कर्ज माफी से किसानों का कितना भला होगा?

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सतीश राय/

आज 6 जून को किसानों को गोली मारने के एक साल पूरा होने के मौके पर कांग्रेस के अध्यक्ष राहुल गाँधी ने मंदसौर में किसानों को संबोधित करता हुआ. उन्होंने वादा किया कि अगर उनकी सरकार बनी तो दस दिन के अन्दर किसानों का कर्ज माफ़ कर दिया जायेगा.

जब भी ऐसी बात होती है तो समाज का एक तबका तुरंत ऐसे तर्क देने लगता है कि कर्ज समाधान नहीं है. हाँ, कर्ज माफी समाधान नहीं है, पर इस दफा कर्ज माफ इसलिए किया जाना चाहिए कि किसान खुद को कुछ हद तक सम्हाल सके. इसे बूस्टर डोज कह सकते हैं.

2006 में आई स्वामीनाथन रिपोर्ट लागू ना होने के कारण किसानों को फसलों के उचित दाम नहीं मिले, रिपोर्ट के अनुसार लागत पर डेढ़ गुना मुनाफा दिया जाना चाहिए था, वादे बहुत हुए, पर इसको पूरा करने का प्रयास भी कभी नहीं किया.

नतीजतन, किसानों पर साल दर साल कर्जा बढ़ता गया. आज आलम यह है कि बैंकों से लेकर सोसाइटी और साहूकारों तक के कर्जे के नीचे किसान दबा हुआ है. सीमांत और छोटे किसान साहूकारों और खाद-बीज बेचने वाले दुकानदारों के कर्जे के नीचे दबा है.

यह भी सच है कि किसी भी तरह की कर्ज माफ़ी इस वर्ग के किसान को फायदा नहीं पहुचायेगी. कर्ज माफी की वकालत करने वाले वर्ग को यह भी सोचना चाहिए कि छोटे और सीमांत किसानों को किस तरह फायदा पहुँचाया जा सकता है.

कर्ज माफी की वकालत करने वाले वर्ग को यह भी सोचना चाहिए कि छोटे और सीमांत किसानों को किस तरह फायदा पहुँचाया जा सकता है.

दरअसल, इनदिनों राजनीतिक पार्टियों से लेकर किसान संगठन तक कर्ज माफी को पॉपुलिस्ट आईडिया के बतौर भुना रहे हैं, इस जुमले के इस्तेमाल के साथ बड़ा वर्ग आपका साथ देने लगता है, तो कर्ज माफी फ़िलहाल ज़रूरी है, पर यह समाधान नहीं है.

तो समाधान क्या हो? बेहतर बीमा नीति! अब सवाल उठता है कि देश में प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना तो है, पर दरअसल यही योजना किसानों के जेब को खाली कर रही है. जैसे, यह योजना अनिवार्य तौर पर उन किसानों पर लागू होती है, जिन्होंने (KCC) किसान क्रेडिट कार्ड बनवा रखा हैं. इसके तहत खरीफ और रवि सीजन में उन किसानों बिना को सूचना दिए प्रीमियम की रकम काटी जाती है. इसके एवज़ में उन्हें किसी भी तरह की पावती या काग़ज़ नहीं दिया जाता है.

अगर आपने जीवन में अगर किसी भी तरह का बीमा कराया होगा तो आपको स्पष्ट जानकारी होगी कि किस बीमा कंपनी से आप बीमा करा रहे हैं. संबंधित जिम्मेदार अधिकारी के दस्तख़त की हुए पावती और बीमा के पूरे पेपर आपको दिए गए होंगे. लेकिन किसानों के साथ ऐसा नहीं होता. यहीं से किसानों को लूटने की प्रक्रिया शुरू होती है.

फ़सल नुकसान होने की स्थिति में किसानों को पता ही नहीं होता कि वो नुकसान बैंक से मांगे, जिला कॉलेक्टर से या उस गुमनाम बीमा कंपनी से.

किसान के खाते से बिना किसान को बताए बैंक पैसा काट लिया जाता है. ना कोई पावती दी जाती है, ना बीमा के कागज़. यहां तक कि किसानों को यह भी नहीं बताया जाता कि किस बीमा कंपनी ने आपका बीमा किया और प्रीमियम की रक़म ली. ऐसे फ़सल नुकसान होने की स्थिति में किसानों को पता ही नहीं होता कि वो नुकसान बैंक से मांगे, जिला कॉलेक्टर से या उस गुमनाम बीमा कंपनी से.

चलिए प्रीमियम से आगे बढ़ते हैं. यहां तक किसान इस मुग़ालते में रहता है या उसे रखा जाता है कि उसकी फ़सल का बीमा हो गया है. उसे लगता है कि फसल के नुकसान होने पर बीमा की रकम मिल जायेगी. लेकिन ऐसा नहीं होता.  असली खेल बीमा कंपनियों का यही से शुरू होता है. मसलन, बीमा कंपनियां केवल 3 स्तिथियों को नुकसानी में गिनती हैं:

  • अगर भुस्खलन से फ़सल ख़राब हो जाये, चूंकि मध्य में भूस्खलन के मामले ना के बराबर होते हैं, इसलिए इस मामले में प्रीमियम का फ़ायदा बीमा कंपनी को ही जाता है.
  • बाढ़ के कारण फ़सल डूब जाने पर.
  • ओले से हुए नुकसान पर बीमा कवर होता है, पर खरीफ़ के सीजन में कभी ओले नहीं गिरते, केवल रवि सीजन में ओले गिरते हैं. ऐसे में ये कहा जा सकता है कि खरीफ़ सीज़न में किसानों के प्रीमियम के पैसा का फ़ायदा केवल बीमा कंपनी को होता है.

दरअसल, खरीफ़ यानी बारिश के सीज़न में कीट- पतंगों, इल्लियों के हमले या जल जमाव के कारण रुट रॉट, तना गलन, या पीला मौजिक जैसी बीमारियों के कारण नुकसान होता है, पर इस तरह के नुकसान को बीमा में कवर नहीं किया जाता, पूरी बीमा नीति बहुत ही चतुराई से इस तरह से बनाई गई है कि इससे केवल बीमा कंपनी को फायदा हो और किसान लुटता चला जाये.

किसानों की बात करने वाले संगठनो को यह समझना होगा कि सरकार की ग़लत नीतियों के कारण किसान आज संकट में है. केवल पॉपुलिस्ट आईडिया पर बात करने से किसान और कृषि समृद्ध नहीं होगी. चर्चा दूरगामी समाधानों पर होनी चाहिए. लेकिन फिलहाल कर्ज माफ़ी फौरी समाधान जरुर हो सकती है.

(पूर्व में पत्रकार रहे सतीश राय आजकल किसानी और राजनीति के बीच की दूरी  को अपने कार्य क्षेत्र का विषय बनाए हुए हैं.  मध्य प्रदेश के सिवनी जिले में रह रहे सतीश वहाँ  के तमाम सामजिक मुद्दों  से गहरे जुड़े  हुए हैं.)

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