे सामने दीवार पर एक ऐसे पेड़ की तस्वीर बना रहा है जिस पर कोई फूल,पत्ती,फल ही नहीं है| बार-बार मुझे यही ख्याल आता है कि किस्मत ने हम बे-समर पौधों को रोपा ही क्यूँ?और अगर रोपना ही था तो चटानों में ही क्यूँ? मौसम खुला है पर समंदर की नम हवा बता रही है कि आज पानी पड़ेगा| लालटेन की रौशनी अब बुझने की कगार पे थी कि दरवाज़े पे खटक हुई|

“कौन?”

“मैं”

बाबा की आवाज़ पर अम्मा ने झट से किवाड़ खोल दिये| बाबा जो पिछले हफ़्ते-आठ दिन जाने कहाँ घूमने के बाद घर आये थे| ऐसे लग रहे थे जैसे उम्र के आठ-दस साल कहीं घिस कर उतार आये हों| न अम्मा ने पूछा और न ही बाबा ने बताया कि वो कहाँ थे इतने दिन| उनने मेरे हाथ में सीपियों से गूंथी दो माला रख दी| मैंने उन्हें उलट-पलट के देखा| सफ़ेद सीपियों में नारंगी मोती पड़े हुए थे| ये खुर्शीद की दुकान की माला होंगी शायद| उसकी दुकान का सामान तो महंगा होता है| कोई भी माला बीस-बीस पैसे से कम की नहीं होगी| मैं सोचती रही कि बाबा के पास चालीस पैसे कहाँ से आये होंगे, जबकि मुझे तो माला पा कर खुश होना चाहिए था| तंगी बाज़दफ़ा ख़ुशी के माने बदल देती है|

“खाना खाओगे?” माँ ने हंडिया देखते हुए पूछा, हालाँकि सब ख़ाली थी|

“नहीं! पेट में जलन सी हो रही है| कुछ ठंडा हो तो दे दो| दूध सा………|”

अपने ही घर में उन्हें दूध जैसी चीज़ मांगने में शर्मा और झिझक हो रही थी| माँ ने जाने किस कोने से छुपा हुआ दूध का कप निकाला और उन्हें पकड़ा दिया| वो शायद नहीं जानती थीं कि वो जलन क्या है? आज होतीं तो मैं समझा पाती कि अम्मा दिन-रात की इस आग़ में जलाना कैसा होता है? दो घूँट दूध पी कर बाबा ने माँ से कहा|

“कल इसे पलाश ले जाना| शायद कुछ काम बन जाये| मैं बात करके आया हूँ आज|”

“कैसा काम ?”

“वो लोग एक फिल्म बना रहे हैं जिसमें चाँद की छोटी बहन के लिए एक लड़की की तलाश है उन्हें |”

चाँद सचमुच चमकता चंदा थी उन दिनों| उसकी बहन का रोल मिला था मुझे पहली ही फ़िल्म में| हीरोइन की बहन, दूसरे दर्जे का रोल है तो क्या हुआ? काम तो मिला|बारह साल की लड़की को फिल्मों में इतनी बड़ी हीरोइन के साथ काम करने का मौका मिल रहा है ये क्या कम बड़ी बात है| कुल सात सीन थे पूरी फिल्म में मेरे| और आखिर का सीन जिसमें मुझे मरना था| चाँद सीने से लगाए रो रही है मुझे,मेरी कांपती आवाज़ धीरे-धीरे ख़ामोश हो रही है| सच कहूं मुझे आज भी लगता है कि चाँद से अच्छा शॉट दिया था मैंने| देखो कैसे किस्मत ने पहली ही बार में पहचान लिया कि ग़म से मेरा बड़ा करीबी रिश्ता है| उसकी लगाई मोहर आज तक हल्की नहीं पड़ी| जिंदगी पलाश के जिस गोल चक्कर से शुरू हुई थी वहीं खत्म भी हो रही है|

………………………………..

मैं सुनसान गली में चल रही हूँ| बरसात के बाद आकाश में धुला हुआ चन्द्रमा मेरे साथ चल रहा है और ज़मीन पर उमर का चौदहवां बरस| हवा की खुनकी में हाथ में पकड़े हुए पाव ठन्डे पड़ते जा रहे हैं| पिछले दो साल से लगातार छोटे-मोटे काम करके मैं थक चुकी हूँ| पर रोटी की गर्माहट थकने का कोई मौका नहीं देती| हर मौसम में चेहरे की रंगत तो बदल जाती है पर मेरी आँखें ये वैसी ही खामोश, खाली रहती हैं| इनने किसी भी रंग का आना रोक दिया है| कई बार ख़ुद आईने में अपनी आँखें देख के डर जाती हूँ| चौदह बरस की आँखें ऐसी तो नहीं होनी चाहिए| क्या कभी कोई शोख़ी यहाँ आकर बस पायेगी? घर आ गया,किवाड़ भिड़े हैं | मैं दौड़ कर अम्मा को ये बताना चाहती हूँ कि अगले बरस पलाश वालों ने एक छोटे बजट की फिल्म में मुझे हीरोइन लेने का वादा किया है| इस फिल्म के बाद उसी की तैयारी करनी है मुझे, और चाँद के कपड़े तैयार करने वाले मास्टर मेरे कपड़े बनायेंगे इस फिल्म में| पर अम्मा जिन्हें मैंने कभी अपना नाम लेते भी नहीं पाया क्या समझ पायेंगी इस ख़ुशी को? मुझे तो ये भी नहीं पता कि उन्हें मेरा नाम याद है भी या नहीं| वो सीन मेरी आखों से निकलता ही नहीं,अधखुली किवाड़ की दरार के बीच से मेरी आँखों में सदा के लिए बस गया है| बाबा लेटे हुए हैं| सर के नीचे पतला तकिया लगा हुआ है| शायाद दर्द बहुत बढ़ गया है| अम्मा उनके घुटने एक-एक कर के मोड़ रही हैं और पेट के नज़दीक खिसका रही हैं| जाने उन्हें घुटने पेट में देने से सच में आराम मिलता था या आराम का वहम| अम्मा एक हाथ से उनका माथा सहला रहीं हैं और दूसरे से अपनी पनीली आँखें पोंछ रही हैं| बर्फ़ की एक ठंडी चटान मेरे सीने में सरक गयी| चौखट के इस पार मैं हूँ और उस पार घर है| घर जिसमें अपनेपन का साझा दुःख है पर मैं इस साझे में कहीं नहीं हूँ| मैं कि जिसके मुस्तक़बिल में ज़माने भर को ग़म का नाटक दिखाना लिखा है उसका अपना ग़म क्या है? दिल के डूबने की आवाज़ पहली बार तभी सुनी थी मैंने| और मेरे इन आख़िर दिनों तक ये लगातर किसी अंधी सुरंग में डूबता ही जा रहा है| बाबा के जाने बाद अकेलेपन ने,तन्हाई ने मुझे शिद्दत से जकड लिया|बाबा ऐसे गए जैसे भरी दुपहरी धूप में खेलते-खेलते कोई साथी किसी दीवार की ओट में दम भरने बैठे और फिर चुपचाप नज़रें बचा कर बीच खेल में से भाग जाये| अम्मा से मेरा कभी कोई उन्स का रिश्ता नही रहा| अम्मा और मैं अब बिना डोर के हवा में लटके घर के बाशिंदे थे| नजदीकियों के नाम पर मेरे हाथों में ख़ाली अदृश्य हवा थी| जिसे जितना भींचना चाहूँ वो उतनी ही तेज़ी से बाहर हो जाए| घर, अपने लोग, और रिश्ते मेरे मन में गढ़ी ऐसी फांस थे जिसे मैंने जितना निकालना चाहा उतना ही अन्दर धंस गए| इस दिली नासूर से बचने के मैंने नया साथी खोज लिया था,नशा| काम से लौटो ज़रा अपने साथी से बात करो और आसमान में उड़ जाओ| धीमे-धीमे इस नशे ने मुझे अपने दामन में समेट लिया| अब छोटी-छोटी चीज़ों से दिल को तसल्ली नहीं मिलती थी| पहले अफ़ीम और अब शराब रात-रात भर मुझे गोद में ले कर लोरियां सुनाते हैं, नींद में ले जाते हैं| अम्मा ने कभी मुझे रोकने की कोशिश नहीं की| जाने उन्हें मुझसे डर लगता था या बेपरवाही थी| जो भी था अब लोगों को मैं पसंद आ रही थी, मेरा काम पसंद आ रहा था| मेरी किसी रेगिस्तान में फंसे मुसाफ़िर सी डूबती, कांपती आवाज़ लोगों को सुरूर से भर देती थी| मेरा टूटता वजूद उन्हें अदाकारी का नायाब नमूना लगता| पर कोई कभी समझ पाया कि मैंने कैसे अन्दर ही अन्दर ख़ुद को खींच के तान रखा है| जिंदगी मुझे बार-बार भरमा देती है कि बहार के मौसम बहुत हैं बस तुम मेरा हाथ न छोड़ना| और मैं पागल इस भुलावे में आ कर अपनी डूबती नाव का चप्पू फिर थम लेती हूँ| ओह! बाबा अगर तुम होते तो मैं तुम्हें मन के सब राज़ बोल कर सुनाती|

……………………………..

कितनी अकेली उदास सी शाम है| घर की सब बत्तियां जल रही है पर रौशनी नीचे फ़र्श पर आते-आते कुम्लाह गयी है| कैसा अँधेरा है जैसे किसी ने हाथों पर रगड़ कर दिन के चेहरे पर राख मल दी हो| मैनेजर को मैंने आजकल आने के लिए मना कर दिया है| शूटिंग भी रोक रखी है, जाने प्रोड्यूसर कैसे इस नुक्सान को भर पायेगा| खैर मैंने ख़बर भिजवा दी है की इन पांच-सात दिन का मुआवजा मैं ही भरुंगी| हम सोचते क्या हैं और क्या हो जाता है | इस शहर ने बिलकुल बारबर का लेन-देन किया है मुझसे|खूब रौशन दिन दिखाए तो बे-हिसाब काली रातें| उजली धूप दिखाई तो तेज़ बारिश भी दी| ये झूले की पींगों सा बरसता पानी, तेज़ चमकती बिजली और नमीदार हवा मेरे दिल की खोखली दरारों में भीतर तक उतर जाती है| रेशमी उदासी वाला ये मौसम कितनी दफ़ा मेरे पैरों में उलझन के चक्कर छोड़ जाता है| ऐसे मौसम में सिर्फ मरने का इंतज़ार बाकी रह जाता है| मरना कितनी दीवानगी से भरा हुआ है| हर बार की तरह इस बार भी ये मौसम मुझे मायूस कर कर गुज़र जाएगा|

इसी उलझन, इसी मायूसी से निकलने के लिए हम ज़िन्दगी को कितनी ही बार गलत हाथों में सौंप देते हैं| बाद में कितनी ही नाकारा, नाकाम कोशिश करते हैं सब समेटने की| पर तब सिवाय किर्चियों के हाथ क्या आता है? मैंने उसे पहले देखा या उसने मुझे ये कहना,सोचना बेमानी है| अस्ल माने इस चीज़ के हैं कि हम जिसको साथी मान रहे हैं वो जिंदगी के लम्बे रेगिस्तान में प्यार भरी फ़ुहार सा बरसेगा या ग़ुबार भरे बादल सा गुज़र जायेगा| झूठी,लफ्फाज़ और बेमानी ख्वाहिशों के लिए हम साथ तो आ गए पर जुड़ न सके| सोने सा चमकता तांबे का टांका ज़्यादा चल नहीं पाया| हम अधूरी ख्वाइशों के साथ-साथ रहे| प्यार का मुखौटा तो हमारी शादी में पहले ही हफ़्ते सरकने लगा था| जिस दीवार में बनने से पहले ही दरार आ जाये उसकी तामीर रोक ही देनी चाहिए| हमारा रिश्ता बड़ी जल्दी ही रास्ते पर आ गया, बस जैसे किसी इद्दत के खत्म होने के इंतज़ार में हो| वो छोटा था मुझसे उमर में| उमर से छोटे आदमी की ख्वाहिशें, चाहतें अलग होती हैं| वो आप में दोस्त ढूंढेगा,उसकी चाह का तलबगार ढूंढेगा| पर आपके उन नाज़ों को नहीं उठायेगा जिसके लिए आप किसी और को तलाशते हैं| किसी चेहरे में किसी आईने को तलाशना बड़े जोखिम का काम है| कोई चेहरा लाख चाह कर भी वह आईना नहीं बना सकता जिसमें आप अपने खोये हुए को तलाश सकें| वो बड़ी जल्दी पहचान गया कि मुझे उसमें अपने खोये हुए बाबा कि तलाश है| वो तो ख़ुद ही अपनी औलाद नहीं चाहता था तो  मेरा खोया हुआ हाफ़िज़ कैसा बनता| आप किसी को मुहब्बत से तो बाँध लोगे पर झूठी ख्वाहिश से नहीं| उसने मेरा झूठ पकड़ लिया था| उसने जाना चाहा मैंने राह दे दी|

आज अम्मा की बेतरह याद आ रही है | आज अगर होती तो मेरे घुटने भी पेट में मोड़ के कहतीं| “सोयी रहो ऐसे ही थोड़ी देर, तकलीफ़ कम हो जायेगी तो दर्द भी कम हो जायेगा|”

पर अधूरी,अतृप्त इच्छाओं की भूख कहीं मिटी है भला| सब खो के भी उम्मीद का दिया लौ ले ही जाता है मेरे दिल में|

“है अपनी किश्ते-वीराँ सरसब्ज़ इस यकीं से

आयेंगे इस तरफ़ भी इक रोज़ अब्र-ओ-बाराँ”

फैज़…….

6

ये दिन बहुत उदास और बुरी तरह थका देने वाले बड़े है| ऐसा लगता है जैसे मेरी सारी ताक़त किसी रग के कहीं चटक जाने से चुपचाप बह गयी है| शूटिंग पर भी अब बार-बार बीच में रुकना पड़ जाता है| घर पर लौट कर जो बिस्तर का सहारा लेना पड़ता है मुझे वो अगली सुबह शूटिंग जाने के वक्त ही छूटता है| ये शूटिंग भी दुबारा करनी पड़ रही है| मेरी इस बीमारी ने बार-बार परेशान किया है मुझे| इन कानों में अजीब-अजीब आवाजें बोलती हैं,कभी सरगोशियाँ करती हैं तो कभी किसी पहाड़ से टकरा के लौटी हुई सदा सी गूंजती हैं| डॉक्टर कहता है कि ये मेरे नशा करनेऔर ज़्यादा काम करने की वजह से है| मुझे खूब आराम करना चाहिए,पर मुझे मालूम है कि ये ज़हन के डूबने के बायस हैं| देने वाले ने मुझे इस शर्मिंदगी से बचाने के लिए  मेरे हाथों में एक अज़ीम मुश्किल रख छोड़ी है|जिस बीमारी में औज़ार लगने से जिंदगी की गाँठ खुल जाती है उसी की गाँठ-गिरह मेरे हाथ बाँध दी है| डॉक्टर के लाख कहने के बाद भी मेरा मन इस बात को मानने को राज़ी नहीं होता| डॉक्टर ने मैनेजर से कई बार कहा कि बिना ऑपरेशन मेरे सही होने की संभावना हर दिन कम होती जायेगी| मैंने बहुत छोटी उम्र में इस बीमारी से बाप को जाते देखा था| इस नामुराद बीमारी का डर तब से मेरे दिल में गाँठ की तरह पड़ गया है| मैनेजर ने बार-बार कहा कि इस ऑपरेशन के बाद मैं सही हो जाऊँगी पर मैंने हर बार उसे टाल दिया| क़ैस को मरना है तो लाख़ लैला उसके सामने खड़ी कर दो पर रेगज़ार का सुनहरा कफ़न लैला के शफ़ा को हँस-हँस कर अंगूठा दिखा देगा| तड़प मंज़ूर है मुझे पर शरीर पर कोई ख़राश नहीं| यूँ भी जिंदगी की कितनी ही ख़राशों को मुस्कुरा के छुपाया है मैंने|

अब बड़ी जल्दी-जल्दी हाथ-पैर सूज जाते हैं| कोहनी से नीचे कलाई तक हाथ और घुटने से नीचे के पैर ऐसे हो जाते हैं जैसे पानी भरी मश्क़| बाल टूट टूट के गिरने लगे हैं| इस मुश्किल से बचाने के लिए डायरेक्टर ने पूरी फिल्म में मेरा गेटअप ही बदल दिया है| कलाई तक की कमीज़,गरारा और सर को ढंके हुए दुपट्टा| पर कोई मौत का गेटअप बदल पाया है भला| उसे आना है और हर शै आना है| हरचंद कोशिश कर लो पर वो मेहमान कभी आ कर अकेला लौटा है बिना मेज़बान के| मेरी बड़ी आरज़ूओं में एक माँ सुनने की आरज़ू खाली रह गयी| अब लगता है ये मेहमान अपने मेज़बान को उसकी इस आरज़ू के पूरी हुए बिना ही ले जायेगा|

मेरे अंदर अक्सर नैनीताल की एक शाम घूमती रहती है| शूटिंग ख़त्म हो गयी थी और हम सब लोकेशन से वापस लौट रहे थे| मेरी गाड़ी काठगोदाम रोड से नीचे ढलान को उतरी ही थी कि एक आदमी सामने आ गया| ड्राईवर ने ऐन मौके ब्रेक लगा गाड़ी रोक ली| मुझे जाने क्या हुआ? मैंने पर्स खोल के कुछ पैसे निकले, गाडी का शीशा नीचे किया और उसे पकड़ा दिए| कैसे उसने मेरा काँपता हाथ देख लिया और पूछ बैठा|

“बहुत थकान लगती है?”

बेसाख्ता मेरे मुँह से हाँ सुन कर वो बोला|

“आगे थकावट के कई मौसम आने हैं और ऐसी ढ़लानें जिन पर संभालना मुश्किल है|”

अब अक्सर उसका चेहरा मेरी आँखों के सामने फिर जाता है| सुकून यूँ भी मुझे कभी नहीं रहा,और उस दिन के बाद तो एक पल भी नहीं| दिल बैठे-बैठे भर जाता है| इस घर के सामने जितना समंदर है उससे ज़्यादा मेरे भीतर है| इस लबालब भरे मन में भी पतझड़ ने अपनी जगह बना ही ली है| पतझड़ की ये बेल अब धीमे-धीमे मेरे अन्दर गाती-गुनगुनाती बढ़ रही है|

एक बात कहूँ ……………… पतझड़ की ये आवाज़ मेरे कानों की अब तक की सुनी आवाजों में सबसे शानदार है|इस आवाज़ ने मुझे सिखाया कि दुःख की आवाज़,उसकी ध्वनि सबसे बारीक होती है| ये आवाज़ बताती है कि आपका दुनिया को देखने का माद्दा कैसा है? आप कितने हस्सास हैं, संवेदनशील हैं? बहार के मौसम में चें-चें करते परिंदों को तो कौन-कौन ही न सुन ले? समाअत का असली हुनर तो दुपहर की चुप्पी में बोलती कोयल की आवाज़ सुनने में है| उससे भी ज़्यादा बिना देखे ये बताने में है कि कोयल किस डाल पर बैठ कर कूंक रही है| मैंने अपनी जिंदगी का बहुत सा वक़्त इसी छुपी कोयल और डाली को ढूंढने में खर्च किया है| इस तलाश ने कुछ और दिया हो या न दिया हो पर मेरे पेशे के हुनर को थोडा ज़्यादा चमकदार बना दिया| इतना कि कल को मैं मर-खप जाऊं तो शायद कुछ लोगों के ज़हन में जिंदा रहूँ| ये भी शर्तिया नहीं कि कोई किसी को याद ही रहे| लोग कितना झूठ बोलते हैं कि हमें उम्र के उस वक्त की बातें भी याद हैं जब हम घुटनों चल ही रहे थे या बिस्तर से करवट लेते गिर-पड़ जाया करते थे| मेरे साथ तो कभी ऐसा कुछ हुआ ही नहीं,मेरी यादों की तख्ती पर तो मानो धारधार बरसात हुई हो और सब साथ बहा ले गयी हो| बचपन तो छोड़िये अब इस उम्र में भी कम ही याद रहता है कि कल क्या हुआ था| किस सेट पर डायलॉग भूला, किस गाने पर बोल छूटे| कहाँ क्या-क्या हुआ कुछ याद ही नहीं? याद की सबसे ताज़ातरीन याद ही यही है कि बाबा के बाद कभी किसी सेट पर स्पॉटबॉय से अफ़ीम की ज़रा सी ख़ुराक जुटाई थी| पर कब,किस फिल्म पर ये नहीं मालूम|

उदासियों ने बाद में कुछ और बढ़ कर मुझे घेर लिया| ये शायद उन दिनों की बात होगी जब बाला की तबियत खराब रहने लगी थी| जिस दिन ये पता चला कि उसका दिल उसका साथ छोड़ रहा है, उस पूरे दिन मेरे गले एक सैलाब उठता-डूबता रहा|हालांकि बाला मेरी कोई बहुत अच्छी दोस्त नहीं थी,पर दुश्मन भी तो नहीं थी|हमपेशा थे तो दोनों कभी किसी शूटिंग पर या किसी मजलिस में टकरा गए तो हँस के दुआ-सलाम कर ली, बस ऐसी दोस्ती रही उससे| वो मुझसे ज़्यादा सुंदर थी पर परदे पर दुःख को जीने का मेरा अंदाज़,मेरा तज़र्बा उससे कहीं ज़्यादा था|बाला की बीमारी का एक यही फ़ायदा हुआ मुझे कि चुपके-चुपके लोग उसकी फिल्मों के रोल मेरे पास लाने लगे| उसको ले कर लोग सौ-सौ अंदेशे उठाने लगे की कहीं उनकी फिल्में बीच ही में न अटक जायें| उसकी छोड़ी वही फिल्में मेरे दरवाज़े तक आयीं जिनके आख़िर में मुझे मर जाना था| खैर मरना तो सभी को है, पर्दा तोछोटी बिसात का कपडा है,अस्ल मौत के कपडे का फ़लक़ तो चौड़ेपने का है|

मेरे अपने फ़लक के दायरे के सिकुड़ने का अंदेशा लोगों को मुझसे पहले होने लगा था| इतना पहले कि जब मेरी हथेलियों की पकड़ चीज़ों पर हल्की पड़ने लगी वो तभी समझगये की अब मेरी अस्ल डोर भी हाथ से छूटने वाली है| इस बीमारी ने मुझसे मेरी सबसे प्यारी चीज़ ले ली| मुझे घर अपना घर जज़ीरा फिल्म के नुकसान की भरपाई और इलाज़ के लिए बेचना पड़ा|

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घर जिसके होने के सपने भर से कितने मौसम लहलहा उठते हैं| रेशमी धागों से बने हुए इसके मौसम जिनकी धूप-छाँव,बरसातें बड़ी अलहदा होती होंगी| जज़ीरा ऐसे ही सपने की इमारत है मेरे लिए जिसे अब छोड़ना पड़ रहा है| इसमें अपने कमरे के गीले फ़र्श पर लेट कितनी ही शामों का ढ़लता सूरज समन्दर में गर्क़ होते देखा है मैंने| कितनी सीली हवाओं वाली रातों का चाँद इसकी खिड़की से आसमान पर टंगा देखा है| ये अब भी उगेगा पर इसकी खिड़की से टिका हुआ सर न होगा मेरा | इस घर का नाम जज़ीरा रखते वक़्त मुझे बिलकुल भी अंदाज़ नहीं था कि जिंदगी का टापू मन के पानी में धंस-धंस के एक दिन पूरा ही डूब जायेगा| घर से निकलना कई बार दुनिया से निकलने से भी बड़ा भरी काम है|

दुःख ने मेरे धूप-छाँव की जासूसी बड़े लम्बे समय तक की है| दिन जाता है तो रात आ जाती है और रात जाती है तो दिन,पर पानी की आँख सा दुःख जो लगातार बह रहा है उसका सुराग ढूंढने पर भी कहीं नहीं मिला मुझे| समय किसी जगह ज़रा देर टिक के बैठा ही नहीं कि मैं उसकी पीठ पर हाथ फेर सकूं|

इन दिनों बिस्तर पर लेटे-लेटे एक सपना बार-बार आता है मुझे| मैं किसी गर्म जलती टीन के नीचे हूँ,ये जगह शायद कोई स्टूडियो है, और किसी तेज़ रौशनी ने मेरी आँखें चुंधिया दी हैं| इस स्टूडियो से निकल कर अब मैं घर जाने कीसुनसान सड़क पर अकेली हूँ| इस सपने में इस सड़क पर एक पुरानी टूटी सी पर मजबूती से पाँव टिकाये एक अदृश्य हवेली मेरे साथ चलती रहती है| मैंने जाने कितनी ही बार बीच राह इस हवेली में शरण ली है| इसमें दरवाज़े से घुसते ही सीधे हाथ को सीमेंट से बनी सीढियां है| बिलकुल सीध में एक आँगन है जिसकी उलटी तरफ़ एक कमरा है जिसके अधखुले किवाड़ों के बीच में से एक अंगूरी हरे रंग का दुपट्टा जिसपे गुलाब,अंगूर की बेलें और मोर कढ़े हुए हैं,लहराता है| दुपट्टे का छोर जहाँ ख़त्म होता है वहां एक छोटी चौकी है| उसके ऊपर सफ़ेद तकिये पर कोई सर टिकाये हवा में फड़फड़ाती दुपट्टे की अंगूरी बेल के नीचे सो रहा है| मैंने कितनी बार उस चेहरे को देखना चाहा जो शायद मेरा ही है| पर उन बेलों पर चलने वाले चींटे और एक काँटों भरी शाख़ मुझे हवेली से निकाल बीच सड़क फेंक देते हैं, और मेरा आगे का रास्ता रोक लेते हैं| ये सपना तो हर बार यहीं टूट जाता है| ये शाख,जिसके तने पर बेशुमार कांटे हैंमेरे सीने में हर पल लहराती है| ये इतनी पैबस्त है, इतनी अंदर तक गढ़ी हुई है कि उम्र के किसी भी दौर में इसे खींच के निकाल फेंकना बड़ा मुश्किल काम है| ये इतनी वज़नी है कि मेरी आधी उम्र इसके बोझ से पस्त रही और बाकि आधी इसके फेंके हुए जालों में उलझ के रह गयी है|

इन तज़र्बों के बाद मुझे मालूम चला कि जिंदगी जैसी कोई चीज़ है ही नहीं कहीं| ये बस एक ख़ला है,एक अँधा गड्ढा,गिरो तो गिरते जाओ सरीखा| मैंने कई बार इस शाख़ पर ऐसा भी महसूस किया है जैसे कभी पल भर को इन काटों के बीच कोई हरा पत्ता उगा हो और लहलहा गया हो,पर ये शायद मेरा वहम है| जिंदगी जाने क्यूँ बहुत एहतियात से बरतने की चीज़ मानी गयी है| जबकि ये मुझे हमेशा ही बहुत जालसाज़ लगी,जिसका ऊपरी कागज़ ही बस मुलायम और साफ़ सुथरा है और अंदर ख़ाली| ये जो चीज़ है जिन दिनों ये शाख़ नहीं होती उन दिनों ये धुआँ बन के सीने में सरसराती है| हस्सास लोग इसे चाहे कुछ भी बुलायें, कुछ भी कहें पर अस्ल में इस धुएँ का नाम शाम है, जिसकी देहरी पर एक बुझता हुआ दिया रखा है और जिसके आगे सिर्फ अँधेरा ही अँधेरा है|

वह दिल नहीं रहा है, न अब वह दिमाग है

जी तन में अपने,बुझता सा कोई चराग़ है

                                                मीर!!

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इसके आगे डायरी के सारे पन्ने ख़ाली थे| तराना ने एक धीमी सांस छोड़ डायरी बंद कर वहीं तस्वीर के पास रख दी| हाथ-मुँह धोये और होटल जाने के लिए टैक्सी वाले को फ़ोन करके बुला लिया| भूदत्त कब से उसके पीछे खड़े थे पर उसे ध्यान ही नहीं था| उसकी आँखें अब भी तस्वीर पर टिकी थीं|

“तुम इन कागजों को देख लो एक बार|” भूदत्त ने उसे टोका|

“कैसे कागज़ है?”

“पुणे वाली जमीन के, देख लो एक बार फिर तुम्हारे नाम चढ़ाने की प्रोसेस शुरू कर देंगे| अपना अकाउंट नम्बर भी दे जाओ तो पैसा उसमें ही ट्रान्सफर कर दूंगा|”

“मुझे ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए| ज़मीन और चार लाख ठीक है मेरे लिये और बाकी पैसे से किसी लड़की की पढाई-लिखाई करा दीजिये| हाँ! ये फ़ोटो और डायरीमैं साथ  ले जाना चाहती हूँ|” वो बोली|

टैक्सी बहुत देर से दरवाज़े पे खड़ी थी| जब वो गाडी में बैठ गयी तो उनने उससे पूछा|

“तुमने ये पूरा पैसा लेने से क्यों मना कर दिया|”

“ताकि कल को कोई और तराना आ कर अपनी जिंदगी बनाने के लिए आपका और इनका शुक्रिया अदा कर सके|” उसने गोद में रखी तस्वीर की तरफ़ देख कर कहा | अच्छा सुनिए एक बात और| एक पल हिचकिचा कर उसने कहा|

“क्या?”

“क्या आप मेरे असली पेरेंट्स को ढूंढने में मेरी मदद करेंगे|जो पैसा अब आपके बचा है उसी में से इस्तेमाल कर लें ढूंढने में,चाहे जितना लगे|”

भूदत्त ने उससे कुछ कहा नहीं बस उसके सर पर हाथ फेरा और ड्राईवर को जाने का इशारा कर दिया| गाड़ी घड़ी भर में ही गली के मोड़ से मुड़ के गायब हो गयी| मार्च का मुस्कुराता सूरज कुछ और चमक के उनके दरवाज़े के सामने आ गया और वो घर में घुसते हुए सोच रहे थे|

“ज़रा देखिये मैडम! मर कर भी आपको माँ बनना नसीब नहीं हुआ|”  .

 

 

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