केंद्र और आरबीआई के बीच जंग क्यों छिड़ी हुई है और क्या हैं इसके मायने?

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अगर भारत की अर्थव्यवस्था अच्छी तरह से चल रही है, तो सरकार को भारतीय रिज़र्व बैंक (आरबीआई) को वह धारा क्यों याद दिलानी पड़ रही है जिसका आजतक इस्तेमाल नहीं हुआ!

अनिमेष नाथ/

भारत के इतिहास में 2018 को इसलिए याद रखा जायेगा क्योंकि इस साल कई संस्थाएं सरकार के विरोध में खुलेआम लोगों के बीच आ गयीं. इसकी शुरुआत जनवरी, 2018 में हुई जब सर्वोच्च न्यायालय के चार प्रमुख न्यायधीश मीडिया के सामने आ गए. उन्होंने देश को यह बताने की कोशिश की कि न्यायपालिका में सबकुछ सही नहीं चल रहा है. अभी बीते महीने अक्टूबर में केन्द्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) में घामासान छिड़ गया. राफेल डील पर घिरती सरकार ने आनन्-फानन में सीबीआई प्रमुख को छुट्टी पर भेजने का फैसला कर लिया. अलबत्ता सरकार को अपना निर्णय बदलना पड़ा.

इन दो बड़े मामलों के बाद अब बारी आरबीआई की है. सरकार और केंद्रीय बैंक के बीच खाई इतनी बढ़ गयी है कि बैंक के एक अधिकारी को खुल कर बोलना पड़ा कि बैंक के रोजमर्रा के कार्य में सरकार अधिक हस्तक्षेप न करे. इसके जवाब में बुधवार को सरकार ने भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम की धारा 7 का हवाला देते हुए कहा कि केंद्र सरकार को बैंक को निर्देश देने का अधिकार है. आईये सवाल-जवाब के माध्यम से इस विवाद को अच्छे से समझते हैं.

आरबीआई अधिनियम में धारा 7 क्या है?

इस अधिनियम का प्रमुख हिस्सा यह है, “केंद्र सरकार समय-समय पर बैंक के गवर्नर से परामर्श लेकर बैंक को जनता के हितों को ध्यान में रखते हुए कुछ सुझाव दे सकती है.” स्पष्ट शब्दों में कहे तो सरकार कहना चाह रही है कि उसे आरबीआई को आदेश देने का अधिकार है.

यह इतना विवादस्पद क्यों है ?

यह प्रावधान पढने में सामान्य भले लग रहा है पर अगर सरकारी व्याख्या की मानें तो यह सरकार को वह शक्ति प्रदान करता है जिसके बूते सरकार बैंक को नियंत्रण में ले सकती है. देश के इतिहास में कभी भी इस प्रावधान का इस्तेमाल नहीं किया गया है, चाहे देश की आर्थिक स्थिति कितनी भी ख़राब क्यों न रही हो.

अब तक किसी भी सरकार ने इस अधिनियम को इस्तेमाल करने की आवश्यकता महसूस नहीं की. वर्तमान में अर्थव्यस्था में मंदी नहीं है, कोई वैश्विक संकट नहीं है और आरबीआई के गवर्नर उर्जित पटेल की नियुक्ति भी मोदी सरकार के कार्यकाल में हुई है. और इससे भी महत्वपूर्ण कि  सरकार यह दावा कर रही है कि देश की अर्थव्यवस्था में सबकुछ सही चल रहा है. फिर भी वर्तमान सरकार को इस प्रावधान को लागू करने की आवश्यकता क्यों महसूस हो रही है! यह संकेत देता है कि सबकुछ वैसा नहीं चल रहा है जैसा सरकार कह रही है.

यह वास्तव में किस प्रकार कार्य करेगा?

क्योंकि इससे पूर्व में कभी भी इस अधिनियम को लागू नहीं किया गया है, तो वास्तव में इसका क्या प्रभाव पड़ेगा, इसके बारे में कुछ नहीं कहा जा सकता. यदि सरकार वास्तव में धारा 7 को लागू करती है तो नियमानुसार यह प्रावधान उर्जित पटेल के प्रभाव को कम कर देगा और इस स्थिति में उर्जित पटेल के पास इस्तीफा देने के अतिरिक्त कोई विकल्प नहीं रह जाएगा.

केंद्र सरकार और आरबीआई के बीच सम्बन्ध कैसे ख़राब हुए?

गवर्नर उर्जित पटेल अपने कार्यकाल में सरकार के निर्देशों को लेकर बहुत ही लचीले रहे हैं. मोदी सरकार द्वारा लागू की गयी नोटबंदी की असफलता का खामियाजा भी आरबीआई को ही झेलना पड़ा और नोट बैन से लेकर डेटा जारी करने के तरीकों तक आरबीआई को कई प्रश्नों का सामना करना पड़ा है.

लेकिन पिछले साल से केंद्र और आरबीआई के बीच सम्बन्ध बिगड़ते हुए दिखाई पड़ रहे हैं. जून 2017 में आरबीआई ने वित्त मंत्रालय की एक टीम को मुद्रा नीति समिति के साथ मिलने के एक अनुरोध को ठुकरा दिया था. यह समिति केंद्रीय बैंकों की ब्याज दरों को निर्धारित करती है.

ज्वेलरी निर्माता मेहुल चौकसी एवं नीरव मोदी द्वारा पंजाब नेशनल बैंक में हुए 11,000 करोड़ रुपये के घोटाले को लेकर वित्त मंत्री अरुण जेटली ने बयान दिया था, “भारतीय प्रणाली में हम राजनेता उत्तरदायी मात्र हैं, नियामक नहीं.”  और इसी प्रकरण पर आरबीआई गवर्नर उर्जित पटेल ने बयान दिया था कि, “सार्वजानिक क्षेत्रों की बैंकों पर सरकार का नियंत्रण आरबीआई से अधिक है. सरकार के पास इन बैंकों के नियंत्रण को लेकर अधिक शक्तियां हैं.”

यह दोनों बयान सरकार और आरबीआई के बीच के विरोधी दृष्टिकोण की ओर इशारा करते हैं.

अप्रैल 2017 में नॉन-परफोर्मिंग एसेट या लाभ नहीं कमाने वाली संपत्तियों की पहचान को लेकर आरबीआई द्वारा नए संसोधित ढाँचे को पेश किया गया था. परन्तु सरकार का कहना है कि आरबीआई ने सरकार को अँधेरे में रखा है और वह नीतियां बनाये बिना इस संशोधन के साथ आगे बढ़ी है. परन्तु बिज़नस स्टैण्डर्ड अखबार के अनुसार सरकार ने इन संशोधित नीतियों एवं नए मानदंडों पर व्यापक रूप से सहमति व्यक्त की थी.

यह सब देखते हुए यह तो समझ में आ रहा है कि सरकार और केंद्रीय बैंक अर्थव्यवस्था को लेकर निश्चिंत नहीं है. और इससे भी बड़ी बात की मोदी सरकार सबकुछ अपने शर्त पर करने के बावजूद भी भारतीय संस्थाओं की मर्यादा को बचाए रखने में असफल रही है.

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