पानी पानी रे: जब तू फिरे उम्मीदों पर.. फिर क्या ही हो

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उमंग कुमार/

केंद्र सरकार ने हाल ही में एक नया जल शक्ति (जल) मंत्रालय बनाया है. इसका उद्देश्य है देश में पानी की समस्या पर समग्र और एकीकृत दृष्टि से नीति बनाना और इससे निजात दिलाना. मंत्रालय ने 2024 तक भारत के हर घर में पाइप से पानी के कनेक्शन देने की महत्वाकांक्षी योजना की घोषणा की है. यह पंक्ति कानों को बहुत सुकून पहुंचती है.

लेकिन एक बार पानी की समस्या को गौर से समझें तो बेहतर तौर पर निर्णय ले सकते हैं कि सरकार का यह निर्णय कितना सही है.

देश के सामने वर्तमान का जल संकट इतिहास में अब तक के सबसे गंभीर जल संकट में से एक है. लगातार दो साल के कमजोर मानसून के बाद, 33 करोड़ लोग यानी देश की एक चौथाई आबादी – गंभीर सूखे से प्रभावित हैं. देश का लगभग 50 प्रतिशत हिस्सा सूखे जैसी स्थिति से जूझ रहा है.  विशेष रूप से पश्चिमी और दक्षिणी राज्यों में स्थिति गंभीर है. इन राज्यों में औसत से कम बारिश हुई है. चेन्नई में पानी की किल्लत रोज अखबारों में हैडलाइन बन रही है. यह कोई अकेला शहर नहीं है जहां पानी की ऐसी किल्लत हो रही है या होने वाली है.

नीति आयोग द्वारा 2018 में जारी कम्पोजिट वाटर मैनेजमेंट इंडेक्स (सीडब्ल्यूएमआई) रिपोर्ट के अनुसार, 21 प्रमुख शहरों में जिसमें  दिल्ली, बेंगलुरु, चेन्नई, हैदराबाद और अन्य शहर शामिल हैं, आने वाले कुछ सालों में भीषण पानी की किल्लत झेलने वाले हैं. ये 21 शहर 2020 तक शून्य भूजल स्तर तक पहुँच जाएंगे. इससे करीब 10 करोड़ लोगों के प्रभावित होने की सम्भावना है.

हालांकि, भारत की 12 प्रतिशत आबादी पहले से ही ‘डे जीरो’ से जूझ रही है. इस ‘डे जीरो’ से तात्पर्य वैसी स्थिति से है नगरपालिका या नगरनिगम सामान्य जलापूर्ति रोक देगा और पानी की राशनिंग शुरू हो जायेगी. देश के इस भीषण पानी की समस्या का मूल कारण है अत्यधिक भूजल की निकासी, देश की बेकार जल प्रबंधन प्रणाली और लागातार कई वर्षों से कम वर्षा का होना.

नीति आयोग की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2030 तक, देश में कुल पानी की मांग उपलब्ध पानी के करीब दोगुनी हो जायेगी. इसका तात्पर्य यह है कि करोड़ो लोगों के लिए गंभीर पानी की समस्या बस आने ही वाली है. इस रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि पानी की कमी की वजह से देश के सकल घरेलू उत्पाद में छह प्रतिशत का नुकसान हो सकता है.

नीति आयोग की रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि 2030 तक, देश में कुल पानी की मांग उपलब्ध पानी के करीब दोगुनी हो जायेगी

इतना कुछ जानने के बाद अब सरकार के हालिया निर्णय पर आते हैं. जब लाखों करोड़ो लोगों के पास साफ़ पानी उपलब्ध नहीं है वैसे में मंत्रालय ने अगले पांच साल में देश के सारे घरों में सप्लाई नल का पानी देने का वादा किया है.

पानी की आपूर्ति के लिए विशाल पाइपलाइन नेटवर्क बिछाने का मतलब है कि फिर से हम बुनियादी ढांचे को अधिक प्राथमिकता दे रहे हैं. इसके अलावा यह भी गौर करने की बात है कि अगर आपूर्ति करने के लिए पानी नहीं है तो सप्लाई किस चीज का होगा?

सरकार के इस घोषणा से पता चलता है कि पानी की समस्या और आने वाले समय में इससे जुड़े सामजिक और आर्थिक चुनौतियों को हम महसूस तक नहीं कर पा रहे हैं. देश का पूरा रुझान ‘बड़ा’ कुछ करने की तरफ है. जैसे बड़ा नेटवर्क बिछाने, विशाल भंडारण बांध बनाने इत्यादि.

जबकि समस्या का मूल ही कहीं और है. हम अबतक अपने स्थानीय जल निकायों की उपेक्षा करते आये हैं. वर्तमान में पानी से अधिक भूमि को महत्व दिया जाता है. जो पोखर, तालाब या अन्य जल निकाय सूख गए हैं उसका खुल कर अतिक्रमण किया जा रहा है. इसके अलावा कई भारतीय शहरों में पानी ठीक से वितरित नहीं किया जाता है. जैसे दिल्ली और मुंबई का उदाहरण लें. इन बड़े शहरों के कुछ क्षेत्रों को अधिक पानी उपलब्ध कराया जाता है. इन इलाकों में नगरपालिका के मानक यानी 150 लीटर प्रति व्यक्ति प्रति दिन (lpcd) से अधिक पानी उपलब्ध कराया जाता है जबकि इन्ही शहरों में बड़ी आबादी को 40-50 lpcd पानी भी नसीब नहीं होता.

इसके साथ ही पानी की समस्या इसलिए भी बढ़ रही है क्योंकि वर्तमान में जो पानी सप्लाई किया जा रहा है वह पेयजल के स्तर का है जिसकी जरुरत नहीं है.

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) कहता है कि एक व्यक्ति को अपनी बुनियादी स्वच्छता और भोजन की जरूरतों को पूरा करने के लिए रोजाना लगभग 25 लीटर पानी की आवश्यकता होती है. बाकी का उपयोग अन्य काम के लिए किया जाता है हिस्में गैर-पीने योग्य पानी से भी काम हो सकता है. जैसे कि घर की सफाई इत्यादि. इसके अतिरिक्त जल की बर्बादी भी एक बड़ी समस्या है. मौजूदा बुनियादी ढांचे के उचित रखरखाव की कमी के कारण शहरी क्षेत्रों में लगभग 40 प्रतिशत पाईप का पानी बर्बाद हो जाता है.

अब अगर सरकार इन सब मुद्दों को समझती तो आने वाले पानी के संकट से झूझने के लिए बड़े बड़े वादे न कर के छोटे छोटे कदम उठाती.

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