व्यंग्य: हल चलाते सरकार बहादुर और विकास की लहलहाती फसल

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जितेन्द्र राजाराम/

चारों तरफ विकास की फसल लहलहा रही थी. कुछ ऐसे कि चौक-चौराहों पर पीट-पीट कर मार डालने वाली भीड़ और सोशल मीडिया के ट्रोल तक परेशान थे कि इस बम्पर फसल से जो विकास पैदा होगा उसका आंटा कहाँ पिसेगा और रोटी कहाँ पकेगी! चारो तरफ जश्न का माहौल था.

बस जेल में बंद कुछ बाबाओं को एक टीस सी थी कि वो इस अच्छे दिन का लुत्फ़ नहीं ले पा रहे हैं. उन्हें अपने किये पर पछतावा होने लगा था. उन्हें लगने लगा था कि उन्होंने साइड बिज़नस और मेन बिज़नस तय करने में समझदारी नहीं दिखाई. मेन बिज़नस में अगर हीरे-जवाहरात या दारू वगैरह होता तो सरकार बहादुर सरकारी बैकों से पैसा भी दिलाते और हवाई जहाज से लन्दन के लिए विदा करते वक्त थोड़े उदास भी हो जाते. हो सकता है घर का बना गाज़र का हलवा भी देते. लॉर्ड्स में बैठ कर खाने के लिए.

खैर विकास की फसल लहलहा रही थी और सरकार बहादुर को मेरे राज्य में इसका ईनाम मिलने ही वाला था. मेरा राज्य भारत के नक़्शे के मध्य में पड़ता है. वहाँ कुछ ही महीनों में दो-दो चुनाव होने थे. चुनावी मौसम में रबी और खरीफ की फसल दोनों काटी जानी थी. जीत को लेकर किसी को कोई संदेह नहीं था!

हो भी कैसे! सरकार बहादुर ने खुद अपने हाथों से खाद-बीज डाली थी और इस लहलहाती फसल को तैयार किया था. उधर विश्व पटल पर चीन, पाकिस्तान, बांग्लादेश और नेपाल सब की लंका लगा डाली थी. विश्व-गुरु बनने का समय नजदीक आ रहा था.

सरकार बहादुर ने खुद अपने हाथों से खाद-बीज डाली थी और इस लहलहाती फसल को तैयार किया था

विकास की इस लहलहाती फसल का जलवा कुछ ऐसा था कि अगर गलती से कोई सरकार बहादुर के बारे में कुछ बुरा सोच भर लेता था तो मन में ही एनकाउंटर हो जाता था. इसलिए सबलोग सपने में भी लहलहाती फसल की तारीफ करते हुए ही पाए जाते थे. सुबह उठकर लोग आपस में बात करते थे कि आज मैंने लहलहाती फसल देखी. कोई कहता मैंने तो देखा कि फसल कट गई है और दूसरी फसल के लिए खाद-बीज का सप्लाई शुरू हो गया है. कईयों ने सरकार बहादुर को कंधे पर ट्वीटर ब्रांड का नुकीलेदार हल लिए जाते देखा था. जनता यह देखकर गदगद हो गई थी. बड़े-बुजुर्गो की नज़र में इस नुकीलेदार हल से खेत जोते जाने के बाद मिट्टी बहुत उपजाऊ होने वाली थी.

सरकार बहादुर के जलवे कुछ ऐसे थे कि एक दिन एक ट्रोल भाई ने यूट्यूब पर गलती से इस फसल पर कोई पर्दाफाश खेलने की सोची. उसको शिकायत थी कि वादे के अनुसार फसल का रंग कुछ और होना था जो हुआ नहीं. तो उसने पर्दाफाश करने की बात बस सोची ही थी कि अचानक से सरकार बहादुर का सबसे नजदीकी शागिर्द प्रकट हुआ. शागिर्द का प्रभाव कुछ ऐसा था कि उसको देखते ही ट्रोल ने बडबडाना शुरू कर दिया.

बोलने लगा, देश को आज़ाद हुए सत्तर साल हो गए, गाँव में बिजली ही नहीं पहुंची. मोबाईल चार्ज करने के लिए दूसरे गाँव में जाना पड़ता है. कितनी बार जाएँ! वैसे भी उस गाँव में पिछले साल हमलोगों ने एक को पीट-पीट कर मार डाला था. उसने सपने में मांसाहारी होने के मजे लिए थे. अब उसके घर के सामने से गुजरना अच्छा नहीं लगता. बांकी के लोगों को बेकार में डराना क्यों!

शागिर्द को समझ में नहीं आ रहा था कि ट्रोल के इतने बेहतर ट्रोल होने पर खुश हो लें कि इसके इंसानी चेहरे पर घिन्न खाएं. खैर वह ट्रोल तो वैसे भी गाँव-देहात का था पता नहीं कहाँ चला गया पर ठीक अगले दिन सभी अखबारों में छपा कि देश के सारे गांवों में बिजली पहुँच गई है. अब ट्रोल यह भी नहीं कह सकते कि गाँव में बिजली नहीं है. सरकार बहादुर की इच्छा थी कि हमेशा मोबाईल चार्ज रखो और ट्रॉल्लिंग करते रहो. अब मोबाईल नहीं चार्ज होने का बहाना नहीं चलेगा. उधर ट्रोल परेशान हो गए कि अखबार में छपने से बिजली नहीं आ जाएगी.

एक बार एक टीवी पत्रकार को कुछ भ्रम हो गया. शायद पत्रकार होने का. उसने खबर चला दी कि कई गांवों में अब तक बस खम्भे ही गड़े है. ट्रोल बेचारा मोबाईल चार्ज कैसे करे. शागिर्द ने उसकी ऐसी दुर्दशा की कि आनंद बाज़ार का लुत्फ़ लेने वाला यह पत्रकार दुःख के गाँव में विलीन हो गया.

वैसे हम विकास के लहलहाती फसल और मेरे राज्य में चुनाव की बात कर रहे थे. मेरे राज्य पर इस शागिर्द की खास मेहरबानी थी. अब तक मैंने यह नहीं बताया कि यह शागिर्द कोई ऐसा-वैसा वाला शागिर्द नहीं था. पूरा पीएम मटेरियल था. कहते हैं कि वह सरकार बहादुर का दाहिना-बायाँ हाथ-पैर सब था.

खैर तो मेरे राज्य के चुनाव में इस शागिर्द की खास मेहरबानी थी. यहाँ चुनाव के बाद कुर्सी पर कौन बैठेगा यह सब पहले से तय था. बाकी के राज्यों में तो रूपया दिखाया गया और बाद में तख़्त पर चवन्नी नज़र आई. बाजू वाले सबसे बड़े राज्य में तो एकदम हॉलीवुड से पकड़ के लाये. अलबत्ता बोला जरुर गया कि देशी स्टाइल में काबिलियत साबित करनी पड़ेगी. वह हॉलीवुड वाला भी कमाल निकला. उस छेदीलाल ने एक महीने में ही अस्पताल में ऑक्सीजन ठप्प कर दी! और इस तरह ‘आर्ट ऑफ़ किलिंग’ का नायाब नमूना पेश किया. इसे देखकर सरकार बहादूर और शागिर्द दोनों परेशान हो उठे कि वे अबतक ऐसे ‘आर्ट ऑफ़ किलिंग’ से वाकिफ क्यों न थे.

बगल के राज्य की तरह हमारे राज्य में न बदनसीब वाला पुल गिरा, न नसीब वाला. कोई दुर्घटना ही नहीं हुई. राज्य के मुखिया को इंटरनेशनल खबर में आने का कोई चांस ही नहीं मिल रहा था. लोकल मीडिया का कोई झगड़ा नहीं था. सरकार बहादुर  का कहना था कि लोकल मीडिया मुट्ठी में है, कहो तो जेठ की दोपहरी को रात छपवा दे. पहले पन्ने पर अमीर को फ़कीर छपवा दे वो भी उसके तस्वीर के साथ.

विदेशी मीडिया को निशाना बनाओ तभी बात बनेगी. राज्य के मुखिया ने कहा चैलेंज एक्सेप्टेड! हैशटैग!! और फिर अमेरिका जा के ताल ठोक आये कि हमारे राज्य की सड़क बॉलीवुड की एक सफल अभिनेत्री के गाल से भी चिकनी है. इधर यह अभिनेत्री ख़ुशी के मारे अपने गाल सहलाने लगी. उधर वाशिंगटन वाले जवाब देने के लिए हॉलीवुड की हीरोइन से लीगल परमिशन लेने पहुँच गए. हॉलीवुड वाली परमिशन में ना-नुकुर करने लगी. नखरे दिखाती रही और उसी देरी ने सरकार बहादुर को देश को विश्वविजयी बनाने का मौका दे दिया. उधर इस लहलहाती फसल के कटने का समय नजदीक आ गया था….

(जितेन्द्र राजाराम  आजकल भोपाल में रहते हैं और सामाजिक राजनितिक बहस में खासा दिलचस्पी रखते हैं. इन विषयों को समझने -समझाने के लिए वे इतिहास और आंकड़ो  को अपना हथियार बनाते हैं. आप उनसे उनके नम्बर 9009036633 पर संपर्क कर सकते हैं.)

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