इतिहास को दबाने के लिए ‘इतिहास’ गढ़ने की परम्परा का सत्य

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चंदन पांडेय/

भारत का इतिहास अनसुलझी गुत्थी है. कभी कभी लगता है कि हम जो पढ़ते हैं इतिहास के नाम पर वो सब मुलम्मा है. आए दिन यह स्पष्ट होता जा रहा है कि भारत का इतिहास मूल संघर्षों से दरकिनार हो कर नया संघर्ष ‘रचने’ और उसी में उलझे रहने का इतिहास भी है. कोई भी सचमुच यह समझना चाहेगा कि जागरुक समाज अपना संघर्ष कैसे तय करता है? जिस समाज में एक वर्ग को, बड़े वर्ग को, अछूत बना दिया गया हो, उन्हें जानवरों से भी बदतर दर्जा दिया गया हो, उनके मनुष्य होने के, बराबरी के अधिकार के लिए होने वाले संघर्ष से बड़ा कोई संघर्ष हो सकता है क्या? और वो लोग कैसे रहे होंगे जिन्होंने इन संघर्षों की तरफ न देखने की अदाकारी करते रहे बल्कि हर संभव इसे कमतर दिखाने का प्रयास किया?

इस प्रश्न या ऐसे अनेक प्रश्नों का जवाब ‘बोज्जाताराकम’ की एक किताब में मिला. यह किताब भारतीय इतिहास, उसके नायक, प्रतिनायक, उनके रचयिताओं आदि से जुडी अनेक गिरहें खोलती है. इस पुस्तिका का शीर्षक है: ‘महाड़ –दि मार्चदैट्सलांच्डएवरीडे’. इतिहासकारों ने अगर पारदर्शिता दिखाई होती तो महाड़ यात्रा आज हर भारतीय बच्चे के जुबान पर होती. लेकिन उन्हें तो कुछ और करना था.

एक तरफ दांडी यात्रा है जिसका उद्देश्य नमक सत्याग्रह है, नमक पर मामूली टैक्स बढाने वाले क़ानून का उल्लंघन है, उसे बड़े आन्दोलन का शक्ल देने की कोशिश है तो दूसरी तरफ महाड़ यात्रा ( मार्च) है, जिसका उद्देश्य दलितों को मनुष्य का मूलभूत अधिकार, बराबरी का अधिकार, दिलाने की ‘प्यास’ है, तालाब का पानी तो निमित्त मात्र है,उनके रोजाना के अपमान को खत्म करने की कोशिश है.

एक तरफ महाड़ यात्रा है जो 1927 से लेकर 1937, दस वर्षों तक चलती है, जिनमें न जाने कितने मुकदमें चलते हैं, कितनी लड़ाईयां चलती हैं दूसरी तरफ 1930 का दांडी मार्च है जो अपने सारे उद्देश्य महज पच्चीस दिन में पूरे कर लेता है.

पुस्तक का कवर

एक तरफ दांडी यात्रा है जिसमें साठ वर्षीय गांधी हैं, तैयारियां हैं, जनमानस का समर्थन है, राजनीतिक उत्साह है,उन्यासी यात्री हैं, खाने पीने उठने बैठने चलने का चाक चौबंद बंदोबस्त है, तयशुदा नियम हैं, दूसरी तरफ महाड़ यात्रा है जिसमें छत्तीस वर्षीय अम्बेडकर हैं, शामिल होने वाले दस हजार लोग हैं, जनमानस-मुख्यत: स्वर्ण हिन्दुओं की – नफरत है, इन यात्रियों के पास घोषित कोई रास्ता नहीं हैं, भोजन के नाम पर साथ लाई सूखी रोटियाँ हैं, असहयोग करता हुआ बाजार है, रुकने के लिए पंडाल तक नहीं है, साहस और आत्मबल के अलावा कुछ भी सहयोगी नहीं है.

एक तरफ दांडी यात्रा है जहाँ गिरफ्तार होने के लिए तैयार बैठे, लगभग व्यग्र, गांधी हैं, शहीद होने की कल्पना को जीते हुए उन्यासी यात्री हैं, लेकिन न कोई गिरफ्तार होता है न कोई शहीद, दूसरी तरफ महाड़ यात्रा है जहाँ संवैधानिक क़ानून की चुप्पी और धार्मिक क़ानून के अट्टहास के साए में घबराए लोगों का हुजूम है, आंबेडकर का वह भय है कि अगर उनके साथी-यात्रियों में से किसी ने भी कोई एक ज़रा चूक कर दी तो यह क़ानून उन सबको असह्य दंड देगा, यह धार्मिक समाज उन्हें मार डालेगा, आंबेडकर की अपने लोगों से यह अनुनय-विनय है कि लड़ाई आगे भी जारी रहेगी, लोगों के उकसावे में न आवें.

यह किताब पढ़ते हुए मन विचलित होने लगता है. यह कल्पना भी मुश्किल है कि मान लीजिए महाड़ मान का एक शहर है जहाँ एक तालाब है, जिससे पानी लेने और पीने का अधिकार हिन्दुओं को है लेकिन ‘तथाकथित हिन्दू धर्म के अछूतों को नहीं, मुस्लिमों ईसाईयों को है लेकिन ‘तथाकथित हिन्दू धर्म के अछूतों’ को नहीं, और तो और, इन अछूतों के मवेशियों को उस तालाब से पानी पीने की छूट है लेकिन अछूतों को नहीं. यह इसी भारत का इतिहास है जिसका जिक्र हमें फुटनोट्स तक में नहीं मिलता. केवल सवाल मिलते हैं. इन्हीं प्रश्नों को यह किताब उठाती है और उनका जवाब भी देती है.

इच्छा है कि पूरी किताब ही यहाँ लिख दूँ. समयसंभव होता तो इसका हिन्दी अनुवाद करता.

महाड़ यात्रा के पहले दिन जब आंबेडकर अपने उद्बोधन में यह कहते हैं: अछूत भाईयों को चाहिए कि वो सबसे पहले आत्मसम्मान की रक्षा करें और फेंके हुए टुकड़ों को खाना बंद करें, तो लगता है कि भूख बनाम आत्मसम्मान के जंग में जीता कौन होगा? यह किताब इतिहास से जुडी उन चुनिन्दा किताबों में से है जो पंक्ति दर पंक्ति सोचने पर मजबूर करती है और साथ ही यह प्रेरणा भी देती है कि हम अपने अतीत को जानें. हम यह जानें कि आखिर हमारा असली इतिहास क्या है? हम कौन हैं? वो सभ्यता कौन सी है जो विश्वगुरु होने का दंभ भरते हुए साथी नागरिकों को अछूत मानना सिखाती है? यह किताब हर उस व्यक्ति को पढनी चाहिए जिसे लगता है कि ‘भारत हमको जान से प्यारा है’. जान से प्यारे लोग ही होते हैं, पत्थर और चट्टाने नहीं.

लेखक बोज्जाताराकम की वैचारिकी सुस्पष्ट है. दांडी और महाड़यात्रा के तथ्यों को दर्ज करने के लिए उन्होंने क्रमश: दो विद्वानों की रचनाओं का सहारा लिया है. महाड़ यात्रा से जुड़े तथ्य उन्होने ‘धंनजय कीर’ की किताब ‘डॉ. आंबेडकर: लाईफ एंड मिशन’ से लिए हैं तो दांडी यात्रा से जुड़े लगभग सभी तथ्य ‘थॉमस वीबर’ की किताब ‘ऑन दि साल्ट मार्च’ से लिए हैं.

पचपन पन्नों की यह किताब ‘महाड़ –दि मार्च दैट्स लांच्ड एवरी डे’, जिसे सब के बुक शेल्फ में होना चाहिए, वह ‘दिशेयर्ड मिरर’ प्रकाशन से आई है और इसका मूल्य महज सौ रुपए है. किताब मंगाने के लिए इस मेल आईडी पर लिखें: [email protected]

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