बनारस की गार्गी मिश्रा का संस्मरण: नाऊन चाची

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तस्वीर- गार्गी मिश्रा

 गार्गी  मिश्रा/

गार्गी  जीवन को कविता की तरह बरतती हैं. तस्वीरों से कविता लिखती हैं. उन तस्वीरों के ब्यौरे भी लिखे तो भी कविता लिखती हैं. और फिर कविता तो लिखती ही लिखती हैं. बनारस इनका जीवन है. बनारस के बारे में कितना कुछ लिखा जा चुका है फिर भी गार्गी जब बनारस पर लिखती हैं तो नया लिखती हैं. इस उम्मीद  के साथ कि हम जल्दी ही बनारस पर उनका लिखा आपको पढ़ाएंगे अभी पढ़िए सवाल  के रूप में एक संस्मरण जो वह अपनी नाऊन  चाची से नहीं पूछ पाईं. 

गार्गी मिश्रा

बनारस में पिछले कुछ रोज से लगातार बारिश हो रही है. सावन का महीना शुरु हो चुका है और मैं बालकनी पर अपनी पसंदीदा जगह खड़ी हूं. एक बूढ़ी महिला मुश्किल से गेट खोल पाती है लेकिन घर में घुसती बड़े अधिकार से हैं, मैं उसे पहचानने की कोशिश में हूँ. नऊआईन चाची?

कायदे से मुझे उन्हें दादी पुकारना चाहिये था. मां उन्हें चाची पुकारते थीं और कब मां की देखा देखी मैं उन्हें चाची पुकारने लगी. याद नहीं और इस समझाईश का कोई असर नहीं ही हुआ कि ‘’चाची हम तोहार माई के हई, तोहार दादी हई’’. वो कुछ पल मां के साथ बैठकर सहज हो लें तब उनसे मिलने जाऊंगी और अपने जन्म का बारंबर दोहराया गया किस्सा फिर उसा उत्साह से सुनूंगी जैसा पहली बार सुना था. कैसा उनके आने पर घर में छोटा सा उत्सव जैसा कुछ हो जाता था. मैं उनकी सुघड़ अंगुलियों से पैरों पर की जा रही चित्रकारी के सम्मोहन में खो सी जाती और अपने पैर रंगे जाने के समय किये जा रहे मज़ाकों को बिल्कुल न समझ पाती.

मैं बालकनी में खड़ी सामने वाली गली में बारिश में आते जाते मोटरों और गाड़ियों की रेलमठेल देख रही हूं. और तभी जमुना साव की दुकान के सामने एक रिक्शा रुकता है. लगता है इसी मुहल्ले में किसी घर की बेटी मायके आई है. मेरी नज़र उसके पांव में लगे महावर पर पड़ती है और एक बार फिर एक एक सपना खुली आंखों में तैरने लगता है. नाऊन चाची गाल में पान दबाए हुए घर घर बयाना ले कर जातीं. ठकुराईन के यहाँ मिसराईन के घर आई नई पुत्र वधु की सुंदरता का बखान करतीं. टोकरी में रखे देसी घी के बने लड्डू खाजा शक्करपारे और बालूशाही ठकुराईन को सौंपतीं, नेग में ठकुराईन से 51 रूपये पातीं और फिर लाल फीते वाली चप्पल पहन पाँव में महावर से चिरई बना कर गुप्ताईन की गली को मुड़ जातीं.

जब तक गुप्ताईन के घर पहुँचतीं नाऊन चाची तब तक पान का बीड़ा गाल से ग़ायब हो चुका होता था.   मुमजामे से पसीजा हुआ दूसरा बीड़ा निकालतीं और बाएं गाल में दबा लेतीं. अँगुली में लगा कत्था बाल में मल कर साड़ी की किनार से होंठ से चूते पान को पोंछ ज्यूँ चप्पल उतारने को होतीं की देखतीं की गुप्ताईन दालान में भक्क सफ़ेद धोती पहन सर झुकाए चली आ रही हैं.

नाऊन चाची भाँप लेतीं की गुप्ता जी अब नहीं रहे और चारपाई पर गुप्ताईन के विराजते ही अपनी नाक पर सरक आया चश्मा ठीक करते हुए गुप्ताईन के पास बैठ कर उँहु उँहु रोने लग जातीं. बहुत बुरा हुआ कह कर जीजी को सांत्वना देतीं और तिरछी नज़र से देखतीं की शायद अंदर से बड़ी बहु आवे  गुप्ता जी का पुराना स्वेटर शॉल ले कर तो इस जाड़े में नाऊ के लिए स्वेटर न खरीदना पड़े. काठ का एक छोटा सा कंघा जिसकी लंबाई और चौड़ाई एक अंगुली भर की है वो नाऊन चाची के मुमजामे से बाहर झांकता है और साथ ही रंग की डिबीया, नाखून काटने के लिए नहनी और एक पुरानी टूटही स्टील की कटोरी.ज्यों ही नाऊन चाची अपने मुमजामे से महावर बाहर निकालतीं वैसे ही भीतर से बड़ी बहु पुराने स्वेटर शॉल की गट्ठर ले कर खड़ी हो जाती और फिर चाची माहौल को हल्का करने के लिए बड़ी बहु के पांव में महावर भरते हुए बात ही बात में मिसराइन की बहू का ज़िक्र छेड़ देतीं. गुप्ताईन भी कुछ देर तक चुप रहने कद बाद बात चीत करने लग जातीं और फिर बात ही बात में बात पहुँच जाती मिसराइन की बहू मायके से सास के बक्से में क्या ले आई है. बड़ी बहु इशारे से चाची से कहती कि एड़ीयों में रंग भरने के बाद पंजे में चिरई बनाने के बजाय दोनों पंजों में सिर्फ़ एक एक गोल बिंदी धर दे तो चाची इस इशारे पर मुस्कुरा देतीं और मन ही मन सोचतीं कि अब ज़माना बदल रहा है. अब वो समय नहीं रहा जब नाऊनें अपनी इच्छा से बहुओं के पांव भरती थीं. बड़ी बहु के नाखूनों में लगे नेल पॉलिश को मुंह बिचका कर एक नज़र देखने के बाद नाऊन अपने काम पर वापस ध्यान देने लग जाती. बेचारे गुप्ता जी तस्वीर में टँगे टँगे मिसराइन के घर से आए बालूशाही और खाजा की सुगंध लेते जो सूखे हुए फूलों तक आ कर दरक जाती और नाऊन चाची की बतकही मिसराइन की बहू से ठुकराईन के मझले बेटे पर चली जाती जो हाल ही में दारोगा हुआ है.

नाऊन चाची पूरे मुहल्ले भर में घरों के सुख दुःख बाँटती हुई एक रोज़ बूढ़ी हो गईं और अब तो यूं लगता है मानों वो कहीं खो गई हैं. कहां चली गईं  नाऊन चाची जो घरों से न निकलने वाली पुरखिन और बहुओं का मनोरंजन करती थीं. वहीं खरी बात करने वाली नाऊन चाची जिनके घर पर बराबर आने से औरतें घर में एक सूत्री नाईटी पहन कर घूमने से डरतीं थी और जिनके डर से कायदे के कपड़े बहुओं के तन पर शोभा पाते और फलाने के घर की बहुओं के फूहड़पन के किस्से भी दबे छुपे रहते थे. कहां चली गईं वो खबरची जिसके पास एक पोटली होती थी. उस पोटली में रखे जाते थे घर घर से मिले पिसान, न्योछावर के रूपये, किसी पुरानी सिल्क की साड़ी का ब्लाउज जो बहुरानी को चर्बी के कारण कसता था और उतरी हुई पुरानी चूड़ियाँ. कहां ग़ायब हो गईं वो नाऊनें जो हमारी निजता को सम्भाल कर रखती थीं और ज़रूरत पड़ने पर कोई ज़रूरी खबर फलाने के घर पहुंचा आया करती थीं. कहां थी वो बूढ़ी सी गुड़िया.

मेरे हाथ में चाय का कप ख़ाली हो चुका है और बाहर आसमान में एक बार फिर काले बादल घिर रहे हैं. भीतर से किसी के ज़ोर  से ठहाका मार कर हंसने की आवाज़ आ रही है. दरवाज़े पर टंगे परदे की किनोर से मैं झांक कर देखती हूं. नाऊन चाची और माँ अपनी मौज में हैं. अभी प्रणाम करूँगी, माँ उन्हें मेरा नाम याद दिलायेगी और वो मेरे सिर पर हाथ फेरकर बोलेंगी, “लगत बा जईसे काल्ही के बात हो. एकर जनम हमरे सामने ही भईल…अब देखा केतना बड़ हो गईल. केतना समय बीत गईल”

मैं पूछना चाहूँगी: चाची कहाँ गया तुम्हारा लाल रंग ?

पूछ कहाँ पाऊँगी ?

 

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