दिवाली मनाने से पहले जानें पटाखा उद्योग से जुड़ी कुछ ज़रुरी बातें

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अनिमेष नाथ/

दिवाली की तैयारियां जोर शोर से चल रही हैं. चारों तरफ इसी से जुड़ी चर्चा है. तमाम बातों में पटाखों पर होने वाली बहस भी शामिल है. दिल्ली जैसे शहरों में वायु प्रदूषण और इस पर सर्वोच्च न्यायालय के, पटाखे फोड़ने पर निर्देश ने इस मुद्दे को और हवा दी है. ऐसे में हमें थोड़ा इस पटाखा उद्योग के बारे में भी जान लेना चाहिए. आईये इस उद्योग के इतिहास, भूगोल और अर्थशास्त्र पर एक नज़र डालते हैं!

कोलकाता, जहाँ इस उद्योग की शुरुआत हुई

वर्तमान में शिवकाशी ही भारतीय पटाखा उद्योग का केंद्र है. हालाँकि पहले ऐसा नहीं था. 1990 के दशक की शुरुआत में दासगुप्ता नाम के एक व्यक्ति कलकत्ता और अब कोलकाता में एक माचिस की फैक्ट्री चलाते थे. उधर शिवकाशी में अकाल और सूखे का प्रकोप बढ़ा. इससे परेशान होकर दो भाई शान्मुगा नादर और पी अय्या नादर रोज़गार की तलाश में कोलकाता पहुंचे. रोज़गार की तलाश में वे दासगुप्ता की फैक्ट्री में पहुंचे और काम किया. यहाँ माचिस का काम सीखकर जब वे वापस लौटे तो शिवकाशी में उन्होंने अपना व्यापार शुरू कर दिया. जिस सूखे से परेशान होकर ये लोग यहाँ से गए थे उसी सूखे ने इन्हें पटाखे बनाने के लिए माहौल दिया. आपको बता दें कि गर्म मौसम पटाखों के लिए मुफीद होता है.

शिवकाशी और भारतीय सेना का संबंध

शिवकाशी में कई उद्योग सेना के लिए गोला बारूद का निर्माण करते हैं. दूसरे, यहाँ एक आतिशबाजी अनुसन्धान और विकास केंद्र भी है. इस केंद्र की शुरुआत उद्योगों हेतु गुणवत्ता और सुरक्षा के मानकों को स्थापित करने के दृष्टिकोण से की गयी थी. यहाँ कच्चे माल का परिक्षण, पटाखे के निर्माण प्रक्रिया और इसमें लगे मजदूरों की सुरक्षा पर अध्ययन होता है. पटाखा उद्योग कई दुखद घटनाओं का शिकार हो सकता है, इसको देखते हुए एफआरडीसी लागातार अनुसंधान कर इनकी संख्या में कमी लाने का प्रयास करती रहती है.

भारत पटाखे निर्यात क्यों नहीं करता है?

पटाखों के बड़े स्तर पर निर्माण को देखते हुए यह स्वाभाविक उम्मीद बनती है कि भारत पटाखों का निर्यात भी करता होगा. पर ऐसा नहीं है. वजह है, अनुपयुक्त भंडारण एवं सामान को भेजने के अपर्याप्त साधन. आयात करने वाले देश सख्त नियामक मानकों को लागू करते हैं, जिन्हें भारत पूरा करने में सक्षम नहीं रहा है. उदाहरण के लिए, ‘पर्यावरण संरक्षण कानून-1986’ के अनुसार, ऐसे पटाखों का निर्माण और विक्रय अवैध है जो पटाखा फोड़े जाने की जगह से चार मीटर की दूरी पर 125 डेसिबल या उससे अधिक आवाज करते हैं. लेकिन डेसिबल के स्तर को तय करने के लिए जरुरी तकनीक और दक्षता भारत में कम ही मौजूद है.सरकार लगातार इस क्षेत्र में सुधार लाने का कार्य कर रही है. उम्मीद की जा सकती है कि भारत जल्दी ही एक बड़े पटाखा निर्यात करने वाले देश के रूप में उभरेगा.

पटाखों का आयात और इससे जुड़ी समस्याएं

चूँकि पटाखों (गोला-बारूद) को विदेशी व्यापार महानिदेशक, पेट्रोलियम और विस्फोटक सुरक्षा संगठन(पीईएसओ)ने ‘नियंत्रित वस्तु’ की श्रेणी में रखा है इसलिए इसके आयात करने की इजाजत किसी को नहीं है. यह प्रतिबन्ध न केवल चीन से पटाखों के आयात पर है बल्कि अन्य देश जिसमें अमेरिका, स्पेन और जर्मनी हैं, से भी इनका आयात नहीं किया जा सकता. ऐसे में चीन से जो भी पटाखे देश में लाये जाते हैं वह बिल्कुल अवैध है.

चीन का भारत के पटाखा बाज़ार पर अतिक्रमण

सन् 1992 में पोटेशियम क्लोरेट पर बैन लगाया गया. इसके पहले बड़ी मात्रा में देश में इस रसायन का उपयोग होता था. जब इसको सल्फर के साथ मिलाया जाता है तो यह बहुत ही खतरनाक हो जाता है. यह देखते हुए भारत सरकार ने इसपर प्रतिबन्ध लगा दिया था. परन्तु चीन में यह प्रतिबन्ध नहीं है और वहाँ धड़ल्ले से इसका उपयोग होता है. वजह यह है कि क्लोरेट के सारे विकल्प इससे काफी महंगे हैं. इस तरह चीन इस सस्ते पर खतरनाक रसायन का इस्तेमाल करता रहा और भारत का पटाखा उद्योग चीन से मात खाता गया.

 

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