लोकसभा चुनाव: ‘एक व्यक्ति और एक वोट’ का विचार सिर्फ किताबी है!

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उमंग कुमार/

लोकसभा का चुनाव सर पर है. निर्वाचन आयोग और तमाम राजनितिक दल आपको आपके वोट का महत्व समझाते फिरेंगे. लेकिन क्या आपको मालूम है कि केंद्र के चुनाव के बाबत सारे नागरिकों का वोट एक समान नहीं है! सभी नागरिकों के वोट का वजन एक जैसा नहीं होता और इस तरह ‘एक नागरिक और एक वोट’ का कथन सिर्फ गिनती को ध्यान में रखता है वोट के वजन को नहीं.

उदाहरण के लिए सिक्किम और बिहार की तुलना करते हैं. सिक्किम में जहां छः लाख लोग मिलकर एक सांसद चुनते हैं वहीँ बिहार में 26 लाख लोग मिलकर एक सांसद चुनते हैं. तात्पर्य यह कि लोक सभा में सिक्किम के छः लाख लोग बिहार के छब्बीस लाख लोगों के बराबर हैं. 2026 में यह फासला और बढ़ेगा. तब बिहार का एक सांसद 28 लाख लोगों का प्रतिनिधित्व कर रहा होगा जबकि सिक्किम का एक सांसद महज सात लाख लोगों को संसद में अपनी जुबान देगा. किसी राज्य का सांसद कितने लोगों का प्रतिनिधित्व करता है यह जानने के लिए कृपया ग्राफ देखें.

भारत में इस विषम प्रतिनिधित्व के लिए भारत सरकार की जनसँख्या नियंत्रण नीति जिम्मेदार है. अगर आप इस कहानी के तह तक जाना चाहते हैं तो सत्तर के दशक में जाना होगा.

लोगों की जनसँख्या का आंकड़ा 2011 के जनगणना पर आधारित है

साठ और सत्तर के दशक में भारत में जनसँख्या विस्फोट हो चूका था. वर्ष 1961 में हुए जनगणना में पता चला कि भारत में एक दशक के भीतर हुए जनसँख्या विकास दर 20 प्रतिशत से भी अधिक हो गया है. ऐसा देश के इतिहास में पहली बार हुआ था. उन दिनों प्रतिवर्ष देश की जनसँख्या दो प्रतिशत के दर से बढ़ रही थी.

वर्ष 1951 की जनगणना में भारत की कुल जनसँख्या 36 करोड़ थी. अगले दस साल में यह बढ़कर 44 करोड़ हो गई. करीब आठ करोड़ का इजाफा. अगले दस सालों में भारत की जनसँख्या 54 करोड़ से भी अधिक हो गई. यह जनसँख्या विस्फोट राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय नीति-निर्माताओं के माथे पर बल लाने लगा था. जनसँख्या पर कई अध्ययन हो रहे थे और बुद्धिजीवी डराने में लगे थे कि अगर ऐसे ही जनसँख्या बढ़ती रही तो सबको रोटी और छत देना मुश्किल हो जाएगा. इस विस्फोट से घबराई भारत सरकार जनसँख्या नियंत्रण को लेकर पशोपेश में थी. नीतियां बनाई जा रहीं थी और येन केन प्रकारेण इनको अमल में लाने की कोशिश की जा रही थी. कांग्रेस के युवा नेता और इंदिरा गांधी के बेटे संजय गांधी, आपात काल और जबरन नसबंदी की कहानी तो सबने सुनी ही होगी.

समय बदला. आपातकाल ख़त्म होने की घोषणा हुई. लोक सभा का चुनाव हुआ और कांग्रेस बुरी तरह से पराजित हुई. वही दौर था जब नीति निर्धारक इस पर बहस कर रहे थे कि जबरदस्ती परिवार नियोजन की नीति अपनाएँ या ज्ञान-विज्ञान का सहारा लें. जनता इस जबरन नसबंदी से खार खाई हुई थी और यह मुद्दा पूरे चुनाव पर छाया रहा था. जनता पार्टी की नई सरकार ने इस नीति से तौबा किया और परिवार नियोजन के लिए प्रचार-प्रसार का रास्ता चुना.

इस प्रक्रिया में भारत की पहली राष्ट्रीय जनसँख्या नीति अस्तित्व में आई. सन 1976 में. डॉक्टर करण सिंह भारत के स्वास्थ्य और परिवार नियोजन मंत्री थे और उन्ही के नेतृत्व में यह पहली नीति बनाई गई. इस नीति में जनसँख्या नियंत्रण के लिए ढेर सारे उपाय अपनाने की बात की गई. इसमें नसबंदी करने वाले को आर्थिक मदद देने की बात की गई. सारे सरकारी विभागों को परिवार नियोजन को बढ़ावा देने में लगाने की बात की गई. इसी नीति में संसदीय प्रतिनिधित्व तय करने के लिए 1971 की जनगणना को ही स्थाई रूप से इस्तेमाल करने की बात भी की गई थी.

जब भारत ने 1971 में यह फैसला लिया था तो सांसदों की संख्या 543 थी.  तब देश की जनसँख्या 54.8 करोड़ थी. उस समय भारत में औसतन दस लाख लोग मिलकर एक सांसद चुनते थे.

लेकिन चालीस साल के बाद कहानी एकदम बदल गई है. अब भारत में करीब 22 लाख लोगों को एक प्रतिनिधि मिलता है. उत्तर के राज्यों में यह और विकृत रूप में मौजूद है बनिस्बत के दक्षिण के राज्यों में.

खैर 1971 में जनसँख्या के आधार पर राज्यवार सीटों का बंटवारा कर दिया गया. उसके बाद जनसँख्या के आधार पर सीट बढाने पर प्रतिबन्ध लग गया. आज राज्य के अन्दर जनसँख्या के आधार पर संसदीय क्षेत्र का दायरा बढ़ा या घटा सकते हैं पर उस राज्य में जनसँख्या के आधार पर सीट की संख्या नहीं बढ़ाई जा सकती है.

ऐसा इसलिए कि जो राज्य जनसँख्या नियंत्रण के उद्देश्य पर अच्छा काम करेंगे उनको संसंद में अपने प्रतिनिधि कम होने का डर न सताए. अब इस नीति का खामियाजा उन राज्यों के लोगों को उठाना पड़ता है जहां के प्रशासन ने जनसँख्या वृद्धि दर को कम करने में रूचि नहीं दिखाई.

उस नीति के अनुसार सन 2000 में इस नियम की समीक्षा होनी थी. लेकिन 2000 में संसद ने इसे आगे जारी रखने का फैसला किया. उस समय केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार थी. अब 2026 में इस फैसले पर पुनः विचार होना है. देखना यह है कि क्या सभी नागरिकों को संसद में बराबर प्रतिनिधित्व मिलेगा या आगे भी ‘एक नागरिक एक वोट’ के नारे से ही संतोष करना पड़ेगा.

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