कोयला और कोयला संयंत्रों के दिन लद रहे हैं: रिपोर्ट

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नये संयंत्रों का निर्माण साल 2015 से 2017 के बीच 73 प्रतिशत नीचे गया है, चीन में कठोर नियंत्रण और भारत के 17 निर्माणाधीन संयंत्रों से निजी वित्त नियामकों के पीछे हटने का हुआ असर

उमंग कुमार/

पिछले दो साल से थर्मल पॉवर सयंत्रों की संख्या काफी नीचे जा रही है. यह ट्रेंड सिर्फ भारत में ही नहीं बल्कि पूरे विश्व में देखा जा रहा है.

साल 2017 में भी, लगातार दूसरे साल वैश्विक स्तर पर विकासशील थर्मल पावर संयंत्रों की संख्या नीचे की तरफ गयी है. सिएरा क्लब, ग्रीनपीस और कोलस्वर्म की रिपोर्ट में इसकी एक बड़ी वजह चीन और भारत में कोयला संयंत्रों में तेजी से हो रही कमी को बताया गया है. ‘उत्थान और पतन 2018: वैश्विक कोयला संयंत्र, पाइपलाइन पर एक नज़र’ नाम से जारी यह रिपोर्ट दुनिया भर के कोयला संयंत्र पाइपलाइन के सर्वे का चौथा संस्करण है. इस रिपोर्ट में बताया गया है कि नये बने कोयला संयंत्र में साल दर साल 28 प्रतिशत (पिछले दो साल में 41 प्रतिशत) गिरावट हुई है, और जो निर्माण शुरू हुए उनमें 29 प्रतिशत गिरावट दर्ज की गयी, वहीं अनुमित प्राप्त एवं प्रस्तावित संयंत्रों की योजनाओं में 22 प्रतिशत (पिछले दो सालों में 59%) की गिरावट हुई.

इस रिपोर्ट के अनुसार कोयला संयंत्रों में आ रहे इस गिरावट की बड़ी वजह चीन के द्वारा नये कोयला संयंत्रों पर कठोर नियम लगाना है, वहीं दूसरी और भारत में कोयला सेक्टर में निजी निवेश में कमी आना भी है. भारत में अभी 17 जगहों पर कोयला संयंत्र बनने का काम रुका हुआ है.

इस रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि पिछले तीन सालों में 97 गिगावाट के कोयला संयंत्र सेवानिवृत हो गए, इनमें अमरीका (45 गिगावाट), चीन (16गिगावाट) और ब्रिटेन (8 गिगावाट) शामिल हैं. पिछले दो दशक में इन संयंत्रों के सेवानिवृति रूझान को देखत हुए इस रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2022 में वैश्विक कोयला क्षमता का घटना शुरू हो जायेगा क्योंकि नये बनने वाले संयंत्र से ज्यादा पुराने सेवानिवृत संयंत्रों की संख्या हो जायेगी.

पिछले तीन सालों में 97 गिगावाट के कोयला संयंत्र सेवानिवृत हो गए, इनमें अमरीका (45 गिगावाट), चीन (16गिगावाट) और ब्रिटेन (8 गिगावाट) शामिल हैं

34 देशों की प्रतिबद्धता से समर्थित पूरी दुनिया में कोयले से चरणबद्ध तरीके से हटने का अभियान तेजी पकड़ रहा है. साल 2017 में, सिर्फ 7 देशों ने कोयला संयंत्र को एक से अधिक जगहों पर शुरू किया. हालांकि नये कोयला संयंत्र में गिरावट के बावजूद रिपोर्ट में चेताया गया है कि अभी वर्तमान में चालू कोयला संयंत्र की वजह से होने वाला उत्सर्जन पेरिस जलवायु समझौता में तय किये कार्बन बजट से कहीं ज्यादा होगा. कोयला उत्सर्जन को उस बजट में रखने के लिये नये कोयला संयंत्र को न लाकर पहले से चालू संयंत्र को भी जल्दी से जल्दी सेवानिवृत करना होगा.

कोलस्वर्म के निदेशक टेड नैस कहते हैं, “जलवायु और स्वास्थ्य के नजरीये से देखें तो कोयला संयंत्र में यह गिरावट एक अच्छा संकेत है, लेकिन यह उतनी तेजी से नहीं हो रहा, जितनी तेजी से होना चाहिए. सौभाग्य से सोलर और वायु ऊर्जा की उत्पादन क्षमता बढ़ने के कारण इनकी कीमतों में उम्मीद से ज्यादा गिरावट हो रही है और वैश्विक बाजार और नीति निर्माता इस चीज पर ध्यान दे रहे हैं”.

ग्रीनपीस के सीनियर वैश्विक कैंपेनर लॉरी मिल्लीविर्ता ने कहा, “लोगों के स्वास्थ्य के लिये कोयला पावर संयंत्र के निर्माण में गिरावट और सेवानिवृत हो रहे संयंत्र में बढ़ोत्तरी एक बेहतरीन खबर है. कोयला संयंत्र की वजह से होने वाले प्रदूषण से लाखों लोगों की पूरी दुनिया में समय से पहले मौत हो रही है. हालांकि निर्माणाधीन संयंत्रों में कमी के बावजूद अधिक्षमता (जरुरत से अधिक) की स्थिति चिंताजनक है, खासकर चीन, भारत और इंडोनेशिया जैसे देशों में जहां नये पावर संयंत्र अब भी आ रहे हैं.”

ग्रीनपीस इंडिया के सीनियर कैंपेनर सुनील दहिया कहते हैं, “अक्षय ऊर्जा की नयी संभावनाओं के भारत में आने से यह लगभग सभी मान चुके हैं कि नये कोयला पावर संयंत्र निवेश के हिसाब से सही नहीं हैं. हमारा विश्वेलषण यह दिखा रहा है कि अगर इस महंगे और गंदे ऊर्जा स्रोत कोयले से निकल कर हम सस्ते अक्षय ऊर्जा की तरफ बढ़ते हैं तो हमारे देश तथा पहले से कर्ज में डूबे बिजली वितरण कंपनियों का बहुत पैसा बचाया जा सकता है.”

सुनील आगे कहते हैं, “भारत के सभी कोयला पावर संयंत्र वायु प्रदूषण और जल उपभोग के लिये 2015 में पर्यावरण मंत्रालय द्वारा लाये गए अधिसूचना के नियमों का उल्लंघन कर रहे हैं. अगर इन नियमों का पालन करने से आज नहीं तो कल कोयले से बनने वाली बिजली का टैरिफ भी बढ़ेगा जो कि आने वाले समय में उपभोक्ताओं के जेब पर और भी भारी पड़ने वाला है.”

 

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