भारत ने विकास का ताज किया चीन के हवाले

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इंडियन एक्सप्रेस से साभार

सौतुक डेस्क/

हाल में आये नोटबंदी के बाद जमा हुए पुराने नोट और जीडीपी के नए आंकड़ो को देखते हुए अंग्रेजी की प्रतिष्ठित पत्रिका द इकोनॉमिस्ट ने लिखा है कि नोटबंदी से होने वाले जो फायदे गिनाये गए थे वो तो नहीं हुए पर भारत ने चीन को अपना ताज थाल में रखकर ज़रूर परोस दिया. वो ताज था सबसे तेजी से विकास कर रहे देश का ताज.

इस वित्तीय वर्ष के पहले त्रैमाषिक के आंकड़े बताते हैं कि देश का जीडीपी विकास महज 5.7 प्रतिशत रहा. पिछले साल इस समय में यह आंकड़ा 7.9 प्रतिशत था. इस दरम्यान चीन का जीडीपी विकास दर 6.9 प्रतिशत रहा था और इस तरह, भारत ने सबसे अधिक गति से विकास कर रहे देश का ताज चीन को पहना दिया.

द इकोनोमिस्ट ही नहीं और भी कई आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ नोटबंदी के कदम पर सवाल खड़े करते रहे हैं. जैसे द टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए साक्षात्कार में रिज़र्व बैंक के पूर्व गवर्नर रघुराम राजन कहा कि उन्होंने सरकार को पहले ही चेताया था कि नोटबंदी के तत्कालीन नुकसान इतने अधिक होंगे कि इसके दूरगामी फायदे नगण्य हो जाएंगे. जब सरकार के आतंकवाद ख़त्म करने, नकली नोट ख़त्म करने और काला धन ख़त्म करने वाले तीनो वादे गलत साबित हो रहे हैं तो अब सरकार यह कह कर अपना बचाव कर रही है कि नोटबंदी की वजह से देश को अन्य फायदे भी हुए हैं.

आपको बताते चलें कि हाल ही में जारी की गयी अपनी रिपोर्ट में रिज़र्व बैंक ने बताया था कि कुल 15.28 लाख करोड़ रुपये वापस आ चुके हैं. उस समय इन दो बड़े नोटों में तब 15.44 लाख करोड़ रुपये प्रचलन में थे. यानि कुल बड़े नोटों का 99 प्रतिशत वापस आ चुका है. जबकि सरकार का यह मानना था कि काला धन जमा किये लोग इसको जमा नहीं करेंगे.

नोटबंदी की वजह से होने वाले नुकसान का हवाला देते हुए राजन ने कहा है कि आज के समय में किसी भी तरह से यह नहीं कहा जा सकता कि नोटबंदी का कदम आर्थिक रूप से सफल कदम था.

पूर्व गवर्नर को लेकर कई सारे आकलन किये जाते थे कि उन्होंने नोटबंदी को लेकर क्या किया था. क्या यह योजना उनके ही कार्यकाल के दौरान बनी थी. राजन ने स्पष्ट किया है कि उन्होंने फ़रवरी 2016 में अपनी राय से सरकार को अवगत कराया था. इसके पश्चात रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया ने भारत सरकार को एक नोट भी जमा किया था जिसमे यह बताया गया था कि अगर सरकार ऐसा सोचती है तो इसके लिए किस तरह की तैयारी करनी पड़ेगी. उन्होंने स्पष्ट किया कि यद्यपि आरबीआई से सलाह ली गई थी पर कभी केंद्रीय बैंक को नोटबंदी सम्बंधित निर्णय लेने के लिए नहीं कहा गया था. सितम्बर में राजन का कार्यकाल ख़त्म हुआ और मोदी सरकार ने नवम्बर की शुरुआत में ही नोटबंदी का निर्णय ले लिया.

याद रहे कि देश के पूर्व प्रधानमंत्री और जाने-माने आर्थिक विशेषज्ञ मनमोहन सिंह ने पहले ही कहा था कि नोटबंदी से देश की जीडीपी में दो प्रतिशत अंक की गिरावट आएगी. नोटबंदी वाले फैसले के नौ महीने के भीतर ही यह साबित हो गया जब देश का जीडीपी घटकर  5.7 प्रतिशत हो गया.

यह तो बस आर्थिक नुकसान की बात हुई जो उस नोटबंदी के फैसले से हुआ है. इसके अतिरिक्त होने वाले नुकसान का तो कोई आंकड़ा ही नहीं है जैसे कितने घरों में शादियाँ रुक गईं, कितने लोगों का काम छूट गया इत्यादि. लगभग 200 लोग कतार में खड़े होने की वजह से गुजरे. यह आंकड़ा भी अखबारों की रिपोर्टिंग के आधार पर है. पैसों की कमी की वजह से अन्य दिक्कतें जैसे इलाज इत्यादि में आई कठिनाई का तो कोई हिसाब ही नहीं है. अपनी तरफ से तो सरकार ने इस तरह के नुकसान से सम्बंधित आंकड़ा भी तैयार करने की कोशिश नहीं की. जैसे यह मान लिया हो कि यह सब तो होना ही है.

मनमोहन सिंह की एक बात के सही होने पर यह देखना ज़रूरी है कि उन्होंने और क्या कहा था. उस समय के स्थिति को देखते हुए उन्होंने कहा था कि यह पहाड़ जैसा बड़ा कुप्रबंधन है. लोगों का करेंसी और बैंकिंग व्यवस्था से सम्बंधित विश्वास डगमगा गया है. उस पूरे फैसले को उन्होंने संगठित लूट करार दिया था.

लेकिन ऐसे भारी भरकम शब्द क्या जनता को समझ में आते हैं और क्या जनता सरकार को अपनी गलती पर अफ़सोस करने पर मजबूर करेगी.

 

 

 

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