नोबेल 2017: इशिगुरो का उपन्यास अंश

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अनुवाद: प्रभात रंजन/

(प्रभात रंजन प्रतिष्ठित कथाकार हैं।  नई संवाद तकनीकों के जरिए साहित्य प्रसार के हिमायती। लोकप्रिय साहित्य के प्रबल पक्षधर। हिंदी की कुछ चर्चित एवं सफल वेबसाइट में से एक जानकीपुल के मॉडरेटर। ध्यातव्य हो कि इनकी जानकीपुल कहानी हिंदी की सर्वाधिक लोकप्रिय कहानियों में से एक है.

सौतुक उनका स्वागत करता है. सौतुक टीम का प्रयास रहेगा कि प्रभात रंजन की साहित्यिक रचनाएं  और अनुवाद समय समय पर पाठकों को  यहाँ उपलब्ध कराई जाए.)

मैं ठीक से नहीं बता सकती कि रूथ ने सुरक्षा गारद खुद बनाया था या नहीं, लेकिन इसमें कोई शक नहीं कि वही उसकी अगुआ थी। छह से दस साल की उम्र के हम बच्चों के बीच जब भी रुथ किसी नए सदस्य को गारद का हिस्सा बनने का मौका देती या किसी को समूह से बाहर कर देती थी तो कुछ चेहरे बदल जाया करते थे। हमारा यह मानना था कि मिस जेराल्डीन हेल्शम की सबसे अच्छी अभिभाविका थी(हेल्शम एक बोर्डिंग स्कूल था, उपन्यास में जिसमें रहने वालों बच्चों की कहानी है और वहां अध्यापिकाओं को अभिभाविका कहा जाता था)I इसलिए हम उनके लिए ख़ास तरह के तोहफे बनाया करते थे- मुझे याद आता है कि हम कागज़ के बड़े टुकड़े पर गोंद से फूल चिपका कर उनके लिए तोहफा बनाते थे। लेकिन जाहिर है, हमारे होने का मुख्य कारण था उनकी रक्षा करना।मेरे उस गारद का हिस्सा बनने से बहुत पहले से रुथ और समूह के अन्य बच्चों को मिसजेराल्डीन के अपहरण की योजना के बारे में पता था।हम निश्चित रूप से यह नहीं बता सकते थे कि इसके पीछे किसका दिमाग था। कई बार हमें सीनियर क्लास के लड़कों के ऊपर शक होता था, कभी अपनी ही क्लास के लड़कों के ऊपर। एक अभिभाविका, जिनका नाम था मिस एलीन, उनके बारे में हमें लगता था कि हो न हो कहीं उनका ही दिमाग न रहा हो। हमें यह नहीं पता था कि अपहरण कब होने वाला था, लेकिन हमें एक बात का पूरा यकीन था कि अपहरण जब भी होगा उसमें जंगल की भूमिका जरूर होगी।

काज़ुओ इशिगुरो

जंगल पहाड़ के ऊपर थे और हेल्शम हाउस के पीछे की तरफ थे। हमें बस घने पेड़ों की कतारें दिखाई देती थीं, लेकिन मैं अपनी उम्र के बच्चों में अकेली नहीं थी जिसको दिन रात उस जंगल का साया महसूस होता रहता था।हेल्शम हाउस के ऊपर उसका साया लहराता हुआ महसूस होता था; खिड़की की तरफ सर घुमाकर देखने पर लगता था जैसे वे दूर से आपकी तरफ झुके हुए हों। सबसे सुरक्षित लगता था हेल्शम हाउस में सामने की तरफ रहना, क्योंकि वहां की किसी खिड़की उन पेड़ों को नहीं देखा जा सकता था। फिर भी, उनसे बचकर निकला नहीं जा सकता था।

उस जंगल के बारे में तरह तरह की भयानक कहानियां प्रचलित थीं। हमारे हेल्शम आने से बहुत दिन पहले की बात नहीं है जब एक लड़के की अपने दोस्तों के साथ खूब लड़ाई हुई और वह हेल्शम की दीवार फांदकर बाहर निकल गया, दो दिन के बाद उसकी लाश मिली, उसी जंगल में, उसका शरीर एक पेड़ से बंधा हुआ था और किसी ने उसके हाथ-पैर काट डालेथे।एक और अफवाह यह सुनाई देती थी कि एक लड़की का भूत उन पेड़ों के बीच भटकता रहता था। वह हेल्शम की ही विद्यार्थी थी और एक दिन वह दीवार फांदकर बाहर की दुनिया का नजारा लेने के लिए निकल गई। यह बात हमारे आने से बहुत पहले की थी। उन दिनों जो अभिभाविकाएं थीं वह अधिक सख्त होती थीं, अधिक क्रूर भी, और जब उसने वापस आने की कोशिश की तो उसको अनुमति नहीं दी गई। वह दीवार के बाहर से अन्दर आने के लिए विनती करती रही, लेकिन उसको अनुमति नहीं दी गई। वह वहां से कहीं और चली गई, उसके साथ कुछ हुआ और उसकी मृत्यु हो गई।लेकिन इसका भूत जंगल में भटकता रहता था, हेल्शम की तरफ देखते हुए, इस कोशिश में कि उसको अन्दर आने का मौका मिल जाए।

अभिभाविकाएं जोर देकर कहती रहती थीं कि सारी कहानियां बकवास थीं। लेकिन पुराने विद्यार्थियों ने हमें यह बताया था कि जब वे आये थे तब उनको भी अभिभाविकाओं ने यही बात बताई थी, लेकिन उनको जल्दी ही इस भयानक सच्चाई के बारे में उसी तरह से पता चल गया जिस तरह से हमें चल गया।

रात के वक्त वह जंगल हमारे ख्यालों में अधिक आता था, जब अपनी डोरमेट्री में हम सोने की कोशिश कर रहे होते थे।आपको लगता था कि आप हवा पेड़ की शाखाओं को हिला रही हो, और उनके बारे में बात करने से डर महसूस होता था। मुझे याद है कि एक रात जब हम मार्जे के. नामक लड़की के ऊपर बहुत नाराज थे- उसने दिन के वक्त कुछ ऐसा किया था जिससे हमें बहुत शर्मिंदगी उठानी पड़ी थी- तब हमने यह तय किया कि उसको सजा के रूप में बिस्तर से बाहर निकाल कर उसका सर खिड़की की तरफ कर दिया जाए, और जंगल की तरफ देखते रहने का हुक्म दिया जाए।पहले तो उसने अपनी आँखों को कसकर मूँद लिया, लेकिन जब हमने उसकी बांहों को ऐंठ दिया तो उसने अपनी आँखों को खोला और चांदनी रात में बाहर जंगल की तरफ देखने लगी। बस इतना ही काफी था, वह रात भर डर के मारे सुबकती रही।

मैं यह नहीं कह रही हूँ कि हम उन दिनों दिन भर जंगल की फ़िक्र में ही डूबे रहते थे। हम कई बार हफ़्तों उसके बारे में सोचते तक नहीं थे, और कई बार तो हिम्मत जुटाकर मैं यह भी सोचने लगती थी: ‘इस तरह के बकवास के ऊपर हम किस तरह से यकीन कर सकते हैं?’ लेकिन फिर कोई छोटी सी बात होती, जैसे कोई आगे बढ़कर जंगल से जुड़ी कोई कहानी सुना देता या किसी किताब का से कोई डरावना हिस्सा पढ़ देता- और आपको जंगल की याद आ जाती। उसके बाद हम फिर से उस जंगल के साए को महसूस करने लगते थे। इसलिए इसमें किसी तरह की हैरानी की बात नहीं कि जब हम मिस जेराल्डीन के अपहरण के बारे में सोचते उस कहानी में सबसे केन्द्रीय स्थान उस जंगल का होता था।

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